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Friday, August 28, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 20 (भरतपुर-केलांग)

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22 जून 2015
आज हमें केवल केलांग तक ही जाना था इसलिये उठने में कोई जल्दबाजी नहीं की बल्कि खूब देर की। मुजफ्फरनगर वाला ग्रुप लेह की तरफ चला गया था और उनके बाद लखनऊ वाले भी चले गये। टॉयलेट में गया तो पानी जमा मिला यानी रात तापमान शून्य से नीचे था। सामने ही बारालाचा-ला है और इस दर्रे पर खूब बर्फ होती है। मनाली-लेह सडक पर सबसे ज्यादा बर्फ बारालाचा पर ही मिलती है। बर्फ के कारण सडक पर पानी आ जाता है और ठण्ड के कारण वो पानी जम भी जाया करता है इसलिये बाइक चलाने में कठिनाईयां आती हैं। देर से उठने का दूसरा कारण था कि धूप निकल जाये और सडक पर जमा हुआ पानी पिघल जाये ताकि बाइक न फिसले।
लखनऊ वालों ने रात अण्डा-करी बनवा तो ली थी लेकिन सब सो गये और सारी सब्जी यूं ही रखी रही। रात उन्होंने कहा था कि सुबह वे अण्डा-करी अपने साथ ले जायेंगे लेकिन अब वे नहीं ले गये। मन तो हमारा कर रहा था कि अण्डा-करी मांग लें क्योंकि दुकानदार को भुगतान हो ही चुका था। हमें ये फ्री में मिलते लेकिन ज़मीर ने साथ नहीं दिया। दूसरी बात कि तम्बू वाले दोनों पति-पत्नी थे। इस तम्बू के सामने वाला तम्बू इसी महिला की मां संभाल रही थी। यह महिला अपने पति के प्रति बहुत आक्रामक थी और जरा-जरा सी बात पर उसे डांट देती थी। एक दुधमुंहा बच्चा भी था। अगर वो रोने लगे तो पति की खैर नहीं। कुल मिलाकर हमारे लिये बडा ही भारी माहौल था, हमने अण्डा-करी मांगना उचित नहीं समझा।
एक आदमी आया और दुकान वाली से बोला- तुम्हें बीस लोगों का नाश्ता बनाने में कितना समय लगेगा? हमारे साथ सौ लोग हैं, सभी के नाश्ते का प्रबन्ध हम पांच दुकानों में करेंगे। आपको केवल चाय और आमलेट ही बनाने हैं। अगर किसी को अण्डा नहीं लेना हो तो उसे मैगी देना। इसके अलावा अगर वे कुछ और मांगें तो बोल देना कि नहीं बनेगा। अगर कोई बिस्कुट वगैरा ले तो उसके पैसे उनसे ही लेना। हम आपको केवल बीस लोगों के एक-एक कप चाय और एक-एक प्लेट आमलेट या मैगी के ही पैसे देंगे।
असल में ये सिन्धु दर्शन यात्रा समिति वाले थे। रात ये शायद जिस्पा में रुके थे और नाश्ता यहां करा रहे थे। ये कुछ व्यवस्थापक पहले आ गये थे ताकि समय पर नाश्ता बनवा सके। उनकी बसें पीछे आ रही थीं। हमने इनसे बात करने की कोशिश की लेकिन इन्होंने सीधे मुंह कोई बात नहीं की। निशा ने कहा- ये एक बडे ग्रुप को यात्रा करा रहे हैं, इसलिये ये भी बडे लोग हुए, इनसे बात करना ठीक नहीं। मैं चाहता था कि पूरा ग्रुप आ जाये। उनमें सभी उम्र के लोग होंगे। कुछ लोग हांफ भी रहे होंगे। कुछ लोग उल्टी करेंगे, कुछ नाश्ता भी नहीं करेंगे; उनके साथ ये व्यवस्थापक कैसे निपटते हैं? ऑक्सीजन सिलेण्डर इनके पास हैं या नहीं। यात्रियों ने कल क्या खाया था, कितना खाया था, व्यवस्थापकों का व्यवहार कैसा है; मैं जानना चाहता था।
इस पेज से पता चला है कि प्रति यात्री 17000 रुपये लिये गये थे और यात्रा चण्डीगढ से शुरू हुई थी। इन 17000 रुपयों में चण्डीगढ से लेह बस से जाना और वापस आना शामिल था और रास्ते के खाने-पीने का खर्च भी। ये लोग क्या खिला रहे हैं, कितना खिला रहे हैं; यह हमने देख ही लिया था जब उसने दुकान वाले से कहा कि आपको केवल प्रति यात्री एक कप चाय और दो अण्डों का एक आमलेट ही देना है। बडी भीषण कमाई कर रहे हैं ये।
खैर, बडी देर तक यात्री नहीं आये तो हमने यहां से प्रस्थान कर दिया। यहां से बारालाचा पांच किलोमीटर है। लेकिन बर्फ की वजह से आधा घण्टा लग गया बारालाचा पहुंचने में। बारालाचा पर संकरी सडक थी जिसके कारण जाम लगा था। उसी जाम में सिन्धु दर्शन वालों की बसें भी खडी थीं।
बारालाचा से आगे सूरज ताल है। यह एक झील है जो इस समय आंशिक जमी हुई थी। चारों ओर बर्फ और बीच में जमी हुई झील अच्छी लग रही थी।
हम बारालाचा से नीचे उतर ही रहे थे कि सचिन मिल गया। उसे हम कल से देखते आ रहे थे। कल नहीं मिला लेकिन पक्का था कि आज तो मिलेगा ही। गर्मजोशी से मिले हम दोनों। वो आज रात जिंगजिंगबार रुका था।
जिंगजिंगबार से कुछ पहले एक नाला है। दो साल पहले जब मैं साइकिल से आया था तो इस पर पुल बन रहा था। पुल के ढांचे से ही मजदूरों ने हमारी साइकिलें पार करा दी थीं। अब उस पुल के फर्श को बदला जा रहा था जिसके कारण ट्रैफिक रुका हुआ था। जल्दी के चक्कर में एक गाडी नाले से होकर जाने लगी तो वो उसमें ही फंस गई। उन्होंने खूब कोशिश कर ली लेकिन नहीं निकले। आखिरकार जब लोहे की चादरें पुल पर बिछ गईं तो बाइक वालों को निकलने की अनुमति दे दी गई। उन चादरों को पुल के ढांचे पर बोल्टों से कसा जायेगा तब बडी गाडियों को निकलने दिया जायेगा।
इस नाले से तो बच गये लेकिन इससे अगला नाला भी काफी वेगवान था। उस पर पुल का ढांचा तो बन गया था लेकिन चादर बिछानी बाकी थी। पहले वाले पुल को पूरा करेंगे, तब इस पुल पर चादर बिछायेंगे। मजबूरन नाले से होकर निकलना पडा। अब यह तो बताने की जरुरत ही नहीं है कि पानी ठण्डा था और हम दोनों के पैर भीग गये।
गुजरात की एक कार एक ट्रक में लदी थी। कार वाले से बात की तो उसने बताया कि जिंगजिंगबार नाले में उनकी कार फंस गई थी। फिर भी किसी तरह निकल तो गई लेकिन सरचू तक पहुंचते पहुंचते यह निष्क्रिय हो गई। उनके ग्रुप के बाकी सदस्य तो लेह चले गये हैं और ये आठ हजार रुपये में कार को ट्रक में लादकर मनाली ले जा रहे हैं।
ग्यारह बजे जिंगजिंगबार पहुंचे। चाय और ब्रैड आमलेट खाये। अब डर था आगे आने वाले दो नालों का। पिछली बार उन दोनों नालों ने मुझे बेहद डरा दिया था। वो डर अभी तक बना हुआ था। लेकिन जिस तरह कल कंगला जल नाले पर पुल मिला और आज जिंगजिंगबार के पुल की मरम्मत होती दिखी; उससे लग रहा था कि आगे वाले दोनों नालों पर भी पुल मिलेंगे।
दीपक ताल के बाद जब पहला नाला मिला तो उतना डर नहीं लगा। इसका कारण यह हो सकता है कि दो साल पहले मेरे सामने आने वाले ये पहले नाले थे। इससे पहले मैंने कभी भी हिमालय पार के नाले नहीं देखे थे। लेकिन फिर भी इनमें पानी भी काफी था और वेग भी।
दारचा चेकपोस्ट पर बाइक की एण्ट्री करके सवा दो बजे तक केलांग पहुंच गये। बस अड्डे के पास पांच सौ रुपये का एक कमरा लिया और गर्म पानी में जी भरके नहाये। आज हमें यहीं रुकना था, हालांकि चाहते तो मनाली तक भी पहुंच सकते थे। केलांग में बहुत सारे बुलेट वाले थे। केलांग से लेह नम्बर की बुलेट भी किराये पर मिल जाती हैं जिससे किराये की बुलेटों पर घूमने वालों को लेह जाकर बाइक नहीं बदलनी पडती।
यहां नेटवर्क मिला तो कोठारी साहब से बात हुई। वे जयपुर अपने घर पहुंच चुके थे।

ट्रक में लदी गुजरात की एक खराब कार

सिन्धु दर्शन वालों का पोस्टर

बारालाचा-ला



बारालाचा-ला पर लगा जाम

बारालाचा-ला के पास जमी हुई सूरज ताल झील



रास्ते में सचिन मिल गया।

जिंगजिंगबार नाले में फंसी गाडी

इसी पुल पर काम चल रहा था

बाइक वाले पुल का काम पूरा होने की प्रतीक्षा में

जिंगजिंगबार के दूसरे नाले को ऐसे पार करना पडा।

दारचा से कुछ पहले दीपक ताल झील


एक नाला




दारचा


दारचा

दारचा-केलांग सडक



केलांग में डिनर
















अगले भाग में जारी...

(प्रार्थना: कृपया ‘बहुत ही ज्ञानवर्द्धक’, ‘रोमांचक’ जैसी औपचारिक टिप्पणी न करें। आपकी कोई जिज्ञासा हो, कुछ और जानकारी बांटना चाहते हो या अपना कोई अनुभव हो, उसे ही टिप्पणी के रूप में लिखिये। धन्यवाद।)


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22. लद्दाख बाइक यात्रा का कुल खर्च

13 comments:

  1. कमाई के नाम पर नोंच रहे है लोगो को

    बहरहाल चारों तरफ का नजारा बड़ा शानदार है और इन झरनों ने बड़ा परेशान कर रहा है

    सचिन से मिलने वाली फोटो में आपके चहरे पर darkness जैसी लग रही है वो क्या है ?

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    1. लद्दाख में अत्यधिक तेज धूप व अल्ट्रा वायलेट किरणों की अधिकता के कारण त्वचा जल जाती है और काली पड जाती है। हालांकि मैंने क्रीम भी लगाई थी लेकिन फिर भी थोडी सी जल गई है। उसी के कारण चेहरे पर कालापन है।

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  2. उस महिला की माँ सामने ही थी...तो उसका आक्रामक होना स्वाभाविक ही था...फिर भी यह उस पुरुष की कमजोरी थी..जोकि इतना प्रताड़ित हो रहा था...
    लखनऊ वालो की अंडा करी ना लेना बेहतर निर्णय था...

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    1. धन्यवाद शर्मा जी...

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  3. लदाख में क्या मातासत्ताक सिस्टिम तो नहीं ... केरला जैसी !...

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    1. केरल में तो नहीं पता लेकिन लद्दाख में महिलाओं की स्थिति काफी मजबूत है।

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  4. नीरज भाई नमस्कार ,

    बारालाचा का नजरा देख कर मज्जा आया …। निशा जी को बर्फ मे खेलनेका मौका नही दिया … आज तो वक़्त भी था ….
    water crossing खतरनाक लग राहा हे ……. पूल बनना चाहिये उस पर …

    बहोत दिनो बाद नरम रोटी मिली नीरज भाई
    आनंद आया होगा डीनर कर के


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    1. निशा यहां भी बर्फ में खूब खेली। मैंने यहां फोटो शेयर नहीं किये।
      हां, बहुत दिनों बाद स्वादिष्ट खाना मिला। वैसे लद्दाख में राजमे की सब्जी बेहद स्वादिष्ट बनती थी लेकिन रोटी बडे दिनों बाद मिली।

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  5. पता चला है कि प्रति यात्री 17000 रुपये लिये गये थे और यात्रा चण्डीगढ से शुरू हुई थी।


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    ... आप जैसे प्रामाणिक व्यक्तित्व जब आयोजन करेगा तो यहाँ का भ्रष्टाचार हटेगा !!..

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    1. क्या इसे भ्रष्टाचार कहेंगे??? या बिजनेस??? वे लोग कुछ सेवाएं दे रहे हैं और उसके बदले पैसे ले रहे हैं। हमें ये पैसे ज्यादा लग रहे हैं, लेकिन जिन्होंने टूर बुक किया था, उन्हें ठीक लग रहे होंगे।

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  6. आज के दिन आप कम चले। रोहतांग क्रास न करते लेकिन रोहतांग की तलहटी में चन्द्रा नदी के साये में स्थित रमणीक खोकसर तो आराम से पहूँच सकते थे। गर्म पानी से नहाने की जरूरत केलांग में रूकने का कारण रहा होगा।

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    1. सर जी, हमारे लिये ‘रमणीक’ शब्द के मायने समाप्त हो गये थे। हर जगह रमणीक ही थी। हर रोज रमणीक स्थानों पर ही रुकते आ रहे थे। केलांग से कोकसर तक हर गांव में रुकने के ठिकाने हैं। सही कहा आपने कि गर्म पानी की सख्त जरुरत थी। हम दोनों को नहाये हुए पांच दिन हो गये थे।

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  7. Seems like All the "Neeraj" are little maniac about travelling. I am also travelling buff but kudos to you, who documented everything for other's reference. Hope We will get chance to share the trek someday.

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