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Monday, August 24, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 19 (शो कार- डेबरिंग-पांग-सरचू-भरतपुर)

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21 जून 2015
आराम से सोकर उठे- नौ बजे। नाश्ते में चाय, आमलेट के साथ एक-एक रोटी खा ली। कल जितना मौसम साफ था, आज उतना ही खराब। बूंदाबांदी भी हो जाती थी। पिछली बार यहां आया था, तब भी रात-रात में मौसम खराब हो गया था, आज भी हो गया। पेट्रोल की बात की तो दुकान वाले ने आसपास की दुकानों पर भागादौडी की लेकिन पेट्रोल नहीं मिला। कहा कि डेबरिंग में मिल जायेगा। बाइक कल ही रिजर्व में लग चुकी थी, अब बोतल का दो लीटर पेट्रोल भी खाली कर दिया।
दस बजे यहां से चल दिये। रात हमने बाइक से सामान खोला ही नहीं था। केवल टैंक बैग उतार लिया था। खोलने में तो मेहनत लगती ही है, सुबह बांधने में और भी ज्यादा मेहनत लगती है।
जिस स्थान पर मुख्य लेह-मनाली सडक पर जाकर मिलते हैं, वहां कुछ तम्बू लग गये थे अर्थात होटल खुल गये थे। कुछ ही दिन पहले यह सडक खुली है, स्थानीय लोगों के लिये सडक का खुलना आमदनी का बडा जरिया होता है। ऐसे में वे एक दिन भी खराब नहीं कर सकते थे। इधर सडक खुली और उधर होटल तैयार। पिछली बार यहां मैंने एक बस में डीजल भरते देखा था तो सोचा कि यहां पेट्रोल मिल जायेगा लेकिन यहां भी पेट्रोल नहीं मिला। कहा कि डीजल तो मिल जायेगा लेकिन पेट्रोल नहीं मिलेगा। तो क्या डेबरिंग में मिलेगा? कहा कि नहीं, वहां भी नहीं मिलेगा। पांग में? मुश्किल है।
यहां से डेबरिंग दो-तीन किलोमीटर दूर है। मना होने के बावजूद भी हम वहां गये। कहीं भी पेट्रोल नहीं था। यहां से एक सडक यार-ला दर्रे को पार करती हुई आगे खुरना और उससे भी आगे तक जाती है। यार-ला का कोई बाइक वृत्तान्त मैंने नहीं पढा था। कम से कम यार-ला तक जाने की योजना थी। लेकिन अब पेट्रोल के अभाव में वहां नहीं जाया जा सकता। डेबरिंग में पूछा कि पांग में तो मिल जायेगा लेकिन सभी ने एक सुर में जवाब दिया कि नहीं मिलेगा।
बाइक में लगभग दो लीटर पेट्रोल था। अर्थात 80-90 किलोमीटर तक जाया जा सकता है। डेबरिंग से कारू 90 किलोमीटर है और रास्ते में तंगलंगला दर्रा पडता है। तंगलंगला के बाद ढलान है, यानी बाइक कारू तक जा सकती है। कारू में पेट्रोल पम्प है। उधर दूसरी तरफ सरचू 130 किलोमीटर है और रास्ते में दो दर्रे पडते हैं। यानी बाइक दो लीटर में सरचू तक नहीं पहुंच सकती। हां, पांग तक पहुंच जायेगी लेकिन क्या फायदा? वहां पेट्रोल नहीं मिलेगा। सरचू में शायद मिल जाये।
90 किलोमीटर कारू तक जाना और फिर इसी रास्ते वापस आना, खराब मौसम में तंगलंगला पार करना; मैं नहीं चाहता था। या रिस्क लेकर पांग जाया जाये? हमने दूसरा विकल्प चुना। पांग चलो। एक तो वहां बहुत सारी दुकानें हैं। शायद मिल जाये। नहीं तो बीआरओ और आईटीबीपी तो कहीं नहीं गये। पांग में ये दोनों भी हैं। चार-पांच लीटर पेट्रोल भी मिल जायेगा तो हम आसानी से टाण्डी तक पहुंच सकते हैं। दस बजकर पचपन मिनट पर पांग की तरफ चल दिये। रास्ता तो आपने ज्यादातर ने देखा ही होगा। मोरे मैदान से होकर यह रास्ता है। मौसम खराब था, चारों ओर धुंध थी; साथ ही तेज हवाएं और ठण्ड। पचास किलोमीटर एक घण्टे में पार हो गये। ठीक बारह बजे हम पांग में थे। पांग में प्रवेश करते ही जो पहली दुकान मिली, उसकी मालकिन से पेट्रोल के बारे में पूछा। दिल धक-धक कर रहा था। जैसे ही उसने कहा कि हां, पेट्रोल उपलब्ध है; बडी राहत मिली। अन्यथा इधर उधर चक्कर लगाने पडते। डेढ सौ रुपये लीटर। मैं सहमत था और पांच लीटर भरने को कह दिया। कल सुमडो में भी हमें लगभग इसी कीमत पर पेट्रोल मिल रहा था, तब हमें वो महंगा लगा था और हमने नहीं लिया था। क्योंकि कल हमें लग रहा था कि डेबरिंग और पांग में पेट्रोल मिल ही जायेगा। अब भी उसी कीमत पर मिला और हमने ले लिया। केवल इसीलिये कि अगर न लेते तो बडी मुसीबत हो जाती।
बीस-बीस रुपये की चाय पी और पांग को अलविदा कह दिया। जल्दी ही लाचुलुंग-ला की चढाई शुरू हो गई। मुझे जो अब डर लग रहा था, वो था कंगला जल नाले का। इसमें पानी का बहाव बहुत तेज होता है और पानी भी काफी होता है। लेकिन जब वहां पहुंचे तो बडी राहत मिली। कंगला जल नाले पर अब पुल बन चुका था।
लाचुलुंग-ला तक रास्ता काफी खराब था। रही सही कसर बर्फ ने पूरी कर दी। रास्ते के किनारे बर्फ थी जिससे पानी रास्ते में फैलता जा रहा था। लाचुलुंग-ला से आगे व्हिस्की नाले तक उतराई है लेकिन रास्ता खराब ही रहता है। व्हिस्की नाले से नकी-ला तक भी खराब रास्ता ही है। यहां कई साइकिल वाले मिले जो लेह जा रहे थे। व्हिस्की नाले के पास तो साइकिल वालों का एक कैम्प भी लगा था जिसके साथ एक बैक-अप गाडी भी थी। इनका सारा सामान गाडी में आ जाता है और इन्हें बस खाली साइकिल ही चलानी होती है।
जब हम लेह में थे तो मेरी सचिन से बात हुई थी। सचिन गांवकर साइकिल से भारत परिक्रमा पर निकला हुआ था और उस समय मनाली में था। वो दो दिन बाद मनाली से निकलता। मैं हिसाब लगाता चल रहा था कि सचिन कहां पहुंचा होगा। आज जब हम मनाली रोड पर थे तो सचिन कभी भी हमें मिल सकता था। मोरे मैदान में तो एक साइकिल वाला मुझे सचिन ही लगा और भरी ठण्ड में मैंने अपना हेलमेट उतारकर उसे हेलो भी कहा। उसने सोचा होगा कि एक बाइक वाला साइकिल वाले के दुःसाहस से खुश होकर हेलो कर रहा है। उसे क्या पता था कि मैं सचिन को ढूंढ रहा हूं।
तीन बजे नकी-ला पार कर गये और साढे तीन बजे गाटा लूप के ऊपरी भाग के पास एक टीन शेड में बैठकर विश्राम करने लगे। यह टीन शेड दो साल पहले भी था और मुझे अभी तक याद था। साथ में कुछ नमकीन थी, खाने लगे। आज केलांग पहुंचना तो बहुत मुश्किल था लेकिन जिंगजिंगबार तक पहुंचा जा सकता था। जिंगजिंगबार से कुछ आगे दो नाले बडे खतरनाक थे। पता नहीं अभी भी वे ऐसे ही होंगे या उन पर भी पुल बन गया होगा। अगर पुल न बना हो तो अन्धेरे में उन्हें पार करना बहुत मुश्किल होगा। इसलिये आज जिंगजिंगबार में ही रुकते हैं।
तभी एक बाइक वाला जो थोडी दूर खडा अपने साथी की प्रतीक्षा कर रहा था, हमारे पास आया। उन्होंने 60000 रुपये में मनाली से एक बाइक टूर बुक किया था। ये कई बाइक वाले थे और इनके साथ एक गाडी और एक गाइड भी चल रहा था। ये आज केलांग से चले थे और आज इन्हें शो-मोरीरी पहुंचना था। मैंने सुनते ही नकार दिया कि आज आप किसी भी हालत में शो-मोरीरी नहीं पहुंच सकते। क्योंकि अभी साढे तीन बजे थे, जल्दी ही चार भी बज जायेंगे। यहां से पांग तक रास्ता बहुत खराब है। छह बजे तक पांग भी पहुंच गये तो डेबरिंग पहुंचने में सात बज जाने हैं। और शो-कार तक अन्धेरा हो जायेगा। शो-कार के बाद रास्ता बेहद खराब है और शो-मोरीरी पहुंचने में कम से कम चार घण्टे लगेंगे। यह बाइक वाला कहने लगा कि आज अभी तक हम लगभग डेढ सौ किलोमीटर आये हैं और मैं बुरी तरह थक गया हूं। आगे डेढ सौ किलोमीटर नहीं चला सकता। मैंने सुझाव दिया कि टूर को मारो गोली, पैसे आपने ही दिये हैं, आगे अपने हिसाब से चलो। आज पांग रुकना, वहां सब सुविधाएं हैं। कल की आपकी बुकिंग लेह की है, आप चाहो तो शो-मोरीरी को छोडकर सीधे लेह भी जा सकते हो। कुछ देर बाद उसके सभी साथी आ गये और गाडी-गाइड भी। सबने विचार-विमर्श किया और आज शो-मोरीरी न जाने का फैसला किया। ये लोग अब शो-मोरीरी को छोड देंगे और कल लेह पहुंचेंगे।
अब अच्छी सडक मिल गई। गाटा लूप पर बाइक चलाना बडा ही रोमांचकारी और सुखद अनुभव होता है। गाटा लूप से नीचे उतरकर हम सारप नदी के किनारे किनारे हो लेते हैं। यह नदी पदुम में जांस्कर नदी में मिल जाती है। पिछले साल हमने इसी नदी के साथ साथ ट्रेकिंग की थी। फुकताल गोम्पा और पुरने इसी नदी के किनारे स्थित हैं। पुरने से विधान और प्रकाश जी वापस चले गये थे और मैं इसकी एक सहायक नदी के साथ-साथ चलता हुआ शिंगो-ला पार करके दारचा आ गया था। मेरी इच्छा किसी दिन यहां से इस नदी के साथ साथ फुकताल गोम्पा और पुरने, पदुम तक जाने की है। रास्ते में दो-तीन झीलें भी मिलेंगी।
साढे पांच बजे सरचू पहुंच गये और हम जम्मू कश्मीर राज्य से हिमाचल में प्रवेश कर गये। सुबह से अब तक हम 150 किलोमीटर चल चुके थे और मुझे थकान भी होने लगी थी। लेकिन मैं आज कम से कम बारालाचा-ला पार कर लेना चाहता था ताकि कल सुबह ही उन दोनों नालों को पार कर सकूं। आज तो मौसम खराब है, अगर कल धूप निकली तो उन नालों में दोपहर बाद पानी बहुत बढ जायेगा। सुबह कम पानी होता है। आज मेहनत करेंगे तो कल अच्छा फल मिलेगा। धीरे धीरे चलते हुए सरचू पार कर गये। एक-एक दुकान में झांक-झांककर देखा कि कहीं सचिन मिल जाये या उसकी साइकिल ही दिख जाये लेकिन वो नहीं दिखा।
सरचू से दस-बारह किलोमीटर तक तो अच्छी सडक है लेकिन उसके बाद अत्यधिक खराब। फिर बर्फ भी मिलने लगी और सडक पर कीचड भी। किलिंग सराय पर कोई नहीं था, अन्यथा हम शायद रुक जाते। सात बजे भरतपुर के पास पहुंचे। चारों तरफ बर्फ ही बर्फ थी और धूप न होने के कारण भयंकर ठण्ड भी थी। एक बाइक वाला आकर रुका और पूछा- भाई, आगे कहीं वाटर क्रॉसिंग है क्या? हमने बताया- है लेकिन खतरनाक कोई नहीं है। तब उसने एक काम की जानकारी दी- आज अगर बारालाचा-ला पार करोगे तो जिंगजिंगबार से पहले दो भयंकर वाटर क्रॉसिंग हैं, सावधानी से पार करना। यह सुनते ही आज ही बारालाचा-ला पार करने का इरादा छोड दिया। थोडा ही आगे भरतपुर कैम्प था, हमने एक कैम्प में शरण ले ली। तीन सौ रुपये के दो बिस्तर मिल गये। हम इस दुकान में आने वाले पहले यात्री थे, इसलिये अपनी पसन्द के गद्दे और रजाईयां ले ली।
भरतपुर कैम्प समुद्र तल से 4700 मीटर ऊपर है। पूरी मनाली-लेह सडक पर इससे ज्यादा ऊंचाई पर केवल व्हिस्की नाला कैम्प ही है। डेबरिंग भी इससे नीचे है। इसलिये अगर आप इस सडक पर यात्रा कर रहे हैं तो भरतपुर में रुकने से बचना चाहिये। या तो जिंगजिंगबार रुक जाओ या फिर थोडी और हिम्मत करके सरचू चले जाओ। हम तो पिछले दस दिनों से लद्दाख में थे और इससे ज्यादा ऊंचे इलाकों पर जा चुके थे, इसलिये हमें तो उतनी समस्या नहीं आयेगी लेकिन अगर कोई मनाली से आ रहा है तो उसके लिये समस्या हो सकती है।
हमारे पहुंचने के थोडी देर बाद कुछ कार वाले इसी कैम्प में आये। बोली से मुजफ्फरनगर के लग रहे थे। मैंने सीधा यही पूछा- भाई, कौण से गाम के हो? पट्ठों ने सीधा ही जवाब दिया- शाहपुर के। फिर तो दोस्ती होते देर नहीं लगी। मैंने दुकान वाले से बचकर उनसे कहा- एक घण्टा लगेगा सरचू पहुंचने में। हो सके तो सरचू चले जाओ। लेकिन अन्धेरा हो चुका था और रास्ता भी खराब था, वे यहीं रुक गये। उनमें से एक की हालत बहुत खराब थी और उल्टियां भी हो रही थीं।
कुछ देर बाद एक ग्रुप और आ गया। ये लखनऊ साइड के थे और सभी अधेड थे। ये भी मनाली की तरफ से आये थे और सभी गिरी-पडी हालत में थे। इन्होंने कल वापस मनाली जाने का फैसला कर लिया था। जरा सोचिये, कुछ लोग पहली बार लद्दाख जा रहे हैं। उन्होंने सुबह मनाली से शुरू किया। पहले रोहतांग पार किया और उसके बाद बारालाचा-ला। बारालाचा पर रोहतांग से ज्यादा बर्फ होती है। रात वे भरतपुर में रुकते हैं। चारों तरफ बर्फ। तापमान शून्य से नीचे। शौचालय का पानी और सडक पर गड्ढों में भरा पानी जमने लगा था। अभी ये लेह के आधे रास्ते में भी नहीं पहुंचे हैं। ये अब क्या सोचेंगे? यही सोचेंगे कि जब आधे रास्ते से पहले ही बर्फ और ठण्ड की यह हालत है तो लेह में क्या हो रहा होगा? सोचते होंगे कि लेह में इतनी बर्फ मिलेगी, इतनी बर्फ मिलेगी कि लोग इग्लू में रहते मिलेंगे। बर्फ की सुरंग से होकर गाडियां चलती होंगी। चारों तरफ भीषण बर्फ और भयंकर ठण्ड मिलेगी। हम यहां आधी ठण्ड को भी नहीं सहन कर पा रहे, लेह की पूरी ठण्ड को कैसे सहन करेंगे? और वे वापस लौटने की बात करने लगते हैं।
तब मैंने समझाया- लेह में न बर्फ है और न ही ठण्ड। जितनी बर्फ और ठण्ड मिलनी थी, मिल चुकी। आप एक घण्टा आगे सरचू जाओ, आपको गर्मी लगेगी। लखनऊ वालों ने कहा- बेटा, तुम्हें पता नहीं है। लद्दाख जाओगे तब पता चलेगा। और मजा तब आया जब मैंने कहा- हम पिछले दस दिनों से लद्दाख में ही थे और अब वापस लौट रहे हैं। यह सुनते ही सभी की तबियत काफी ठीक हो गई। सभी जहां रजाईयों में हाय-हाय करते लेटे थे, यह सुनते ही एकदम उठकर बैठ गये और प्रश्नों की झडी लगा दी। सभी के प्रश्नों का उत्तर हमने तसल्ली से दिया और इसका नतीजा यह हुआ कि अगले दिन उन्होंने लद्दाख जाने की ठान ली।
तम्बू के मालिक शायद पति-पत्नी थे। लडके के घरवाले शायद गरीब रहे होंगे और लडकी अमीर खानदान की रही होगी। दोनों की लडाई ही होती रही और लडके को हर बात सुननी पडती और माननी पडती। हालांकि उस बात का असर हममें से किसी पर नहीं हुआ, समय पर खाना मिला और अच्छा खाना मिला। हां, खाने से याद आया। कुल मिलाकर तीन ग्रुप थे- हम दोनों, मुजफ्फरनगर वाला ग्रुप और लखनऊ वाला ग्रुप। होटल वालों ने सभी से पूछा कि डिनर में क्या क्या लोगे? लखनऊ वालों ने बारह-तेरह अण्डों की अण्डा-करी का भी आदेश दे दिया। होटल वाले ने इसके मनमाने दाम लगाये और वे पैसे देने को राजी भी थे। जब तक चावल बने, दाल बनी, रोटी बनी, अण्डा-करी बनी; तब तक सब सो चुके थे। लखनऊ वाले किसी भी यात्री ने कुछ नहीं खाया, मुजफ्फरनगर वालों में से आठ में से दो-तीन ने ही खाया। हमने जरूर खाया। हम जानते थे कि इस ऊंचाई पर जितनी जरूरी नींद है, उससे भी ज्यादा जरूरी भोजन है। ये बात मैंने सबको बताई लेकिन मुजफ्फरनगर वालों में से तीन को छोडकर किसी ने नहीं सुनी। लखनऊ वालों की सैंकडों रुपये की अण्डा-करी धरी रह गई। एक बार तो मेरी भी नीयत डोल गई थी कि दो चमचे अण्डा-करी अपने चावलों पर डलवा लूं लेकिन ऐसा किया नहीं। होटल वाली पैसे छोडने वाली नहीं है। जितने पैसे तय हुए थे, उतने पैसे तो लेकर ही छोडेगी। ज्यादा कहेंगे तो अण्डा-करी बांधकर दे देगी कि ये लो लेकिन पैसे अवश्य लेगी। सुबह ये लोग पैसे भी देंगे और रात भर के रखे अत्यधिक ठण्डे हो चुके अण्डों को लेकर नहीं खायेंगे, इसलिये मेरी नीयत डोली कि दो चमचे अण्डा-करी मिल जाये तो मजा आ जाये।

शो-कार के पास जहां हम रात रुके थे।

शो-कार से डेबरिंग का रास्ता

सामने दिखता डेबरिंग

डेबरिंग से वापस चल दिये। सीधी सडक मनाली जाती है और बायें वाली अपनी वही है जिससे कल आये थे शो-मोरीरी से।


पांग में पेट्रोल भरवाया।


पांग

पांग से आगे का रास्ता




कंगला जल नाले पर अब पुल बन गया है।

जून का महीना है लेकिन फिर भी छांव वाले स्थानों पर जमे हुए झरने हैं।


लाचुलुंग-ला की ओर


लाचुलुंग-ला पर


लाचुलुंग-ला दिखता नीचे व्हिस्की नाला कैम्प और आगे नकी-ला की ओर जाती सडक।


नकी-ला पर

सडक बनने से पहले पैदल यात्रा होती थी, खूब व्यापार होता था। तब की पगडण्डी अभी भी दिखाई देती है हालांकि प्रयोग में नहीं है।

सडक बनने से पहले की पगडण्डी

बन्द पडी पगडण्डी

गाटा लूप



सारप नदी, जो आगे फुकताल गोम्पा जाती है।









अगले भाग में जारी...

(प्रार्थना: कृपया ‘बहुत ही ज्ञानवर्द्धक’, ‘रोमांचक’ जैसी औपचारिक टिप्पणी न करें। आपकी कोई जिज्ञासा हो, कुछ और जानकारी बांटना चाहते हो या अपना कोई अनुभव हो, उसे ही टिप्पणी के रूप में लिखिये। धन्यवाद।)



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16. लद्दाख बाइक यात्रा-16 (मेरक-चुशुल-सागा ला-लोमा)
17. लद्दाख बाइक यात्रा-17 (लोमा-हनले-लोमा-माहे)
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19. लद्दाख बाइक यात्रा-19 (शो कार-डेबरिंग-पांग-सरचू-भरतपुर)
20. लद्दाख बाइक यात्रा-20 (भरतपुर-केलांग)
21. लद्दाख बाइक यात्रा-21 (केलांग-मनाली-ऊना-दिल्ली)
22. लद्दाख बाइक यात्रा का कुल खर्च

17 comments:

  1. सुंदर! अब आप जल्द ही मनाली पहुँचेंगे| उदासी लग रही है कि यह महा शृंखला जल्द ही समापन पर होगी| लेकिन आप जो सैर कराते है उसका क्या कहना! (नीरजजी, कृपया औपचारिक धन्यवाद न देना; वह पहले ही मिल गया है! :) )

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    1. टिप्पणियों के बदले धन्यवाद तो देना बनता है।

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  2. आपके फोटो तो दीखते है पर पाट्नर के फोटो नही के बराबर दिखते है | आप के साथ चलने वाले सह - यात्री तो आपके आस -पास भी नहीं दीखते

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    1. हमेशा की तरह लैंडस्केप्स का बेहतरीन चित्रण। कलम से भी और कैमरे के भी। बिल्कुल किसी चल-चित्र जैसा।
      अरै ताऊ, खुद ब्लॉगर होकै बी ब्लॉगिंग के सारे कायदे भूल ग्या? आङै यात्रा-लेख पढण खातिर आया करै या यात्रियां की शक्ल देखण?

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    2. सर जी, निशा के फोटो मैं प्रत्येक पोस्ट में लगाता हूं।

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  3. Bhai anda kari pe haath saaf kar lena tha

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    1. अगर मैं हाथ साफ कर लेता और वे लोग सुबह अण्डा-करी मांग लेते तो???
      इसीलिये हाथ साफ नहीं किया।

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  4. नमस्कार नीरज जी,

    जमे हुए झरने का फोटो मस्त हे ,ऐसा लागता हे किसी चित्रकार चित्र निकाला हो …
    पेंगोंग - हनले के बीच मे पेट्रोल पम्प नही हे ?…….
    लेह - लद्दाख मे पेट्रोल पम्प पर पेट्रोल प्रती लिटर कितना रुपये लेते हे । ………
    लेह - लद्दाख मे पेट्रोल पम्प कोनसे स्थानो पर हे कृपया जानकारी हो तो सहयोग करे …
    डेबरिंग - मनाली सफर कर रहे हो तो कोनसे स्थानो पर Stay करना योग्य होगा …

    हा …। कोठारी साहब कहा थे ?


    Thank u.......

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    1. पूरे लद्दाख में कारगिल, मुलबेक, लेह और कारू में ही पेट्रोल पम्प है। दो साल पहले उप्शी में बन रहा था, अभी पता नहीं चालू हुआ या नहीं। इसके अलावा एक पेट्रोल पम्प नुब्रा घाटी में भी है लेकिन बताते हैं कि वहां तेल कम ही उपलब्ध रहता है।
      कारू के बाद पेंगोंग, चुशुल, हनले और शो-मोरीरी तक कोई पेट्रोल पम्प नहीं है।
      लद्दाख में 74-75 रुपये प्रति लीटर तक पेट्रोल मिलता है।
      डेबरिंग से मनाली रोड पर पांग, सरचू, दारचा और केलांग तो बडे ठिकाने हैं। इनके अलावा व्हिस्की नाला, भरतपुर, जिंगजिंगबार, जिस्पा और कोकसर में भी रुका जा सकता है।
      कोठारी साहब लेह से मनाली चले गये और उसके बाद अपने घर जयपुर।

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    2. धन्यवाद नीरज जी आपने उपयुक्त जानकारी दि …
      क्या कोठारी साहब मनाली - जयपुर bike पर गये ……

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  5. नीरज जी शाहपुर में मेरी ससुराल हैं, कम से कम सालो के फोटो तो दिखा देते....

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    1. आपके साले पस्त हुए पडे थे।

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  6. अंडा करी खा लेनी चाहिए थी ... बना हुआ भोजन छोड़ना भोजन का अपमान ही है .... खैर वो लोग थक कर सो गए होंगे लेकिन कल खाना बेकार जाए उससे अच्छा आप खा लेते .... इस बारे में ज्यादा सोच विचार नहीं करना था ....

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    1. हमने बना हुआ भोजन नहीं छोडा। अगर हम खा लेते तो डर था कि कहीं सुबह न मांग लें। फिर दुकान वाला कहां से देता?

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  7. यह श्रृंखला अब यही खत्म हो गया ।
    क्या सर ।

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  8. Neeraj ji aage ki yatra padhne ke liye vyakul hun ...

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  9. मेरे को पांग से आगे लाचुलुंग-ला से पहले की संकडी घाटी में कुछ डर लगा था। दोनों तरफ़ खड़े पहाड़ों के बीच बेतरतीब लम्बा रास्ता फिर अकेला ओर शाम का समय।

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