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Friday, January 30, 2015

लाखामण्डल से चकराता- एक खतरनाक सफर

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26 नवम्बर 2014
हमारा दिमाग खराब था कि हमने लाखामण्डल से शाम सवा चार बजे चकराता जाने का फैसला किया। दूरी लगभग 70 किलोमीटर है, सडक सिंगल लेन ही है। पूरा रास्ता पहाडी। इतनी जानकारी हमें थी। जैसे हम कल से पहाडों पर चलते आ रहे थे, ऐसे ही चलते रहें तो तीन घण्टे लगने ही थे जबकि एक घण्टे बाद ही दिन छिपना शुरू हो जायेगा। उसके बाद अन्धेरा। और चकराता भी हम किसलिये जाना चाहते थे? सिर्फ रात रुकने के लिये। हमें कल वहां से सुबह ही दिल्ली के लिये निकल पडना है। यह भी जानते थे कि चकराता में होटल यहां लाखामण्डल के मुकाबले महंगे मिलेंगे, फिर भी बस बिना सोचे समझे निकल पडे।
लाखामण्डल में ही हमें बता दिया गया था कि लाखामण्डल गांव से निकलते ही एक तिराहा आयेगा। आप ऊपर वाली सडक से जाना। हालांकि दोनों ही सडकें आगे गोराघाटी में फिर से मिल जाती हैं लेकिन नीचे वाली सडक खराब है, ऊपर वाली ठीक है। यह हमें बताया गया। यह भी बताया गया कि गोराघाटी के बाद सडक अच्छी बनी है।

Wednesday, January 28, 2015

लाखामण्डल

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आठ बजे सोकर उठे। आज मेरी छुट्टी का आखिरी दिन था। लाखामण्डल यहां से लगभग सवा सौ किलोमीटर दूर है और हम लाखामण्डल जाकर रात होने तक दिल्ली किसी भी हालत में नहीं पहुंच सकते थे। इसलिये लाखामण्डल जाना रद्द कर दिया था। आज के लिये तय था कि मसूरी से देहरादून उतर जायेंगे और फिर आगे अपने घर चले जायेंगे।
लेकिन अब जब चलने की तैयारी करने लगे तो अरुण ने कहा कि एक दिन की ही बात है, लाखामण्डल चलते हैं। मेरे लिये एक दिन की छुट्टी बढवाना कोई मुश्किल नहीं था। सबसे ज्यादा मुश्किल आई सचिन को। उसने पहले ही कह रखा था कि आज शाम तक हर हाल में उसे अपने घर जाना है। हमने उसे अपना निर्णय बताया। उसने पहले तो स्पष्ट मना कर दिया। लेकिन कुछ हमारी काउंसलिंग के बाद वह इस शर्त पर चलने को राजी हो गया कि कल दोपहर तक उसे घर पहुंचना ही पहुंचना है। हम उसकी बात पर राजी हो गये हालांकि जानते थे कि उसे कल भी घर पहुंचने में शाम हो जायेगी।

Monday, January 26, 2015

मोटरसाइकिल यात्रा- ऋषिकेश, नीलकण्ठ और कद्दूखाल

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सवा ग्यारह बजे हम बरनावा से निकल गये। अब हमें सीधे ऋषिकेश जाना था। यहां से सरधना लगभग 20 किलोमीटर है। बरनावा की सीमा से निकलते ही हिण्डन नदी पार की और हम बागपत जिले से मेरठ जिले में प्रवेश कर गये। सडक की जितनी तारीख की जाये, कम है। यूपी में ऐसी सडकें मिलती नहीं हैं। भूनी चौराहा पार करते करते सरधना पांच किलोमीटर रह जाता है। भूनी में मेरठ-शामली सडक इस बडौत-सरधना सडक को काटती है। भूनी से मेरा गांव दबथुवा लगभग 8 किलोमीटर मेरठ रोड पर है।
सरधना में बेतरतीब भीड ने हमारा स्वागत किया। सरधना से भी हमारा गांव आठ किलोमीटर दूर ही है। यहां एक बडा प्रसिद्ध चर्च है। सरधना से इतना नजदीक होने के बावजूद भी मैं आज तक यह चर्च नहीं देख सका। इस बार भी नहीं देखा।
सचिन को गूगल मैप के अनुसार चलने का शौक है। मैं चाहता था कि सरधना से दौराला जाया जाये और फिर नेशनल हाईवे से होते हुए मुजफ्फरनगर और रुडकी होते हुए हरिद्वार। लेकिन सचिन ने कहा कि गंगनहर के रास्ते चलेंगे। मैं इस रास्ते से नहीं जाना चाहता था क्योंकि यह सिंगल रोड है। इस पर अब काफी ट्रैफिक भी रहने लगा है और गन्ने से लदी बुग्गियां व ट्रैक्टर ऐसे रास्तों पर बडा परेशान करते हैं। दौराला के रास्ते आठ-दस किलोमीटर का चक्कर जरूर पडेगा लेकिन ऐसी कोई समस्या नहीं आयेगी। लेकिन सचिन की जिद व अरुण की स्वीकृति के कारण गंगनहर के रास्ते चलने की मंजूरी देनी पडी।

Friday, January 23, 2015

लाक्षागृह, बरनावा

नई बाइक ली और अगले ही दिन लाइसेंस के लिये पहुंच गया लोनी रोड। वहां जो लम्बी लाइन देखी, तत्काल वापस भाग आया। फिर अगले दिन गया कडकडडूमा के पास सूरजमल विहार। यहां बिल्कुल लाइन नहीं थी। मोटरसाइकिल के लाइसेंस की फीस 30 रुपये जमा की और उसी दिन लर्निंग लाइसेंस लेकर लौट आया। अब इन्तजार था कि कब एक महीना पूरा हो और कब मैं परमानेंट लाइसेंस लेने जाऊं। लेकिन इस दौरान मुझे बाइक चलानी भी सीखनी थी। अब से पहले मैंने कभी भी बाइक नहीं चलाई थी। एक महीने बाद जब मैं ड्राइविंग टेस्ट देने पहुंचा तो घबराहट होनी स्वाभाविक थी। मेरे देखते ही देखते कई बाइक वाले असफल भी घोषित हुए।
आखिरकार मैं सफल हुआ। शनिवार 22 नवम्बर को परमानेंट लाइसेंस घर आ गया। अब निश्चित हो गया कि सोमवार को यात्रा पर निकलूंगा। पहले ही बता चुका हूं कि मेरी पहली पैदल हिमालय यात्रा नीलकण्ठ महादेव की थी, पहली साइकिल यात्रा भी नीलकण्ठ की ही थी तो तय कर लिया कि पहली बाइक यात्रा भी नीलकण्ठ की ही होगी। इसे और ज्यादा आकर्षक बनाने के लिये नाम दिया- लाक्षागृह से लाखामण्डल। लाक्षागृह बडौत के पास है और लाखामण्डल चकराता के पास। दोनों की कहानी एक ही है कि कौरवों ने लाख का एक महल बनवाया था और उसमें पाण्डवों को रहने के लिये राजी कर लिया। जब पाण्डव रहने लगे तो कौरवों ने धोखे से उसमें आग लगा दी। पाण्डव किसी तरह सुरंगों के रास्ते बचकर निकले। यही सब देखने के लिये लाक्षागृह और लाखामण्डल जाना था।

Wednesday, January 21, 2015

जांस्कर यात्रा का कुल खर्च

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यह एक बेहद खर्चीली यात्रा रही। इसका खर्च विधान के माध्यम से काफी चर्चा में रहा। मैं बताता हूं हमारा कहां-कहां कितना खर्च हुआ।
दिल्ली से श्रीनगर फ्लाइट खर्च= 4200 रुपये
(विधान और प्रकाश जी दूसरी फ्लाइट से गये थे। उनकी फ्लाइट सस्ती थी। उनके 3000-3000 रुपये के आसपास दिल्ली से श्रीनगर का खर्च आया।)
घर से निकला, शास्त्री पार्क से नई दिल्ली तक मेट्रो से गया, जेब से कुछ नहीं लगा, अपना स्टाफ कार्ड काम करता है। इसके बाद एयरपोर्ट लाइन पर अपना यह कार्ड काम नहीं करता, इसलिये टिकट लेना पडा।

Monday, January 19, 2015

फोटोग्राफी चर्चा- 1

फोटोग्राफी पर चर्चा के लिये मित्रों से फोटो आमन्त्रित किये थे। काफी संख्या में फोटो आये। कुछ फोटो की पिछली डायरियों में चर्चा की थी, बाकी की इस बार कर देते हैं। 
बहुत मुश्कित है किसी के काम में कमियां निकालना। चर्चा के बहाने असल में कमियां ही निकाली जाती हैं। कमी न भी हो, तब भी... जबरदस्ती। असल में जब कोई भी मित्र अपने सैंकडों हजारों फोटो में से दो-चार फोटो भेजेगा तो निश्चित ही वह अपने सर्वोत्तम फोटो ही भेजेगा। इस बात में कोई शक नहीं कि सभी फोटो बेहद शानदार हैं। लेकिन फोटो आमन्त्रित करने का मकसद उन फोटो की वाहवाही करना नहीं है। इस काम का मकसद ही है कमियां निकालना तथा और ज्यादा प्रयोग करने की सलाह देना। मैं सभी मित्रों को यही सलाह देता हूं कि फोटो तो ठीक है लेकिन अगर ऐसा होता तो ये होता, वैसा होता तो वो होता। वास्तव में फोटोग्राफी कैमरे को क्लिक क्लिक करना भर नहीं होता। इसमें आपको बहुत प्रयोग भी करने होते हैं।
लेकिन मुश्किल यही है कि सर्वोत्तम फोटो होने के बाद भी थोडी बहुत कमियां निकाली जायेंगी तो फोटोग्राफर थोडा-बहुत आहत भी होता है। निश्चित ही आहत जरूर होगा। यही सोचकर अब इस काम को बन्द करने का निश्चय कर लिया (नहीं किया) है। 

Friday, January 16, 2015

शिंगो-ला से दिल्ली वापस

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अगले दिन यानी 18 अगस्त को सुबह आठ बजे सोकर उठा। चाय पी, कुछ बिस्कुट खाये और जैम के साथ लद्दाखी रोटी भी। हालांकि अब मैं हिमाचल में था, लाहौल में था लेकिन यह लद्दाख से ज्यादा भिन्न नहीं है। साढे आठ बजे यहां से चल पडा।
आज मुझे अपने बाकी दोनों साथियों से मिलना है। पुरने में जब हम अलग हुए थे, तब यही तय हुआ था कि हम चार दिन बाद दारचा में मिलेंगे। सुबह वे लेह से चले होंगे, मैं यहां से चलूंगा। देखते हैं कौन पहले दारचा पहुंचता है?
लामाजी द्वारा बनवाई जा रही सडक लगभग शिंगो-ला तक पहुंच चुकी है। वह सडक यहां से बस कुछ ही ऊपर थी। नीचे पगडण्डी थी। मुझे अभी भी इतनी थकान थी कि मैं करीब सौ मीटर ऊपर सडक पर नहीं जाना चाहता था। लेकिन इसका भी अपना नुकसान था। ऊपर सडक बनी तो मलबा नीचे तक आ गया था। उससे पगडण्डी भी प्रभावित हुई थी, इसलिये चलने में समस्या आ रही थी। एक बार हिम्मत करके ऊपर सडक तक पहुंच गया और बाकी पैदल यात्रा मजे में कटी।

Wednesday, January 14, 2015

गोम्बोरंजन से शिंगो-ला पार

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आज तारीख थी 17 अगस्त 2014
आपको ध्यान होगा कि मैं पवित्र गोम्बोरंजन पर्वत के नीचे एक अकेले कमरे में सो गया था। रात में एकाध बार आंख भी खुली थी लेकिन मैं चूंकि सुरक्षित स्थान पर था, इसलिये कोई डर नहीं लगा। हां, एकान्त में होने का एक अजीब सा डर तो होता ही है।
साढे सात बजे आंख खुली। कुछ बिस्कुट खाये, पानी पीया, बिस्तर समेटा और सवा आठ बजे तक निकल पडा। अब ऊंचाई बढने लगी थी और रास्ता भी ऊबड खाबड होने लगा था। जिस स्थान पर मैं सोया था, वो जगह समुद्र तल से 4250 मीटर पर थी, अब जल्दी ही 4400 मीटर भी पार हो गया। वैसे तो अभी भी बडी चौडी घाटी सामने थी लेकिन इसमें छोटी छोटी कई धाराओं के कारण रास्ता बिल्कुल किनारे से था जहां बडे-बडे पत्थरों की भरमार थी।
सामने बहुत दूर खच्चरों का एक बडा दल इस घाटी को पार कर रहा था। कैमरे को पूरा जूम करके देखा तो पता चला कि उन पर कुछ राशन लदा है और कुछ लोग पैदल भी चल रहे हैं। निश्चित ही वह एक ट्रेकिंग ग्रुप होगा जो आज लाखांग में रुका होगा। आज शिंगो-ला पार कर लेगा।

Monday, January 12, 2015

पदुम-दारचा ट्रेक- तेंगजे से करग्याक और गोम्बोरंजन

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16 अगस्त 2014
सुबह साढे आठ बजे सोकर उठा। हालांकि रात जब सोने जा रहा था तो दुकान मालकिन से यही कहकर सोया था कि सुबह छह बजे चल पडूंगा। सुबह छह बजे आंख भी खुली थी लेकिन बाहर बूंदाबांदी हो रही थी। मैं फिर सो गया। अबकी उठा तो साढे आठ बज चुके थे और तेज धूप टेंट पर पडने लगी थी। दुकान भी खुल चुकी थी। सरचू जाने वाले विदेशियों के ग्रुप का साजो-सामान उखड चुका था और खच्चरों पर लादा जा रहा था।
मैं तय कार्यक्रम से काफी पीछे था। सुबह सवेरे चलने का मकसद इतना ही था ताकि कुछ समय व दूरी की पूर्ति कर सकूं। परसों शाम तक हर हाल में दारचा पहुंचना है। दारचा में मुझे विधान व प्रकाश जी मिलेंगे, कल ही इस बारे में सबकुछ तय हो गया था। अगर मैं न पहुंचा तो वे दारचा में मेरी प्रतीक्षा करते रह जायेंगे। लेकिन बुरी आदत है देर तक सोने की, सोता ही रह गया।

Friday, January 9, 2015

पदुम- दारचा ट्रेक- पुरने से तेंगजे

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आज देश में स्वतन्त्रता दिवस मनाया जा रहा था और हम जांस्कर के दुर्गमतम स्थान पर छोटे से गांव के छोटे से खेत में तम्बू लगाये पडे सो रहे थे। हमें तिरंगा देखना था और दो घरों के गांव पुरने में इसकी कोई सम्भावना नहीं थी। उम्मीद थी कि आगे बढेंगे तो कहीं किसी बडे गांव में स्कूल मिलेगा और हम तिरंगा देख सकेंगे।
आगे बढने से पहले थोडा सा भूतकाल में लौटते हैं। कल की बात है। जब हम फुकताल से पुरने आये तो हमें घोडे वाला मिला। यह वही घोडे वाला था जो हमें परसों शाम अनमो से चा के रास्ते में मिला था और हमने उसे सुबह पुरने में मिलने को कहा था। जिस समय हमारी घोडे वाले से बात हुई थी, उस समय हमारा इरादा पुरने रुकने का ही था लेकिन बाद में अन्धेरा हो गया तो इरादा बदल गया और हम चा रुक गये। हालत हमारी तब ऐसी थी कि हम इस वाकये को भूल गये।
अब आगे क्या हुआ, यह भी जान लीजिये। वो घोडे वाला तेंगजे का था जो पुरने से भी करीब 15 किलोमीटर आगे है। वह पहले अपने घर गया। उसे पुरने तक पहुंचने में ही अन्धेरा हो गया होगा। अपने घर वह कम से कम दस ग्यारह बजे रात को पहुंचा होगा। फिर रात को ही वहां से पुरने लौट आया और सुबह हमें ढूंढने लगा। लेकिन हम वहां होते तो उसे मिलते भी। तब हम चा में थे और फुकताल जाने वाले थे। वह हमें ढूंढता रहा लेकिन हम नहीं मिले। फिर दोपहर को प्रकाश जी और विधान का सामान लेकर एक आदमी पुरने गया। आपको याद होगा कि हमने आठ सौ रुपये में सामान चा से पुरने पहुंचाने के लिये एक आदमी को कहा था और खाली हाथ फुकताल चले गये थे। उस आदमी ने वहां हमारे बारे में बताया। उससे हमने किसी घोडे वाले को तैयार करने को भी कहा था। उसने एक घोडे वाले को तैयार कर दिया। अब पुरने में दो घोडे वाले ऐसे हो गये जो हमारा इंतजार कर रहे थे।

Wednesday, January 7, 2015

अदभुत फुकताल गोम्पा

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   जब भी विधान खुश होता था, तो कहता था- चौधरी, पैसे वसूल हो गये। फुकताल गोम्पा को देखकर भी उसने यही कहा और कई बार कहा। गेस्ट हाउस से इसकी दूरी करीब एक किलोमीटर है और यहां से यह विचित्र ढंग से ऊपर टंगा हुआ दिखता है। इसकी आकृति ऐसी है कि घण्टों निहारते रहो, थकोगे नहीं। फिर जैसे जैसे हम आगे बढते गये, हर कदम के साथ लगता कि यह और भी ज्यादा विचित्र होता जा रहा है।

   गोम्पाओं के केन्द्र में एक मन्दिर होता है और उसके चारों तरफ भिक्षुओं के कमरे होते हैं। आप पूरे गोम्पा में कहीं भी घूम सकते हैं, कहीं भी फोटो ले सकते हैं, कोई मनाही व रोक-टोक नहीं है। बस, मन्दिर के अन्दर फोटो लेने की मनाही होती है। यह मन्दिर असल में एक गुफा के अन्दर बना है। कभी जिसने भी इसकी स्थापना की होगी, उसी ने इस गुफा में इस मन्दिर की नींव रखी होगी। बाद में धीरे-धीरे यह विस्तृत होता चला गया। भिक्षु आने लगे और उन्होंने अपने लिये कमरे बनाये तो यह और भी बढा। आज इसकी संरचना पहाड पर मधुमक्खी के बहुत बडे छत्ते जैसी है। पूरा गोम्पा मिट्टी, लकडी व पत्थरों का बना है। जांस्कर में बारिश नहीं होती इसलिये मिट्टी का बना होने के बावजूद भी यह अभी तक टिका है।

Monday, January 5, 2015

डायरी के पन्ने- 28

ध्यान दें: डायरी के पन्ने यात्रा-वृत्तान्त नहीं हैं।

1. पता है कुछ ही दिन पहले तक इस पोस्ट का शीर्षक क्या था? इसका शीर्षक था- डायरी के पन्ने- आखिरी भाग। इसमें कुछ नहीं लिखा था, बस जो बचे-खुचे फोटो थे, मित्रों ने भेज रखे थे चर्चा के लिये, उन्हें ज्यों का त्यों लगा दिया था बिना किसी कैप्शन के, बिना किसी चर्चा के। फिर अब ख्याल आया कि महीने में दो बार डायरी के पन्ने छपते हैं, यानी सालभर में चौबीस पोस्ट ऐसे ही हो जाती हैं बिना किसी यात्रा के। अब तो फोटो-चर्चा भी शुरू कर रहा हूं।
असल में डायरी के पन्ने लिखने में समय बहुत कम लगता है और फोटो चर्चा में तो और भी कम। किसी यात्रा-वृत्तान्त के मुकाबले बहुत ही कम। और इन्हें पसन्द भी किया जाता है। यात्रा-वृत्तान्त में पहले यात्रा करो, फिर वापस आकर थकान उतारो और फिर लिखना शुरू करो। फोटो का चुनाव करो, उन्हें एडिट करो। डायरी में ऐसा कुछ नहीं है। पन्द्रह दिन में दो घण्टे लगते हैं और एक अच्छी-खासी डायरी तैयार। और फोटो चर्चा में? मित्र लोग फोटो भेज देते हैं। न उनका चुनाव करने का झंझट, न एडिटिंग का झंझट; बस फोटो अपलोड करके चार लाइनें लिख दो, किसी की वाहवाही कर दो, किसी में कमी निकाल दो, किसी को सुझाव दे दो और काम खत्म।

Friday, January 2, 2015

फुकताल गोम्पा की ओर

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सुबह आठ बजे आंख खुली। आज हम जमकर सोये। रात ही तय हो गया था कि आज क्या करना है। तय ये हुआ था कि आज एक आदमी विधान और प्रकाश जी का सामान लेकर पुरने जायेगा। मैं अपना सामान अपने साथ ही रखूंगा। वे दोनों खाली हाथ फुकताल गोम्पा जायेंगे और शाम को पुरने में सामान ले लेंगे। चा से पुरने लगभग दो किलोमीटर है। सारा ढलान है, फिर भी उस आदमी ने सामान के आठ सौ रुपये मांगे। मजबूरी थी इसलिये देने पडे। साथ ही उसे यह भी बता दिया कि पुरने जाकर घोडे या खच्चर का इंतजाम करके रखना। हमें उनकी सख्त आवश्यकता थी।
पिछली पोस्ट में बताया था कि पुरने में सारप में एक नदी और आकर मिलती है। यह नदी शिंगो-ला से आती है, इसलिये चलिये इसे सुविधा के लिये शिंगो नदी कह देते हैं। सारप नदी बारालाचा-ला से निकलती है और सरचू होते हुए लम्बा चक्कर लगाकर यहां तक आती है। हमें शिंगो-ला जाने के लिये पुरने में सारप को छोड देना है और अपना सफर शिंगो नदी के साथ साथ तय करना है। लेकिन पुरने से पांच किलोमीटर दूर सारप नदी की घाटी में अदभुत फुकताल गोम्पा है। हम फुकताल गोम्पा को अवश्य देखना चाहते थे। उसके लिये सबसे प्रचलित और सुविधाजनक रास्ता पुरने से जाता है। उधर हम पुरने नहीं पहुंचे थे, उससे कुछ पहले चा में थे। गोम्पा का एक रास्ता चा से भी जाता है। चा वाला रास्ता सारप नदी के इस तरफ से है तो पुरने वाला उस तरफ से। हम इस तरफ से फुकताल जायेंगे और उस तरफ वाले रास्ते से होते हुए पुरने चले जायेंगे। पुरने में हमें सामान भी मिल जायेगा और घोडे भी। अच्छा हां, हम इस बात को भूल ही गये थे कि कल हमने एक घोडे वाले से भी बात की थी और उसे पुरने मिलने को कहा था। अब वह हमें पुरने में ढूंढ रहा होगा। चलिये, उसका किस्सा बाद में बताऊंगा।