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Wednesday, August 19, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 17 (लोमा-हनले-लोमा-माहे)

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19 जून 2015
भारतीय सेना के अपनेपन से अभिभूत होकर सुबह सवा नौ बजे हमने हनले के लिये प्रस्थान किया। जरा सा आगे ही आईटीबीपी की चेकपोस्ट है और दो बैरियर भी हैं। यहां से एक रास्ता सिन्धु के साथ-साथ उप्शी और आगे लेह चला जाता है, एक रास्ता वही है जिससे हम आये हैं यानी चुशुल वाला और तीसरा रास्ता सिन्धु पार जाने के लिये है। सिन्धु पार होते ही फिर दो रास्ते मिलते हैं- एक सीधा हनले जाता है और दूसरा बायें कोयुल होते हुए देमचोक। देमचोक ही वो स्थान है जहां से सिन्धु तिब्बत से भारत में प्रवेश करती है। गूगल मैप के भारतीय संस्करण में देमचोक को भारत का हिस्सा दिखाया गया है, अन्तर्राष्ट्रीय संस्करण में इसे विवादित क्षेत्र बताया है जो भारतीय दावे और चीनी दावे के बीच में है और चीनी संस्करण में इसे चीन का हिस्सा दिखाया है। लेकिन फिलहाल जमीनी हकीकत यह है कि देमचोक भारतीय नियन्त्रण में है। देमचोक का परमिट बिल्कुल नहीं मिलता है। अगर आपकी सैन्य पृष्ठभूमि रही है तो शायद आप वहां जा सकते हैं अन्यथा नहीं। हालांकि लोमा में सिन्धु पार करके देमचोक वाली सडक पर कोई नहीं था, आप भूलवश कुछ दूर तक जा सकते हैं, शायद कोयुल तक भी।
यहां आईटीबीपी ने हमारी सारी डिटेल अपने रजिस्टर में भरी और बैरियर खोल दिया। हम हनले की ओर बढ चले। यहां से हनले पचास किलोमीटर है और अच्छी सडक बनी है। रास्ता एक चौडी घाटी से होकर जाता है जिससे ज्यादा पहाडी मोड पार नहीं करने पडते। यह घाटी एक नमभूमि भी है जिसमें हर जगह भेडपालक और याकपालक थे। जहां भेडपालक नहीं थे, वहां क्यांग- जंगली लद्दाखी गधे- बेरोकटोक घूम रहे थे। निशा ने आधी दूरी में ही दो सौ से भी ज्यादा ज्यादा क्यांग गिन डाले।
जैसे जैसे हनले नजदीक आता जा रहा था, सामने के पहाडों में कहीं फोटी-ला का भी आभास होने लगा था। फोटी-ला पर सडक बनी है। यह 5500 मीटर ऊंचा है यानी खारदुंगला से भी 150 मीटर ज्यादा। फोटी-ला वाली यह सडक आगे कोयुल में देमचोक वाली सडक में मिल जाती है, इसलिये आम नागरिकों को फोटी-ला नहीं जाने दिया जाता। फिर भी अगर आप फोटी-ला चले गये तो देमचोक तक आपको रोकने वाला कोई नहीं है।
हनले में हम गये सबसे पहले मोनेस्ट्री में। हनले में दो स्थान दर्शनीय हैं- मोनेस्ट्री और वेधशाला। पहले हम मोनेस्ट्री गये। हनले मोनेस्ट्री चांगथांग क्षेत्र की सबसे बडी और सबसे पुरानी मोनेस्ट्री है। चांगथांग यानी उप्शी से देमचोक तक सिन्धु के आसपास का इलाका। चांगथांग एक बहुत बडा क्षेत्र हुआ करता था जिसकी जलवायु और भूगोल बाकी लद्दाख से अलग होता था। यह लद्दाख और तिब्बत के बीच में पडता था। अब कुछ चांगथांग भारत में है और कुछ चीन अधिकृत तिब्बत में।
मोनेस्ट्री में कुछ मरम्मत का काम चल रहा है। अगर आप लद्दाख की किसी भी मोनेस्ट्री को देखेंगे तो उसके वास्तु को देखकर हैरान रह जायेंगे जबकि इसके बनाने का तरीका बेहद आसान है। एक सेंट्रल कक्ष होता है जिसे ‘गर्भगृह’ जैसा मान सकते हैं। यह सबसे अधिक पवित्र होता है और सारे पूजा-पाठ इसी में होते हैं। इसके चारों तरफ फिर अन्य कक्षों का निर्माण होना शुरू होता है जो लगातार साल-दर-साल चलता रहता है। छोटे-छोटे कमरे बनते जाते हैं, एक के ऊपर एक, दो के ऊपर एक, एक के ऊपर दो... और आखिरकार मोनेस्ट्री मधुमक्खी के छत्ते जैसा आकार ले लेती है। हनले मोनेस्ट्री आजकल वैसे तो जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है लेकिन कमरे बनाने का काम अभी भी चल रहा है। इस साल की योजना बनाई जा चुकी है और उसी के अनुसार काम चल रहा है। सर्दियों में अगले साल की योजना बनेगी। हिमाचल के रहने वाले करण मुझे यहां मिले। आपको याद होगा कि मैंने और करण ने लेह में एक साथ ही परमिट लिया था, वहीं मुझे पता चला था कि करण हनले मोनेस्ट्री पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाने आये हैं। वे सिविल इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि से हैं और अपने कुछ छात्रों व मित्रों को हनले मोनेस्ट्री की विजिट पर लाने वाले हैं।
मोनेस्ट्री के बारे में बहुत सी बातें करण ने मुझे बताईं। मसलन कि यह पहले एक किला हुआ करती थी। किले जैसे अवशेष अभी भी इसमें हैं। यह लद्दाख और तिब्बत के बीच में पडता था इसलिये यहां खूब लडाईयां होती थीं खासकर लडाकू जाति मंगोलों से। तो मोनेस्ट्री को किलेनुमा बनाना आवश्यक था। अब उसकी आवश्यकता नहीं रही तो किले के अवशेष टूटने लगे। मुख्य लामा जी शाम को आयेंगे और पूजा-पाठ होगा। अभी दोपहर के बारह बजे थे, हम शाम तक यहां नहीं रुक सकते थे, इसलिये मोनेस्ट्री का मुख्य कक्ष देखे बिना लौटना पडा।
मोनेस्ट्री एक छोटी सी पहाडी की चोटी पर स्थित है। ऊपर तक जाने के लिये सडक बनी है। ऊपर से हनले के आसपास का शानदार नजारा दिखता है। नीचे बडा चौडा मैदान है जो मुख्यतः नमभूमि है और पानी व दलदल है। हरी घास भी खूब है। नमभूमि के उस पार वेधशाला दिख रही थी।
भूख लगी थी, खाने के लिये पूछा। मोनेस्ट्री से नीचे एक गेस्ट हाउस है। उसने कहा कि अगर हमारे यहां रुकोगे तो इस समय खाना बन जायेगा, अन्यथा नहीं बनेगा। उसने सुझाव दिया कि आप वेधशाला की तरफ चले जाओ, रास्ते में होमस्टे है, खाना मिल जायेगा।
एक होमस्टे मिला, शायद गेस्ट हाउस हो- सोनम गेस्ट हाउस या फिर शायद कुछ और नाम हो। सडक से थोडा हटकर था। हम वहां पहुंचे। खाने में ‘क्यू’ था। बिल्कुल थुकपा जैसा। मैंने तो थुकपा ही सोचा था, नाम पूछा तो क्यू बताया। भूख लगी थी, इसलिये खाना पडा अन्यथा यह हमें बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था। इसके बाद मीठी चाय पी, तब जाकर मुंह का जायका वापस लौटा।
यहां से हमें बहुत सारी जानकारियां मिलीं। हमें चुमुर का परमिट नहीं मिला था लेकिन हम क्युल-शो जाना चाहते थे। क्युल-शो एक झील है, बल्कि कहना चाहिये कि पास-पास ही दो झीलें हैं। क्युल-शो यहां से लगभग 45 किलोमीटर दूर है। वहां से दो रास्ते अलग हो जाते हैं। एक जाता है चुमुर और दूसरा जाता है न्योमा। हम चुमुर नहीं जा सकते थे लेकिन न्योमा तो जा ही सकते थे। वैसे भी अगर हम हनले से वापस लोमा जायेंगे तो लोमा से आगे हमें न्योमा से ही माहे और शो-मोरीरी जाना पडेगा। हनले से न्योमा जाने के दो रास्ते हैं- एक तो मुख्य और अच्छा बना हुआ लोमा वाला और दूसरा खराब क्युल-शो वाला।
यहां पता चला कि हम क्युल-शो जा सकते हैं। हनले में कोई चेकपोस्ट नहीं है। यह सडक जो पश्चिम की तरफ जा रही है, कुछ दूर आगे खराब हो जायेगी, फिर न्योमा तक खराब ही रहेगी। रास्ते में आपको कोई नहीं रोकेगा। एक कमाल की बात और पता चली कि उधर न्योमा में भी कोई चेकपोस्ट नहीं है। मैं हैरान रह गया। न्योमा में अगर चेकपोस्ट नहीं है तो आप बिना किसी परमिट के क्युल-शो होते हुए हनले तक आ सकते हैं। लेकिन चूंकि लोमा में चेकपोस्ट है इसलिये आपको हनले से वापस भी क्युल-शो होकर ही जाना पडेगा। यह घोर आश्चर्य की बात है कि हनले का परमिट सीजनल होता है, कभी मिलता है, कभी नहीं मिलता; लेकिन कोई चाहे तो आसानी से बिना परमिट के हनले जा सकता है।
हम खुश हो गये। निशा को तो पीछे बैठना था, उसे इलाके का ज्यादा पता भी नहीं था; इसलिये मुझे अपार खुशी हो रही थी कि हम क्युल-शो जायेंगे। लेह में चुमुर का परमिट नहीं मिला था, वो सारी निराशा समाप्त हो गई।
यहां से चलकर हम पहुंचे वेधशाला पर। वेधशाला एक पहाडी के ऊपर बनाई गई है। ऊपर तक सडक बनी है। इसकी छत गुम्बदाकार है। आप इसमें प्रवेश कर सकते हैं और फोटो भी खींच सकते हैं। अन्दर एक इंजीनियर मिले, लद्दाखी थे। उन्होंने कहा कि ऊपर घूमकर आ जाओ यानी अन्दर ही अन्दर गुम्बद के ऊपर तक। मैंने कहा कि अगर आपके पास समय हो तो आप भी साथ चलो। वे साथ हो लिये। मैंने जब बताया कि मैं मैकेनिकल इंजीनियर हूं तो उनका उत्साह देखते ही बनता था। एक अनजान आदमी को इंजीनियरिंग के बारे में बताना और एक जानकार को बताना; इन दोनों बातों में फर्क होता है। उन्हें लगा कि मैं सारी बातें समझ लूंगा तो दुगुने उत्साह से बताने लगे।
यह असल में एक टेलीस्कोप है, अत्यधिक शक्तिशाली दूरबीन है। गुम्बद की छत के ठीक नीचे दूरबीन है। छत में एक दरवाजा है। रात को जब जरुरत पडती है तो वो दरवाजा खोलकर दूरबीन का लेंस आसमान की तरफ कर देते हैं और जो डाटा लेना होता है, ले लेते हैं। यहां का सारा नियन्त्रण बैंगलुरू स्थित इसरो की लैब से होता है। यहां बैठे इंजीनियरों का काम इसकी देखरेख करना होता है और सिस्टम को दुरुस्त बनाये रखना होता है। जब दूरबीन काम कर रही होती है तो अत्यधिक ठण्डे स्थान पर होने क बावजूद भी इसका तापमान काफी बढ जाता है। उसे नियन्त्रण में रखने के लिये तरल नाइट्रोजन का इस्तेमाल किया जाता है। नाइट्रोजन प्लांट इस पहाडी के नीचे ही स्थित है। नाइट्रोजन कहीं दूर से नहीं मंगानी पडती। वातावरण में तीन-चौथाई के लगभग नाइट्रोजन होती है, इसलिये थोडी सी कोशिशों में ही भरपूर नाइट्रोजन मिल जाती है।
यह वेधशाला यहीं यानी चीन सीमा के इतनी नजदीक ही क्यों लगाई है? इसके जवाब में बताते हैं कि एक तो यह स्थान प्राकृतिक रूप से काफी ऊंचाई पर है। साफ-सुथरा माहौल है। बारिश नहीं होती इसलिये बादलों का डर नहीं होता। फिर सैनिक महत्व का स्थान होने के कारण सुरक्षा भी मिल जाती है। जो भी कोई यहां आता है, सुरक्षा-जांच से गुजरकर ही आता है। भले ही सुरक्षा जांच पचास किलोमीटर दूर लोमा में हो।
मैं दूरबीन द्वारा लिये गये किसी चित्र को देखना चाहता था। देखना चाहता था कि यह दूसरे ग्रहों के, तारों के फोटो लेती है, वे कैसे होते हैं। बताया कि जैसा आप सोच रहे हैं कि चित्र होंगे, वैसा नहीं है। असल में यह कुछ डाटा लेती है। उस डाटा के अनुसार ग्राफिक्स के माध्यम से चित्र बनाये जाते हैं जिसका सारा नियन्त्रण बंगलुरू में है। आप चाहो तो डाटा देख लो, लेकिन आपके समझ में कुछ आयेगा नहीं। सही बात थी।
उसे धन्यवाद देकर सवा दो बजे हम वेधशाला से वापस चल दिये। अब बारी थी हमारी पश्चिम दिशा की ओर जाने की यानी क्युल-शो जाने की। हम करीब 12-13 किलोमीटर ही चले होंगे कि एक गांव के बाद अच्छी सडक समाप्त हो गई और कच्ची सडक शुरू हो गई। ठीक वैसी ही जैसी पर हम कल चले थे- पेंगोंग से चुशुल और सागा-ला तक। लेकिन यह वैसी भी होती तो कोई बात नहीं थी। यहां रेत ज्यादा थी। दो किलोमीटर में ही कई बार असन्तुलित हुए।
अभी तीन बजे के आसपास का समय था। चालीस किलोमीटर क्युल शो है। यानी कम से कम तीन घण्टे लगेंगे यानी छह बज जाने हैं। उसके बाद फिर 5100 मीटर ऊंचा एक दर्रा पार करके चालीस किलोमीटर दूर न्योमा है, उसमें भी तीन घण्टे कम से कम लगेंगे यानी रात के नौ बज जाने हैं। हम किसी भी हालत में अन्धेरे में नहीं चलेंगे और न ही दर्रे के आसपास रुकेंगे। इसका अर्थ है कि रात हमें क्युल शो के आसपास टैंट लगाना पडेगा। मैं अपनी इस यात्रा के प्रत्येक रास्ते का अध्ययन करके गया था। क्युल शो की दोनों झीलें एक बडे मैदान में हैं यानी नमभूमि है। वहां भेडपालक और याकपालक मिलेंगे। उनके साथ कुत्ते भी अनिवार्य रूप से होंगे। यहां कोई यात्री नहीं आता। दिनभर में एकाध सैन्य गाडी आ गई तो आ गई, नहीं तो कोई हलचल नहीं होती। ऐसे में दिन ढलते समय हम वहां पहुंचेंगे तो कुत्ते निश्चित ही खतरनाक हो जायेंगे। अगर हम आगे जाते हैं तो सुनसान इलाके में रात अवश्य बितानी पडेगी और हम नहीं चाहते थे कि कुत्तों के खौफ में रात बितानी पडे।
वापस मुड गये।
आधे घण्टे में हनले और पांच बजे तक लोमा पहुंच गये। रास्ता तो शानदार बना ही है। लोमा के पास रेत के पहाड बडे ही शानदार लग रहे थे। सिन्धु पार की। आईटीबीपी ने देखते ही बैरियर खोल दिया। उन्हें याद था कि हम सुबह ही यहां से गये थे। अगर याद न रहता या हम किसी और रास्ते से हनले पहुंचते और यहां आते तो वे हमसे पूछताछ करते और परमिट भी मांगते।
रास्ता सिन्धु के साथ साथ है और सिन्धु काफी चौडी घाटी से होकर बहती है। इसलिये सडक भी सिन्धु से पर्याप्त दूरी पर है। ज्यादातर सीधी है इसलिये स्पीड भी मिल जाती है। पौने छह बजे न्योमा पहुंचे। यहां रुकने खाने के काफी ठिकाने हैं। एक ढाबे पर हम रुक गये, भूख लगी थी। चाय और केक लिये। मालिक ने पूछा कि चाय में मीठा कितना लोगे? मैंने कहा- तेज। तेज मीठा सुनते ही उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। कंजूस सेठ होगा वो। बडी हैरानी से पूछा- आप तेज मीठा लेते हो चाय में? हमने कहा- हां। कुछ देर बाद चाय आई। मीठा कम ही था। हमने कोई शिकायत नहीं की। चाय खत्म भी नहीं हुई कि वो फिर आया। पास बैठ गया और हल्के स्वर में बोला- तो दिल्ली वाले तेज मीठे की चाय पीते हैं? हमने फिर कहा- हां। जब पैसे देने लगे तो फिर पूछा- आप यहां लद्दाख में ही तेज मीठे की चाय पीते हो या हमेशा ही ऐसी चाय लेते हो? हमने बेफिक्री से कहा- हमेशा ही हम तेज मीठे की चाय पीते हैं लेकिन तुम्हारी चाय में मीठा कम था। इतना कहकर हम तो चलते बने लेकिन आखिरी शब्द सुनकर जरूर उसकी तबियत खराब हो गई होगी।
काम की बात यह है कि न्योमा में एक पेट्रोल पम्प बन रहा है। नहीं तो अभी तक सबसे नजदीकी पेट्रोल पम्प 150 किलोमीटर दूर कारू में था। दो साल पहले कारू से 15 किलोमीटर पहले उप्शी में भी निर्माणाधीन पेट्रोल पम्प देखा था, लेकिन अब पता नहीं वो चालू है या नहीं। हमें अभी पेट्रोल की आवश्यकता नहीं थी।
न्योमा से 20-21 किलोमीटर आगे माहे है और उससे तीन किलोमीटर आगे माहे पुल। माहे पुल से ही सिन्धु पार करके शो-मोरीरी जाया जाता है। शाम का समय हो चुका था। यह समय फोटोग्राफी के लिये सर्वोत्तम होता है, इसलिये सिन्धु और इसके जल-क्षेत्र के कई फोटो लिये। रास्ता अच्छा है हालांकि न्योमा पुल के पास काम चल रहा है। हमने अच्छी तरह देखा लेकिन न्योमा पुल पर कोई चेकपोस्ट नहीं दिखी। न इस तरफ, न उस तरफ। इसका मतलब कि हनले में उस लडके ने ठीक ही बताया था कि आप न्योमा पुल से सिन्धु पार करके क्युल-शो होते हुए बिना परमिट के भी हनले आ सकते हो।
सात बजे माहे पहुंचे। यहां से एक रास्ता काकसांग-ला होते हुए चुशुल जाता है। काकसांग-ला लगभग 5400 मीटर ऊंचा है जो खारदुंगला से 50 मीटर ज्यादा है। मेरी जानकारी में लद्दाख में तीन दर्रे ऐसे हैं जो खारदुंगला से ऊंचे हैं और सडक भी बनी है- मारसिमिक-ला (लगभग 5590 मीटर), फोटी-ला (5500 मीटर) और काकसांग-ला (5400 मीटर)।
(नोट: अभी-अभी जब मैं गूगल मैप पर मारसिमिक-ला की ऊंचाई देख रहा हूं तो एक और दर्रे का पता चला है जो भारतीय क्षेत्र में है। इसका नाम है आने-ला (5380 मीटर)। सैटेलाइट से देखने पर इस पर मोटर रोड होने की पुष्टि हो रही है। यह भी खारदुंगला से ऊंचा है। तो इस तरह अकेले लद्दाख में ही कम से कम चार सडक दर्रे खारदुंगला से ऊंचे हैं।)
मेरी इच्छा इनमें से कम से कम एक दर्रे पर जाने की थी। मारसिमिक-ला पर इसलिये नहीं गये कि मौसम खराब था और हम खारदुंगला और चांगला को भुगत चुके थे। फोटी-ला पर इसलिये नहीं गये कि वहां जाना बेहद संवेदनशील इलाके में जाने के बराबर है और आसानी से सिविलियन वहां नहीं जा सकते। लेकिन काकसांग-ला जाना शायद हो सकता था। अगर काकसांग-ला जाना होता तो हम कल चुशुल से काकसांग-ला की तरफ आ जाते। कल नहीं आये तो अब भी नहीं जायेंगे। काकसांग-ला फिर कभी।
माहे गांव से तीन किलोमीटर आगे माहे पुल है। यहां एक पुलिस चौकी है जहां प्रत्येक वाहन की रजिस्टर में एण्ट्री होती है। चूंकि यहां का परमिट नहीं लगता इसलिये परमिट नहीं देखा जाता। इसके बराबर में ही चाय-पानी की एक दुकान थी। दुकान के बराबर में एक निर्माणाधीन मकान था। उसके बराबर में पुल था जिससे होकर शो-मोरीरी जाया जाता है। पुल के बराबर में सिन्धु किनारे सडक से नीचे उतरकर एक छोटा सा मैदानी टुकडा था। पहले तो हमने इसी में टैंट लगाने का निश्चय किया। लेकिन जब देखा कि अक्सर आने-जाने वाले पुल के पास खडे होकर इसी मैदान की तरफ सूसू कर देते हैं तो इसमें टैंट लगाने का इरादा त्याग दिया। अब सर्वोत्तम जगह थी वो निर्माणाधीन मकान। हमने उस मकान की ‘रेकी’ की और एक कमरा हमें पसन्द आ गया।

लोमा में सिन्धु पर बना पुल


हनले की ओर जाती सडक

हनले रोड



हनले से दूरियां

ऊपर पहाडी पर हनले मोनेस्ट्री

मोनेस्ट्री से नीचे का नजारा

मोनेस्ट्री से दिखती वेधशाला





मोनेस्ट्री से दिखती लोमा की ओर जाती नदी और नदी के उस तरफ सडक


हनले के आसपास का इलाका नमभूमि है।


हनले मोनेस्ट्री में किले जैसे अवशेष।

मोनेस्ट्री में निर्माण कार्य चल रहा है।


मोनेस्ट्री से दिखती फोटी-ला की ओर जाती सडक। 

निशा स्थानीय महिलाओं से खाने के बारे में पूछताछ कर रही है।

यहां हमने भोजन किया।

वेधशाला की ओर

वेधशाला


वेधशाला के दिखती हनले मोनेस्ट्री

इस स्थान से हम वापस मुडे थे।

हनले से चुमुर जाने का रास्ता






वापस लोमा की ओर

लोमा के आसपास रेत बहुत ज्यादा है।






लोमा और सिन्धु नदी



न्योमा गांव

न्योमा से दूरियां और निर्माणाधीन पेट्रोल पम्प


सिन्धु किनारे



माहे में यहां से एक सडक काकसांग-ला होते हुए चुशुल जाती है।


माहे पुल के पास हमने यहीं टैंट लगाया था।

इसी मकान में टैंट लगाया था।






अगले भाग में जारी...

(प्रार्थना: कृपया ‘बहुत ही ज्ञानवर्द्धक’, ‘रोमांचक’ जैसी औपचारिक टिप्पणी न करें। आपकी कोई जिज्ञासा हो, कुछ और जानकारी बांटना चाहते हो या अपना कोई अनुभव हो, उसे ही टिप्पणी के रूप में लिखिये। धन्यवाद।)



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14 comments:

  1. नीरज ये एक बेहतरीन प्रयास है कि जहां एक आम भारतीय नही पहुँच पाता आप उन जगहों को सबके लिए संभव बना रहे हैं ! प्रशंसनीय कार्य ! आप ज्यादातर अपनी पोस्ट में ऐसा लिखते हैं कि आगे की सड़क खराब होगी - या फिर 40 किलोमीटर खराब होगो फिर सही मिल जायेगी ! ऐसा कैसे पता कर पाते हैं आप ? और हाँ , ये बात और भी अच्छी लगी कि मैकेनिकल इंजीनियर भले हथोड़ा छाप हो लेकिन दिमाग तो उसका चलता ही है ! और एक डिपोलमची का तो और भी ज्यादा ! मैं खुद डिप्लोमची हूँ और वो भी मैकेनिकल से इसलिए मुझे लगता है ये शब्द बुरा नही लगेगा आपको !!

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    1. सडक की स्थिति गूगल मैप के सैटेलाइट मोड से पता चल जाती है। हालांकि यह वर्तमान स्थिति नहीं बताता, कुछ पुरानी स्थिति ही बताता है लेकिन फिर भी अन्दाजा हो जाता है।

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  2. Aisi jageh per LML scooter.. photo me dikha.. AASCHARYA hua..

    Lagta hai ret ke pahado ne apka jyada mun moha..

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    1. शाम के समय रेत बेहद खूबसूरत लग रही थी।

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  3. रेत से कुछ आकृतियाँ ऐसी बन गईं हैं जैसे ये किसी और ही दुनिया की हों. सारे चित्र बेहतरीन हैं. जुले शब्द बहुत प्रचलित है क्या यहाँ?

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    1. ‘जुले’ का अर्थ है नमस्कार। वहां सभी आपस में जुले ही कहते हैं।

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  4. लदाखी लोग हम जैसे पर-राज्यों के लोगों के प्रति कैसा व्यवहार करते है ...

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  5. अत्यंत अद्भुत नीरज जी! खगोलशास्त्र में रुचि रखने के कारण हनले ऑब्सर्वेटरी के बारे में कौतुहल था| आपने उसे थोडा पूरा कर दिया| :)

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    1. धन्यवाद निरंजन जी...

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  6. Neeraj ji hilly area mai bike average ka kya fark hai. Kitne average deti hai

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    1. पहाडों में औसत थोडा गिर जाता है- मैदान से करीब 5 किलोमीटर प्रति लीटर कम।

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  7. एक तरफ बर्फिले दुसरी तरफ रेतीले पहाड …………. क्या करिष्मा हे कुदरत का नीरज भाई ….

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