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Thursday, January 14, 2016

नागटिब्बा ट्रेक-1

   नागटिब्बा जाना तो अपने घर की बात लगती थी। वो रहा देहरादून, वो रहा मसूरी और वो रहा नागटिब्बा। फिर भी कई सालों तक बस सोचते ही रहे, लेकिन जाना नहीं हो पाया। लेकिन इस बार कमर कस ली। नागटिब्बा समुद्र तल से 3000 मीटर से भी ज्यादा ऊंचाई पर स्थित है, इसलिये सर्दियों में अच्छी-खासी बर्फ गिर जाती है। कम दूरी का ट्रैक होने के कारण यह विण्टर ट्रैकों में भी अहम स्थान रखता है। यही सोचकर दिसम्बर में यहां जाने की योजना बनी।
   मेरी बडे दिनों से इच्छा थी कि किसी ग्रुप को ट्रैकिंग पर लेकर जाऊं। एक बार इस बारे में अपने फेसबुक पेज पर भी लिखा था। इस बार की योजना थी कि क्रिसमस की छुट्टियों में एक ग्रुप को तो अवश्य तैयार कर लेना है। शुक्रवार का क्रिसमस था, उसके बाद शनिवार और फिर रविवार। किसी भी नौकरीपेशा के लिये यह एक शानदार संयोग होता है। इसलिये कोई सन्देह नहीं था कि ग्रुप नहीं बनेगा। खर्चे का अन्दाजा लगाया और आखिरकार तय हुआ कि दिल्ली से दिल्ली तक प्रति व्यक्ति 5000 रुपये और देहरादून से देहरादून तक 4000 रुपये लगेंगे। इसमें आना-जाना, रहना और खाना-पीना सब शामिल था। ग्रुप बडा हुआ तो दिल्ली से ही गाडी कर लेंगे, नहीं तो एसी बस से आना-जाना करेंगे जिसका किराया एक तरफ का लगभग 500 रुपये है।
   अपने एक सहकर्मी हैं विपिन। उन्होंने अपने एक मित्र के साथ ट्रैक पर जाने की इच्छा जताई। इनके अलावा ग्वालियर से प्रशान्त जी भी तैयार थे। उधर मेरठ से नितिन काजला और उनका एक मित्र अमरीश तैयार थे और दिल्ली से ही सचिन त्यागी और उनका मित्र। जैसे जैसे दिन नजदीक आने लगे और दिखने लगा कि अच्छी टीम साथ चलने को तैयार है इसलिये विचार बन गया कि शेयर में यात्रा करेंगे। शेयर में यात्रा करना हमेशा ही सस्ता होता है। सस्ता इसलिये होता है क्योंकि तब हम देहरादून तक एसी बस से जाते और अब साधारण बस से जायेंगे या अपनी कार से। विपिन और सचिन के पास अपनी कारें हैं।
   लेकिन...
   25 दिसम्बर को जब कश्मीरी गेट आईएसबीटी से मैं देहरादून वाली साधारण बस में बैठा तो अकेला ही था और मेरठ से नितिन अपने मित्र के साथ आने वाले थे। विपिन को वायरल हो गया था, इसलिये वे और उनके मित्र का चलना कैंसल हो गया। सचिन ने भी मना कर दिया और प्रशान्त जी के साथ एक अनहोनी घट गई, इसलिये वे भी नहीं आ सके। तय था कि मोदीपुरम से नितिन भी इसी बस में आकर बैठ जायेंगे और देहरादून व आगे तक की सारी यात्रा साथ ही करेंगे। लेकिन आज क्रिसमस था और बस अड्डे पर भारी भीड थी। यह बस पूरी भरकर ही दिल्ली से चली इसलिये नितिन को मुझे कहना पडा कि आप देहरादून जाने का इंतजाम कर लो, इस बस में जगह नहीं है। अच्छी बात ये रही कि उन्हें मेरठ से देहरादून जाने वाली एक टैक्सी मिल गई जो 200-200 रुपये लेकर इन्हें देहरादून ले जायेगा। यानी बस के ही किराये में। असल में यह टैक्सी वाला देहरादून से थोडी ही देर पहले कुछ यात्रियों को लाया था, अब इसे देहरादून लौटना था तो खाली ले जाने से अच्छा यही था कि सस्ते दाम में सवारियां ही बैठा ली जायें।
   खतौली दिल्ली से 100 किलोमीटर दूर है। लगभग सभी बस वाले विभिन्न होटलों पर यहां आधे घण्टे के लिये बसें अवश्य रोकते हैं। लेकिन इन होटल वालों का तौर-तरीका और दादागीरी मुझे कभी पसन्द नहीं आई। मुझे भूख लगी थी, हल्का चटपटा खाने की इच्छा थी। पकौडी वाले से पकौडियां मांगी तो उसने कहा कि 60 रुपये की एक प्लेट हैं, मैंने कहा कि आधा प्लेट दे दे तो मना कर दिया। इन लोगों का बस नहीं चलता अन्यथा बस की सभी सवारियों से जबरदस्ती पैसे ले लें। मैंने सुना है कि बिहार में कहीं ऐसा होता है। ढाबों पर बसे रोक ली जाती हैं। जबरदस्ती सभी यात्रियों से पैसे ले लिये जाते हैं, चाहे आप खाओ या मत खाओ। और खाना भी बेहद खराब होता है। मैं इसी मामले में हमेशा खतौली का आलोचक हूं।
   मुजफ्फरनगर के बाद खराब सडक शुरू हो जाती है। काम चल रहा है, जोरों से चल रहा है लेकिन पता नहीं कब पूरा होगा। नितिन तब तक छुटमलपुर के पास पहुंच चुके थे। उन्होंने बताया कि रुडकी में जाम लगा है, ड्राइवर से कह कर झबरेडी के रास्ते आ जाओ। मैंने कण्डक्टर से बात की तो उसने मना कर दिया। खैर, फिर भी मंगलौर तक तो आराम से पहुंच गये। मंगलौर में जाम लगा मिला। लेकिन यह जाम केवल मंगलौर में ही था, उसके बाद नहीं था। सडक का काम भी केवल मंगलौर तक ही चल रहा है, उसके बाद नहीं चल रहा।
   बस चूंकि देहरादून की सवारियों से भरी थी, इसलिये रुडकी बस अड्डे पर नहीं गई। रेलवे लाइन पार करते ही देहरादून रोड पर मुड गई। इससे कम से कम आधा घण्टा बचा। लेकिन छुटमलपुर के बाद मोहंड में जब शिवालिक की पहाडियां आ गईं तो भीषण जाम मिला। इन पहाडियों में कई जगह पुलिया बनाने का काम चल रहा है तो वहां सिंगल सडक ही आवागमन के लिये बची है। खूब ट्रैफिक है और लम्बा जाम लग जाता है। इस जाम में इजाफा करते हैं कार वाले। कार वाले गाडियां चलाने वालों की एक विशेष प्रजाति होती है जो वैसे तो खूब पैसे वाले भी होते हैं और साक्षर भी होते हैं लेकिन कभी भी गाडी चलाने की तमीज नहीं सीख पाते। दो-लेन की पहाडी सडक पर जाम लगा हो तो ये लोग गलत साइड से कार आगे ले जाते हैं और सामने से आ रहे वाहनों का रास्ता रोककर जाम में और इजाफा करते हैं। आज क्रिसमस था, सडक पर कारवालों की धूम थी तो यह समस्या और भी विकराल हो गई।
   शाम चार बजे देहरादून पहुंचे। इस समय मसूरी से आगे जाने के लिये किसी भी वाहन का मिलना बेहद मुश्किल था। नितिन और उनका मित्र कभी के देहरादून पहुंच चुके थे और देवलसारी जाने के लिये किसी टैक्सी की बात करने रेलवे स्टेशन की तरफ गये थे। यहां आईएसबीटी स्थित टैक्सी वाले 2500 रुपये मांग रहे थे। रेलवे स्टेशन से पर्वतीय मार्गों के लिये बसें भी चलती हैं और शेयर टैक्सी भी; तो क्या पता वहां से कोई शेयर टैक्सी ही मिल जाये या कोई सस्ते में ही चलने को राजी हो जाये। लेकिन वहां भी 2500 रुपये से कम में कोई तैयार नहीं हुआ। आखिरकार वही टैक्सी वाला राजी हुआ जिसके साथ नितिन मेरठ से यहां तक आये थे। उससे उन्होंने रास्ते में ही बात कर ली थी और वो 2200 रुपये में राजी हो गया था। हमने अविलम्ब इसी में सामान रखा और साढे चार बजे तक यहां से निकल पडे।
   राजपुर रोड पर बडा लम्बा जाम मिला। इस पर एक प्रसिद्ध मॉल है। यहां क्रिसमस की धूमधाम मची पडी थी, तो इसकी वजह से जाम लगा था। एक बार तो लगा कि मसूरी तक ऐसा ही जाम मिलेगा लेकिन इस मॉल के बाद ज्यादा ट्रैफिक नहीं मिला और फटाक से मसूरी पहुंच गये। बाहर ही बाहर धनोल्टी रोड पकड ली। सूरज तो कभी का छिप गया था, अब सामने चांद निकला था। काले पहाडों के ऊपर पूरा चांद बडा ही शानदार लग रहा था।
   सुवाखोली से बायें मुड गये। यह रास्ता थत्यूड जाता है। एक जगह सडक के बीचोंबीच एक बन्द गाडी खडी मिली। कुछ लोग इसे स्टार्ट करने की कोशिश कर रहे थे। इधर-उधर से आगे निकलने की जगह नहीं थी। हमारा ड्राइवर बाहर गया, वास्तुस्थिति का जायजा लेकर आया तो बोला- ये लोग किसी की नहीं सुनेंगे। कुछ इनसे कहेंगे तो ये गाली-गलौच भी करने लगेंगे। अच्छा यही है कि ये जितना समय लगा रहे हैं, इन्हें लगाने दो। यह ड्राइवर सहारनपुर का रहने वाला है और देहरादून टैक्सी यूनियन पर गाडियां चलाता है। ज्यादातर मैदानी इलाकों में ही टैक्सी ले जाता है, पहाडों में कम ही आता है तो यहां के बारे में इसकी भी कुछ धारणाएं थीं। एक तो यही थी कि पहाडी लोग जिद्दी और मन्दबुद्धि होते हैं। उन्हें कुछ अच्छा कहो तो वे पलटवार करते हैं।
   जल्दी ही सामने वाली गाडी ठीक हो गई और ठीक होते ही उन्होंने जो पहला काम किया, वो था हमें आगे निकलने के लिये साइड देना।
   इस सडक पर मैं अप्रैल 2015 में डोडीताल ट्रेक के दौरान आया था और उत्तरकाशी से लेकर देहरादून तक की बाइक यात्रा की थी। उधर चिन्यालीसौड के पास दस-बारह किलोमीटर की सडक खराब थी, अन्यथा यह पूरी सडक ही अच्छी बनी है। अब तो चिन्यालीसौड के पास भी अच्छी बन गई होगी। आगे चलकर एक बैण्ड मिला जहां से सीधे सडक थत्यूड जाती है और दाहिने घूमकर चिन्यालीसौड और उत्तरकाशी। हम सीधे चलते रहे। थत्यूड में एक छोटी नदी पार की और आगे चलते रहे। यहां से करीब दस किलोमीटर आगे देवलसारी है। रास्ता न हमें पता था और न ही ड्राइवर को। अचानक जब किलोमीटर का पत्थर आया जिस पर लिखा था नैनबाग, तो तुरन्त गाडी रुकवा ली। मैंने कहा कि नैनबाग और देवलसारी की सडकें थत्यूड से अलग हो जाती हैं। अगर यह सडक नैनबाग जाती है तो इसका यही अर्थ है कि हम गलत आ गये हैं। किसी से रास्ता पूछ लेना चाहिये। रात थी और सुनसान भी, कोई नहीं मिला लेकिन गूगल मैप मिल गया और जीपीएस से हमारी सटीक लोकेशन भी पता चल गई। अब मालूम पडा कि अभी कुछ आगे तक नैनबाग और देवलसारी की एक ही सडक है, फिर अलग हो जायेंगी। थोडा आगे एक पुल और आया और नैनबाग की सडक पुल पार करके बायें मुड गई और देवलसारी की सडक सीधे चलती रही।
   इसके बाद खराब रास्ता भी शुरू हो गया। लेकिन कार आराम से चलती रही। एक जगह रास्ते में बीचोंबीच एक पत्थर पडा था। कार के निकलने के लिये इसे हटाना जरूरी था। नितिन इसे हटाने गये, पत्थर उठाया और किनारे खाई में फेंक दिया। मेरे और ड्राइवर के मुंह से एक साथ निकला- अरे, यह क्या कर दिया? बाद में जब नितिन भाई आये तो उन्हें समझाया कि नीचे किसी का घर भी हो सकता है या कोई आदमी या जानवर भी आता-जाता होगा, इसलिये इस तरह पत्थर नीचे नहीं फेंका करते। नितिन ने कहा- घुमक्कडी का पहला पाठ सीखा।
   आखिरकार एक गांव में एक तिराहे पर आकर रुक गये। गूगल मैप के अनुसार इससे कुछ पहले तेवा गांव था और आगे सडक देवलसारी तक जा रही है। लेकिन जब गांव वाले से पूछा तो पता चला कि यह तेवा गांव है और सडक आगे अन्तन जा रही है। यानी गूगल मैप में जहां देवलसारी लिखा है, वो असल में अन्तन गांव है। फिर देवलसारी कहां है? बताया कि दूसरी दिशा में यानी देवलसारी और अन्तन के बीच में तेवा स्थित है। हमारी जानकारी के अनुसार ट्रैक देवलसारी से शुरू होता है लेकिन गांववालों ने बताया कि अगर आप आज देवलसारी भी जाओगे जोकि यहां से करीब 2 किलोमीटर दूर है तो आपको नागटिब्बा जाने के लिये कल फिर यहीं से होते हुए अन्तन जाना पडेगा और अन्तन से ही ट्रैक शुरू होता है। हमने पूछा कि क्या देवलसारी से सीधे नागटिब्बा के लिये कोई ट्रैक नहीं है ताकि हमें अन्तन न जाना पडे तो जवाब आया कि नहीं।
   हमारे दिमाग में यही भरा हुआ था कि हमें देवलसारी जाना ही पडेगा। नेट पर पहले कई वृत्तान्त पढे हैं जो कहते हैं कि ट्रैक देवलसारी से शुरू होता है। यहां पता चला कि देवलसारी कुछ नहीं है बल्कि जंगल वालों का एक रेस्ट हाउस है। ट्रैकर आते हैं और रेस्ट हाउस में ठहर जाते हैं और अगले दिन अन्तन होते हुए ट्रैकिंग शुरू कर देते हैं। उधर ड्राइवर को भी अभी देहरादून लौटना था, हमने यहीं तेवा में ही रुकने का फैसला किया। सामान उतार लिया और ड्राइवर को वापस भेज दिया।
   रात के नौ बजे हुए थे। यहीं तिराहे के पास एक घर में हमने रुकने की बात की। लडके ने पहले तो मना कर दिया लेकिन जोर देने पर 1000 रुपये में एक कमरा देने को राजी हो गया। खाना भी बन जायेगा। घर में उसके मां, बाप और बहनें व शायद घरवाली भी थीं। हम 1000 रुपये में नहीं रुक सकते थे। वैसे तो ये लोग नागटिब्बा के लिये गाइड का भी काम करते हैं लेकिन इनके कमरे में ऐसा कोई लक्षण नहीं दिखा जिससे यह पता चलता हो कि ये लोग ट्रैकरों को यहां ठहराते हों। हालांकि नितिन ने यही कहा कि इन्होंने यह कमरा किराये पर देने के लिये ही बना रखा है। यह काफी बडा कमरा था। एक डबल बैड था और दूसरे कोने में एक सिंगल बैड। सिंगल बैड पर दरियां बेतरतीब तरीके से बिछा रखी थीं जैसा कि गांवों में अक्सर बिछा लेते हैं अपनी-अपनी सुविधानुसार। अलमारी में बर्तन रखे थे। टीवी था और उलझे हुए तार। आटे या खल की बोरी भी रखी थी।
   हम 400 से ऊपर नहीं बढे और वे 800 से नीचे नहीं उतरे तो हमने टैंट लगाने के लिये जगह तलाशनी शुरू कर दी। सामने ही एक स्कूल था लेकिन इसके मेन गेट पर ताला लगा था। नितिन भाई अकेले जगह देखने गये। वापस आये तो खुश थे, बोले- वहां थोडा सा आगे आंगनबाडी केन्द्र है। इसके कमरे के दरवाजे में ताला नहीं लगा है और अन्दर गद्दे भी रखे हैं। मैं यह सुनते ही बडा खुश हो गया। दोनों दौडे-दौडे ‘आंगनबाडी केन्द्र’ में गये। देखा कि यह बिल्कुल कच्चा था और किसी गरीब का घर ही ज्यादा लग रहा था। रास्ते के बिल्कुल किनारे दो कमरे थे, दोनों के दरवाजे सीधे सडक पर ही खुलते थे। कहीं आंगनबाडी केन्द्र दर्शाता बोर्ड भी नहीं लगा था। कुण्डी खोलकर अन्दर घुसे तो एक कोने में भगवानजी की मूर्तियां थीं। एक चटाई बिछी थी। दीवारों पर कुर्ते-पाजामे समेत कई कपडे टंगे थे। चूल्हा था और कुछ बर्तन भी। अरे भाई, यह तो किसी का घर है, न कि आंगनबाडी केन्द्र। इसे बन्द करके दूसरे कमरे में घुसे- इसमें भी एक जोडी गर्म कपडे खूंटी पर टंगे थे और कुछ लकडियां भी रखी हुई थीं। बाहर ठण्ड थी लेकिन यह कमरा गर्म था। नितिन ने कहा कि इसी में सो जाते हैं लेकिन मैंने मना कर दिया कि यह किसी का घर है। मालिक पता नहीं कहां है। उसकी अनुपस्थिति में इसमें घुसना ठीक नहीं। हमने कुण्डी वैसे ही लगा दी। तभी कुछ दूर वास्तविक आंगनबाडी केन्द्र जैसा कुछ दिखा। हम वहां पहुंचे तो पाया कि असली आंगनबाडी केन्द्र यह है। यह पक्का बना था और दोनों कमरों में ताला लगा था। छोटे से बरामदे में टैंट लगाने लायक जगह तो थी लेकिन मैंने कहा- मैं रात भर का जगा हुआ हूं और हम सुबह से खराब रास्तों पर सफर भी कर रहे हैं, काफी थक गये हैं इसलिये आज कमरे में ही सो जाना अच्छा है।
   वापस वहीं पहुंचे और 500 रुपये में कमरा फाइनल हो गया। खाना भी यहीं बन जायेगा।

   26 दिसम्बर 2015
   सुबह उठे। पता चल गया था कि ऊपर नागटिब्बा पर और पूरे रास्ते में कुछ भी खाने को नहीं मिलेगा। इसलिये कल ही आज के लिए आलू के 15 परांठे पैक करने को कह दिया था। 2-2 परांठे अब खा लिये। कुछ रेवडियां भी नितिन के बैग में थीं। टैंट, स्लीपिंग बैग मैं दिल्ली से लेकर गया था। अब एकमात्र टैंट, एक स्लीपिंग बैग और एक मैट्रेस अपने साथ रहने दिये और बाकी सब उन दोनों को दे दिये। उनके पास छोटे छोटे बैग थे, इसलिये उन्हें मैट्रेस और स्लीपिंग बैग ऊपर रस्सी से बांधने पडे। लेकिन इनके साथ एक चमडे का भारी-भरकम बैग और भी था जिसे काफी सोच-विचार के बाद अपने साथ ले जाना तय हुआ। अगर वापस भी इसी रास्ते से आते तो इस भारी-भरकम बैग को यहीं छोड देते लेकिन हमें इधर से वापस नहीं आना था, इसलिये इसे भी ले जाना पडा।
   बताया गया कि जंगल विभाग से पर्ची बनवानी पडती है। जंगल वालों का एक ऑफिस तो देवलसारी में है और एक यहीं तेवा गांव में थोडा ऊपर। मैं ऊपर गया। वहां ताला लगा मिला। वापस नीचे आया। गांववालों ने कहा कि एक आदमी का शुल्क 150 रुपये है और टैंट लगाने का शुल्क भी 150 रुपये ही है। आप हमें 600 रुपये दे दो, हम आपकी पर्ची कटवा देंगे। हमने मना कर दिया कि हमें इसकी रसीद चाहिये। उन्होंने कहा कि वापस आओगे, तब ले लेना। हमें वापस नहीं आना था। उन्होंने कहा कि अगले गांव अन्तन वाले आपको नहीं जाने देंगे। डराने लगे कि अगर तुम पकडे गये तो और भी भारी जुर्माना लग जायेगा। काफी वाद-विवाद के बाद हमने यही तय किया कि बिना रसीद के हम एक भी रुपया नहीं देंगे। अगर हम अब यहां 600 रुपये दे दें तो आगे कोई हमें बिना रसीद के पकड ले तो हम क्या जवाब देंगे। बोले कि उनकी हमसे बात कराना। आखिरकार हमने उन्हें कोई पैसा नहीं दिया और अपने मेजबान सुरेन्द्र की बाइक पर लगभग तीन किलोमीटर दूर अन्तन तक चले आये।
   अन्तन में सडक खत्म हो जाती है। गूगल मैप में अन्तन को देवलसारी लिखा गया है। अक्सर गूगल मैप में इस तरह की गलतियां मिलती रहती हैं। इसका कारण है कि कुछ समय पहले तक गूगल मैप को कोई भी अपडेट कर देता था। ये गांव नक्शे में नहीं होंगे तो किसी ने उन्हें अपडेट कर दिया। गूगल को क्या पता कि सही अपडेट किये हैं या गलत? तब से यह गलत ही है। हालांकि कुछ शिकायतें मिलने के बाद गूगल ने कई दिनों तक अपनी अपडेट की प्रक्रिया बन्द कर दी और अब नई प्रक्रिया शुरू की है। अब कोई भी अपनी मर्जी से गूगल मैप को अपडेट नहीं कर सकता। पुराना नियम तो मुझे भी मालूम था, नया नियम और नया तरीका मालूम नहीं है।
   अगर हमें पता होता कि नागटिब्बा ट्रैक देवलसारी से नहीं बल्कि अन्तन से शुरू होता है तो हम कल अन्तन ही आ जाते। यहां के लोग अच्छे थे। चाय पिलाने का खूब आग्रह किया जिसे हमने मना कर दिया। लेकिन गांव में स्थित उनके नाग देवता मन्दिर को देखने का आग्रह नहीं टाल सके। लकडी का बना यह मन्दिर असल में ‘टावर टेम्पल’ है, जो ज्यादातर हिमाचल में मिलते हैं।
   11 बजे ट्रैकिंग शुरू कर दी। नीचे से इशारा करके बता दिया था कि वो ऊपर धार पर पहुंचना है, वहां से एक धार और दिखेगी, फिर एक और। अन्तन समुद्र तल से लगभग 1700 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है जबकि नागटिब्बा लगभग 3000 मीटर पर। लगभग 2800 मीटर पर पन्तवाडी से आने वाला रास्ता भी इसमें मिल जाता है, यह मुझे ज्ञात था और आज हम वहीं रुकेंगे। यानी आज हमें 1100 मीटर ऊपर चढना है।
   रास्ता जंगल से होकर है। मध्य हिमालय के जंगल यानी भालुओं का घर। यह बात हमें तेवा गांव वालों ने भी बताई थी। उनका मकसद था कि हम डर जायेंगे और उन्हें गाइड के तौर पर साथ ले चलेंगे। लेकिन भालू जैसे हमें मिलेंगे, वैसे ही उन्हें। भालू मिलने पर जो वे करते, वही हम यानी भाग खडे होते। अगर अचानक सामने कोई भालू आ भी जाये तो उनके लिये भी उतना ही खतरा है और हमारे लिये भी। वैसे भी सर्दियों में भालू शीतनिद्रा में जाने लगते हैं।
   लगभग दो घण्टे बाद हम एक छोटे से खुले मैदान में पहुंचे। यह 1975 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। अन्तन गांव से यह स्थान एक चोटी जैसा दिख रहा था और गांववालों ने बताया कि वहां पहुंचकर सामने एक और धार दिखेगी। यहां कुछ देर आराम किया और फिर चल दिये। थोडा ही चले थे कि कुछ खेत दिखे और एक घर भी। इसके बारे में भी अन्तन वालों ने बता दिया था कि रास्ता इसके पीछे से होकर जाता है। पगडण्डी तो थी लेकिन इतनी पतली थी कि झाडियां बहुत हावी हो गई थीं। पता नहीं वो बिच्छू घास थी या कोई और; नन्हें नन्हें कांटे त्वचा में चुभ गये और इन्होंने हम तीनों को दर्द से हिलाकर रख दिया।
   2200 मीटर की ऊंचाई पर फिर एक खुला स्थान मिला और एक और घर। न पहले वाले घर में कोई था और न ही इसमें। ये अक्सर बकरी वालों के बनाये होते हैं। ये लोग गर्मियों में यहां आते हैं और सर्दियां आने पर नीचे चले जाते हैं। चार घण्टे से चलते रहने के कारण हम काफी थक गये थे। यहां बैठकर परांठे खाये और मेरठ की लाई हुई रेवडी भी खाईं।
   रास्ता धार के साथ-साथ है। धार पर पानी नहीं होता। यहां भी पानी नहीं था। हम तीनों अपनी-अपनी बोतलें भरकर चले थे लेकिन लगातार चढाई भरे रास्ते पर ये कब तक साथ देतीं। जब पानी की भयावहता का अन्दाजा हुआ, तब तक आधी से ज्यादा बोतलें खाली हो चुकी थीं। अब तय किया कि बहुत जरूरी होने पर ही पानी पीयेंगे, और वो भी एक घूंट ताकि गला गीला रहे। अन्तन से कुछ टॉफियां भी ले ली थीं। लेकिन जब आप चढाई पर चढ रहे हों तो पसीने से खूब पानी बाहर निकलता है। टॉफियां गला तो तर रखती हैं लेकिन कभी भी पानी की पूर्ति नहीं करतीं।
   इस दूसरे घर के बाद दो पगडण्डियां जाती दिखीं। हम एक पर चल दिये। कुछ आगे जाकर एहसास हुआ कि हम गलत पगडण्डी पर आ गये हैं। बाकी दोनों ने पीछे लौटकर दूसरी पगडण्डी पर चलने का सुझाव दिया लेकिन मुझे सामने कुछ ही दूर एक और धार आती दिख रही थी। नागटिब्बा के चारों ओर गांव हैं और सभी के लिये यह पूजनीय स्थान है। तो चारों ओर से नागटिब्बा जाने के रास्ते बने हुए हैं। मुझे यकीन था कि सामने जो धार है, उस पर भी कोई न कोई रास्ता अवश्य होगा। जिस पगडण्डी पर हम अभी थे, यह बहुत ही पतली थी। एक तरफ ढाल भी काफी था जिससे गिरने का डर भी पैदा हो रहा था। पीछे मुडकर दूसरी पगडण्डी से जाने का दबाव जब बहुत ज्यादा हो गया, तब मैं इन दोनों से तेज चलता हुआ काफी आगे निकल गया और इस धार ने मुझे निराश नहीं किया। यहां बेहद चौडी पगडण्डी मिल गई जो पीछे सिरस गांव से आ रही थी। नितिन और अमरीश पतली पगडण्डी से जूझ रहे थे और मुझे जंगल में आवाजें भी लगा रहे थे। मैं भी उन्हें ‘आ जाओ’ कहकर हौंसला देता रहता। लेकिन मैंने उन्हें यह नहीं बताया कि मुझे चौडी अच्छी पगडण्डी मिल गई है। मैं उस समय चौडी पगडण्डी पर खडा था और वे मुझसे दस मीटर दूर बेहद पतली पगडण्डी पर तेज ढाल पर जूझ रहे थे, तो एक ने कहा- हम ठीक नहीं आ रहे, वापस चलते हैं और उस दूसरी पगडण्डी पर चलते हैं। मैंने कहा कि हां, मुझे भी ऐसा ही लगता है। आओ, थोडी देर बैठो, आराम करो, तब चलेंगे।
   और जब बाकी दोनों मेरे पास आये तो एक ने कहा- ओये, ये तो हम हाईवे पर आ गये हैं। यहां खडा हुआ है और बता नहीं रहा।
   भले ही अब ज्यादा अच्छा रास्ता हो लेकिन चढाई बरकरार थी। पश्चिम दिशा में सूरज था और धूप सीधी हम पर पड रही थी। पानी की तंगी थी ही। एक जगह हिमालय की बर्फीली चोटियां दिखाई दीं।
   2500 मीटर के बाद चढना मुश्किल होने लगा। सबसे खराब हालत नितिन की थी। मैं भी ठीक नहीं था। हम जी कठोर करके चले जा रहे थे। लक्ष्य था बस वो स्थान जहां पन्तवाडी का रास्ता आकर मिलता है। मैंने गूगल मैप में वो जगह देखी थी। वहां दो छोटे-छोटे तालाब भी हैं, इसलिये पानी भी मिल सकता है। हालांकि दिसम्बर होने के कारण वे सूख गये होंगे।
   लगभग 2700 मीटर की ऊंचाई पर जब तीनों चलने में बिल्कुल निःसक्त हो गये तो पन्द्रह मिनट के लिये फिर बैठ गये और जबरदस्ती करके परांठे खाये। कुछ तो बैठने से और कुछ परांठे खाने से शरीर को ऊर्जा मिली और हम फिर चल पडे। यह उच्च पर्वतीय बीमारी के लक्षण थे। हालांकि 2700 मीटर ज्यादा नहीं होता लेकिन हम रात लगभग 1600 मीटर की ऊंचाई पर तेवा गांव में रुके थे। इस तरह आज 1100 मीटर ऊपर आ गये हैं। मुझे 1000 मीटर की ट्रैकिंग के बाद चलना मुश्किल होने लगता है। वही हालत अब हो रही थी। रात हम रुकेंगे, सुबह फिर से हट्टे-कट्टे हो जायेंगे।
   मेरी जानकारी के अनुसार जहां पन्तवाडी का रास्ता आकर मिलता है और दो तालाब हैं, जब वहां पहुंचे तो थोडा नीचे कुछ दूर आग जलती दिखाई दी। अन्धेरा हो चुका था। आंखें गडाकर गौर से देखा तो आग के पास टैंट या कमरे जैसा भी दिखाई दिया। हमारी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। हमने भी अपने मोबाइल की टॉर्चें जलाई और उनकी दिशा में बढ चले।
   उनके पास पहुंचे तो देखा कि चार स्थानीय लडके हैं और चार हिमाचल के ट्रैकर हैं। मैंने पूछा- हिमाचल में कहां से? बोले- मण्डी। मण्डी का कोई ट्रैकर भला तरुण गोयल को ना जानता हो? मैंने तुरन्त यही पूछा- तरुण गोयल को जानते हो? बोले- बहुत अच्छी तरह।
   ये लडके कल देवलसारी रुके थे। इन्होंने वहीं के एक लडके को गाइड बनकर साथ चलने को कहा। उसने 1000 रुपये मांगे तो इन्होंने मना कर दिया और बिना गाइड के ही चलने लगे। कुछ दूर ही चले थे कि वो लडका अपने तीन साथियों के साथ इनसे आ मिला और अभी तक सभी साथ ही हैं। स्थानीय लडके बस ऐसे ही मुंह उठाकर चले आये। अब ठण्ड से परेशान हो रहे थे। लकडी और घास-फूंस इकट्ठी करके एक छोटा सा छप्पर भी बना लिया था। न ओढने को कपडे थे और न ही बिछाने को। खाना भी नहीं था इनके पास और पानी का तो सवाल ही नहीं। हमें देखते ही हमारे टैंट में आने लगे। हमने मना कर दिया कि हमारा दो लोगों का टैंट है और हम तीन हैं। जगह ही नहीं बचेगी। हिमाचल वाले भी इनसे गुस्सा थे। एक तो ये गाइड बनने के 1000 रुपये ले रहे थे। और अब इस हालत में चले आये। किस बात के गाइड हो? किस बात के जानकार हो?
   पास के दोनों तालाब सूखे थे लेकिन एक में थोडा सा पानी बर्फ बना हुआ था। बर्फ तोडकर लाये और एक भगोने में उसे गला लिया। हिमाचल वाले अपने साथ एक भगोना लाये थे मैगी वगैरा बनाने को। ये तालाब जून से लेकर नवम्बर तक भरे रहते होंगे। इनमें बकरियां व जानवर लोटते होंगे और पानी पीते होंगे। अब जब बर्फ गल गई तो इसमें से वही गन्ध आने लगी। मुझे तो टैंट लगाते ही ठण्ड लगने लगी। बर्फ गलाने का सारा काम नितिन और अमरीश ने किया। लेकिन उन्हें भी ठण्ड लग रही थी और भूख भी लग रही थी इसलिये पानी उबलने तक की प्रतीक्षा नहीं कर सकते थे। फिर लकडियां भी हमसे अच्छी तरह नहीं जल रही थीं। बिना उबला पानी ही बोतलों में भर लिया। यह देखने से ही पीने योग्य नहीं लग रहा था लेकिन सभी के गले सूखे थे, कर भी क्या सकते थे?
   पानी की कमी के कारण मुंह में लार बननी बन्द हो गई थी जिसके कारण परांठे भी नहीं खाये जा सके। कुछ परांठे स्थानीय लडकों को दे दिये। एक चादर भी दे दी। लेकिन एक चादर से क्या होता है? उन्हें ठण्ड लगती रही और वे पूरी रात आपस में गाली-गलौच और शोर-शराबा मचाते रहे।


तेवा में इस कमरे में रुके थे.

अन्तन में नाग मंदिर के अन्दर


अन्तन का नाग मंदिर


कुछ ऊपर से दिखता अन्तन गाँव


लगभग पूरे रास्ते मोबाइल नेटवर्क मिलता है.


तेवा गाँव का विहंगम नजारा.





रास्ते में एक जगह विश्राम करते हुए.


नागटिब्बा तक अच्छी पगडण्डी बनी है.


रास्ते से दिखती हिमालयी बर्फीली चोटियाँ.

सूर्यास्त

रात में आग जलाकर बर्फ गलाते हुए.





43 comments:

  1. पूरा लेख पढ़ा नीरज भाई, हालात काफ़ी खराब हो गए थे पानी की कमी से ! आप कैसे निबटे इस समस्या से फिर ?

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    1. आज के हाल तो आपने पढ़ ही लिए... अगले दिन की कहानी अगली पोस्ट में आयेगी... खैर, अगले दिन दोपहर को पानी मिला था...

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  2. नीरज जी, मैं बिहार का रहने वाला हूं, आपने बिहार के लाईन होटलों पर मुसाफिरों से जो जबरदस्ती पैसे लेने वाली बात लिखी है, वो सही नही है. हां यह हो सकता है कि वो सामान के ज्यादा पैसे लेते हों.

    SANTOSH PRASAD SINGH, MUZAFFARPUR

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    1. संतोष जी, मैंने बिहार के बारे में ऐसा केवल ऐसा सुना भर था... मुझे वहां का कोई अनुभव नहीं है... आपका बहुत बहुत धन्यवाद इसे स्पष्ट करने के लिए.

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  3. वाह नीरज भाई रोमांचक
    मजा आ गया

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    1. धन्यवाद चौधरी साहब...

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  4. एक बार फिर से बहुत सुंदर एवं सरस यात्रा वर्णन नीरज जी.........आपकी लेखन शैली में बहुत अच्‍छा प्रवाह है।

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    1. धन्यवाद स्वाति जी...

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  5. खतौली के बारे में आपकी राय बिल्कुल सही है नीरज भाई। एक बार 15 मिनट के फोन चार्जिंग करने के बदले 70 रुपये की घटिया पकौड़ियाँ मुझे भी खानी पड़ी थी।

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    1. बिलकुल ठीक कहा बीनू भाई...

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  6. बड़े ही कठीन होते होते ये ट्रेक | जंगली रास्ते, पतली पगडंडिया, अंजान खतरे और खाने पीने की कमी |
    अच्छा वर्णन

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    1. धन्यवाद रीतेश भाई...

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  7. 'नाग टिब्बा' कोई जोत (पास) की तरह है क्या?
    फोटोज विशेष अच्छे लगे।

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  8. काफी दिन से नागटिब्बा ट्रैक के लेख का इन्तजार था नीरज भाई। नागटिब्बा के बारे में थोड़ी और जानकारी चाहिए, वैसे हो सकता है अगले भाग में मेरी जिज्ञासा शांत हो जाये।
    धन्यवाद

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    1. निशांत जी, अगले भाग में बची-खुची जानकारी देने की कोशिश करूँगा... फिर भी आपको अपनी जिज्ञासा बता देनी चाहिए थी...

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  9. आपके जज्बे को सलाम नीरज भाई
    हमें कुल 10-10 किलो वजन बाँट खुद सम्हाला 25 किलो से भी ज्यादा!

    ये मोटा नितिन अगर कोई ट्रेक कर सकता था तो केवल आपके साथ ही कर सकता था।
    कोई और होता तो कहता आप से आगे बढ़ा नहीं जा रहा आप लौट जाइये।
    मैंने कई बार कहा की नीरज भाई बस अब और नहीं,पर आप हर बार हौसला देते।
    आखिर के जबरजस्ती खिलाये परांठे अभी याद हैं और उसके बाद आई ताकत भी।

    पता नहीं क्यों कुछ लोग आपको स्वार्थी या घमण्डी कह जाते होंगे,शायद इसलिए के उन्हें आपका सानिध्य नहीं मिला। आपका को-ऑपरेशन काबिले तारिफ था।
    और हाँ इस दिन एक सीख और मिली थी टॉफी के रेपर नहीं फेकना! पता है घर आकर जेब से निकले वे।

    इस बार पुनः 23 जनवरी को जाने का पक्का मूड और प्लान कर चुका था पर गत सोमवार बाइक फिसल गयी और बाएं पैर में फ्रैक्चर,फिर प्लास्टर लग गया है तो अब नहीं जा पाउँगा।

    पाठकों को सन्देश-
    अगर आप बिगनर हैं तो नागटिब्बा,नीरज और 23 जनवरी से बेहतर कॉम्बिनेशन नहीं मिलने वाला।
    होकर आइये आप भी नितिन हो जायेंगे।

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    1. धन्यवाद नितिन भाई...
      भावुक हो गया आपकी टिप्पणी पढ़कर...

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    2. पिछले दिनों नीरज जी के कैमरे में नागटिब्बा के कुछ फोटो देखे...नितिन जी की सेहत देख कर मेने सबसे पहला सवाल यही किया...यह मोटु भाईसाहब चढ़ गये थे...? नीरज जी ने अनसुना कर के कह दिया हाँ चढ़ गये थे...नितिन जी की टिपण्णी ने सब खुलासा कर दिया..।। नीरज जी का सादगीपूर्ण व्यक्तित्व और उत्साहवर्धन करने की प्रकृति अदभुत है।

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    4. धन्यवाद डॉ साहब,
      ये ट्रेक करके प्रेरणा ली थी कि शीघ्र ही 95 से 80 पर आना है और खूब आनन्द लेना है भाई के साथ।
      शेड्यूल डेढ़ महीना पीछे जरूर हुआ पर निश्चित ही कार्य होगा इस पर।

      जहाँ तक नीरज जी बात है आप और हम साथ रहकर जितना जान पाएं हैं इनके बारे में दूसरे लोगो को भी खुद को मौका देना चाहिए।

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  10. वाह भाई ।
    मज़ा आगया हमको भी ट्रेकिंग का नितिन जी की पोस्ट से ब्लॉग पर आया ।
    धन्यवाद

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    1. धन्यवाद पाण्डेय जी...

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  11. I am also following you

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  12. पहाड़ जितने सुंदर है उतने ही भयानक भी है । अगली पोस्ट का इंतजार रहेगा।किन किन मुश्किलो से तुम लोग गुजरे हो ।

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  13. अरे ये मन्दिर तो काफी सुंदर है। इसका मतलब उत्तराखण्ड में और भी टोवर टेम्पल होने चाहिए। और कौन लड़के मिल गए भाई मण्डी के तुम्हे :D नाम तो बताओ

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  14. नीरज जी आपकी हिम्मत को सलाम इतनी कठिन परिस्थिओ में भी ट्रैकिंग करके इतने सहज रहते हैं और हम आपकी पोस्ट पढ़ कर रोमांचित हो जाते है और घुमक्कडी का फितूर जग उठता है

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  16. बहुत अच्छा मालिक...... नागटिब्बा अपने आप में मध्य हिमालय की एक range भी है ... co ordinate कैसे नहीं दे पाए इस बार !!

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  18. भाई जी एक बात तो है कि हिमाचल व उत्तराखंड के लोगों के व्यवहार में बहुत बड़ा अंतर है

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    1. ऊपर पोस्ट में ही नीरज भाई ने साफ़ कर दिया है के जैसा ड्राईवर ने कहा था वैसा निकला नहीं
      ख़राब गाड़ी के ड्राईवर ने पहला काम किया हमें साइड देना।
      धन्यवाद भाई जी

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  19. सचमुच डरावना लगता है ये सोचकर भी की कोई जानकार (Experience holder) साथ ना हो तो क्या हाल हो......

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  20. नीरज भाई राम राम।
    मैं आपके साथ इसलिए नही गया, क्योकी मुझे ओर मेरे कजन को आपके साथ, 24 जनवरी वाले नाग टिब्बा टूर पर जाना था,

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  21. मज़ा आ गया नीरज भाई!

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  22. नागटिब्बा ..हमारी जिज्ञासाऐं बढ़ गई है . अगली पोस्ट का इंतजार रहेगा . कई नई बातें जानने मिली .

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  23. नमस्कार नीरज जी, मैं वीरेंद्र, पटना बिहार से| अभी पिछले दो दिनों से आपके यात्रा संस्करणों को पढना शुरू किया है | मैं भी ट्रैकिंग कर ना चाहता हूँ | मैने अभी तक सिर्फ माता रानी वैष्णो देवी तक की चढाई की है | मार्गदर्शन के अभिलाषी है |

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  24. अगली पोस्ट का इंतजार रहेगा।किन किन मुश्किलो से तुम लोग गुजरे हो ।

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  25. नीरज जाट भाई ने संदीप जाट की राम राम . भाई कई दिन ते ब्लॉग पढ़न लाग रहा हु. बढिया लिखे है स्वाद आ गया भाई.

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  26. WAH NEERAJ JI MAZA AA GAYA I LIKE IT

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  27. neeraj ji aap kabhi jain teerath shikher ji ki yatra par jana kaphi maza ayega shikher ji jain teerath h jo jharkhand me h

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  28. niche se 3rd pic zabardast hai bhai..

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