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Saturday, August 8, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 12 (लेह-खारदुंगला)

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
16 जून 2015
एक बात मैं अक्सर सोचता हूं। हम मैदानों में बाइक के पहियों में हवा लगभग 35 पौंड पर भरते हैं। जब हम लद्दाख जैसी ऊंची जगहों पर पहुंचते हैं तो वातावरण में हवा का दबाव कम होने के कारण पहियों में हवा का दाब बढ जाता है। जैसे कि मान लो लेह में हवा का दाब दिल्ली के मुकाबले आधा है, तो दिल्ली में भरी गई 35 पौंड की हवा लेह में 70 पौंड का प्रभाव पैदा करेगी। यह खतरनाक हो सकता है। बाइकों में अधिकतम 40 पौंड तक ही हवा भरी जाती है, उससे ज्यादा हवा अगर भरी गई तो टायर के फटने का डर हो जाता है। लेकिन ऊंचाईयों पर पहुंचने पर दाब 70 पौंड तक भी पहुंच जाता है, जो निश्चित रूप से अत्यधिक खतरनाक है। ऐसे में अत्यधिक दाब वाली हवा ट्यूब पर, पहिये पर दबाव डालती है और ट्यूब जहां से भी कमजोर होती है, वहीं से पंचर हो जाती है।
लद्दाख में दर्रों के आसपास पंचर ज्यादा होते हैं। केवल इसीलिये।
इसलिये जरूरी था कि हवा चेक की जाये। यह काम हम कल नहीं करा सके, सोचा कि आज चलते समय करायेंगे। लेकिन आज सुबह नौ बजे हम चल पडे, लेह से बाहर निकल गये लेकिन हवा चेक नहीं कराई। यह खतरनाक तो था लेकिन जो होगा देखा जायेगा।
लेह से खारदुंगला की दूरी लगभग 40 किलोमीटर है। लेह 3500 मीटर की ऊंचाई पर है और खारदुंगला लगभग 5350 मीटर पर। इसका अर्थ हुआ कि लेह से खारदुंगला की सडक औसतन प्रति किलोमीटर 46 मीटर ऊपर चढती है। यह पैमाना काफी ज्यादा होता है। सडक काफी पतली है, हालांकि अच्छी बनी है। जैसे जैसे ऊपर चढते हैं, लेह शहर का शानदार नजारा दिखता है खासकर शान्ति स्तूप का।
हां, एक बात तो बतानी भूल ही गया। सुबह जब हम उठे थे तो मैंने सबसे पहला काम किया था खिडकी से बाहर झांककर खारदुंगला पर मौसम देखना। वहां मौसम खराब था और ताजी बर्फबारी भी हुई थी। दर्रों पर आमतौर पर दोपहर बाद मौसम खराब हो जाता है लेकिन अगर सुबह ही ऐसा हो जाये तो समझो कि कुछ ठीक नहीं है। शाम को अगर मौसम खराब होता है तो वो कुछ घण्टों बाद ठीक हो जाता है लेकिन अगर सुबह ही मौसम खराब मिले तो उसका स्वभाव बिल्कुल अनिश्चित होता है। हो जाये वो अभी ठीक हो जाये, नहीं तो कई कई दिन भी लग सकते हैं। कल भी खारदुंगला पर बर्फबारी हुई थी, आज रात भी बर्फ गिरी और अभी भी मौसम ठीक नहीं है। मैं चिन्तित इस बात से था कि खारदुंगला बन्द न हो जाये। निशा को फटाफट जगाया, बिना नहाये ही निकल लिये। आज तो हर हालत में खारदुंगला पार करना ही है। यह अगर बन्द हो गया तो चांग-ला भी बन्द हो जायेगा और हम न नुब्रा घाटी जा पायेंगे और न पेंगोंग झील। अगर गये भी तो अनावश्यक बहुत ज्यादा चक्कर काटना पड जायेगा।
हमारे पार करने के बाद अगर खारदुंगला बन्द भी हो जाता है तो हम श्योक के रास्ते पेंगोंग चले जायेंगे और फिर चुशुल होते हुए शो-मोरीरी। फिर तो कैसा भी मौसम खराब हो जाये, कितनी भी बर्फ पड जाये, हम नहीं रुकने वाले। एक बार बस खारदुंगला पार हो जाये।
आज एक पत्र और कोठारी साहब के नाम लिखा। इसमें आगे का कार्यक्रम लिखा था और साथ में परमिट फार्म की कॉपी और एप्लीकेशन फार्म की एक कॉपी भी दी थी। मैंने लिखा कि आज या कल चुशुल और हनले का परमिट लेकर परसों पेंगोंग किनारे मिलो।
शहर से बाहर निकले तो टैक्सी यूनियन वालों ने रोक लिया। बाइक के कागज और ड्राइविंग लाइसेंस मांगे। सन्तुष्ट होने पर जाने दिया। असल में बाहर की कोई टैक्सी या किराये की बाइक केवल लेह तक ही जा सकती है। उससे आगे जाने के लिये आपको लेह से टैक्सी या किराये की बाइक लेनी पडेगी। वे यही चेक कर रहे थे कि यह हमारी अपनी बाइक है या किराये की। अगर आरसी और डीएल पर अलग-अलग नाम होते तो शायद दिक्कत हो सकती थी। मैंने पढा है कि पिछले दिनों यूनियन वालों ने दिल्ली के किसी कार वाले के साथ मारपीट और तोडफोड भी की। इस बारे में कुछ ट्रैवल फोरम पर यूनियन की खूब आलोचना हो रही है लेकिन बिना सच जाने मैं कुछ नहीं कहूंगा। मुझे केवल वो ही बात पता है जो कार वालों ने बताई। और अगर गलती कार वालों की भी होगी तो वे कभी भी अपनी गलती नहीं बतायेंगे। कोई भी अचानक एकदम मारपीट शुरू नहीं करता। ताली दोनों हाथों से बजती है। लद्दाखी आक्रामक नहीं होते लेकिन यह भी सच है कि कश्मीर की तरफ से भी हवाएं लद्दाख पहुंच रही हैं।
हमसे यूनियन वालों ने बेहद शालीन तरीके से रुकने को कहा। बीया जी, बीया जी कहकर कागज मांगे और सन्तुष्ट होने पर वापस लौटाये और यह सब करने के लिये माफी भी मांगी।
हिमाचल में भी रोहतांग पर अपनी निजी गाडी ले जाना मना है। इसके नियन्त्रण के लिये हिमाचल पर्यटन के लोग बैठे होते हैं या फिर जंगल विभाग के; पता नहीं। इसी तरह लेह में टैक्सी यूनियन के लोग होते हैं। अब जब नियम है कि अन्य राज्यों की टैक्सी लेह से आगे नुब्रा और पेंगोंग नहीं जा सकती, तो हमें यह नियम मानना पडेगा। अगर मेरे पास अपनी बाइक न होकर अपने किसी दोस्त की होती तो मैं कैसे सिद्ध करता कि यह किराये की नहीं है? मुझे तो पता है कि यह किराये की नहीं है, लेकिन अन्य किसी को नहीं पता। कागज भी अलग-अलग नामों के हैं, तो कैसे मैं बताऊंगा कि यह मेरी पर्सनल है? मैंने बहुत से विदेशी दिल्ली नम्बर की, हिमाचल नम्बर की सफेद नम्बर-प्लेट की बाइकों पर लद्दाख घूमते देखे हैं। सफेद रंग की नम्बर प्लेट भले ही हों, लेकिन होती तो वे किराये की ही हैं। यहां उन्हें रोक लिया जायेगा और वापस भेज दिया जायेगा। आप बहसबाजी करोगे तो वे लोग झुण्ड में होते हैं, वे भी बहसबाजी पर उतर आयेंगे।
इस एक घटना से लद्दाख की छवि को भयंकर नुकसान पहुंचा है। कुछ लोगों ने तो बाकायदा एक मुहिम भी चला रखी है कि एक साल के लिये लद्दाख कोई मत जाओ, लद्दाखियों को भूखों मरने दो। हालांकि लद्दाख की आमदनी का एक बडा हिस्सा पर्यटन से आता है लेकिन किसी के जाने या न जाने से कोई भूखा नहीं मरता। आप बेधडक लद्दाख जाओ। हर जगह जाने के कुछ नियम होते हैं, उन नियमों का पालन करते रहो, कभी परेशानी नहीं आयेगी।
जैसे जैसे ऊपर चढते रहे, मौसम खराब होता गया और आखिरकार बर्फबारी शुरू हो गई। सवा दस बजे साउथ पुल्लू पहुंचे। यहां कम से कम दो किलोमीटर तक वाहनों की कतारें लगी थीं। लेकिन बाइक वाले कतारों में नहीं रुके और सभी वाहनों से आगे निकलते गये। आखिरकार बैरियर से करीब दो सौ मीटर पहले जब आगे बढने की कोई गुंजाइश न दिखी, तो रुक जाना पडा। बर्फ पड ही रही थी। यहां भी और ऊपर खारदुंगला पर भी।
साउथ पुल्लू में आईटीबीपी की और पुलिस की चेकपोस्ट है। पहले यहां से आगे जाने का परमिट लगता था। अब परमिट नहीं लगता लेकिन सेल्फ डिक्लरेशन फार्म जमा करना पडता है। यह फार्म लेह में फोटो स्टेट की दुकानों पर आसानी से मिल जाता है। इसमें आपको सभी यात्रियों की डिटेल भरकर, वाहन की डिटेल भरकर स्वयं ही हस्ताक्षर करके जमा करना होता है। पहले जहां जहां जाने का परमिट लगता था और अब नहीं लगता, वहां वहां जाने के लिये सेल्फ डिक्लरेशन फार्म भरना होता है जैसे कि नुब्रा घाटी, पेंगोंग और शो-मोरीरी। इससे प्रशासन को पता रहता है कि किस इलाके में कितने लोग हैं और कितने वाहन हैं। कोई प्राकृतिक दुर्घटना होने पर यह काम आता है। हमने पांच फार्म ले लिये थे। भरा कोई नहीं था। सोचा कि जहां जरुरत पडेगी, साथ के साथ भर लेंगे।
आईटीबीपी ने बैरियर लगा रखा था जिसके कारण कोई खारदुंगला नहीं जा रहा था। हम कल से ही देखते आ रहे थे कि खारदुंगला पर बर्फबारी हो रही है। अभी भी वहां बर्फ पड रही थी। आईटीबीपी ने बताया कि रास्ते में कई फीट बर्फ है, जिसे हटाने का काम चल रहा है। ऊपर से जब क्लियरेंस मिलेगा, तभी बैरियर खुलेगा।
अब समझ में आया कि कल कोठारी साहब लेह क्यों नहीं पहुंचे?
यहां साउथ पुल्लू पर तकरीबन आधा फुट ताजी बर्फ थी। इसका अर्थ था कि खारदुंगला पर कम से कम दो फीट बर्फ मिलेगी। इतनी बर्फ में गाडी नहीं चल सकती। हम समेत जितने भी बाइक वाले थे, सभी ने मान लिया था कि कम से कम दो घण्टे तो लगेंगे ही सडक खुलने में। हम परसों से लेह में ही थे, आज खारदुंगला के इतना नजदीक आकर भी अगर वापस जाना पडे तो बेकार था। रास्ता कभी भी खुले, हम डटे रहेंगे।
लेकिन तभी एक छोटी सी घटना घटी। आगे खडे एक गाडी वाले ने गाडी के पिछले पहियों पर जंजीर बांध ली ताकि बर्फ पर न फिसले। उसने आईटीबीपी से बैरियर खोलने की अनुमति मांगी और जंजीर बंधी देखकर संतरी ने बैरियर खोल दिया। उसके निकल जाने से थोडी सी जगह बनी और सारा बाइक गैंग बैरियर के पास जाकर खडा हो गया। अब इतना तो पक्का हो गया था कि जितनी बर्फ हम सोच रहे हैं, उतनी बर्फ नहीं है। जंजीर बंधी कोई गाडी जा सकती है, तो हम भी जा सकते हैं। बर्फ पर कारों के मुकाबले बाइक को संभालना ज्यादा आसान है। कार अगर ढलान पर बर्फ में फिसलेगी तो उसे सन्तुलित करना मुश्किल है, लेकिन बाइक सन्तुलित हो जाती है।
सन्तरी ने थोडी सी रहमदिली दिखाई और बाइक वालों के लिये बैरियर यह कहते हुए खोल दिया- आप यहां गाडियों के बीच में खडे अच्छे नहीं लग रहे हो, बैरियर से आगे सडक खाली पडी है, वहां खडे हो जाओ और उधर कैंटीन में चाय नाश्ता कर लो। कम से कम बीस बाइकें थीं। सभी बैरियर से आगे हो गईं। बैरियर पार करते ही सबकी नीयत खराब हो गई। हमें अब कोई रोकने वाला ही नहीं था। एक थोडा सा आगे बढा, रुका, चार उसके पीछे गये। फिर कुछ और आगे बढे। किसी ने पीछे से कुछ नहीं कहा, न रुकने को कहा। और आखिरकार सभी बाइक वाले खारदुंगला की तरफ चल दिये।
साउथ पुल्लू से आगे रास्ता बहुत खराब था और बर्फ के कारण रास्ते में कीचड भी हो गया था। अभी भी मौसम खराब था, बर्फ पड रही थी और ठण्डी तूफानी हवा चल रही थी। हेलमेट के शीशे पर बर्फ आकर चिपकती जाती थी और सामने दिखना बन्द हो जाता था। इसलिये शीशा खोलना पडा। ठण्डी हवा चेहरे और नाक पर खूब प्रहार कर रही थी। पीछे बैठी निशा से पूछा तो उसने बताया- नहीं, मैंने शीशा नहीं खोल रखा है लेकिन हम कहां चल रहे हैं, मुझे कुछ नहीं दिख रहा।
साउथ पुल्लू से खारदुंगला लगभग 14 किलोमीटर है। सात किलोमीटर बाद तो सडक पर भी खूब बर्फ थी लेकिन कुछ तो पानी से और कुछ समय समय पर आती-जाती गाडियों से एक लीक बन गई थी। हम इसी लीक पर चलते रहे। फिर आगे यह लीक भी गायब हो गई और हमारे सामने थी कांच जैसी कठोर बर्फ। ताजी बर्फ के ऊपर जब गाडियां चलेंगी तो अत्यधिक कम तापमान के कारण यह पिघलती नहीं है और दबती दबती कठोर हो जाती है और कांच जैसी बन जाती है। इस पर चलना बेहद मुश्किल था। खारदुंगला अभी भी छह किलोमीटर दूर था।
निशा को नीचे उतरना पडा और बाइक को धक्का लगाना पडा। पहिये बर्फ पर स्लिप हो जाते थे। कुछ बुलेट वाले तो नीचे उतर गये थे और पहले गियर में डालकर पैदल ही सन्तुलन बनाते चल रहे थे। एक जगह एक बुलेट आगे नहीं बढ रही थी। उसका पिछला पहिया कठोर बर्फ पर घूमता जाता था। आखिरकार निशा ने उसे धक्का लगाया और वो आगे बढा। मैं उसके पीछे खडा हुआ उसकी वीडियो बना रहा था। तभी एक बाइक वाला मुझसे आगे निकला और गिर पडा। मैंने वीडियो तुरन्त बन्द की, अपनी बाइक खडी की और उसकी बाइक उठवाई।
खारदुंगला पांच किलोमीटर रह गया। हम लगभग 5100 मीटर की ऊंचाई पर थे। काफी तेज बर्फबारी हो रही थी। रास्ते पर और भी बर्फ मिलने लगी। सभी ने वापस मुडने का फैसला किया। खारदुंगला तक अगर पहुंच भी जाते तो उस तरफ चिकनी कठोर बर्फ पर नीचे उतरना बेहद मुश्किल होता। हम खारदुंगला के दक्षिण में थे। किसी भी दर्रे के दक्षिण में बर्फ कम होती है, उत्तर में ज्यादा होती है। यानी खारदुंगला के उस तरफ हमें और भी ज्यादा बर्फ मिलेगी। चढ तो हम जायेंगे धक्का लगाते-लगाते, गिरते-पडते। लेकिन फिर नीचे उतरना असम्भव हो जायेगा। नीचे उतरते समय ब्रेक लगाने जरूरी होते हैं और ऐसे में ब्रेक नहीं लगाये जा सकेंगे। ब्रेक लगाने से या गियर में डालकर इंजन बन्द कर देने से पहिये तो घूमना बन्द कर देंगे लेकिन चिकनी बर्फ पर ढलान पर फिसलने लगेंगे और हमारे नियन्त्रण से बाहर भी हो सकते हैं। अभी धक्का लगा रहे हैं, फिर पीछे से खींचना पडेगा। न बाइक टिकेगी, न खींचने वाला ही स्थिर रह पायेगा।
सामने खारदुंगला दिख रहा था और हम वापस मुड लिये। जो अभी थोडी देर पहले सोच रहे थे कि उस तरफ नीचे उतरना मुश्किल होगा, वही स्थिति अब हमारे सामने आ गई। एक किलोमीटर हमें बर्फ पर उतरना पडा। अब हमें पता चला कि ऐसे में ऊपर चढने के मुकाबले नीचे उतरना ज्यादा मुश्किल होता है।
लेकिन निशा को बर्फ में खेलने से, स्नोमैन बनाने से कौन रोक सकता था?
अब हमारे सामने एक ही विकल्प था और वो था शो-मोरीरी जाना। क्योंकि पेंगोंग के रास्ते में चांग-ला दर्रा पडता है जो खारदुंगला के लगभग बराबर ही है। खारदुंगला बन्द है तो चांग-ला के भी बन्द होने की काफी सम्भावना है।
अब कुछ बातें खारदुंगला के बारे में बताना चाहता हूं। बीआरओ के अनुसार इसकी ऊंचाई 18380 फीट यानी 5602 मीटर है और इसे दुनिया की सबसे ऊंची मोटर योग्य सडक कहा जाता है। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। खारदुंगला की वास्तविक ऊंचाई गूगल मैप के अनुसार 5340 और 5360 के बीच है। गौरतलब है कि गूगल मैप 20-20 मीटर के गैप पर ऊंचाईयां बताता है। चांग-ला की ऊंचाई भी 5340-5360 के बीच है। तंगलंग-ला 5320-5340 के बीच में है। बीआरओ खारदुंगला को दुनिया की सबसे ऊंची मोटर सडक बताता है, चांग-ला को दूसरे नम्बर पर और तंगलंग-ला को तीसरे नम्बर पर रखता है। बीआरओ के अनुसार खारदुंगला 18380 फीट (5602 मीटर), चांग-ला 17586 फीट (5360 मीटर) और तंगलंग-ला 17582 फीट (5359 मीटर) पर हैं। अगर गूगल मैप और बीआरओ की तुलना करें तो चांग-ला और तंगलंग-ला में ज्यादा अन्तर नहीं है लेकिन खारदुंग-ला की ऊंचाई में दोनों में लगभग 250 मीटर का अन्तर है जो बहुत ज्यादा है।
निःसन्देह गूगल मैप की परिशुद्धता शानदार है। लेकिन इसकी कमी है कि यह 20-20 मीटर के अन्तर पर ऊंचाईयां बताता है। अब इससे भी आगे बढकर जीपीएस यन्त्र आ गये हैं। प्रत्येक एण्ड्रॉयड और आधुनिक मोबाइल फोनों में जीपीएस होता है। खुले आसमान के नीचे ये बिल्कुल सटीक ऊंचाई बताते हैं। लेकिन मोबाइल फोन मुख्यः बातचीत करने के लिये होते हैं। इनका जीपीएस उतना अच्छा नहीं माना जाता। सबसे अच्छे जीपीएस यन्त्र 6000-7000 रुपये से शुरू होते हैं जिनका काम ही जीपीएस-गिरी करना है। ये सब जिस स्थान का भी डाटा लेते है, वो एकदम सटीक होता है। यन्त्र जितने ज्यादा सैटेलाइटों से सम्पर्क कर सकता है और जितनी सूक्ष्म गणनाएं कर सकता है, वो उतनी ही सटीक जानकारी हमें देगा। यहां क्लिक करके आप दुनिया की 12 सबसे ऊंची मोटर योग्य सडकों के बारे में जान सकते हैं। यहां एक बडी ही विचित्र लगने वाली बात लिखी है कि चांग-ला (5360) खारदुंगला (5359) से एक मीटर ऊंचा है।
पिछले दिनों मैंने इस बात की जानकारी फेसबुक पर डाली तो कुछ मित्र विरोध में आ गये थे। उन्होंने बीआरओ द्वारा लगाये बोर्ड के फोटो दिखाये जिनमें खारदुंगला 5602 मीटर लिखा हुआ था। अब जमाना जीपीएस का है, आपके पास भी जीपीएस है। आप अगली बार खारदुंगला जायेंगे तो स्वयं देखना कि इसकी कितनी ऊंचाई है। हम तो खैर खारदुंगला नहीं जा पाये, अन्यथा अपने जीपीएस से इसकी ऊंचाई दिखा देते। उधर बीआरओ को भी चाहिये कि दुनिया की सबसे ऊंची मोटर सडक बनाने की शाबाशी बटोरने के लिये गलत तथ्य पेश न करें। आधुनिक बनो और यथाशीघ्र खारदुंगला की वास्तविक ऊंचाई लिखो और ‘दुनिया की सबसे ऊंची सडक’ का लेबल भी हटाओ।
केवल भारत में ही खारदुंगला से ऊंची सडकें हैं जिनमें तीन तो लद्दाख में ही हैं- मारसिमिक ला, फोटी-ला और काकसांग ला। उत्तराखण्ड में माणा पास तक सडक बन गई है जो वर्तमान में भारत की सबसे ऊंची मोटर सडक है। कमाल की बात ये है कि ये सभी सडकें भी बीआरओ द्वारा ही बनाई गई हैं। खुद बीआरओ ने माणा गांव में एक बोर्ड लगा रखा है कि यह सडक माणा पास जाती है, जिसकी ऊंचाई 18399 फीट है यानी बीआरओ के खारदुंगला (18380) से भी ज्यादा। इसलिये खारदुंगला से ‘वर्ल्ड्स हाईएस्ट मोटरेबल रोड’ का ठप्पा हट जाना चाहिये।

लेह में नाश्ता

खारदुंगला की ओर... खराब मौसम


खारदुंगला रोड से दिखता शान्ति स्तूप


खारदुंगला रोड


साउथ पुल्लू पर

खारदुंगला पर बर्फबारी के चलते साउथ पुल्लू पर ट्रैफिक रोका हुआ था।



साउथ पुल्लू से आगे




यहां से सभी वापस मुड लिये।


सामने ऊपर खारदुंगला है।


निशा को बर्फ में खेलने से मना करना असम्भव था। यहां से जल्दी वापस चलने के लिये लालच दिया कि आगे बारालाचाला पर इससे भी ज्यादा बर्फ मिलेगी लेकिन बेचारी को तो यह भी नहीं पता था कि बारालाचाला कितनी दूर है और कब हम वहां पहुंचेंगे।

साउथ पुल्लू पर रुका हुआ ट्रैफिक





वापस लेह की ओर








खारदुंगला रोड का एक और फोटो। कठोर बर्फ के कारण यह बाइक गिर गई।

नीचे की वीडियो में बर्फीली सडक पर कुछ बाइक वाले जाते दिखाये हैं।


इसमें निशा एक बाइक को धक्का लगा रही है, बाइक बर्फ के कारण आगे नहीं बढ रही थी। एक दूसरा बाइक वाला गिर पडा।



ठोस बर्फ में जब बाइक पर बैठकर नहीं चलाई गई तो नीचे भी उतरना पडा।



तेज बर्फबारी में सभी ने वापस मुडने का फैसला किया।


निशा स्नोमैन बनाती हुई।


एक छोटा सा लेक्चर।





अगले भाग में जारी...

(प्रार्थना: कृपया ‘बहुत ही ज्ञानवर्द्धक’, ‘रोमांचक’ जैसी औपचारिक टिप्पणी न करें। आपकी कोई जिज्ञासा हो, कुछ और जानकारी बांटना चाहते हो या अपना कोई अनुभव हो, उसे ही टिप्पणी के रूप में लिखिये। धन्यवाद।)



1. लद्दाख बाइक यात्रा-1 (तैयारी)
2. लद्दाख बाइक यात्रा-2 (दिल्ली से जम्मू)
3. लद्दाख बाइक यात्रा-3 (जम्मू से बटोट)
4. लद्दाख बाइक यात्रा-4 (बटोट-डोडा-किश्तवाड-पारना)
5. लद्दाख बाइक यात्रा-5 (पारना-सिंथन टॉप-श्रीनगर)
6. लद्दाख बाइक यात्रा-6 (श्रीनगर-सोनमर्ग-जोजीला-द्रास)
7. लद्दाख बाइक यात्रा-7 (द्रास-कारगिल-बटालिक)
8. लद्दाख बाइक यात्रा-8 (बटालिक-खालसी)
9. लद्दाख बाइक यात्रा-9 (खालसी-हनुपट्टा-शिरशिरला)
10. लद्दाख बाइक यात्रा-10 (शिरशिरला-खालसी)
11. लद्दाख बाइक यात्रा-11 (खालसी-लेह)
12. लद्दाख बाइक यात्रा-12 (लेह-खारदुंगला)
13. लद्दाख बाइक यात्रा-13 (लेह-चांगला)
14. लद्दाख बाइक यात्रा-14 (चांगला-पेंगोंग)
15. लद्दाख बाइक यात्रा-15 (पेंगोंग झील- लुकुंग से मेरक)
16. लद्दाख बाइक यात्रा-16 (मेरक-चुशुल-सागा ला-लोमा)
17. लद्दाख बाइक यात्रा-17 (लोमा-हनले-लोमा-माहे)
18. लद्दाख बाइक यात्रा-18 (माहे-शो मोरीरी-शो कार)
19. लद्दाख बाइक यात्रा-19 (शो कार-डेबरिंग-पांग-सरचू-भरतपुर)
20. लद्दाख बाइक यात्रा-20 (भरतपुर-केलांग)
21. लद्दाख बाइक यात्रा-21 (केलांग-मनाली-ऊना-दिल्ली)
22. लद्दाख बाइक यात्रा का कुल खर्च

29 comments:

  1. साऊथ पुल्लू के आगे इतनी बर्फ है तो नोर्थ पुल्लू पर कितनी होगी??
    सही कहा आपने गाड़ीयो के टायर से दब दब कर बर्फ एक फिसलन भरा फर्श का रूप ले लेता है जिसपर चलना बहुत जोखिम भरा,होता है।

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    1. धन्यवाद सचिन भाई...

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  2. नीरज जी, वाकई खर्दुंगला की ऊँचाई पर बाईक पैदल चलाना या उसे पीछे से धकेलना. . . आप बदलते हिमालयीन मौसम पर एक अलग से पोस्ट लिखिए, यह मेरी विनती है| हम जिस हिमालय से परिचित है; वह जल्द ही नष्ट होता या सिकुड़ता जा रहा है| चाहे वह भूकम्प हो; चाहे बादल फटना हो; बाढ हो; वेस्टर्न डिस्टर्बन्स या क्लाएमेट चेंज हो| एक बार जब समय हो तो इस विषय के उपर अपने विचार जरूर रखिए|

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    1. बदलते हिमालयी मौसम पर अलग से एक पोस्ट... यानी शोध... मुश्किल है... बडा मुश्किल है मेरे लिये... फिर भी कोशिश करूंगा।

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    2. Niranjanji
      Himalaya ka janm bhartiya aur eurashian tectonic plates ke takrav ki vajah se hua tha aaj se 6.5 crore saal pehle..aur vo kaise hua tha ye janiye...13.5 crore saal pehle bharat ka aadha nichla hissa Africa se alag hua tha Australia ke saath iske 1.5 CR saal baad Australia kuch forces ki vajah se alag ho gaya aur ye hissa 6.5 cr saal ye anagaraland se takraya aur us pehle takrav me trans him.(LADAKH,KAILASH,ZANSKAR) Ka janm hua
      USKE 70 lack saal baad fir takrav hua usse great him(KASHMIR,KARGIL,MT EVEREST etc)
      ka janm hua
      Aise hi 2.4 CR. Saal baad fir takrav hua usse middle Himalayas (manali,rohtang,badrinath,kedarnath etc)
      Fir uske 1 CR saal baad Jo takrav hua usse shiwalik him. Ka janm hua..
      Poori dharti me 14 tectonic plates hain...
      Hamare bharat. Ke niche sabse strong plate hai..isme har samay 1000's earthquake aate hain..har saal India 3 mm eurashian ki taraf khisak raha hai..
      Ye to hui bhukamp ki baat..
      Ab aate hain mausam pe..
      Himalayas northern hemisphere me aate hain..
      North. Hemi. Me mausami parivarthan southern hem. Se kahi zyada hote hain..
      Poori dharti 7 zones me bati hui hai..
      Pehla equator
      2)0*-30* latitude me tropical zone aata hai
      3)30*-75* latitude me temperate zone aata hai
      4)75*-90* lat. Me polar zone hai..
      Jaise suraj shift hota hai [BETWEEN TROPICS] vaise hi ye belt bhi shift hoti hain..
      Fir hawaon pe aate hain 3 tarah ki hawa hoti hain..northeasterlies,,Jo ki tropical area me active rehti hain ..westerlies Jo ki temperate zone me active rehti hain aur last polar easterlies Jo poles me active rehti hain..
      Belt ki shifting hone par in hawao ka active area bhi change ho jata hai


      garmi me ye belt upar ki or shift hoti hai...pehle Jo area westerlies me asar me tha wahan par northeasterlies hawa behti hai aur continents ke eastern coast par baarish ka karan banti hai..monsoon isi vajah se aata hai..
      Aise hi sardiyon me hota hai belt niche ki taraf shift hoti hain.. Jo area pehle NE winds ke asar ne tha vo ab westerlies ke under aa jata hai..
      Aur isi vajah se sardiyon me baarish hoti hai.

      Jaise monsoon ka karan El nino aur la Nina hota hai..aise hi sardiyon me thand ka zyada hona ya na hona western disturbance ke karan hota hai..
      Western disturbance ka Matlab hai ki Mediterranean (bhumadhya sagar) me hone wale badlav...agar ye sagar zyada garm tehta hai to thand kam rehti aur low pressure ka system ban jata hai jisse baarish hoti hai..but par bahut kam..
      Agar thanda hota hai to thandi hawaen bharat aur pakistan ke western side se andar aati hain..
      Isi vajah se Himalayas me bahut thand rehti hai..
      Pahado me baarish us taraf hoti hai Jo samudri aur baaki hawaon ki taraf hai..
      Usko windward side note hain aur Jo diosri side hai vo leeward side kehlati hai ..use rain shadow area bhi bolte hain..
      Isi vajah se ladakh me baarish bahut kam hoti hai..
      Baadal fatna ka sabse bada karan hai global warming...baarish evaporation ki vajah se hoti hai..jitni zyada garmi hogi utni zyada baarish hogi..
      Baadal jab dusre baadal se takrata hai use badal fatna kehte hain..
      Monsoon me Himalayas me badal fatna aam hota hai..
      Dusra karan hai dams..uttarakhand me Jo tehri dam hai vo badal fatne MA karan bante hain..
      Kyuki ek jagah paani bahut saara hota hai..aur evaporation bhi bahut zyada hota hai..badal janti bante hain..aur musladhar baarish hoti hai...
      Aur bhai Jo hamara Himalaya sikudtaja raha hai vo plates ki vajah se hi hai..kyuki Asian plate eurashian plate ki niche dab rahi hain.
      .

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  3. नीरज मेरे तो लेख पढ़कर फोटो देखकर और वीडियो देखकर ही रोंगटे खड़े हो गये और एक तुम्हारी बीवी है वो बर्फबारी में भी पुतले बना रही है सच में बोहोत हिम्मत है तुम दोनों की

    शानदार

    keep walking

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    1. धन्यवाद सैनी साहब...

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  4. नीरज भाई जीपीएस से कैसे ऊँचाई मापी जाती है जो फ़ोन का जीपीएस होता है और जीपीएस के क्या क्या फायदे है भाई साहब जरा विस्तार से बताना

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    1. उमेश जी, जीपीएस के बारे में जानकारी पिछली डायरी में दी गई थी। आप यहां क्लिक करके इसे पढ सकते हैं। फिर भी कोई जिज्ञासा हो तो बताना।

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  5. अभी ही पिछले डायरी के पन्ने में भाई ने मोबाइल जीपीएस की जानकारी दी है उमेश जी।
    आप वहां भी देख सकते हैं।

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  6. अभी ही पिछले डायरी के पन्ने में भाई ने मोबाइल जीपीएस की जानकारी दी है उमेश जी।
    आप वहां भी देख सकते हैं।

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  7. किसी भी दर्रे के दक्षिण में बर्फ कम होती है, उत्तर में ज्यादा होती है..... इसका क्या लॉजिक है?नीरज

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    1. सर जी, किसी भी दर्रे के दक्षिण में उत्तर के मुकाबले धूप ज्यादा पडती है। सूरज पूर्व से निकलकर दक्षिण होता हुआ पश्चिम दिशा में जाता है, इसलिये उत्तर में उतनी धूप नहीं मिल पाती। जहां ज्यादा समय तक धूप होगी, वहां बर्फ उतनी ही कम होगी।

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  8. बर्फ़बारी वाला विडीयो बहूत ही शानदार बन पड़ा है।
    प्राय: सभी मोबाइल में जीपीएस के नाम पर गुगल मैप एप्प होता है। उसमें क्या ऊँचाई व अक्षांश देशांतर मापने का ऑप्शन होता है?

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    1. सर जी, गूगल मैप एक एप्लीकेशन है जबकि जीपीएस एक हार्डवेयर। जीपीएस की सहायता से गूगल मैप आपको आपकी सटीक लोकेशन बताता है। गूगल मैप के अलावा सैंकडों एप्लीकेशन प्ले स्टोर पर और भी मिल जायेंगे आपके मनचाहे। जहां नेटवर्क न आ रहा हो, वहां गूगल मैप नहीं चलेगा। उसके लिये आपको कोई और एप्लीकेशन डाउनलोड करना पडेगा। वैसे गूगल मैप अक्षांश, देशान्तर बता देता है और टैरेन मोड में आप उस स्थान की ऊंचाई भी देख सकते हैं।

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  9. वाह नीरज भाई बचपन में तो आप काफी स्मार्ट लगते थे. सन्दर्भ ऊपर से ३३ वाँ फोटो . आप ऐसे जगह वाटर मार्क लगाते हो की टिप्पड़ी अपने आप आ जाती है.

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    1. हा हा हा,... सही है।

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  10. '…… .निशा ने कहा कि हम इस रास्ते नहीं लौटेंगे, किसी दूसरे रास्ते से लौटेंगे लेकिन बेचारी को नहीं पता था कि इधर जाने का भी यही एक रास्ता है......'
    '…… . आगे बारालाचाला पर इससे भी ज्यादा बर्फ मिलेगी लेकिन बेचारी को तो यह भी नहीं पता था कि बारालाचाला कितनी दूर है और कब हम वहां पहुंचेंगे।....'
    नीरज जी , ये बार बार 'बेचारगी' क्यों ? निशा जी को जब मालूम चलेगा कि कइ बार मुझे 'बरगलाया' जा रहा है, तो कभी साथ नहीं जाएगी

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    1. सर जी, उसे बरगलाया नहीं था। वाकई बारालाचाला पर सबसे ज्यादा बर्फ थी।

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  11. नीरज , 'लेह' में देखने लायक और कौन-कौनसी जगह है ... हम सिर्फ शांती स्तुप ही देख सके थे (July 2014) ...

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    1. सर जी, ये तो मुझसे अच्छा नेट बता सकता है। वैसे एक तो महल है जो डीसी ऑफिस से थोडा आगे है, उसके पास जरा सा ऊपर एक गोम्पा भी है। शहर में शायद और भी होगा कुछ देखने लायक। शहर से बाहर निकलें तो मनाली रोड पर सिंधु घाट है, शे गोम्पा है, ठिक्से गोम्पा है, हेमिस है। श्रीनगर रोड की तरफ स्पिटुक गोम्पा, पत्थर साहिब गुरुद्वारा, मैग्नेटिक हिल, सिंधु-जांस्कर संगम, लिकिर गोम्पा, अलची गोम्पा हैं। और खारदुंगला तो है ही।

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  12. नी र ज , तुम्हारी 'घुमक्कडी दिल से ' whatsapp group का मोबाईल नंबर मिल सकता है .. क्या ?
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    ..... और एक बात तुम्हारी आगे की घुमक्कडी के लिए ज्यादा नही लेकीन थोडा बहुत खर्चा करना चाहता हू... बुरा मत मानना . Bank A/c No. de do ....SBI ka हो तो अच्छा होगा .... लेह का खर्चा न उठाने का मलाल रहेगा ...

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    1. सर जी, इसके लिये एडमिन साहब से बात करनी पडेगी। वैसे उस ग्रुप में हम सब ‘लाइक माइण्डेड’ हैं। ज्यादातर ब्लॉगर हैं जो आपस में मिले भी हैं और काफी समय से जान-पहचान है। कभी तकनीकी बातें होती हैं तो कभी लडते-झगडते भी हैं।
      एसबीआई का एकाउण्ट... मेरा नहीं है, निशा का है... कहो तो दे दूं? मेरा खाता यूनियन बैंक में है।

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    2. यूनियन बैंक ka ho to bhi chlega... baki tum thik samzo .......... एसबीआई का एकाउण्ट esliye mang raha tha ... एसबीआई mere college ke samane hai ....

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  13. मालिक .... खारदुंग ला वाली बात से ही महाराष्ट्र की सबसे ऊंची चोटी का मुकाम भी साल्हेर या कल्सुबाई में से किसे दिया जाए... ये भी विनिश्चित होना चाहिए ... और ये काम आप जैसा कोई भूगोल प्रेमी ही कर सकता है .... ट्रेक करने वाले अक्सर बिना डेटा के ही घूम कर आ जाते हैं ..... गूगल अर्थ तो आज भी साल्हेर को ही सबसे ऊंचा बता रहा है ....

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    1. निश्चित ही कल्सूबाई के मुकाबले साल्हेर ऊंचा है। बाकी किसी दिन वहां जाकर वहां का जीपीएस डाटा ले आयेंगे।

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  14. आज के वीडियो तो जानदार है

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  15. Neeraj Bhai Maine aapke bahut blog pade hain aur mai bhi aapki tarah ghumakkad hun..bas Abhi unemployed hun to ja nahi pata..apke blog padkar aisa lagta hai ki mai khud yatra kar raha hun..
    baralacha la himachal me hai ya ladakh me?

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    1. अभी बेरोजगार हैं इसलिए कही जा नहीं पाते... जो लोग रोजगार वाले हैं, उनसे पूछो, वे कहेंगे कि नौकरी की वजह से नहीं जा पाते.
      बारालाचाला हिमाचल में है. सरचू के बाद लद्दाख शुरू होता है.

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