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Friday, November 13, 2015

पातालकोट से इंदौर वाया बैतूल

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पातालकोट हम घूम चुके और अब बारी थी वापस इन्दौर जाने की। एक रास्ता तो यही था जिससे हम आये थे यानी पिपरिया, होशंगाबाद, भोपाल होते हुए। इस रास्ते को हम देख चुके थे। दूसरा रास्ता था बैतूल होते हुए। मैं इसी बैतूल वाले से जाना चाहता था। नया रास्ता, नई जगह देखने को मिलेगी। तामिया से दोनों रास्ते अलग होते हैं। हम बायें मुड गये और जुन्नारदेव के लिये ग्रामीण रास्ता पकड लिया। तामिया से जुन्नारदेव 28 किलोमीटर है और सारा रास्ता अच्छा बना है। सडक सिंगल लेन है यानी पतली सी है और कोई ट्रैफिक नहीं। ऊंची-नीची छोटी-छोटी पहाडियां इस रास्ते को बाइक चलाने के लिये शानदार बनाती हैं। आधा घण्टा लगा जुन्नारदेव पहुंचने में।
शाम के चार बज चुके थे। बैतूल अभी भी लगभग 100 किलोमीटर था। मुझे इस दूरी को तय करने में लगभग तीन घण्टे लगेंगे, अगर सडक अच्छी हुई तो। यानी बैतूल पहुंचने में अन्धेरा हो जाना है। मैं अन्धेरे में बाइक चलाना पसन्द नहीं करता इसलिये तय कर लिया कि रात बैतूल रुकना है। उधर सुमित पहले ही काफी लेट हो रहा था। उन्हें जल्द से जल्द इन्दौर पहुंचना था इसलिये आज वे बैतूल नहीं रुक सकते थे। सहमति बनी और हम जुन्नारदेव में अलग हो गये। सुमित तेज बाइक चलाता है और जब तक हम बैतूल पहुंचेंगे, वो हरदा पहुंच जायेगा।
बैतूल में एक मित्र रहते हैं अनुराग। जब से उन्हें मेरी इस यात्रा की जानकारी हुई, वे लगातार कह रहे थे कि अगर मैं बैतूल आऊं तो उन्हें भी बताऊं। उन्हें बता दिया कि आज अन्धेरा होने तक हम बैतूल पहुंच जायेंगे।
जुन्नारदेव के बाद मेन हाईवे मिल जाता है। यह टू-लेन है और अच्छा बना है। दमुआ के बाद करीब 10 किलोमीटर खराब है। यहां सडक बनाने का काम चल रहा था। यह खराब सडक के बाद जो शानदार सडक आई, उसने जी खुश कर दिया। एक तो अच्छी सडक, फिर ट्रैफिक भी नहीं। वाकई मध्य प्रदेश बाइक वालों के लिये स्वर्ग है।
साढे पांच बजे सारणी पहुंचे। अब बैतूल लगभग पचास किलोमीटर रह जाता है। यहां एक बहुत बडा थर्मल पावर प्लांट है। इसमें कोयला लाने के लिये बीस किलोमीटर दूर घोडाडोंगरी से रेलवे लाइन भी आई है।
शाम सात बजे बैतूल पहुंचे। थोडे इंतजार के बाद अनुराग भी अपने एक मित्र के साथ आ मिले। वे हमें शहर में ले गये और एक महंगे होटल में 660 रुपये का कमरा दिला दिया। ये पैसे चूंकि हमें ही देने थे इसलिये मैंने कहा कि शहर से बाहर मेन रोड पर कोई सस्ता होटल होगा, लेकिन अनुराग ने बताया कि यह बैतूल के सबसे अच्छे होटलों में से एक है और हमारे लिये लिये यही सर्वोत्तम है। मजबूरी में यहां रुकना पडा। उन्हें क्या पता था कि हम पचमढी में भी 400 रुपये के एक महंगे कमरे में रुके थे और न्यूनतम बजट हमारे लिये सबसे पहली जरुरत होता है।
अनुराग ने बताया कि बगल में ही उनका घर है और अगली कालोनी में ससुराल। तय हुआ कि सुबह जल्दी ही अनुराग अपनी बाइक पर आ जायेंगे और बैतूल के पास एक दर्शनीय स्थल को दिखायेंगे। लेकिन अगले दिन हमारी भी जल्दी आंख खुल गई और हम सूरज निकलने के साथ ही बैतूल से निकल पडे। जब तक अनुराग का फोन आया, हम चालीस किलोमीटर दूर चिचौली पहुंच चुके थे।
कल अनुराग ने बताया था कि चिचौली के बाद ऐसा घना जंगल है कि वहां से गुजरते हुए डर लगता है। मैं भी ऐसे घने जंगल को देखने को उत्साहित था। चिचौली में चाय-बिस्कुट खाये, थोडा सा अखबार पढा और साढे सात बजे चल दिये। जंगल तो अच्छा खासा है, लेकिन मैं जंगलों का इतना अभ्यस्त हो चुका हूं कि अब जंगल भयावह नहीं लगते। सडक अच्छी है ही। टू-लेन है। रास्ता ज्यादातर पहाडी है। अस्सी किलोमीटर दूर टिमरनी पहुंचने में दो घण्टे लगे।
टिमरनी से हरदा तक भी अच्छी सडक है लेकिन हरदा के बाद जो सडक मिली, उसने इस पूरी यात्रा की अच्छी यादों को भुला दिया। हरदा से इन्दौर डेढ सौ किलोमीटर है। इस दूरी को तय करने में पांच घण्टे से भी ज्यादा लग गये। हण्डिया से कुछ पहले 10-15 किलोमीटर की अच्छी सडक जरूर है लेकिन नर्मदा पार करके नेमावर के बाद तो और भी बुरी हालत है। बाद में सुमित ने बताया कि यह इलाका भी अच्छा नहीं है। देर सबेर जाने वालों से लूटपाट भी हो जाती है।
जब बैतूल से चले थे तो बारह-एक बजे तक इन्दौर पहुंच जाने का लक्ष्य था। उधर आज शाम को इन्दौर से भी आगे घाटाबिल्लौद में मुकेश भालसे जी के यहां भी जाना था। सुमित ने कह रखा था कि वे आज नौ बजे इन्दौर आ जाने के बावजूद भी क्लिनिक नहीं गये। लंच हमारे साथ ही करेंगे। मैंने भी इसकी सहमति दे दी। उधर वे भूखे बैठे हमारी प्रतीक्षा करते रहे और इधर हम हरदा-इन्दौर के बीच में खराब सडक पर लेट पर लेट होते गये। दो बजे जब हम चापडा से निकले तो सुमित को कह दिया कि हम आज आपके यहां नहीं आ रहे। खराब सडक ने हमारा सारा समय ले लिया है। हमें चूंकि कल दिल्ली के लिये चल देना है, इसलिये आज घाटाबिल्लौद जाना जरूरी है। इसलिये हम सीधे घाटाबिल्लौद ही जा रहे हैं। साथ लंच कल करेंगे। मेरी और सुमित की ट्यूनिंग बहुत अच्छी है, इसलिये मेरे इतना कहते ही मान गया।
सवा तीन बजे इन्दौर बाईपास पर पहुंचे। अगर हम सुमित के यहां जाते तो एक घण्टा और लग जाना था। फिर कब हम लंच करते और कब घाटाबिल्लौद जाते?
भूख भयंकर लगी थी। यहीं बाईपास पर ही एक पंजाबी रेस्टोरेण्ट है। बाहर धूप बडी तेज थी। लस्सी से राहत मिली और आलू के परांठे तो लाजवाब थे ही।
इसके बाद बाईपास पर ही चल दिये। यह बाईपास इन्दौर शहर की सीमा पर ही है, इसलिये ठीकठाक ट्रैफिक रहता है। लेकिन फिर भी कई जगह लिखा था कि 100 की स्पीड से चलो। यानी यहां अधिकतम आधिकारिक स्पीड 100 है। ऐसा मुझे और कहीं नहीं मिला। इसके बाद एक बार 90 तक तो हम भी पहुंच गये थे।
राऊ और उसके बाद महू बाईपास। कुछ दिन पहले जब हम इन्दौर से महेश्वर जा रहे थे तो यहीं से गुजरे थे। कुछ दूर महू बाईपास पर चले, फिर पीथमपुर वाली सडक पकड ली। यहीं सडक आगे घाटाबिल्लौद और धार, दाहोद होते हुए अहमदाबाद चली जाती है। यह अहमदाबाद-भोपाल हाईवे है और ज्यादातर फोर-लेन है।
घाटाबिल्लौद से थोडा ही आगे लेबड है जहां नेशनल स्टील फैक्ट्री है। यहीं फैक्ट्री प्रदत्त मकान में मुकेश जी सपरिवार रहते हैं। मुकेश जी से पहली बार परिचय कब हुआ, यह तो नहीं पता लेकिन उन दिनों मैं घुमक्कड डॉट कॉम पर भी लिखा करता था और वहां कमेण्ट भी करता था। मुकेश जी और उनकी पत्नी कविता जी भी वहां अपने यात्रा-वृत्तान्त लिखा करते थे। मैं टिप्पणियों में अक्सर सामने वाले की कमियां गिनाया करता था, उत्साहवर्धन कम ही करता था। तो मुकेश जी मुझ पर गुस्सा हो जाया करते थे। और कविता जी के तो ये हाल थे कि जैसे ही उन्हें पता चलता था कि नीरज ने टिप्पणी की है तो वे उसे नहीं पढती थीं बल्कि विण्डो ही बन्द कर देती थीं। आज तो मुझे ये सब लिखते हुए अच्छा लग रहा है लेकिन उन दिनों यह तनातनी की बात थी। तब एक बार मुकेश जी ने मुझसे कहा था जो मुझे अभी भी याद है- नीरज, तुम अच्छे घुमक्कड हो, अच्छा लिखते हो, सभी तुम्हारी तारीफ करते हैं लेकिन ये तारीफें तुमसे संभल नहीं रहीं। इन्हें सम्भालना सीखो।
ये लाइनें वास्तव में मेरे लिये क्रान्तिकारी साबित हुईं। मैंने उसके बाद स्वयं में परिवर्तन किया। तब से अब तक मेरे और मुकेश जी के सम्बन्ध बहुत अच्छे हैं।
डिनर में मालवा का प्रसिद्ध दाल बाफला मिला। बाफला राजस्थानी बाटी के जैसा ही जोता है लेकिन उससे कुछ बडा होता है। मुझे बाटी अच्छी नहीं लगती, बाफला भी अच्छा नहीं लगा। हालांकि यह पौष्टिक होता है। एक तो इसे हाथ से खाना होता है। अगर इसका चूरा बनाकर इसमें दाल अच्छी तरह मिल जाये तो थोडा बहुत स्वाद आ जाता है। यह मुझसे फूट तो जाता है लेकिन इसका चूरा नहीं बनता। चूरा बन भी जायेगा, लेकिन तब भूखे पेट बैठकर इसे बडी-बडी देर तक मसलना पडेगा। मैं कई स्थानों पर स्थानीय भोजन बडे चाव से खा लेता हूं लेकिन दाल बाटी मुझसे चाव से नहीं खाई जाती। निशा का भी यही हाल था। इस बात पर मुकेश जी ने गौर की और बोले- यह हमारा स्थानीय भोजन है और हम इसे चाव से खाते हैं लेकिन जरूरी नहीं कि जो लोग इसे नियमित नहीं खाते, उन्हें भी यह पसन्द आयेगा।
मालवा का पोहा मुझे बडा पसन्द आया और मैं केवल पोहे पर कई दिन गुजार सकता हूं।
कल सुमित ने बाफला के बारे में बताया था- हमारे यहां जब भी बाफला बनता है तो खाने वाले को कई शर्तों का पालन करना होता है जैसे इसे शाम को ही खाना होता है और सुबह से भूखा रहना होता है। खाने वाले को ढीले ढाले कपडे खासकर पाजामा पहनना होता है। इसे बिस्तर पर बैठकर खाना होता है ताकि खाते ही पीछे लुढका जा सके। इसका मतलब ये है कि दाल बाफला केवल उनके लिये है जिनकी खुराक अच्छी खासी हो। अब मुझे ध्यान आया कि सुमित क्यों आज साथ लंच करने को कह रहा था। उन्होंने निश्चित ही दाल बाफला बनाया होगा। इसका मतलब आज हम यहां इसे खा रहे हैं, कल फिर सुमित के यहां खाना पडेगा।
डिनर के बाद मुकेश जी कालोनी में घुमाने ले गये। पद के अनुसार अलग-अलग तरह के क्वार्टर बने हैं। पहले बडे अफसरों के क्वार्टर हैं, फिर छोटे अफसरों के, फिर इंजीनियरों के, फिर वर्करों के और आखिर में झुग्गियां थीं। सच कहूं तो जब हम इंजीनियरों के क्वार्टरों से सामने से गुजर रहे थे तो मुझे वहां बडा अपनापन सा लग रहा था।
अगला दिन हमारी वापसी का दिन था- मुकेश जी के यहां से भी और मालवा से भी। दस बजे यहां से चल दिये और साढे ग्यारह बजे तक सुमित के यहां पहुंच गये। सुबह कविता जी ने आलू के परांठे बना दिये। मन था तीन-चार खाने का लेकिन एक ही खाना पडा। अवश्य सुमित ने दाल बाटले बनवा रखे होंगे। और वही बात निकली। मुझे तो हालांकि अन्दाजा हो गया था लेकिन निशा को कोई अन्दाजा नहीं था। जैसे ही हमारे सामने बाटले रखे गये, निशा के मुंह से निकला- हे भगवान! आज भी वही।
सुमित को एक मलाल रहा कि हम इतने दिन साथ रहे लेकिन साथ इन्दौर नहीं घूम सके। शाम को इन्दौर की रौनक कुछ और ही होती है खासकर खाने-पीने वालों के लिये। शाम को पांच सवा पांच बजे भोपाल के लिये डबल डेकर ट्रेन चलती है। इससे हमें भोपाल जाना था और वहां से दिल्ली की ट्रेन पकडनी थी।
अगले दिन दोपहर बारह बजे हम दिल्ली में थे।

तामिया से दूरियां 

तामिया-जुन्नारदेव सड़क 


दमुआ के पास सड़क पर काम चल रहा था. 

लेकिन बाकी सड़क बेहद शानदार है. 



सारणी थर्मल पावर प्लांट 



अगले दिन बैतूल से प्रस्थान 

बैतूल हरदा रोड 



हंडिया-नेमावर के बीच में नर्मदा 

इंदौर बाईपास पर आधिकारिक स्पीड 100 है. 

सुमित के यहाँ 

अलविदा इंदौर. 






1. भिण्ड-ग्वालियर-गुना पैसेंजर ट्रेन यात्रा
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9. पचमढ़ी से पातालकोट
10. पातालकोट भ्रमण और राजाखोह की खोज
11. पातालकोट से इंदौर वाया बैतूल

15 comments:

  1. रोमेश शर्माNovember 13, 2015 at 8:35 AM

    समय के साथ विचारों में परिपक्वता आ जाती है। आप के लेख पढ़कर स्वतः ही वहां जाने की इच्छा जागृत हो जाती है। राजस्थान की दाल बाटी तो खाई है। कभी ये दाल बाटला भी खाएंगे।

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    1. धन्यवाद शर्मा जी...

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  2. बहुत सुन्दर! बहुत मज़ा आया| एमपी जाना चाहिए| नीरजजी, आपने खजूराहो जाने का विचार किया था?

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    1. नहीं निरंजन जी... मैं अभी तक खजुराहो नहीं गया हूँ.

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  3. नीरज भाई दाल बाटला नहीं...
    दाल बाफला है...मालवा का पारंपरिक खाना...

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    1. धन्यवाद सुमित भाई... इसे ठीक कर दिया है...

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  4. अपनी ट्यूनिंग बहुत अच्छी है..
    जोकि मेने तुम्हे इतना पढ़ रखा है, उसी का नतीजा है...
    बहुत आनंद आया...यात्रा में भी और यात्रा वृतांत पढ़ने में...
    अलविदा...😑

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  5. Sahi kaha Sumit Sharma ji....Wo Daal-Bafala hota hai Neeraj Bhai aur saath me chatni aur besan gatte ki sabji ho to maja hi aa jata hai.....

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    1. धन्यवाद शर्मा जी...

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  6. Ek aur kila jeet liya bhai badhai ho

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  7. Neeraj ji ram ram.Bhut Sundr yatra. par Ek photo to Mukesh ji ke sath banta tha.

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  8. Main bhi apne photo ka intzaar kartaa rah gaya. Ho sakta hai satkar men kuchh kami rah gai ho ?

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  9. bahut hi achchi jankari batai hai aap ne.. khas kar.. aaj tam may MALWA kaya hai... vo nahi samaj paya tha.. aap ne achchi jankari di.. dhanyawad... or Maheswar ke bare me bahut achcha likha.. ab aap BAGH ki gufayae..... or MANDU kab ja rahe ho? yah batana... us ka vrutant bhi padhane ko kab tak milega..? plz. batana sir

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