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Monday, April 24, 2017

गुजरात मीटरगेज ट्रेन यात्रा: जूनागढ़ से देलवाड़ा

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17 मार्च 2017
रात अच्छी नींद आयी। एक चूहे ने एक बार आसपास चहलकदमी की, एक दो डरावने सपने आये: फिर भी सब ठीक रहा। इतने बड़े रेस्ट हाउस में मैं अकेला ही था। भूतों के अस्तित्व को मैं मानता हूँ। रेलवे लाइन के किनारे बने इस सुनसान रेस्ट हाउस में भूत रहते होंगे, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। धन्यवाद भूतों, मुझे शांति से सोने देने के लिए।
जूनागढ़ से ट्रेन ठीक समय पर चल दी। भीड़ बिल्कुल नहीं थी। जैसे ही शहर से बाहर निकले, गिरनार पर्वत दिखायी पड़ने लगा। काफ़ी ऊँचा पर्वत है और जूनागढ़ के साथ-साथ गुजरात का भी बहुत बड़ा धार्मिक आस्था का केंद्र है। दूर से ही नमस्कार किया - भविष्य में दीप्ति के साथ आने का वादा करके।
वीसावदर में हमारी ट्रेन पहुँचने के बाद खिजडिया-जूनागढ़ पैसेंजर आ गयी। लग रहा था कि अब हमारी ट्रेन खाली हो जाएगी, लेकिन खिजडिया ट्रेन के आधे से ज्यादा यात्री इसमें चढ़ गए। सभी सीटें भर गयीं और कुछ यात्री खड़े भी रहे। मैं कल इस मार्ग पर यात्रा कर चुका था, इसलिए मेरे काम पर इस भीड़ का उतना प्रभाव नहीं पड़ा।



काठिया - मुझे इसका नाम नहीं पता था। मैं भजिया लेना चाहता था, लेकिन स्टेशन पर स्थित तीन दुकानों में किसी में भी भजिया नहीं मिली। तो काठिया ले ली। मैंने इसका फोटो ले लिया कि बाद में यार लोगों से इसका नाम पूछूँगा, लेकिन ट्रेन में ही खाते-खाते इसका नाम पता चल गया। 'काठिया खा लो', 'गरमागरम काठिया' जैसे शब्द यात्री बोलते रहे और मुझे इसका नाम पता चल गया।
किसी के मोबाइल में गाना बज रहा था - 'कह दूँ तुम्हें या चुप रहूँ।' मैं गाने में खो-सा गया। फिर एक गुजराती गाना बजने लगा, मुझे समझ तो नहीं आया, लेकिन अच्छा लगा। यह ख़त्म हुआ तो 'मेघा रे मेघा रे, मत परदेस जा रे' बजने लगा।
एक ट्रैक्टर-ट्राली में भूसा लादा जा रहा था। चारों कोनों पर मजबूत बल्लियाँ खड़ी करके रस्सियाँ और तिरपाल बाँधकर छोटी-छोटी बोरियों में भर-भरकर नीचे खेत से ट्राली में भर रहे थे। तीन आदमी लगे हुए थे। इसे भरने में इन्हें तीन चार घंटे तो लग ही जाने हैं। यानी दोपहर के दो बज जाने हैं। हम शहरों में रहने वालों के लिए उनकी यह मेहनत किसी काम की नहीं।
मुझे भूसा ढोने का काम सबसे ख़राब लगता था। अप्रैल में गेहूँ कटने और मशीन से निकलने के बाद अनाज तो साथ के साथ घर ले जाते हैं। भूसा बाद में ले जाया जाता है। यह इतना मुश्किल होता है कि इसे रात में करते। पूरी पूरी रात हो जाती भूसा ढोने में। जूट की बड़ी-बड़ी चादरों में ... चादर शब्द मैंने उन मित्रों के लिये प्रयोग किया है, जो इसके प्रचलित नाम पल्ली को नहीं समझते। तो बड़ी-बड़ी पल्लियों में इनकी गाँठें बाँधकर तैयार कर लेते। फिर इन्हें भैंसाबुग्गी पर चढ़ाया जाता। हमारे पास न भैंसा था और न ही बुग्गी। तो इधर-उधर से माँगने पड़ते। भैंसे भी अपने मालिक की अनुपस्थिति में कई बार शैतानी कर देते। उनके थोड़ा-सा हिलते ही बुग्गी पर एक के ऊपर एक रखी गाँठें असंतुलित हो जातीं। फिर उस भैंसे पर पिताजी पिल पड़ते। उसकी दादी-नानी-माँ-बहन सब याद दिलाने की कोशिश करते। कई बार उसे याद आ जाती, कई बार याद नहीं आती। हम दोनों भाई बैठे पिताजी को भी कोसते और भैंसे को भी। दोनों ही समय ख़राब कर रहे हैं। पिताजी को हम कुछ नहीं कह सकते थे और भैंसा तो भैंसा है ही। फिर घर आकर उन्हें उतारने का काम चलता। माँ भूसे की कोठरी में इन गाँठों को खोलने का काम करती, मैं बुग्गी पर खड़ा होकर गाँठों को पिताजी और धीरज के सिर पर रखने में हाथ बँटाता और भैंसे को भी काबू करता। आँगन में नीम का पेड़ था। उसकी नीची डालियों में सिर पर ढोयी जा रही गाँठें टकरा जातीं और गर्दन को झटका दे देतीं। इसलिये वहाँ खाट का ‘बैरीकेट’ लगाया जाता, ताकि भूलवश फ़िर-फ़िर नीम की उस डाल के नीचे से न जा पायें।
बड़ी मेहनत का काम होता है गर्मियों में भूसा ढोने का। यह सारा काम धूल का है। अप्रैल की गर्मी में भूसे की निहायत सूखी धूल। तौलिया या गमछा गीला करके मुँह पर लपेटते, अन्यथा इस धूल को फेफड़ों तक जाने में देर नहीं लगती। फिर जब घंटों तक यही काम करना हो तो ऊपर वाला ही मालिक होता है।
वापस गुजरात पहुँचते हैं।
जब ट्रेन कासिया नेश से सासन गिर की ओर अपनी 30 की स्पीड से चली जा रही थी और यात्री बैठे जंगल का आनंद ले रहे थे, तभी ट्रेन में आपातकालीन ब्रेक लगे और यह रुक गयी। ज़ाहिर है कि कोई जानवर ट्रेन के सामने आ गया है। शेरों का जंगल है तो काफी सम्भावना है कि शेर ही हो। मैं आपातकालीन खिड़की से आधा बाहर निकलकर झाँकने लगा। आगे तक सभी दरवाजों पर यात्री पूरे बाहर झूले हुए थे, 'शेर' की एक झलक पाने को। कुछ नीचे भी उतर गए थे। एक मिनट बाद ही ट्रेन चल पड़ी। करीब सौ मीटर दूर जंगल में मुझे ऐसा लगा जैसे शेर हो। शायद शेर न हो, लेकिन मुझे लगा कि शेर था। केवल एक झलक दिखी। चलती ट्रेन और बीच में इतने सारे सूखे पेड़। फिर कुछ नहीं दिखा। हाँ, लंगूर, मोर व चीतल आज भी खूब दिखे। मोर और चीतल पास-पास ही रहते। शेरों के जंगल में साथ रहने में ही समझदारी है। चीतल मोरों की भाषा समझते होंगे और मोर चीतलों की।
तालाला में यह ट्रेन पहुँची तो दो ट्रेनें पहले से ही खड़ी थीं। कल की तरह। प्लेटफार्म वाली लाइन पर देलवाडा-वेरावल पैसेंजर, दूसरी लाइन पर वेरावल-ढसा पैसेंजर और तीसरी लाइन पर यह जूनागढ़-देलवाडा पैसेंजर। यानी तीनों लाइनों से एक-एक ट्रेनें आयीं और अब तीनों ही लाइनों पर प्रस्थान कर जाएँगी। हमारी ट्रेन से बहुत से यात्री उतरकर वेरावल वाली में जा चढ़े। कुछ ढसा पैसेंजर से वेरावल से आने वाले यात्री हमारी ट्रेन में भी चढ़े होंगे।
प्राची रोड पर किसी डिब्बे में यात्रियों का कुछ हो गया। बाहर भीड़ लग गयी। गार्ड, ड्राईवर और स्टेशन मास्टर भी आ गए। दूसरे डिब्बों से यात्री दौड़-दौड़ कर जाने लगे। शायद झगडा हुआ होगा। झगडे का रस लेने की हमारी परंपरा है। गुमसुम खड़े होकर रस लेते रहेंगे। मैं पीछे वाले डिब्बे में ही रहा। कुल्फी वाला कुल्फी बेच रहा था। पाँच रुपये की एक। मैंने ले ली। ऐसी गर्मी में झगड़े में वो रस कहाँ, जो कुल्फी में था?
प्राची रोड से कोडिनार वाली लाइन पर अब ट्रेनों का संचालन बंद हैं। इस मार्ग पर एक ही ट्रेन चलती थी। और अब शायद ही कभी इस पर ट्रेन चले। गेज परिवर्तन होगा, लेकिन मुझे नहीं लगता कि कोडिनार लाइन भी परिवर्तित होगी। गुजरात की बहुत सारी छोटी लाइनों का गेज परिवर्तन नहीं हुआ है और अब वे स्थायी रूप से बंद हो चुकी है।
एक रेलप्रेमी होने के नाते मैं तो यही चाहूँगा कि इस पर ट्रेनें चलती रहें - गेज परिवर्तन होने से पहले भी और बाद में भी।
वेलादर में घुंघराले छोटे-छोटे बालों वाले अफ़्रीकी जैसे दिखने वाले दो लड़के नीचे उतरे। अपनी गुजराती दिखने वाली फैमिली के साथ। शायद वे गुजराती ही होंगे, जिनके पूर्वज कभी अफ्रीका से इधर आकर बस गए हों।
शिंगोड़ा नदी पर एक ऊँचा और लम्बा पुल था। इसमें पानी भी था और लोगबाग नहा भी रहे थे। इसके ऊपर से गुजरे तो शीतल हवा का झोंका आया। कुछ सेकंड के लिए आनंद आ गया।
ऊना में ट्रेन खाली-सी हो गयी। यह वही ऊना है जो पिछले दिनों कोई दलित हत्याकांड़ के लिये देशभर में चर्चित रहा था। यहाँ कर्फ्यू भी लगाना पड़ा था। काफ़ी बड़ा शहर है यह। वातावरण में गर्मी थी, लेकिन बाकी कहीं गर्मी नहीं थी। सब सामान्य था।
देश में ऊना नाम के दो रेलवे स्टेशन हैं। एक तो गुजरात में ‘ऊना’ और दूसरा हिमाचल प्रदेश में ‘ऊना हिमाचल’।
ऊना से अगला ही स्टेशन देलवाड़ा है। यह इस लाइन का आख़िरी स्टेशन है। यहाँ से अब मुझे सड़क मार्ग से भावनगर जाना था। स्टेशन मास्टर ने सुझाव दिया कि रनिंग रूम में जाकर नहा लो, खाना खा लो, उसके बाद इसी ट्रेन में बैठकर ऊना चले जाना और वहाँ से भावनगर की बस पकड़ लेना। यह विचार उत्तम था, मैंने इसी का पालन किया।
देलवाड़ा से दीव आठ किलोमीटर दूर ही रह जाता है। किसी स्टाफ की बाइक लेकर मैं घंटे दो घंटे में दीव घूमकर आ सकता था, लेकिन नहीं गया। फुरसत में जायेंगे कभी।
ऊना से भावनगर की बस आसानी से मिल गयी। पाँच घंटे लगे। दो लेन की सड़क है। पिपावाव पोर्ट होने के कारण ट्रकों का काफ़ी यातायात रहता है। इसे चार-छह लेन बनाने का काम चल रहा है।
भावनगर में विमलेश जी मिल गये। ब्लॉग और फेसबुक के माध्यम से उनसे घनिष्ठ मित्रता है, लेकिन मिलना आज पहली बार हुआ। दोनों का एक शौक समान है - रेलवे।
ज्यादा न लिखते हुए एक ही बात लिखना चाहूँगा - विमलेश जी जैसे मित्र सबको मिलें और देश के कोने-कोने में मिलें।



बराबर में ब्रॉड़गेज लाइन है जो वेरावल जा रही है।

वीसावदर जंक्शन

काठिया




प्राची रोड़ जंक्शन के पास

प्राची रोड़ से एक लाइन कोडिनार जाती है। इस पर आजकल ट्रेन संचालन बंद है।













7 comments:

  1. जिसे आप पल्ली कहते हैं उसे हम भक्कू कहते हैं। और मैं खुद को बहुत भाग्यशाली मानता हूँ कि बचपन में पूरी खेती अकेले करने के बावजूद ये दो काम (भूसा ढोना और गेहूँ के पौधे थ्रेशर में डालना) मुझे नही करना पड़ा। कोई न कोई जुगाड़ भिड़ा ही लेता था। गुजरात में अफ्रीकी मूल के लोगों की काफी आबादी है जो यहाँ सैकड़ो सालों से है।

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  2. लोट आया पुराना नीरज....
    रंगत भी लोट आई...
    और ये बेसन के फीके फीके पकोड़े का नाम काठिया नहीं गांठिया है...

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  3. भूतों का कोई अस्तित्व नहीं होता है, ये सब दिमागी वहम है, चलो आप ही बताऔ आप ने कभी भूत देखा है।

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  4. रोचक वृत्तांत। पढ़कर मजा आया। आपके वृत्तांत पढ़कर मेरा मन भी रेलयात्रा करने का कर रहा है।

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  5. मैं भी कन्फ्यूज होता रहा कि गांठिया; काठिया कब से हो गया। फिर सोचा कि काठियावाड के कारण नीरज इसे काठिया समझ रहे होंगे। जहाँ तक अफ़्रीकी मूल के लोगों जैसा दिखने वाले यात्री की बात है। जूनागढ़ के तत्कालीन महाराजा ने अफ्रीका से बहुत सारे शेर लाये थे और उन शेरों की देख भाल के लिए वहां से अफ़्रीकी मूल के लोगों को भी लाये थे। तभी से ये लोग यहाँ बस गए और यहाँ के नागरिक हो गए। ऐसी ही कुछ मिलती जुलती बात भावनगर के महाराजा के लिए भी प्रचलित है। यह पोस्ट भी बाकी पोस्ट की तरह जानकारी भरा और रोचक है।

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  6. Ek dum khaalis desi bhasha me likha gaya lekh. Yahi aapki khasiyat hai Jo ki hume aap ko follow karne ko majboot kar deti hai.

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  7. ​​बेहतरीन ! अगर आप स्पष्ट न करते तो मैं तो ऊना (हिमाचल ) ही पहुँच जाता ! एक ट्रैन निकलती है इधर गाज़ियाबाद से होते हुए ऊना की ! कठिया -गठिया अच्छा लगा देखने में ! खाने का तो स्वाद खाकर ही पता चलेगा !!

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