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Friday, June 6, 2014

चूडधार यात्रा- वापसी तराहां के रास्ते

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9 मई 2014, शुक्रवार
आज के इस वृत्तान्त का शीर्षक होना चाहिये था- नमाज बख्शवाने गये थे, रोजे गले पड गये।
चूडधार शिखर के नीचे जहां मन्दिर और धर्मशाला बने हैं, वहीं एक दुकान में मैं परांठे खाने बैठ गया; आलू के परांठे मिल गये थे। बिल्कुल घटिया परांठे थे। अगर पहले ही पता होता तो एक खाकर ही तौबा कर लेता। जब तक घटियापन का पता चला, तब तक दूसरा परांठा भी बन चुका था। तो बातों ही बातों में मैंने जिक्र कर दिया कि यहां से नीचे जाने के कौन कौन से रास्ते हैं। बोला कि एक तो ‘त्रां’ वाला है और एक ‘स्रां’ वाला। बाद में पता चला कि ये क्रमशः तराहां और सराहां हैं। मेरा स्लीपिंग बैग चूंकि नोहराधार में रखा था, उसे लेना जरूरी था इसलिये मुझे इनमें से तराहां वाला रास्ता चुनना पडा। तराहां से नोहराधार की बसें मिल जाती हैं।

यहां गौरतलब है कि जब सबसे प्रचलित रास्ता सीधा नोहराधार वाला ही है जिससे मैं यहां तक आया हूं तो अब दूसरे रास्ते से क्यों जाना चाहता हूं? सीधा सीधा जवाब है कि मैं नीचे उतरते समय बर्फ से बचना चाहता था। ढलान पर जमी पडी बर्फ पर चढने के मुकाबले नीचे उतरना कई गुना ज्यादा खतरनाक होता है। मुझे बर्फ से वैसे ही डर लगता है, इसलिये मैं हर हाल में इससे बचना चाहता था। फिर बाद में मन ने दूसरी वजह भी बना ली- एक नया रास्ता देखने को मिलेगा। इस रास्ते पर बर्फ नहीं थी।
चूंकि यह स्थान काफी ऊंचाई पर है, इसलिये मुझे लग रहा था कि यहां से तराहां दिख सकता है। परांठे वाले से पूछा तो उसने दुकान से बाहर आकर नीचे एक घाटी की तरफ इशारा करके समझाया कि वहां करीब दस किलोमीटर दूर तराहां है। इस घाटी को देखते ही मैं घबरा गया। यह बुरी तरह जंगल से भरी थी। दूर बिल्कुल आखिर में एक गांव दिख रहा था और पहाड पर एक लकीर भी, जो सडक थी। बाकी सारा रास्ता जंगल का था। आपको पूरे हिमालय में कहीं भी जंगल दिखे, आंख मूंदकर यकीन कर लेना कि उसमें भालू भी होंगे। फिर जंगल अगर मध्य हिमालय में हो यानी 2000-3000 मीटर की रेंज में हो तो भालुओं की बहुतायत मिलेगी। यह जंगल भी बहुतायत वाला जंगल है। और हां, हिमालयन काला भालू दुनिया के सबसे खतरनाक जानवरों में से एक होता है।
इस वजह से मैं इधर से जाने से हिचकने लगा। पूछा कि रास्ता कैसा है? क्या वैसा ही है जैसा नोहराधार से तीसरी तक है? बोला कि हां जी, वैसा ही है। क्या लोग-बाग आते-जाते मिलेंगे? हां जी, बहुत लोग आते जाते मिलेंगे। मेरी कुछ हिम्मत बढी। फिर बताया कि यहां से तराहां की दूरी दस किलोमीटर है। आप इधर से जाओगे, नीचे एक ट्रांसफॉर्मर मिलेगा। नीचे उतरते जाना, उस नाले को कई बार पार करना पडेगा, पुल बने हुए हैं। बढिया चलता-फिरता रास्ता है। बस, मेरे लिये इतना ही काफी था। फैसला हो गया।
नमाज तो माफ हो गई लेकिन अभी तक क्या पता था कि रोजे गले पडने वाले हैं? और रोजों का अर्थ ही होता है पांच बार नियमपूर्वक नमाज।
यह जगह समुद्र तल से 3400 मीटर की ऊंचाई पर है। ठीक दो बजे यहां से चल दिया। जल्दी ही पगडण्डी गायब हो गई और एक बडी मुश्किल से अस्पष्ट सा रास्ता मिला। यह रास्ता क्या, बस पैरों के निशान मात्र थे जो थोडी-थोडी देर में दिख जाते थे। बडी तेज उतराई थी। जगह जगह बर्फ भी थी लेकिन जंगल में होने के कारण बिल्कुल भी खतरनाक नहीं थी।
उतरते-उतरते काफी देर हो गई और कोई भी इंसान नहीं मिला तो घबराहट बढने लगी। घबराहट में मेरे पैर कांपने लगते हैं। वो तो ट्रैकिंग पोल यानी डण्डा अच्छा साथ दे रहा था अन्यथा इस ढलान पर मैं गिर चुका होता। फिर भालू का डर भी था। जगह जगह देवदार की ताजी नुची और अधखाई पत्तियां भी मिल रही थीं जो भालू के होने की पक्की निशानी थीं।
तेजी से लगातार नीचे उतरते हुए जब आधा घण्टा हो गया तो एक राहत की चीज दिखी। एक गाय घास चर रही थी। यहां एक बेहद छोटा सा मैदान था, ट्रांसफार्मर भी था। यहां से बिजली ऊपर चूडधार मन्दिर तक जाती है। गाय ने एक बार सिर उठाकर मुझे देखा और पुनः घास चरने लगी। मैंने गाय के मालिक की खोज में इधर-उधर देखा लेकिन कोई नहीं दिखा। यहां कुछ राख पडी थी और एक डण्डे पर लाल झण्डा भी फहरा रहा था। हालांकि यहां इंसान नहीं था लेकिन उसकी निशानियां देखकर मुझे राहत मिली, डर कम हो गया। यह जगह समुद्र तल से 3000 मीटर की ऊंचाई पर है।
इसके बाद फिर उसी तरह ढलान शुरू हो गया। कुछ देर बाद एक नाला मिला। इस पर पुल नहीं था लेकिन बिना पैर भिगोये आसानी से पार किया जा सकता था। अब रास्ता कुछ स्पष्ट होने लगा था। नाले के साथ साथ आगे बढना था। पानी की आवाज किसी और आवाज को नहीं सुनने दे रही थी। इंसान अभी भी नहीं दिखा था। डर फिर से बढने लगा था। मैं डण्डे को पत्थरों पर जोर जोर से मारता हुआ चल रहा था ताकि आगे अगर भालू हो तो रास्ते से हट जाये। हालांकि भालू की सुनने की क्षमता कम होती है।
डर का आलम यह था कि अब तक मुझे कई ‘भालू’ दिख चुके थे। हर बार ‘भालू’ दिखने पर रोंगटे खडे हो जाते। मैं इंसानी आवाज सुनने को बेताब था। अगर इस दौरान किसी भूत या चुडैल की कितनी भी डरावनी आवाज आती तो मुझे राहत ही मिलती। अब मैं इधर आने के लिये पछता रहा था। पता नहीं अभी कितना जंगल शेष है? उधर से ही चले जाना चाहिये था। उधर आने-जाने वालों की लाइन लगी है। कौन फिसला है बर्फ पर? सभी उतर रहे थे तो तू भी उतर ही जाता। नोहराधार व तीसरी से जब चलना शुरू किया था तो सोच रखा था कि उसी रास्ते से वापस लौटूंगा। उधर से लौटने के लिये तो तू तैयार था। थोडी दूर की बर्फ थी बस। उसके बाद तो मौज ही मौज थी। नमाज बख्शवाने के लिये इस जंगल के रास्ते से आया हूं, अब रोजे भी गले पड गये। हे भगवान! यह जंगल जल्दी से जल्दी खत्म हो।
नाले के उस तरफ कुछ गायें घास चरती दिखीं। थोडा सुकून मिला। रुककर फिर किसी आदमजात के लिये देखा लेकिन कोई नहीं दिखाई दिया। एक तसल्ली मिली कि गायें बेफिक्र होकर घास चर रही हैं, उन्हें किसी जानवर का डर नहीं है तो तू क्यों डर रहा है? फिर सोचा कि इसमें तो कोई शक नहीं कि यह भालू बाहुल्य क्षेत्र है। भालू मांसाहारी नहीं होता, वह गायों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता, इसलिये वे उससे नहीं डर रही हैं। डर फिर बढ गया।
कुछ आगे चलकर अचानक रास्ता गायब हो गया। गौर से देखा तो नाले के उस तरफ हल्की सी पगडण्डी दिखाई दी। ध्यान आया कि ऊपर ढाबे वाले ने बताया था कि नाले को कई बार पार करना पडेगा। लेकिन उसने तो यह भी कहा था कि पुल बने हैं। कहां है पुल? कोई पुल नहीं था। इसे ऐसे ही पार करना पडेगा। बहाव बहुत तेज था। पानी के नीचे डूबे पत्थरों पर काई भी दिखाई दे रही थी। ये नाले पार करना भी मुझे पसन्द नहीं है। बहाव तो तेज होता ही है, ऊपर से पानी भी बहुत ठण्डा होता है। कुछ पत्थर पानी से ऊपर भी निकले थे, जिन पर पैर रख-रखकर आसानी से उस तरफ जा सकता था। लेकिन हिम्मत नहीं पडी। आखिरकार जूते उतारने पडे और चलकर पार कर लिया। वाकई बहुत ठण्डा पानी था।
पौने चार बजे जब ऊंचाई 2350 मीटर थी, पहली बार दो आदमी दिखाई दिये। उन्हें दूर से देखते ही खुशी से चिल्लाने का मन करने लगा। तुरन्त सारा डर समाप्त हो गया। बिना बातचीत किये तो मैं आगे बढने वाला नहीं था। पूछा कि तराहां कितना दूर है? उन्होंने कुछ देर हिसाब लगाया और कहा कि तीन घण्टे लगेंगे। फिर पूछा कि जंगल कितना बचा हुआ है? बोले कि डेढ घण्टा। सुनकर थोडी निराशा अवश्य हुई लेकिन अब मनोबल पहले से काफी बढा हुआ था।
पांच मिनट भी नहीं चला कि नाले के उस तरफ तीन महिलाएं दिखाई पडीं। हमारे हिमालय के जंगलों में महिलाओं का होना कुछ भी अजीब नहीं है। महिलाएं ज्यादातर लकडी लेने जंगल जाती हैं। लेकिन मेरे लिये विस्मय की बात थी कि इनमें से एक महिला स्वेटर बुन रही थी। पांच मिनट बाद जब लकडी का एक पुल आया और उसके पास बकरियां चरती दिखीं तो सब कुछ समझ आ गया। असल में ये गुर्जर हैं।
इनका मूल ठिकाना सहारनपुर में शिवालिक की पहाडियां और उनसे लगते मैदान हैं। धौलाधार के गद्दियों की तरह गर्मियां आते ही ये भी अपनी भेड-बकरियों को लेकर हिमालय की ऊंचाईयों की ओर चल देते हैं। ज्यादातर तो उत्तराखण्ड में यमुना और टोंस घाटी में जाते हैं। कुछ यमुना पार करके इधर हिमाचल में चूडधार क्षेत्र में शरण ले लेते हैं।
पुल पार करके आगे बढने लगा। गुर्जरों को देखकर अब डर नाम की कोई चीज नहीं बची। कुछ आगे एक घराट मिला। अभी यह बन्द था। इसी के बाद छोटा सा मैदान है। पहली बार... चूडधार से चलने के बाद दो घण्टे में पहली बार मैं यहां बैठा। अभी तक बस यही धुन थी कि जल्दी से जल्दी यह जंगल पार हो जाये। यह धुन डर के कारण थी। अब डर समाप्त हो गया तो अपने आसपास की प्रकृति भी दिखने लगी। ऐसा नहीं था कि यहां भालू नहीं थे। भालू यहां भी उतने ही थे, जितने कि कुछ देर पहले। लेकिन डर वास्तविक न होकर मानसिक ज्यादा था। वास्तविक खतरा तो गांव में पहुंचने पर भी रहेगा लेकिन मानसिक खतरा टल गया था।
कुछ देर बैठा रहा, बल्कि लेट गया। नाला अब नदी की शक्ल लेने लगा था, चौडाई भी बढ गई थी, पानी भी और वेग भी।
आगे बढा। एक बार फिर नाले को पार करने के लिये जूते उतारने की सोच ली थी लेकिन मनोबल इतना बढ चुका था कि पत्थरों पर पैर रख-रखकर आसानी से पार कर गया। एक जोडा मिला। ज्यादा उम्र नहीं थी उनकी और शादी को भी ज्यादा दिन नहीं हुए होंगे। ये दोनों चूडधार जा रहे थे। महिला ने हाथ जोडकर मुझसे नमस्ते भी की। मैं इसके लिये तैयार नहीं था और तेजी से बढता जा रहा था। मुझे भी हाथ जोडकर ही उसकी नमस्ते का जवाब देना चाहिये था। आगे से तैयार रहूंगा।
फिर नाला पार करना पडा। इस बार यहां पेडों के दो-तीन तने व कुछ पत्थर रखकर कामचलाऊ पुल बनाया हुआ था। इससे आगे बढा तो एक छोटा सा मैदान दिखाई दिया। यहां पांच लडके बैठे थे। मैंने पूछा कि तराहां कितना दूर है? बताया कि अब तो समझो कि पहुंच ही गये हो। मुझे बैठने को कहा तो बैठ गया। ये भी चूडधार ही जा रहे थे और शिवजी के पक्के भक्त थे तभी तो दम लगाये जा रहे थे। मुझसे भी कहा लेकिन मैंने मना कर दिया। मैंने पूछा कि अब क्यों जा रहे हो? सुबह जाना चाहिये था। बोले कि हमारा रात बारह बजे तक पहुंचने का लक्ष्य है। ये शिमला के थे और पहली बार चूडधार जा रहे थे। मैंने बताया कि यह रास्ता बहुत खतरनाक है और चढाई भी यहां बहुत है। आपको नोहराधार की तरफ से जाना चाहिये था। बोले कि हमें पता नहीं था।
अब जंगल समाप्त हो रहा था। नाला नदी का रूप ले चुका था। उस पार घर और खेत भी दिखने लगे थे। मैं अब पुनः सभ्यता में लौट आया था। बताया गया था कि यहां से नोहराधार की आखिरी बस शाम चार बजे मिलेगी। चार कभी के बज चुके थे और अभी भी मैं तराहां नहीं पहुंचा था। इसका अर्थ है कि रात तराहां में ही रुकना पडेगा।
बच्चे स्कूल से लौट रहे थे। मुझे देखते ही हाथ जोडकर नमस्ते करते। मैं भी हाथ जोडकर ही नमस्ते लेता। एक जगह एक बच्चे ने पूछा कि आप कहां जाओगे? मैंने बताया तराहां। बोला कि आप गलत आ गये हैं। ठीक रास्ता कुछ देर पहले नीचे की तरफ गया है और नदी के उस तरफ से है। मैंने पूछा कि अब मेरी वापस जाने की इच्छा नहीं है। आगे भी तो होगा कोई नीचे उतरने का रास्ता। बोला कि हां है। थोडा आगे एक घर मिलेगा, उसके बराबर से जा रहा है एक रास्ता। मैं आगे बढ चला।
घर के पास पहुंचकर खेत में काम कर रही एक महिला से रास्ता एक बार फिर पूछा और मैं सही रास्ते पर आ गया। नीचे लोहे का एक पुल था। नदी पार करनी थी लेकिन पार करते ही तीन दिशाओं में पगडण्डियां जा रही थीं। इस तरफ एक घराट भी था जो इस समय चल रहा था। मैंने घराट वाले से पूछा तो उसने बताया कि खड्ड के साथ-साथ चलते जाओ। तराहां यहां से एक किलोमीटर दूर है।
अब कोई दिक्कत नहीं थी। थोडे उतार-चढाव के बाद आखिरकार छह बजे तराहां पहुंच ही गया। यहां चूडधार के पास से आ रही नदी पर एक पुल बना था और सडक भी थी। सबसे पहले तो चाय पी। चाय पीते पीते ही रुकने का इंतजाम भी हो गया। यह एक छोटा सा गांव है। जिस कमरे में मैं रुका हुआ था, वह असल में तीन बिस्तरों की एक डोरमेट्री थी। कुछ देर बाद दो लोग और आ गये। ये व्यापारी थी। इन्होंने बताया कि इस गांव में बस इन्हीं के यहां रुकने का इंतजाम है। पचास रुपये लगे। खाने का इंतजाम भी यहीं पर हो गया।
तराहां समुद्र तल से 1840 मीटर की ऊंचाई पर है। उधर नोहराधार है 2140 मीटर पर। इसलिये अगर नोहराधार की तरफ से चूडधार जायेंगे तो सीधे सीधे 300 मीटर का फायदा मिलेगा। फिर नोहराधार वाले पूरे रास्ते में खाने-पीने और रुकने का अच्छा प्रबन्ध है जबकि इस रास्ते में तराहां छोडने के बाद आपको कुछ नहीं मिलने वाला। नोहराधार से दूरी 18 किलोमीटर है जबकि तराहां से भी 15-16 किलोमीटर से कम नहीं है। इसलिये अगर चूडधार जाना है तो नोहराधार वाला रास्ता ही सर्वोत्तम है। वैसे एक रास्ता दूसरी तरफ सराहां से भी जाता है। पहले शिमला से चौपाल जाना पडेगा, फिर सराहां और उसके बाद पैदल यात्रा। सराहां लगभग 2200 मीटर की ऊंचाई पर है। बताते हैं कि सराहां-चूडधार पैदल मार्ग में एक जगह खाने-पीने का प्रबन्ध है।


ऐसा ही रास्ता है।

ढलान का अन्दाजा हो सकता है।

रास्ते में गिरा पडा एक पेड

पहली बार जब गाय और ट्रांसफार्मर दिखा तो बडा सुकून मिला।




आधे घण्टे बाद नदी के उस तरफ फिर गायें दिखी। फोटो के बीच में तीन गायें दिख रही हैं।

यही रास्ता है।



लकडी का पुल। यहां गुर्जर मिले थे और मेरा सारा डर जाता रहा था।


यहां से नाला पार करना पडा।





लौट आये सभ्यता में...

काली लाइन कल की यात्रा है- नोहराधार से तीसरी तक। लाल लाइन है आज की यात्रा- तीसरी से चूडधार होते हुए तराहां तक। फोटो पर क्लिक करके बडा किया जा सकता है।


अगले भाग में जारी...



चूडधार कमरुनाग यात्रा

1. कहां मिलम, कहां झांसी, कहां चूडधार
2. चूडधार यात्रा- 1
3. चूडधार यात्रा- 2
4. चूडधार यात्रा- वापसी तराहां के रास्ते
5. भंगायणी माता मन्दिर, हरिपुरधार
6. तराहां से सुन्दरनगर तक- एक रोमांचक यात्रा
7. रोहांडा में बारिश
8. रोहांडा से कमरुनाग
9. कमरुनाग से वापस रोहांडा
10. कांगडा रेल यात्रा- जोगिन्दर नगर से ज्वालामुखी रोड तक
11.चूडधार की जानकारी व नक्शा

13 comments:

  1. तस्वीरें देख कर ही जंगल की भयावहता का अंदाज़ा हो जाता है ऐसे में वातावरण की नीरवता सिहरन पैदा करती है..
    काफी जानकारी मिलती है लेख से आपके।

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  2. नीरज जी जब हम नए व अन्जाने रास्ते पर होते है ओर साथ मे कोई भय हो तो वह रास्ता बडा लम्बा व भयवय लगने लगता है.ओर आप तो ऐसे जंगल मे सफर कर रहे थे जहां पर भालू व अन्य खतरनाक जानवर मौजूद थे तो डर लगना तो लाजमी था.

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  3. घराट क्या होता है भाई?

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    1. आटा-चक्की होती है

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  4. रोजों का अर्थ ही होता है पांच बार नियमपूर्वक नमाज -
    यहाँ पे थोडा भूल सुधार लें
    रोजों का मतलब रमजान के तीस दिनों का उपवास जो मुस्लमान भाई रखते हैं

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    1. हां जयन्त साहब, थोडी शब्द-चुनाव की त्रुटि है।
      इसे होना चाहिये था- रोजों में पांच बार नमाज भी पढनी होती है। बाकी तो जो उपवास वगैरह होता है, वो होता ही है।

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  5. इसका पोस्ट का शीर्षक 'भाग नीरज भालू आया ' रखना था !!

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  6. घना जंगल, भालू का डर , अंजान रास्ता..... नदी, पेड़ , नाले ........ यही है रोमांच की परिभाषा......

    बढ़िया....

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  7. जब भालू आप से नही डरता,, तो आप क्योँ डरते हो?

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  8. बहुत रोमांचकारी यात्रा ,,,,,,,,,,,,,,,,पढ़ कर आनंद आ गया ,

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  9. फोटो देखकर लगता नहीं कोई व्यक्ति इस वीराने में चल सकता है और वो भी भालुओं के दर के साए में. आपकी हिम्मत की दाद देनी होगी दोस्त !!

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  10. इतने खतरनाक रस्ते पर न जाए वो नीरज नाम कहा ---

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