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डायरी के पन्ने- 8

16 मई 2013
1. शाम पांच बजे गुडगांव से एक प्रशंसक मिलने आये। नाम भूल गया। ज्यादातर घुमक्कडी पर ही चर्चा हुई।

18 मई 2013
1. दिल्ली में गर्मी बढती जा रही है। तापमान 45 डिग्री के पास पहुंच गया। कूलर अत्यावश्यक हो गया। पिछले साल से निष्क्रिय पडे कूलर को चेक किया। मोटर खराब। ठीक कराने गया तो 800 रुपये मांगे। 1600 का नया ले आया। साफ सफाई करके कूलर चालू किया। सीजन की पहली ठण्डी फुहारयुक्त हवा मिल गई।
2. लैपटॉप नखरे करने लगा। ऑन नहीं हुआ। कहने लगा पहले बूटेबल डिवाइस दो, तब चलूंगा। यार, बूटेबल डिवाइस तो तेरे ही अन्दर है। चल जा, नहीं तो बूटेबल की जगह बूट मिलेंगे। जाट किसी के नखरे नहीं झेला करता। खैर, नहीं चला।

19 मई 2013
1. प्रातःकालीन सेवा देकर घर आया। लैपटॉप ऑन किया, चल गया। आधे ही घण्टे बाद फिर ठप। अमित को दिखाया, कहने लगा इसे फारमेट करना पडेगा। मेरा सारा डाटा इसी में है, अभी फारमेट से मना कर दिया।
2. साइकिल से लद्दाख यात्रा के लिये तम्बू लेना पडेगा। यात्रा एक महीने की है। अगर 20 दिन भी तम्बू प्रयोग में ले लिया तो 200 रुपये रोजाना के हिसाब से इसकी कीमत वसूल हो जायेगी।

20 मई 2013
1. यार लोगों से लैपटॉप के बारे में सलाह ली। पोर्टेबल हार्ड डिस्क लेनी जरूरी लग रही है। साथ ही वर्तमान हार्ड डिस्क को बदलवाने की सलाह व बैटरी भी चेतावनी दे रही है। कम से कम दस हजार का खर्चा है।
2. लद्दाख साइकिल यात्रा खटाई में जाती दिख रही है। कारण आर्थिक है। जून के शुरू में 20000 रुपये की सालाना बीमा किश्त जाती है। गांव में निर्माण कार्य छेड रखा है। लैपटॉप भी खर्चा मांग रहा है। उधर स्वयं लद्दाख पर भी महीने भर में 15000 का खर्चा होना ही है। मोटे तौर पर 70000 का खर्चा सिर पर है। और आमदनी? तीस हजार। घर का एकमात्र कमाऊ सदस्य होने के कारण बचत भी नहीं होतीं। सारी उम्मीदें उधार पर हैं।
3. ‘प्रभात खबर’ पत्र से अवनीश मिश्रा जी का फोन आया। कह रहे हैं कि बुधवार तक एक लेख भेज दूं। लेकिन शर्त है कि लेख यात्रा वृत्तान्त न होकर ऐसा होना चाहिये कि कम प्रचलित पर्यटन स्थलों का उल्लेख व महिमा हो।
मैं केवल यात्रा वृत्तान्त लिखा करता हूं। अभी तक पत्र-पत्रिकाओं में मेरे जितने भी लेख छपे हैं, सभी यात्रा वृत्तान्त हैं। उन्हें ब्लॉग से कापी-पेस्ट करना ज्यादा आसान रहता है। अब प्रभात खबर की आवश्यकता के लिये मुझे बिल्कुल अलग तरीके से लिखना पडेगा। मैंने हां तो कर दी लेकिन मन नहीं था। कुछ देर बाद मन को तैयार भी किया लिखने के लिये लेकिन देखा लैपटॉप बन्द है। फिर लिखूं कैसे?
4. ‘चीनी यात्री फाहियान का यात्रा विवरण’ पढा। मूल पुस्तक चीनी में है, हिन्दी अनुवाद जगन्मोहन वर्म्मा ने किया। फाहियान का यात्रा मार्ग व स्थानों के वर्तमान नाम भी लिखे हैं। सन 400 में यात्रा शुरू की, 15 साल बाद समुद्री मार्ग से चीन पहुंचा। आया स्थल मार्ग से था हिमालय को पार करके, पेशावर में भारतभूमि पर पैर रखे उसने। उस समय भारतभूमि में दो धर्म थे- हिन्दू व बौद्ध। यात्रा वास्तव में दुस्साहस से भरी थी। बिल्कुल अनजान देश व अनजान भाषा वाले इलाके में जाना फाहियान की हिम्मत को दर्शाता है। वह त्रिपिटक की खोज में भारत आया था। पुस्तक नेशनल बुक ट्रस्ट, इण्डिया से प्रकाशित है।

21 मई 2013
1. ‘श्रीनगर का षडयन्त्र’ पढी। मूल रूप से विक्रम चन्द्रा द्वारा अंग्रेजी में लिखित व हिन्दी अनुवाद प्रभात रंजन ने किया। वाणी प्रकाशन ने प्रकाशित की है, पेपरबैक मूल्य 100 रुपये।
90 के दशक तक कश्मीर शान्त था। इसके बाद जो अलगाववाद की हिंसा भडकी, वो आज भी छिटपुट जारी है। पुस्तक वैसे तो उपन्यास है लेकिन सच्ची घटना ही प्रतीत होती है। कश्मीरियों की सरलता भी दिखाई गई है। वहां हिन्दू-मुसलमानों का कोई झगडा नहीं था, लेकिन नब्बे के दशक के आखिरी सालों में पाकिस्तानी आतंकवादियों ने जब घाटी में प्रवेश किया तो फिजा ही बदल गई। हिन्दुओं को भागना पडा। हालांकि भारतीय सुरक्षा बलों व उत्तम जासूसी तन्त्र द्वारा आज हालात कब्जे में हैं।

22 मई 2013
1. चार मुख्य खर्चे हैं- वरीयता क्रम में बीमे की किश्त, घर की मरम्मत, लद्दाख यात्रा व लैपटॉप। पिताजी से बात हुई। वहां अब ज्यादा पैसों की आवश्यकता नहीं है। पिताजी से कह दिया कि अगर जरुरत पडेगी तो उधार कर लेना। चुकता होने में ज्यादा देर नहीं लगेगी। लैपटॉप का कायापलट करने की बजाय दो-ढाई हजार लगाकर काम चलाऊ कर दिया जायेगा।
लद्दाख जरूर जाना है। ऐसा मौका बार-बार नहीं मिलता कि ऑफिस में पर्याप्त आदमी हों और कोई भी छुट्टी न ले रहा हो।
2. डॉ. करण की शादी है कल। जाने का इरादा था, ड्यूटी भी बदल ली थी, लेकिन गर्मी को देखते हुए जाने का मन नहीं है। दिल्ली में ही यह हाल है कि रात में भी लू चल रही है। झुंझनूं में हालांकि रात में लू नहीं चलती, लेकिन दिन दिल्ली से भी गर्म होता है।
3. ‘प्रभात खबर’ के लिये लेख नहीं लिख पाया। आज अवनीश जी का फोन आया। लैपटॉप तो खराब है ही, सोच रहा हूं कि बाहर किसी कम्प्यूटर पर लिखकर मेल कर दूं। लेकिन बाहर मूड नहीं बनेगा लिखने का, इसलिये एक कागज पर लिखकर टाइप कर दूंगा। बडा श्रमसाध्य व समयसाध्य कार्य है। लेकिन वचन दे रखा है तो लिखना पडेगा।

23 मई 2013
1. नाइट ड्यूटी थी। समय निकालकर प्रभात खबर के लिये लेख लिख दिया। लेख में प्रवाह नहीं बन पाया। बनेगा भी कैसे? बुधवार तक दे देना था, आज गुरूवार है। एक तो जल्दबाजी में, दूसरे लैपटॉप नहीं, कागज पर लिखना पडा। लेख अवनीश जी की मेल पर भेज दिया। साथ ही यह भी जोड दिया कि अगर पारिश्रमिक देना हो तो चेक इस पते पर भेजा जाये। दूसरे, चेक पर नाम नीरज कुमार लिखा जाये। जब पहले पहल दैनिक जागरण में मैंने लेख भेजा था तो कुछ अता-पता नहीं था मुझे। कुछ दिन बाद चेक आया नीरज जाट के नाम से। खाता नीरज कुमार के नाम से है, भला जाट नामधारी चेक किस काम का? वापस भेजना पडा। तब से यही नियम बना लिया है कि लेख भेजते समय ही अपना नाम भी बता देना है। सामने वाले का पैसे देने का मन हो या न हो, यह अलग बात है।
2. भयंकर गर्मी। करण की शादी में जाना रद्द। दिल्ली में ही जब 45 तक पारा पहुंच गया है, राजस्थान में झुंझनूं में और भी बुरा हाल हो रहा होगा। लोग इतनी गर्मी में शादी की कैसे सोच लेते हैं? ना घराती खुश होते होंगे, ना बाराती। विवाह केवल सर्दियों में होने चाहिये।

24 मई 2013
1. लैपटॉप का मामला बडा अजीब सा लग रहा है। हर तरह की सलाह मिली- बैकअप लेने की सलाह सर्वोपरि रही। अमित को इसकी जिम्मेदारी सौंपी। वो मेट्रो में तो मेरे समकक्ष ही है लेकिन चीजों की खरीद-बेच में उस्ताद है। वह पोर्टेबल हार्ड डिस्क व नई हार्ड डिस्क लेने का प्रबल हिमायती था। मेरे पास आजकल लिखने को कुछ नहीं है, इसलिये लैपटॉप की न्यूनतम आवश्यकता है। मैंने खर्चा कम करने के लिये किसी भी तरह की हार्ड डिस्क लेने से मना कर दिया। इसके बदले 32 जीबी का मेमोरी कार्ड लूंगा। दूसरे, बैकअप लेने के बाद लैपटॉप को फॉरमेट भी कर दिया। विंडो दोबारा इंस्टाल की। ठीक चलने लगा। आज सात-आठ घण्टे चालू रखा, कोई परेशानी नहीं आई।

25 मई 2013
1. कादम्बनी से 1500 रुपये का चेक आया। वहां मैंने रूपकुण्ड वृत्तान्त भेजा था। खुशी की बात तो खैर है ही, आमदनी होने पर किसी का मुंह नहीं फूलता। यार लोगों से इस बात का जिक्र किया तो सलाह मिली, इन्हें दावत में उडा दे। पार्टी मांगने लगे। मैंने कहा यात्रा करने, फिर उसे लिखने में बहुत ज्यादा खर्च होता है। जिस दिन मुझे उस खर्च के ऐवज में चन्दा मिलने लगेगा, उसी दिन से आमदनी होने पर पार्टी भी करने लगूंगा। आज सरकारी छुट्टी है बुद्ध पूर्णिमा की, कल रविवार है। सोमवार को चेक को बैंक में डालकर आऊंगा।
2. कई दिन पहले 27 दिन की छुट्टी के लिये आवेदन किया था। मई के आखिर में ही पता चलेगा कि छुट्टी मिलेगी या नहीं। इसी सिलसिले में प्रबन्धक साहब से बात हुई। उन्होंने 27 दिन की छुट्टी में असमर्थता जता दी, कहा कि 20 दिन की ले लो। मैंने 20 दिन की लगा दी। पहले नुब्रा घाटी, पेंगोंग झील व चामथांग इलाके को भी देखने का इरादा था। अब 7 दिन कम होने से चांगथांग से मन हटाना पडेगा। शायद पेंगोंग से भी।

26 मई 2013
1. बोकारो से अमन का फोन आया। उन्होंने बताया प्रभात खबर में मेरा लेख छपा है। दोपहर मैंने प्रभात खबर की खोज शुरू की, नहीं मिला।

27 मई 2013
1. ढाई किलो आम लाया। कुछ दिन पहले तक बडे बुरे आम आ रहे थे। थे तो पके लेकिन खटासयुक्त। तब मैं एक किलो आम में आधा किलो दूध व चीनी मिलाकर मैंगो शेक बना लिया करता था। अब रसीले आम आने लगे हैं। इन्हें चूसने व काटकर खाने में ज्यादा आनन्द आता है। आज जब इसी आनन्द में डूबा था तो फेसबुक पर लिख दिया, जो आम नहीं खाता, उसे मनुष्य होने पर धिक्कार है। इस बात पर अच्छा वाद-विवाद हुआ। तीन तरह के मनुष्य सामने आये- पहले वे जो आम खाते हैं, दूसरे वे जो आम इसलिये नहीं खाते कि यह खतरनाक कार्बाइड से पकाया जाता है, तीसरे वे लोग जो कहते हैं कि देश में भीषण गरीबी है, एक तरफ लोग भूखे पेट सोते हैं, हम आम खाएं?
मुझे दूसरे नम्बर वालों से सहानुभूति है क्योंकि वे जल्दी बीमार हो जाते हैं। अपने समय व आमदनी का काफी हिस्सा वे चिकित्सक को देते हैं। और तीसरे नम्बर वालों से कोई लगाव नहीं क्योंकि वे ठहरे समाजसेवक। पहले गरीब आदमी का पेट भरेगा, तब वे भरपेट खायेंगे। मैं समाज-बिगाडक जीव हूं, भला समाज-सुधारकों से क्या लगाव?
2. नाइट ड्यूटी करके आया। साथ में मनदीप भी। उसे आज बाराखम्भा रोड स्थित मेट्रो भवन जाना था। मेरा भी कई महीनों से मेट्रो भवन का एक काम अटका पडा है, मैं भी चल दिया।
असल में जनवरी में जब मैं लद्दाख गया था, तो सरकारी खर्चे से गया था। उसके एडवांस के लिये आवेदन किया था। चेक भी बन गया लेकिन आलस तेरा बुरा हो, मैं चेक लेने नहीं गया। यात्रा हो गई, जनवरी निकल गई, फरवरी निकल गई, इसी तरह मई भी निकलने को आ गई, 8100 का चेक था। आज जबकि नाइट ड्यूटी की थी, नींद चरम पर थी, मनदीप के साथ निकल पडा।
मेट्रो भवन गया, चेक मिल गया लेकिन इसकी मियाद तीन महीनों की ही थी। आज पांच महीने बाद यह किसी काम का नहीं। पहले तो एकाउण्ट वालों ने मुझे धिक्कारा। बाद में कह दिया जाओ, तुम्हारे खाते में पैसे आ जायेंगे।
3. जब कनॉट प्लेस आया हूं तो एक तम्बू भी ले लेता हूं। यहां ट्रेकर्स पाइंट के नाम से एक दुकान है। पहुंच गया। दो आदमियों वाला तम्बू लेना था, नहीं मिला। उसकी बजाय 6000 रुपये का तीन आदमियों वाला मिला। मैं भला इसे क्यों लेता जबकि मुझे पता था कि एडवेंचर 18 नामक दुकान में दो आदमियों वाला 3000 से कम में मिल जायेगा?
4. एडवेंचर 18 धौला कुआं के पास है। हिम्मत बटोरकर चल पडा। राजीव चौक से एम्स के लिये मेट्रो पकडी। एक सरदारजी मिले, बुजुर्ग थे। उन्हें भी एम्स ही जाना था। प्लेटफार्म पर मेट्रो की पूछताछ कर रहे थे। मैंने जब कहा कि मेरे साथ आओ तो साथ हो लिये। मेरी बढी दाढी देखकर पूछने लगे कि बेटा, मुसलमान हो या सरदार? मैंने कहा, नहीं बाबा, हिन्दू हूं। बोले बेटा, सरदार लग रहे हो।
5. एम्स से धौला कुआं की बस पकडी। एडवेंचर 18 पहुंचा। दो आदमियों का तम्बू 3000 का। मेरी जेब में 5500 रुपये थे। 2400 रुपये का एक ट्रेकिंग बैग ले लिया। 200 रुपये का एक छोटा सा थर्मामीटर भी। बिल बना तो छूट भी मिली। 5100 का खर्च आया। मैट्रेस भी लेने का मन था लेकिन उसके लिये 700 रुपये जेब में नहीं थे। वापस शास्त्री पार्क आकर सो गया।

28 मई 2013
1. कल अवकाश है, आज गांव जाना है। महीना हो गया गांव गये हुए। अगर आज नहीं गया तो अब जुलाई में ही जाना होगा। सोचा साढे दस वाली पैसेंजर पकडूंगा। पहले क्वार्टर पर गया। लद्दाख यात्रा के मद्देनजर कुछ व्यायाम किया, थकान हुई तो लेट गया। उठा तो दो बज रहे थे। साढे दस वाली ट्रेन तो जा ही चुकी है, पौने दो वाली भी गई। अब पौने चार बजे पुरानी दिल्ली से शालीमार पकडूंगा।
शाम साढे छह बजे मैं गांव में था।

29 मई 2013
1. आज वैसे तो अवकाश है लेकिन कल चूंकि नाइट ड्यूटी है, इसलिये आज ही रात दस बजे तक ऑफिस पहुंच जाना है। घर पर पडा ही रहा, कुछ नहीं किया, शाम साढे छह बजे चल दिया। चलते समय ताई ने आम का मीठा अचार एक डिब्बे में भरकर दे दिया। घर पर निर्माण कार्य चल ही रहा है। पैसों की दरकार थी। मैंने कहा इस बार नहीं। एक महीना उधार कर लो, अगले महीने सब चुक जायेंगे।
प्लास्टिक का एक बोरा साइकिल रखने के लिये, बीस पच्चीस मीटर सुतली तम्बू के लिये ले लिये। साथ ही एक पतले से फुट भर के सरिये को लुहार से ऐसा बनवा दिया, जैसा पंक्चर वाले रखते हैं, टायर खोलने के लिये।
2. ठीक साढे सात बजे शाम मेरठ छावनी स्टेशन पर हरिद्वार अहमदाबाद मेल आ गई। जनरल डिब्बे ठसाठस भरे थे, फिर भी ऊपर वाली सीट पर सोते एक लडके को उठाकर बैठने की जगह बन गई। नीचे कुछ मुसलमानी बैठी थीं। एक सीट पर तीन ही थीं, बीच में एक बच्ची लेटी थी, सोई नहीं थी। कई यात्रियों ने मगजमारी कर ली लेकिन वे नहीं हिलीं। जनरल डिब्बों में नीचे वाली बडी सीटों पर पांच आदमी आराम से बैठ सकते हैं, भीड हो तो छह सात भी। ज्यादातर महिलाओं की यही समस्या है कि जब तक उन्हें सीट नहीं मिलेगी, वे मिमियाती रहेंगी और जब सीट मिल जाये तो गुर्राने लगती हैं।
3. एक मित्र से बात हुई- लडकी से। वह मुझे ब्लॉग के ही माध्यम से जानती है। यदा-कदा औपचारिक बात होती रहती है यद्यपि वह भी दिल्ली में ही रहती है। मूल रूप से हरियाणा की है, दिल्ली में सरकारी नौकरी करती है। एक नम्बर की जिन्दादिल व हंसोड। मैंने उसका फोटो देखा है, सुन्दर भी है। मार्शल आर्ट भी जानती है और ध्यान साधना भी करती है। उसने बताया- वह विवाह नहीं करना चाहती। घरवाले पूरी जुगत से लगे हैं। कई लडके वालों ने मना भी कर दिया। घरवाले सोचते हैं कि इतनी काबिल लडकी व लडके वाले मना कर रहे हैं, अवश्य कोई भूत-बला है। इसके लिये हवन-अनुष्ठान भी होता रहता है।
अगले दिन पता चला कि वह एक लडके से प्यार करती है। और आज से नहीं, कम से कम दस सालों से। सामाजिक रूप से लडकी नीची जाति की है, लडका उच्च जाति का। बदलाव की हवा चल तो रही है लेकिन बहुत मद्धम गति से। लडके के घरवाले इस रिश्ते के लिये पहले ही दिन से राजी हैं। लडकी वालों ने कह दिया है कि इस लडके से विवाह नहीं करेंगे। और लडका भी ऐसा वैसा नहीं है, सेना में अधिकारी है। गधे से विवाह कर देंगे, लेकिन इससे नहीं करेंगे। लडकी चाहती तो घर से भाग सकती थी, ससुराल में सब बैठे हैं उसके स्वागत के लिये। लेकिन कहती है- मैं तो अबला हूं। घर वाले जिससे भी विवाह करेंगे, उसी से कर लूंगी। मैंने उसे भडकाने की कोशिश की- नहीं, तू अबला नहीं है। नासमझ भी नहीं है। मानसिक रूप से पूर्ण परिपक्व है। किसी गधे से विवाह जरूर कर लेगी, लेकिन अपने सारे सपनों का दमन करके, सारी इच्छाओं का गला घोंटकर तू जीवित नहीं रह सकेगी। घरवालों के प्रति कठोर बन। उन्हें एहसास होना चाहिये कि भले ही उनकी बेटी उनसे बीस तीस साल छोटी हो, लेकिन मानसिक रूप से बहुत बडी है। लेकिन चूंकि कई जगहों से रिश्ते आए और टूट गए, इसलिये उसे अभी भी यकीन है कि आगे भी रिश्ते इसी तरह टूटेंगे, बाद में घरवालों को उसी से विवाह करना पडेगा, जो दस सालों से तैयार है।
मैं चाहता हूं कि घरवाले बच्चों की इच्छाओं का सम्मान करे। और समाज इतना जालिम है कि अगर बच्चों ने- चाहे लडका हो या लडकी- अपना सिर उठाना चाहा, उसे कुचलने में देर नहीं करता। कोई दारू पीये- सौ नशे करे, कोई कलंक नहीं, नालियों में पडा रहे, कोई कलंक नहीं, हजार अपराध करे, कोई कलंक नहीं, लेकिन कोई अगर अपनी मर्जी से विवाह करने या न करने का फैसला ले ले तो नाक कट जाती है। इस मुद्दे पर लडके व लडकी में ज्यादा फरक नहीं। लडकों को डर होता है कि समाज उन्हें अबल कहेगा, नपुंसक कहेगा। उधर लडकी पहले ही खुद को अबला घोषित कर देती हैं। सम्पत्ति हैं बच्चे। जैसा घरवाले चाहेंगे, वैसा करना होगा। धिक्कार है!

ओशो का कथन याद आता है-
“सारा जगत कहता हो कि यह है सत्य और अगर आपको सत्य नहीं मालूम पडता तो कर दें उपेक्षा उस पूरे जगत की, समस्त उस जनमत की- सारे जगत के कहने की, सारे जगत के कथन की। दुनिया के तीर्थंकर कहते हों, अवतार कहते हों, बुद्ध पुरुष कहते हों, पैगम्बर कहते हों लेकिन आपका विवेक नहीं कहता है, तो कर दें उपेक्षा उस सारे सालों के इतिहास की और परम्परा की।...
... उपेक्षा जरूरी है और यह कहना जरूरी है कि चुप! बस, मैंने सुन ली सारी बातें, अब मैं उस खोज को जाता हूं जहां मैं जानूंगा। न ही मैं बाइबिल ले जाना चाहता अपने साथ, न गीता, न कुरान, न मैं कृष्ण का हाथ पकडना चाहता, न महावीर का, न बुद्ध का। हाथ मुझे भी दिये हैं भगवान ने, मैं अपने हाथ से खोज शुरू करता हूं। नहीं पकडूंगा किसी का हाथ, न किसी गुरू का, न किसी शास्त्र का। ... इतनी उपेक्षा हमारे भीतर हो, हम गुरू को कह सकते हों कि क्षमा करो और मुझे अकेला जाने दो। अब नहीं मैं आपकी पूंछ पकडकर चलूंगा। नहीं, अब कृपा करो! मुझे जाने दो। मैं अनुगमन नहीं करूंगा। अब मैं अपनी आंखों से, अपने पैरों से चलना चाहता हूं। ... जो आपका विवेक कहता है उसके अतिरिक्त सारी चीजें उपेक्षा कर देने जैसी हैं।”
(ओशो, प्रभु की पगडंडियां)


डायरी के पन्ने-7 | डायरी के पन्ने-9




Comments

  1. diary ki panne achhe lage laptop bhi tjik ho gaya hoga.................

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  2. ok best of luck for laddhak trip

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  3. oso ka katan gyan vardak or accha laga.....

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  4. Pangong miss mat karna, mai ye galti kar chuka hun !

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  5. मैं समाज-बिगाडक जीव हूं, भला समाज-सुधारकों से क्या लगाव?

    ye huyee na baat............

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  6. डायरी का सब से मजबूत अंश ...
    एक मित्र से बात हुई- लडकी से। वह मुझे ब्लॉग के ही माध्यम से जानती है। यदा-कदा औपचारिक बात होती रहती है यद्यपि वह भी दिल्ली में ही रहती है। मूल रूप से हरियाणा की है, दिल्ली में सरकारी नौकरी करती है। एक नम्बर की जिन्दादिल व हंसोड। मैंने उसका फोटो देखा है, सुन्दर भी है। मार्शल आर्ट भी जानती है और ध्यान साधना भी करती है। उसने बताया- वह विवाह नहीं करना चाहती। घरवाले पूरी जुगत से लगे हैं। कई लडके वालों ने मना भी कर दिया। घरवाले सोचते हैं कि इतनी काबिल लडकी व लडके वाले मना कर रहे हैं, अवश्य कोई भूत-बला है। इसके लिये हवन-अनुष्ठान भी होता रहता है।
    अगले दिन पता चला कि वह एक लडके से प्यार करती है। और आज से नहीं, कम से कम दस सालों से। सामाजिक रूप से लडकी नीची जाति की है, लडका उच्च जाति का। बदलाव की हवा चल तो रही है लेकिन बहुत मद्धम गति से। लडके के घरवाले इस रिश्ते के लिये पहले ही दिन से राजी हैं। लडकी वालों ने कह दिया है कि इस लडके से विवाह नहीं करेंगे। और लडका भी ऐसा वैसा नहीं है, सेना में अधिकारी है। गधे से विवाह कर देंगे, लेकिन इससे नहीं करेंगे। लडकी चाहती तो घर से भाग सकती थी, ससुराल में सब बैठे हैं उसके स्वागत के लिये। लेकिन कहती है- मैं तो अबला हूं। घर वाले जिससे भी विवाह करेंगे, उसी से कर लूंगी। मैंने उसे भडकाने की कोशिश की- नहीं, तू अबला नहीं है। नासमझ भी नहीं है। मानसिक रूप से पूर्ण परिपक्व है। किसी गधे से विवाह जरूर कर लेगी, लेकिन अपने सारे सपनों का दमन करके, सारी इच्छाओं का गला घोंटकर तू जीवित नहीं रह सकेगी। घरवालों के प्रति कठोर बन। उन्हें एहसास होना चाहिये कि भले ही उनकी बेटी उनसे बीस तीस साल छोटी हो, लेकिन मानसिक रूप से बहुत बडी है। लेकिन चूंकि कई जगहों से रिश्ते आए और टूट गए, इसलिये उसे अभी भी यकीन है कि आगे भी रिश्ते इसी तरह टूटेंगे, बाद में घरवालों को उसी से विवाह करना पडेगा, जो दस सालों से तैयार है।
    मैं चाहता हूं कि घरवाले बच्चों की इच्छाओं का सम्मान करे। और समाज इतना जालिम है कि अगर बच्चों ने- चाहे लडका हो या लडकी- अपना सिर उठाना चाहा, उसे कुचलने में देर नहीं करता। कोई दारू पीये- सौ नशे करे, कोई कलंक नहीं, नालियों में पडा रहे, कोई कलंक नहीं, हजार अपराध करे, कोई कलंक नहीं, लेकिन कोई अगर अपनी मर्जी से विवाह करने या न करने का फैसला ले ले तो नाक कट जाती है। इस मुद्दे पर लडके व लडकी में ज्यादा फरक नहीं। लडकों को डर होता है कि समाज उन्हें अबल कहेगा, नपुंसक कहेगा। उधर लडकी पहले ही खुद को अबला घोषित कर देती हैं। सम्पत्ति हैं बच्चे। जैसा घरवाले चाहेंगे, वैसा करना होगा। धिक्कार है!

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  7. पढ़ने की रुचि आपकी यात्राओं को बहुत अर्थमयी बना देगी।

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  8. कश्मीर की प्रवृतियों के बारे में बढ़िया पुस्तक लिखी है श्री जगमोहन ने "माय फ्रोजेन टरबुलेंस इन कश्मीर"

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  9. Jo bhi aapki aalochna karta hai wo aapse 100% jalta hai.

    Salahuddin Ahmed, Meerut















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  10. डायरी के पन्ने पढ़कर यूँ लगा साथ ही चल रहा हूँ।

    टेंट लिया, बैग लिया, एक कैमरा भी रख लेना, कुछ अच्छी तसवीरें होंगी तो हमारी भी लदाख यात्रा हो जायेगी,
    लदाख यात्रा के लिए शुभकामनाएं।

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  11. नीरज जी आपकी डायरी पढता ही चला गया, आपके लेखन में गहराई हैं. एक बात कहना चाहूँगा, कि आपने लिखा हैं कि हिंदू और बोद्ध दो धर्म थे. और बाद में आपने सरदार जी की बातो पर बताया हिंदू. नीरज जी धर्म केवल एक हैं सनातन हिंदू धर्म. भगवान बुद्ध विष्णु जी के दसवे अवतार माने जाते हैं. हिंदू और बोद्ध में कोई अंतर नहीं हैं. बोद्ध और सिक्ख पंथ सनातन हिंदू धर्म की ही सुधारवादी शाखाए हैं. सभी भारतीय धर्म और पंथो का उद्गम सत्य सनातन हिंदू धर्म हैं. वन्देमातरम...

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  12. BAHUT SUNDER
    APNI NAI TAMBU KI PHOTO DALIYE
    HAME V KAREDNI HAI

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  13. भाईसाहाब.... प्रणाम! आप कितने महान इन्सान है!! आप फिर लदाख के लिए प्रयाण कर रहे है। आपके कारण अतीव आनंद तथा उत्साह का अनुभव होता है.... आपकी महानता शब्दों में नही बतायी जा सकती है...... आप एक ऐसे इन्सान है, जिनका जीवन जीने के लिए प्रेरणा देता है। आपका बहुत बहुत आभारी एवम् आपसे प्रेरित हुँ। यात्रा के लिए शुभकामनाएँ।

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  14. नीरज भाई ये पन्ने आपकी डायरी के सबसे उत्कृष्ट पन्ने हैं पढ़ कर मजा आ गया

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  15. लद्दाख यात्रा जिन्दाबाद।

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  16. Its been a long since you updated your blog.
    Hope all is well at your end
    Take care
    Stone

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  17. नीरज जी आप कहाँ हैं? आपका कोई समाचार नहीं मिल रहा है।
    आशा है सकुशल होंगे।

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  18. नीरज भाई कहाँ हो सबको चिंता हो रही है कभी कभार ताज़ा हाल लिख दिया करो

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  19. नीरज भाई कहाँ हो ,आपकी डायरी पडकर बहुत अच्छा लगा !

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  20. सफ़र से आ गए हो कुछ तो लिखो

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  21. नीरज भाई सफ़र से आये हुए एक हफ्ता हो गया कुछ तो लिखो आपके प्रशंसक नए यात्रा विवरण का इंतजार कर रहे हैं

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46 रेलवे स्टेशन हैं दिल्ली में

एक बार मैं गोरखपुर से लखनऊ जा रहा था। ट्रेन थी वैशाली एक्सप्रेस, जनरल डिब्बा। जाहिर है कि ज्यादातर यात्री बिहारी ही थे। उतनी भीड नहीं थी, जितनी अक्सर होती है। मैं ऊपर वाली बर्थ पर बैठ गया। नीचे कुछ यात्री बैठे थे जो दिल्ली जा रहे थे। ये लोग मजदूर थे और दिल्ली एयरपोर्ट के आसपास काम करते थे। इनके साथ कुछ ऐसे भी थे, जो दिल्ली जाकर मजदूर कम्पनी में नये नये भर्ती होने वाले थे। तभी एक ने पूछा कि दिल्ली में कितने रेलवे स्टेशन हैं। दूसरे ने कहा कि एक। तीसरा बोला कि नहीं, तीन हैं, नई दिल्ली, पुरानी दिल्ली और निजामुद्दीन। तभी चौथे की आवाज आई कि सराय रोहिल्ला भी तो है। यह बात करीब चार साढे चार साल पुरानी है, उस समय आनन्द विहार की पहचान नहीं थी। आनन्द विहार टर्मिनल तो बाद में बना। उनकी गिनती किसी तरह पांच तक पहुंच गई। इस गिनती को मैं आगे बढा सकता था लेकिन आदतन चुप रहा।

ट्रेन में बाइक कैसे बुक करें?

अक्सर हमें ट्रेनों में बाइक की बुकिंग करने की आवश्यकता पड़ती है। इस बार मुझे भी पड़ी तो कुछ जानकारियाँ इंटरनेट के माध्यम से जुटायीं। पता चला कि टंकी एकदम खाली होनी चाहिये और बाइक पैक होनी चाहिये - अंग्रेजी में ‘गनी बैग’ कहते हैं और हिंदी में टाट। तो तमाम तरह की परेशानियों के बाद आज आख़िरकार मैं भी अपनी बाइक ट्रेन में बुक करने में सफल रहा। अपना अनुभव और जानकारी आपको भी शेयर कर रहा हूँ। हमारे सामने मुख्य परेशानी यही होती है कि हमें चीजों की जानकारी नहीं होती। ट्रेनों में दो तरह से बाइक बुक की जा सकती है: लगेज के तौर पर और पार्सल के तौर पर। पहले बात करते हैं लगेज के तौर पर बाइक बुक करने का क्या प्रोसीजर है। इसमें आपके पास ट्रेन का आरक्षित टिकट होना चाहिये। यदि आपने रेलवे काउंटर से टिकट लिया है, तब तो वेटिंग टिकट भी चल जायेगा। और अगर आपके पास ऑनलाइन टिकट है, तब या तो कन्फर्म टिकट होना चाहिये या आर.ए.सी.। यानी जब आप स्वयं यात्रा कर रहे हों, और बाइक भी उसी ट्रेन में ले जाना चाहते हों, तो आरक्षित टिकट तो होना ही चाहिये। इसके अलावा बाइक की आर.सी. व आपका कोई पहचान-पत्र भी ज़रूरी है। मतलब

जिम कार्बेट की हिंदी किताबें

इन पुस्तकों का परिचय यह है कि इन्हें जिम कार्बेट ने लिखा है। और जिम कार्बेट का परिचय देने की अक्ल मुझमें नहीं। उनकी तारीफ करने में मैं असमर्थ हूँ क्योंकि मुझे लगता है कि उनकी तारीफ करने में कहीं कोई भूल-चूक न हो जाए। जो भी शब्द उनके लिये प्रयुक्त करूंगा, वे अपर्याप्त होंगे। बस, यह समझ लीजिए कि लिखते समय वे आपके सामने अपना कलेजा निकालकर रख देते हैं। आप उनका लेखन नहीं, सीधे हृदय पढ़ते हैं। लेखन में तो भूल-चूक हो जाती है, हृदय में कोई भूल-चूक नहीं हो सकती। आप उनकी किताबें पढ़िए। कोई भी किताब। वे बचपन से ही जंगलों में रहे हैं। आदमी से ज्यादा जानवरों को जानते थे। उनकी भाषा-बोली समझते थे। कोई जानवर या पक्षी बोल रहा है तो क्या कह रहा है, चल रहा है तो क्या कह रहा है; वे सब समझते थे। वे नरभक्षी तेंदुए से आतंकित जंगल में खुले में एक पेड़ के नीचे सो जाते थे, क्योंकि उन्हें पता था कि इस पेड़ पर लंगूर हैं और जब तक लंगूर चुप रहेंगे, इसका अर्थ होगा कि तेंदुआ आसपास कहीं नहीं है। कभी वे जंगल में भैंसों के एक खुले बाड़े में भैंसों के बीच में ही सो जाते, कि अगर नरभक्षी आएगा तो भैंसे अपने-आप जगा देंगी।