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Friday, December 26, 2014

पदुम-दारचा ट्रेक- अनमो से चा

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आपको याद होगा कि हम अनमो पहुंच गये थे। पदुम-दारचा ट्रेक आजकल अनमो से शुरू होता है। वास्तव में यह ट्रेक अब अपनी अन्तिम सांसे गिन रहा है। जल्दी ही यह ‘पदुम-दारचा सडक’ बनने वाला है। पदुम की तरफ से चलें तो अनमो से आगे तक सडक बन गई है और अगर दारचा की तरफ से देखें तो लगभग शिंगो-ला तक सडक बन गई है। मुख्य समस्या अनमो से आठ-दस किलोमीटर आगे तक ही है। फिर शिंगो-ला तक चौडी घाटी है, कच्ची मिट्टी है। सडक और तेजी से बनेगी। एक बार सडक बन गई तो ट्रेक का औचित्य समाप्त। इसी तरह पदुम को निम्मू से भी जोडने का काम चल रहा है। निम्मू वो जगह है जहां जांस्कर नदी सिन्धु नदी में मिलती है। पदुम से काफी आगे तक सडक बन चुकी है और उधर निम्मू से भी बहुत आगे तक सडक बन गई है। बीच में थोडा सा काम बाकी है। सुप्रसिद्ध चादर ट्रेक इसी पदुम-निम्मू के बीच में होता है। निम्मू से चलें तो चिलिंग से आगे तक सडक बन गई है। जहां सडक समाप्त होती है, वहीं से चादर ट्रेक शुरू हो जाता है। जब यह सडक पूरी बन जायेगी तो चादर ट्रेक पर भी असर पडेगा। उधर पदुम और कारगिल पहले से ही जुडे हैं।

हम इसी अन्तिम सांसे गिनते ट्रेक पर जा रहे हैं। कुछ साल बाद जब सडक बन जायेगी, मोटरसाइकिल वाले इधर से जाया करेंगे, अपनी शिंगो-ला विजय गाथा लिखा करेंगे; उस समय हमारे पास भी कहने को होगा कि हम इधर तब गये थे जब सडक ही नहीं थी। ठीक साच-पास की तरह। आज कौन साच-पास को पैदल पार करता है?
विधान और मैं कई बार साथ यात्रा कर चुके हैं। विधान से आप भी परिचित होंगे। ट्रेक शुरू करने से पहले अपने अन्य साथी प्रकाश यादव जी के बारे में भी बताना उचित समझता हूं। प्रकाश जी रायगढ छत्तीसगढ में जिंदल स्टील में महाप्रबन्धक हैं। महाप्रबन्धक यानी जीएम, जनरल मैनेजर। बहुत बडी पोस्ट होती है महाप्रबन्धक की। एक इंजीनियर ही जानता है कि महाप्रबन्धक क्या चीज होती है। मैं स्वयं एक इंजीनियर हूं। आपको जानकर हैरानी होगी कि मैंने आज तक अपने महाप्रबन्धक से बात करना तो दूर, उन्हें देखा तक नहीं है। तो एक महाप्रबन्धक के साथ घूमना, बातें करना, खाना खाना और सबसे बडी बात कि उन्हें निर्देश देना; मेरे लिये बडे गर्व की बात थी। हम उन्हें ‘सर’ कहते थे।
विधान किसी बात पर प्रकाश जी से खुश होकर बोला- भगवान आपको जल्दी से जल्दी मैनेजर बना दे। प्रकाश जी तुरन्त बोले- अरे भाई, क्यों मेरा डिमोशन करा रहे हो?
अनमो लगभग 3900 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इस ऊंचाई का अन्दाजा लगाने के लिये बता दूं कि केदारनाथ, बद्रीनाथ , गंगोत्री, यमुनोत्री, अमरनाथ सब इससे कम ऊंचाई पर ही हैं। शिमला, मनाली की तो बात ही छोड दो। इस ऊंचाई पर वायु बहुत कम हो जाती है। फिर हम लगातार यात्रा कर रहे थे। दिल्ली से चलकर सीधे कारगिल रुके। कारगिल की ऊंचाई 2700 मीटर है। फिर अगली रात रांगडुम में रुके जो लगभग 4000 मीटर पर है। रांगडुम में रुकने का फायदा मिलना चाहिये था लेकिन उतना फायदा नहीं मिला। अब यहां आकर पन्द्रह-पन्द्रह किलो सामान उठाकर पैदल चल दिये। तीनों की हालत खराब।
सोचा कि खच्चर या घोडे ले लेते हैं। लेकिन चार घरों के गांव अनमो में कुछ नहीं मिला। सलाह मिली कि चार किलोमीटर आगे पूरने में खच्चर मिल जायेगा। चलने वाले ही थे कि कुछ खच्चर वाले आ गये। उन्हीं के पीछे पीछे एक गाडी भी आ गई। देखते ही देखते चार खच्चर पूरे लद गये। मैं तो हालांकि सामान स्वयं ही ले जाने वाला था लेकिन विधान और प्रकाश जी के लिये खच्चर जरूरी था। हम मुंहमांगे पैसे देने को तैयार थे लेकिन खच्चर वाले ने मना कर दिया। उचित यही लगा कि किसी तरह पूरने चलते हैं। रात वहीं गुजारेंगे और आगे के लिये खच्चरों का इंतजाम भी कर लेंगे।
लद्दाख और जांस्कर की धूप से मैं परिचित हूं। इसके बारे में कहा जाता है कि यह एक ऐसी जगह है जहां अगर आप आधे धूप में और आधे छांव में लेट जाओ तो आपको सनस्ट्रोक और कोल्डस्ट्रोक दोनों हो सकते हैं। आप धूप से झुलस भी सकते हो और ठण्ड से आपको पाला भी मार सकता है। मुझे बस एक यही चिन्ता थी। बाकी तो मैं इसकी धूल, गर्द, आंधी, नंगे बंजर हरियाली-विहीन पहाडों को जानता ही हूं। यहां आकर वही सब मिला। उधर विधान ने लद्दाख के शानदार फोटो देख रखे थे। वह भी ऐसे ही फोटो खींचना चाहता था। शानदार दृश्यावली, मनभावन पहाड, नीला आसमान, शीतल मौसम। लेकिन यहां आकर सबकुछ विपरीत मिला तो उसे निराशा हुई। प्रकाश जी का ज्यादा नहीं पता। वे तो बस ट्रैकिंग करना चाहते थे। जैसे ही सुना कि हम जा रहे हैं, तो वे भी तैयार हो गये। यह उनकी पहली ट्रैकिंग थी।
हवा की कमी के कारण चिडचिडापन भी आ गया था। फिर खच्चर न मिलने की वजह से और भी ज्यादा मामला बिगड गया। जिस समय हम अनमो से रवाना हुए, तीनों चुप थे और तीनों के दिमाग खराब थे। लेकिन अनुभवी होने के कारण मेरी ही ज्यादा जिम्मेदारी थी। जल्दी ही पगडण्डी शुरू हो गई और सडक पीछे छूट गई। यहां पहाड इतने विकट थे कि पगडण्डी पर खडे होकर झुककर नीचे झांकने पर बहुत दूर सारप नदी दिखती थी। ऐसे में चक्कर आना बडी साधारण बात होती है।
उस समय एक मोड पर मैं बैठ गया और दोनों की प्रतीक्षा करने लगा। कुछ देर बाद प्रकाश जी आये। हालत खराब। अब मैं बार-बार हालत खराब नहीं लिखूंगा। आप स्वयं ही समझते जाना कि जैसे जैसे हम आगे बढते गये, हमारी हालत खराब होती चली गई। वे भी मुझे देखते ही तुरन्त बैठ गये। मैंने पूछा- सर, चक्कर तो नहीं आ रहे? बोले कि नहीं। मैंने फिर कहा कि अगर चक्कर आयें तो तुरन्त बता देना, नजरअन्दाज मत करना। फिर विधान आया। उससे भी मैंने यही पूछा- भाई, चक्कर तो नहीं आ रहे? चिडचिडापन पहले से ही था। बोला- अगर चक्कर आ भी रहे हों तो तू क्या कर लेगा? यह एक ‘लडाई’ की शुरूआत थी। मैं भी चिडचिडा हो रहा था। भिड पडा मैं भी।
बडी देर तक बहस हुई। आखिरकार विधान ने कहा- मैं वापस जा रहा हूं। प्रकाश जी भी हमारे बीच में बोले। जा चला जा- कहकर मैं आगे बढ गया और उनकी आंखों से ओझल होकर एक मोड पर फिर बैठ गया और उनमें से किसी के आने की प्रतीक्षा करने लगा। और वास्तव में उस समय मैं कुछ भी नहीं सोच पा रहा था। कुछ भी गणित नहीं लगा रहा था। विधान जायेगा या नहीं, चला जायेगा तो मुझे क्या करना है, उसे वापस लाना है या नहीं; कुछ भी अन्दाजा नहीं लग रहा था। बस बैठा था और कुछ भी घटित होने की प्रतीक्षा कर रहा था।
थोडी ही देर में दोनों आते दिखे। विधान तेजी से आगे निकल गया और प्रकाश जी मेरे पास रुककर बोले- थोडा कण्ट्रोल कर। बडी मुश्किल से समझाया है उसे। रास्ता समतल था। हालांकि कहीं ढलान भी था और कहीं चढाई भी लेकिन कुल मिलाकर समतल ही था। इस समय यहां ढलान था और मैंने देखा कि विधान अप्रत्याशित गति से आगे बढा जा रहा है। निःसन्देह वह इस समय भयंकर गुस्से में है। गुस्सा ही उसे तेज चला रहा है। यह बडे खतरे की बात थी। उसके पास न कोई डण्डा था और न ही कोई वाकिंग स्टिक। जबकि हम दोनों के पास वाकिंग स्टिक थी। मैंने प्रकाश जी से कहा- आप धीरे धीरे आओ। मैं विधान को रोकता हूं।
मुझे लगभग दौडना पडा तब जाकर बडी दूर विधान को पकड पाया। उस समय वह एक चट्टान का सहारा लेकर खडा हुआ था। मैं उसके पास गया। वाकिंग स्टिक उसकी तरफ बढाई, उसने तुरन्त ले ली। कोई संवाद नहीं हुआ। हमारी आंखें तक नहीं मिलीं। और इस समय मैं कितना खुश हुआ, कोई अन्दाजा नहीं लगा सकता। वो आगे बढ गया। मैं खुशी से नाच उठा। मोबाइल निकाला और अपनी खुशी उसमें रिकार्ड भी की। बिल्कुल उम्मीद नहीं थी कि वो वाकिंग स्टिक ले लेगा। सोचता आ रहा था कि वो नहीं लेगा; उसे समझाऊंगा, ऐसे कहूंगा, ये कहूंगा, वो कहूंगा। लेकिन सब पानी फेर दिया- तुरन्त ले ली बिना कोई प्रतिकार किये।
इसके बाद उसने मेरा एक फोटो भी खींचा। खींचकर दूर से ही बोला- चौधरी, लाख रुपये का फोटो खींचा है तेरा। बेटा, जब तक पैसे नहीं देगा, फोटो भी नहीं दूंगा। फोटो वास्तव में लाख में एक है, नीचे लगा रखा है। इसमें काला चश्मा इसलिये है कि आंखों में धूप से नुकसान न हो। इस लाख रुपये के फोटो के बाद हम विधान को महान फोटोग्राफर कहने लगे।
चार-पांच किलोमीटर दूर है अनमो से पूरने। और हमारी चाल चींटी से भी कम थी। प्रकाश जी बिल्कुल नहीं चल पा रहे थे। इसका हम दोनों को यह फायदा था कि हमें थकान बिल्कुल नहीं हो रही थी। सूरज डूबने लगा था। सात बज गये थे और अभी भी पूरने का कहीं नामो-निशान नहीं था। वे बिल्कुल भी नहीं चलना चाहते थे लेकिन रुक भी नहीं सकते थे।
तभी पीछे से एक घोडे वाला आया। वह पूरने जा रहा था। हमने उससे कल के बारे में बात की। इतना तो तय था कि हम आज पूरने ही रुकेंगे। घोडे वाले से कह दिया कि सुबह पूरने में हमसे मिलना। सबकुछ तय हो गया। यह भी तय हो गया कि वह हमें आठ सौ रुपये प्रतिदिन के हिसाब से शिंगो-ला पार करायेगा। साथ ही उसने यह भी कहा कि एक घोडा नहीं किया जा सकता। कम से कम दो घोडे होंगे। इसका कारण था कि अकेले घोडे का मन नहीं लगता। वह उत्पात मचाता है। उसका कोई साथी साथ हो तो ठीक रहता है। यह भी हमने स्वीकार कर लिया। जरुरत होगी तो दूसरे घोडे पर बैठा भी जा सकता था। उसने बताया कि पूरने में वह हमें स्वयं ढूंढ लेगा।
आठ बज गये। अन्धेरा हो गया। हैड लाइट निकाल ली और मोबाइल की टॉर्च भी जला ली। पूरने अभी तक दिखा भी नहीं था हालांकि हम जानते थे कि वह कहां है। सामने दो नदियां मिल रही हैं। दोनों के संगम पर उस पार पूरने है। तभी कुछ ही दूर कुछ लाइटें दिखीं। यह चा गांव था। प्रकाश जी को देखते हुए तय हुआ कि आज चा में ही रुकते हैं। चा हालांकि एक किलोमीटर भी नहीं था लेकिन फिर भी वहां पहुंचने में एक घण्टा लग गया। और रास्ता बिल्कुल समतल।
गांव में ही एक छोटा सा मैदान था। हमने यहां टैंट लगाने की सोची। लेकिन समस्या थी खाने की। भूख लग रही थी और खाना जरूरी था। गांव-देहातों में लोग जल्दी सो जाते हैं। चा में भी कोई नहीं दिख रहा था। किसका दरवाजा पीटें? तभी एक महिला दिखी। उससे बात की तो बताया कि उनके यहां होम-स्टे है और पांच सौ रुपये किराया है जिसमें सोना और दो समय का खाना शामिल है। हमने केवल खाने के पैसे पूछे तो उन्होंने बताया कि हम सोने जा रहे हैं। केवल आपके लिये ही खाना बनाना पडेगा। आप रुको या मत रुको, पैसे तो पांच सौ ही लगेंगे। आखिरकार हमने उनके यहां रुकने का फैसला कर लिया।
लद्दाखी घरों में मैं पहले भी रुक चुका हूं। यहां भी ऐसा ही प्रबन्ध था। जमीन पर बिछे गद्दे, मोटी मोटी रजाईयां और बीच में रखी नीची ‘डाइनिंग टेबल’। जाते ही चाय मिली। फिर राजमा-चावल आये। विधान ने तो बिल्कुल नहीं खाये हालांकि मैंने और प्रकाश जी ने भी जबरदस्ती ही खाये। ऊंचाई के कारण खाने का भी मन नहीं करता।




आगे सडक बन रही है।


रास्ता

रास्ता और नीचे बहती सारप नदी


नदी के उस पार ट्रैकिंग पथ




सूर्यास्त की स्वर्णिम आभा




चा गांव और आसमान

यह है वो लाख में एक फोटो जो विधान ने खींचा। धन्यवाद भाई।



चा गांव की स्थिति। नक्शे को छोटा व बडा भी करके देखा जा सकता है।


अगले भाग में जारी...




पदुम दारचा ट्रेक
1. जांस्कर यात्रा- दिल्ली से कारगिल
2. खूबसूरत सूरू घाटी
3. जांस्कर यात्रा- रांगडुम से अनमो
4. पदुम दारचा ट्रेक- अनमो से चा
5. फुकताल गोम्पा की ओर
6. अदभुत फुकताल गोम्पा
7. पदुम दारचा ट्रेक- पुरने से तेंगजे
8. पदुम दारचा ट्रेक- तेंगजे से करग्याक और गोम्बोरंजन
9. गोम्बोरंजन से शिंगो-ला पार
10. शिंगो-ला से दिल्ली वापस
11. जांस्कर यात्रा का कुल खर्च

35 comments:

  1. Aab aap lakhpati ban gaye , thanks vidhan bhai .

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  2. kamaal ka sahash .paristhition ko sambhalne me maahir Neeraj ..great job.

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  3. yaar ye to samtal hi hai hisab kitab :) agar main darcha se jaaun to akele jaa sakta hun kya? ruko, main aapko fone hi kar lunga :D

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    1. बिल्कुल भाई जी, अकेले जा सकते हो और किसी टैंट की जरुरत भी नहीं है। लेकिन अब दिसम्बर में तो शिंगो-ला बन्द हो गया होगा।

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  4. neeraj bhai aap ki jitni bhi tarif kre vo kam hai aap to tarif se bhi uper chale gye ho........aapki agli post ka intjaar rhe ga....

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    1. धन्यवाद सहदेव साहब...

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  5. Good Neeraj,Agli Post ka intjar,Aur Ha Bhai Photo to pakka 1 Lak ka He h.

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  6. नीरज भाई ,सबकी तरह सबसे पहले एक लाख रूपए वाले फोटो की बात करूँगा ,वास्तव मे विधान भाई का खीचा ये फोटो एक लाख नही दस लाख रूपए का है। वास्तव मे केवल एक फोटो ही पदुम-दारचा ट्रेक की विजय गाथा बताने के लिए पर्याप्त है, इस फोटो मे लग रहा है जैसे कोई शेर दहाड़ कर बता रहा है की मे हु जंगल का राजा -तो जाट बता रहा है मे हु घुमक्कड़ो का राजा। बाकी फोटो भी शानदार है और ट्रैक किस कदर मुश्किल और खतरनाक है ये बता रहे है। सफर मुश्किल है लेकिन आप तीनो का साहस भी सलाम करने लायक है।

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    1. धन्यवाद विनय जी... जी खुश हो गया... मैं हूं घुमक्कडों का राजा... हा हा हा

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  7. विधान को बदले में कौन सा फोटो दिया..?
    लाख रुपये तो देने से रहे इतना हमें पता है और बिना लिये वो फोटो नहीं देता.. :-)
    प्रणाम

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    1. मैंने तो दिया नहीं लेकिन लगता है उसने सब फोटो ले लिये। तभी तो अपनी फेसबुक पर फोटो पर फोटो लगाये जा रहा है और सबसे कह भी रहा है कि नीरज के फोटो चुराने के लिये यहां क्लिक करें। इस एक फोटो के बदले उसे यह सब करने का हक है।

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  8. खतरनाक पहाड़ी रास्तो पर शानदार यात्रा विवरण ...... फोटो तो सभी ही शानदार है.... पर वो फोटो तो लाख का ही है....

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    1. धन्यवाद गुप्ता जी...

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  9. Replies
    1. धन्यवाद मिश्रा जी...

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  10. GHUMMAKARI ZINDABAAD ye bolana apke saamne chhota parne laga hai.........................................................................................................................................................................ab to GHUMMAKAR ZINDABAAD bolna padegaa...

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  11. kya baat hi neeraj bahi mera salam hi aap ko

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    1. मेरा भी सलाम है आपको...

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  12. जितनी प्रशंसा की जाए इस पोस्ट की कम है. बहुत बहुत धन्यवाद. फोटो वाकई शानदार है. आगे बढ़ते रहिये इस बार आपने गूगल माप

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  13. शेयर नहीं किया

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    1. धन्यवाद विशाल जी। गूगल मैप मैंने पिछली दो-तीन पोस्टों में इसलिये लगाया था ताकि मित्रों को अन्दाजा हो जाये कि हम किस इलाके में गये थे। अब चूंकि सब पता चल गया है तो पांच-दस किलोमीटर की ट्रेकिंग करके यह बताने की जरुरत नहीं महसूस होती कि हमने यहां से यहां तक ट्रेकिंग की। फिर भी आपका कहना ठीक है, मैं कोशिश करूंगा सभी पोस्टों में मैप लगाने की।

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  14. BASPA VALLEY ki yaad aa gayi

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    1. बस्पा वैली??? अरे सर जी, कहां यह बंजर रूखी-सूखी घाटी और कहां वो हरी-भरी बस्पा घाटी??? दोनों की कोई तुलना ही नहीं है।

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  15. 15 kg का बैग के साथ ट्रैकिंग बडी मुश्किलो का सामना करना पडा होगा.

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    1. नहीं भाई, उतनी मुश्किलें नहीं आईं। मुश्किल केवल और केवल इतनी ही थी कि अब वजन उठाने की आदत नहीं रही। 15 किलो बहुत भारी लग रहा था।

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  16. आपके ब्लौग में ऐड रहा है...

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    1. हां सर जी, अब विज्ञापन लगा दिया है।

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  17. विधान का खीचा फोटो एक लाख नही दस लाख रूपए का है

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  18. bahut sunder yatra bhi or photo bhi ---ismei to hiro hiralal lag raha hai ---

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  19. खतरनाक यात्रा का जानदार फोटो । क्या बड़ाई करे समझ मे नहीं आता।

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  20. एक कहावत है की भगवान ने ज्ञान बाटना भारत के नीचे से अर्थात साउथ से शुरू किया था और उत्तर मे जाते जाते यह ज्ञान खत्म हो गया जब की सुंदरता बाटने की शुरुआत उत्तर भारत से किए और साउथ मे आते आते यह सुंदरता खत्म हो गया । यह कहावत आप की यात्रा और फोटो से पता चलता है।

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