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Friday, July 24, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा-8 (बटालिक-खालसी)

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12 जून 2015
सिन्धु यहां बहुत गहरी घाटी में बहती है। पहाड बिल्कुल सीधे खडे हैं। ऐसे इलाके दुर्गम होते हैं। लेकिन इसके बावजूद भी यहां कुछ बसावट है, कुछ गांव हैं। इनमें जो लोग निवास करते हैं, वे स्वयं को शुद्ध आर्य बताते हैं। इसीलिये धा और हनुथांग व अन्य गांव प्रसिद्ध हैं। वैसे तो हिमाचल के मलाणा निवासी भी स्वयं को आर्य कहते हैं लेकिन उनमें बहुत सी गन्दगी पनप गई है। यहां वो गन्दगी नहीं है। मेरी इच्छा इसी तरह के किसी गांव में रुकने की थी। लद्दाख के ज्यादातर गांवों में होम-स्टे की सुविधा मिलती है, रुकने की ज्यादा समस्या नहीं आती।
लेकिन हम चलते रहे। शाम का समय था और सूरज की किरणें अब नीचे नहीं आ रही थीं। अन्धेरा होने से पहले ही रुक जाना ठीक था। लेकिन धा गांव कब निकल गया, पता ही नहीं चला। एक निर्जन पुल के पास साइनबोर्ड अवश्य लगा था जिस पर मोटे मोटे अक्षरों में अंग्रेजी में लिखा था- धा। हो सकता है कि गांव सडक से कुछ ऊपर हो। हम इसे छोडकर आगे बढ गये। धा के बाद एक गांव और मिला। यहां एक होम-स्टे का बोर्ड भी लगा था लेकिन हम इसे भी छोडकर आगे चल दिये।
छह बज चुके थे। सिन्धु पर एक पुल मिला। उधर एक गांव था। नाम था संजक। पुल के इस तरफ गेस्ट हाउस का भी सूचना-पट्ट लगा था। हम गेस्ट हाउस के लालच में पुल पार कर गये। गेस्ट हाउस बन्द मिला और इसका मालिक कहीं बाहर गया था। भूख जोर की लगी थी, सुबह द्रास वार मेमोरियल में ही थोडी सी चाऊमीन खाई थी। यहां से यह रास्ता सीधा बोध खारबू जाता है और श्रीनगर-लेह मुख्य मार्ग में मिल जाता है। बोध खारबू नामिक-ला और फोतू-ला के बीच में है। यहां सिन्धु में एक नदी भी आकर मिलती है जो नामिक-ला और फोतू-ला तक का पानी एकत्र करके लाती है।
संजक कारगिल जिले में है। सिन्धु नदी यहां कारगिल और लेह जिलों की सीमा बनाती है। कारगिल जिले में है तो समझना चाहिये कि मुस्लिम गांव है। उधर सिन्धु पार लेह जिले के गांव बौद्ध हैं। यहां चाय-बिस्कुट खाये। कुछ देर गेस्ट हाउस के मालिक की प्रतीक्षा की। उसके न आने पर हमने पुनः सिन्धु पार की और खालसी का लक्ष्य बनाकर चल दिये। खालसी यहां से 55 किलोमीटर है।
सिन्धु अभी तक तो बहुत ही तंग घाटी से होकर बह रही थी। अब धीरे धीरे घाटी चौडी होने लगी। खालसी में तो यह खूब चौडी हो जाती है। उससे आगे लेह में तो आपने देखी ही होगी- बिल्कुल मैदान से होकर बहती है। पहाड बहुत दूर हैं इसके किनारों से। फिर तो आगे चीन सीमा तक सिन्धु चौडी ही रहती है। अब शाम हो चुकी थी। पीछे मुडकर देखने पर सिन्धु अच्छी लग रही थी। अरे हां, सिन्धु तो नद है, नदी नहीं। इसलिये कहना चाहिये कि सिन्धु अच्छा लग रहा था। भारत में तीन नद हैं- सिन्धु, ब्रह्मपुत्र और सोन। बाकी सभी नदियां हैं।
रास्ते में हनुथांग मिला, स्क्रबुचान मिला, दोमखार मिला और भी कई छोटे-छोटे गांव मिले। जहां भी गांव होते, वहीं हरियाली भी होती अन्यथा बिल्कुल बंजर और आभा-रहित पहाड। साढे सात के बाद तेजी से अन्धेरा हो गया। सवा आठ बजे जब पहली बार सामने दूर वाहनों की लाइटें दिखीं तो राहत की सांस ली। फिर तो खालसी पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगा।
खालसी में प्रवेश करते ही ‘गेस्ट हाउस’ से स्वागत होता है। मालकिन ने एक कमरे का किराया बताया 600 रुपये जो बडी आसानी से 500 का मिल गया। कमरा सडक से थोडा सा नीचे उतरकर था, इसलिये बाइक सडक पर खडी करनी पडी और सारा सामान खोलना पडा। हम सामान खोल ही रहे थे कि दिल्ली के कुछ बाइकर्स और आये। उन्हें दो कमरे लेने थे। 600-600 के लिये। मालकिन हमसे चुपके से कह गई- अगर ये लोग कमरे का किराया पूछें तो 600 ही बताना, मैंने इन्हें 600 का दिया है। हां, एक बात और, 500 में ही हमने सुबह दो बाल्टी गर्म पानी की बात भी कर ली थी, अन्यथा बुढिया दो बाल्टी गर्म पानी के 100 रुपये मांग रही थी। इन्होंने ये कमरे नये बनाये हैं, अभी तक इनमें गीजर नहीं लगे हैं।
खालसी में भला खाने-पीने की क्या तंगी? हम सुबह के भूखे थे। जमकर अण्डा कढी, आलू मटर और रोटियां खाईं।
अब आगे की योजना बनाने लगे। आज शुक्रवार था, कल शनिवार है और परसों रविवार है। खालसी और लामायुरू के बीच में से एक रास्ता फोतोकसर गोम्पा के लिये जाता है। हमारी योजना वहां जाने की थी। वहां का कोई भी बाइक या गाडी वृत्तान्त मुझे अभी तक नहीं मिला है। ट्रेकिंग कथाएं तो बहुत हैं। उधर नई-नई सडक बनी है, गूगल मैप के सैटेलाइट व्यू में भी यह सडक दिखती है। हालांकि फोतोकसर गोम्पा जाकर वापस इसी रास्ते से आना पडेगा लेकिन नई जगह पर जाने की बडी इच्छा हो रही थी। रास्ते में एक दर्रा भी पडेगा जिसका नाम है शिरशिर-ला। फोतोकसर से आगे एक दर्रे तक भी यह सडक पहुंच गई है। अगर मौका मिल गया तो उस दर्रे पर भी जायेंगे। कल शाम तक फोतोकसर देखकर लेह चले जायेंगे।
अब यही एक समस्या हो गई। कल है शनिवार। कल शाम तक लेह पहुंचेंगे। परसों रविवार को कोई परमिट नहीं मिलेगा। हमें चुशुल और हनले का परमिट चाहिये। हम खारदुंग-ला पार करके नुब्रा घाटी में जायेंगे, फिर लेह वापस नहीं लौटेंगे। नुब्रा घाटी से सीधे पेंगोंग झील जाने के दो रास्ते हैं- एक वारी-ला होते हुए और दूसरा श्योक होते हुए। हमारी प्राथमिकता वारी-ला के रास्ते पेंगोंग जाने की रहेगी, किसी भी सूरत में वापस लेह नहीं लौटेंगे। फिर पेंगोंग से सीधे चुशुल चले जायेंगे और वहां से लोमा होते हुए हनले। चुशुल और हनले का परमिट लेना होता है जो रविवार को नहीं मिलेगा। इस तरह हमारा एक दिन खराब होगा। इस पर खूब माथापच्ची कर ली लेकिन कोई समाधान नहीं मिला।
एक बार तो सोचा कि फोतोकसर छोड देते हैं। कल लेह जाकर परमिट ही बनवा लेंगे। लेकिन फोतोकसर का भी आकर्षण था। ऐसा नहीं है कि मुझे गोम्पा का लालच था। मुझे बस रास्ता देखना था और शिरशिर-ला पर चढना था। फिर फाइनल हुआ कि कल फोतोकसर जाकर वापस आ जायेंगे और लेह रुकेंगे। परसों यानी रविवार को खारदुंग-ला पार करके पनामिक में रुकेंगे। सोमवार को तुरतुक जायेंगे और वापस आकर हुण्डर या दिस्कित में रुकेंगे। मंगलवार को वारी-ला पार करके कारू आयेंगे और बाइक की टंकी फुल करायेंगे। इसी मंगलवार को कारू से लेह आकर चुशुल-हनले का परमिट बनवा लेंगे और पुनः कारू से आगे कहीं निकल जायेंगे। यह योजना बनी और आखिरकार तय हो गया कि कल हम फोतोकसर जा रहे हैं।
लेकिन लेटे-लेटे जितना मैं सोचता गया, उतना ही उलझता गया। आज सुबह द्रास में मौसम कुछ ठीक था, उसके बाद खराब ही रहा। शाम को तो कुछ बूंदें भी पडी थीं। लद्दाख में दोपहर बाद तूफानी हवाएं चलती हैं और मौसम खराब हो जाता है लेकिन बूंदें नहीं पडतीं। अगर बूंदें गिर रही हैं तो समझना चाहिये कि कुछ गडबड है। चौडी सिन्धु घाटी हवाओं की दिशा तय करती है। अगर सिन्धु घाटी में बूंदें गिर रही हैं तो समझिये कि ऊपर खारदुंग-ला पर कुछ भी ठीक नहीं होगा। फिर खारदुंग-ला, वारी-ला और चांग-ला सगे भाई हैं- तीनों दर्रे एक ही पहाड की रीढ पर बने हैं और लगभग बराबर ऊंचाई के हैं। मौसम के लक्षण अच्छे नहीं लग रहे हैं। अगर हम परसों रविवार को खारदुंग-ला पार करें और तब तक मौसम इतना खराब हो जाये कि वारी-ला बन्द हो जाये तो...?
या वारी-ला अभी तक न खुला हो तो...? वारी-ला प्राथमिकता में नहीं है। खारदुंग-ला और चांग-ला से फुरसत मिलती है, तब वारी-ला खोलते हैं। उस अवस्था में नुब्रा घाटी से या तो पुनः खारदुंग-ला पार करके लेह आना पडेगा या फिर श्योक होते हुए पेंगोंग जाना पडेगा। परमिट की गडबड हो जायेगी।
आखिरकार बिना कोई निर्णय लिये सो गया।

बटालिक के पास एक झरना




पूरा रास्ता सिन्धु के साथ साथ है।









यह है संजक

संजक पुल- उस तरफ कारगिल जिला है, इधर लेह जिला है।







सामने चट्टान की आकृति देखिये। सब भूगर्भीय हलचलों का परिणाम है।

खालसी में डिनर








अगले भाग में जारी...

(प्रार्थना: कृपया ‘बहुत ही ज्ञानवर्द्धक’, ‘रोमांचक’ जैसी औपचारिक टिप्पणी न करें। आपकी कोई जिज्ञासा हो, कुछ और जानकारी बांटना चाहते हो या अपना कोई अनुभव हो, उसे ही टिप्पणी के रूप में लिखिये। धन्यवाद।)


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20. लद्दाख बाइक यात्रा-20 (भरतपुर-केलांग)
21. लद्दाख बाइक यात्रा-21 (केलांग-मनाली-ऊना-दिल्ली)
22. लद्दाख बाइक यात्रा का कुल खर्च

34 comments:

  1. वाह...मज़ा आ गया नीरज जी ! शुरू से पढ़ा है ये सीरिज !

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    1. धन्यवाद अभिषेक जी...

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  2. I only watch photos and find them very beautiful. Thanks for sharing.

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    1. धन्यवाद तुषार जी... फोटो देखिये या लेख पढिये... सब आपके सामने है।

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  3. नीरज भाई आपकी यात्रा वृत्तान्त के साथ साथ आपकी फोटोग्राफी की भी तारीफ करनी पड़ेगी आपकी यात्रा यूँ ही चलती रहे

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    1. धन्यवाद उमेश जी...

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  4. बहुत सुन्दर ...
    आपको जन्मदिन की बहुत बहुत हार्दिक मंगलकामनाएं!

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    1. धन्यवाद कविता जी...

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  5. भाई साहब ऊपर से ग्यारहवें फोटो से अपना नाम डिलीट कीजिये या वह फोटो डिलीट कीजिये. उचित नहीं लगता.

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    1. आपने तो मुझे डरा ही दिया था कि क्या पता फोटो आपत्तिजनक हो। देखा तो बडी हंसी आई। वो एक गधे का फोटो है जिसे नीरज जाट ने खींचा है। फोटोग्राफर का नाम नीरज जाट है, न कि गधे का। अच्छा लगा आपका यह कमेण्ट।

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  6. Red Aryans ka kya matlab hai Neeraj ji.Pahli baar padha hai

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    1. जैसा कि मैंने ऊपर भी लिखा है कि ये लोग स्वयं को शुद्ध आर्य मानते हैं यानी इनकी सभ्यता, संस्कृति और रक्त में किसी बाहरी जाति का मिश्रण नहीं हुआ है। इनकी त्वचा का रंग लालिमा लिये होता है, इसलिये रेड आर्यन्स हुए।

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  7. कारगिल व लेह जिले की भौगोलिक जानकारियाँ से लेश व यहाँ के मौसम के बारे पूर्वानुमान लगाने के तरिके से आपका यह वृतांत, विशेष कर घुम्मकड़ो के लिये मार्गदर्शक का कार्य करेगा।
    मैंने भी इस दिन रात्रि विश्राम खालसी में ही किया था। पुनर्मिलन का अवसर एक बार फिर पास होकर दूर ही रहा।

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    1. ओहो... खालसी ज्यादा बडा तो नहीं है। इने-गिने गेस्ट हाउस ही वहां हैं, फिर भी नहीं मिल सके। कमाल हो गया।

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  8. नीरज जी,
    1. ये आर्य क्या हिन्दू ही हैं… क्या किसी गांव वासी से उनकी संस्कृति, रहन सहन आदि के बारे में आपको जानकारी मिली?
    2. क्या पूरे लद्दाख, कारगिल के स्कूलों में हिन्दी की भी पढाइ होती है
    3. पूर्ण शाकाहारी (अण्डा रहित) यात्री के लिए परेशानी आती होगी?

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    1. 1. ये आर्य हिन्दू नहीं हैं। इनमें से कुछ मुसलमान हैं और कुछ बौद्ध। हम यहां किसी गांव में नहीं रुके, इसलिये कोई विशेष जानकारी नहीं मिली। लेकिन इनका रहन-सहन पूरी तरह लद्दाखी ही है। बस केवल अपने को आर्य मानते हैं ये लोग। पुरातन कहानियां प्रचलित हैं कि सैंकडों हजारों साल पहले इनके पूर्वज यहां आये थे।
      2. हां जी, हिन्दी की पढाई होती है लेकिन वैकल्पिक विषय के तौर पर। मूल पढाई अंग्रेजी में होती है। मुस्लिम बहुल राज्य होने के कारण ज्यादातर विद्यार्थी उर्दू पढते हैं।
      3. वैसे तो पूर्ण शाकाहारी यात्री के लिये कोई परेशानी नहीं है लेकिन एक ही बर्तन में शाक भी और मांस भी दोनों पकाये जाते हैं। कभी-कभी तो आपके सामने ही पहले मांस पकाया जायेगा और बाद में उसे धोकर आपके लिये शाक बना दिया जायेगा। शाक और मांस पकाने के लिये अलग-अलग बर्तन नहीं होते। इसके अलावा कोई परेशानी नहीं है।

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  9. यार एक बात बताओ की कोठारी साहब कहां है?
    वो आपको लेह मे मिले या लद्दाख मे?
    ओर तुमसे अलग होकर वो क्या क्या देखते आए?
    वैसे इन प्रशनो का जवाब कोठारी साहब भी दे सकते है।

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    1. सचिन भाई, लद्दाख तो जोजी-ला से ही शुरू हो गया था और हिमाचल में प्रवेश करने तक हम लद्दाख में ही रहे। लद्दाख नाम का न कोई गांव है, न ही शहर। लद्दाख एक बहुत बडे क्षेत्र का नाम है। इसमें कारगिल और लेह जैसे शहर हैं तो कुछ गांव-कस्बे भी। ‘वो आपको लेह में मिले या लद्दाख में’ ऐसा कहना बिल्कुल गलत है।
      कोठारी साहब हमें आज तक नहीं मिले। वैसे जैसा कि उन्होंने ऊपर टिप्पणी भी की है कि वे भी आज खालसी में ही थे। उम्मीद है कि वे आगे भी इसी तरह बताते रहेंगे कि वे कब कहां थे।

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    2. नीरज जी बिल्कुल ठीक कहा आपने ओर हां अब कोठारी साहब के कमेंटस भी पढने पढेगे क्योकीं उनकी यात्रा भी तो आपके संग संग चल रही है ना।

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    3. मैंने भी फेसबुक पर इस यात्रा का वृतांत जितना जान समझ पाया था, उतना लिखने का प्रयास यात्रा के दौरान ही किया था। चाहो तो सचिन आप मेरी वाल पर जाकर पढ़ सकते हो।
      ज़ाहिर है मेरे इन वृत्तांतों के लिखने के बाद अपनी फेसबुक मित्रता हुई थी।

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  10. सिन्धु तो नद है, नदी नहीं। इसलिये कहना चाहिये कि सिन्धु अच्छा लग रहा था। भारत में तीन नद हैं- सिन्धु, ब्रह्मपुत्र और सोन। बाकी सभी नदियां हैं।
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    यह word सिर्फ geography का प्रोफेसर बोल सकता है.. या जाना माना जानकार !.. .............. तो नीरज तुम्हारी इस बारे मैं बहुत study हो चुकी है ...

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    1. हा हा हा... तो मैं जियोलोजी का प्रोफेसर हो गया। कहां हैं कन्धे, थपथपा लूं।
      धन्यवाद सर।

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  11. Neeraj bhai ye bataiye laddakh yatra roadways buses ke dwara sambhav hai ya nahi hai to kis prakar?

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    1. दिल्ली से लेह के लिये हिमाचल परिवहन की एक बस शाम को चलती है जो तीसरे दिन शाम को लेह पहुंचती है। इसके अलावा श्रीनगर से जे एण्ड के रोडवेज की बसें भी सुबह लेह के लिये प्रस्थान करती हैं।

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  12. एक बार फिर बहुत ही सुंदर वर्णन । आपके यात्रा वर्णन से बहुत महत्‍वपूर्ण जानकारियां मिली जैसे कि रेड आर्यन्स के बारे में और भारत में तीन नद हैं- सिन्धु, ब्रह्मपुत्र और सोन। वैसे ये बताईये कि नद और नदी में क्‍या अंतर होता है।

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    1. धन्यवाद स्वाति जी... नद और नदी में कोई अन्तर नहीं है। नदी को अक्सर स्त्रीलिंग माना जाता है जैसे कि गंगा, यमुना, कावेरी, नर्मदा आदि। लेकिन ब्रह्मपुत्र, सोन और सिन्धु को पुल्लिंग माना जाता है।

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  13. नमस्कार, नीरज जी मैं आपका ब्लॉग रेग्युलर पढ़ता रहेता हूँ कितनी बार तो काए स्टोरी रिपीट पढ़ता हूँ आपकी स्टोरी से इनस्पाइर हो के मैं 2016 मैं श्रीखंड महादेव की प्लानिंग कर रहा हूँ कीप राइटिंग सर :)

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    1. 2016 में क्यों? 2015 चल रहा है और इस साल की यात्रा अभी तो शुरू भी नहीं हुई है। आप इसी साल जा सकते हैं।

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    2. नीरज जी सबसे पहेले तो बजेट का प्रोबेलें होता है फिर मैं प्राइवेट जॉब करता हूँ तो छुट्टी का भी प्राब्लम होता है इसलिए मैने 2016 के लिए सोच रखा है और इस साल मैं गौमुख & तपोवन ट्रेक पे गया था तो घर वाले भी बोलेंगे की जब देखो तब घूमता रहेता है कम काज की कोई पड़ी नहीं बिना मतलब का ज्ञान देने लगेंगे

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  14. सभी फोटो बहुत शानदार है। विशेस कर सामने चट्टान की आकृति देखिये। सब भूगर्भीय हलचलों का परिणाम है।वाला फोटो । फोटो नं 9 मे चट्टान पर बना लकड़ी का ढांचा का क्या उपयोग है।

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    1. सर जी, वो किसी जमाने में पुल रहा होगा जो अब टूट गया है। वो पुल के इस तरफ का अवशेष है।

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  15. अवसादी चट्टान है शायद । अवसाद के निक्षेप से बनी हुई।
    लकङी का ढाँचा तो डामचा जैसा कुछ लगता है।

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  16. bahbhi ko saath le gye they tabhi jyda khrcha kr diya warna akeley to saastey m hi nipat aatey aap

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  17. मेरी सुविधा के लिए थॅंक्स। अब मैँ आराम से सब पढ़ सकती हूँ। यहाँ के नाम बड़े अजीब है ।तुझे याद कैसे होते है ?

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