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Monday, May 26, 2014

लद्दाख साइकिल यात्रा के लिये कुछ सुझाव

अभी पिछले दिनों निरंजन वेलणकर साहब से मेल पर बात हुई- लद्दाख साइकिल यात्रा के बारे में। पेश है वह वार्तालाप ज्यों का त्यों:

निरंजन वेलणकर:
घुमक्कडी जिन्दाबाद नीरज जी!
आपको प्रेमपूर्वक और आदरपूर्वक प्रणाम!
हर सुबह आपकी गाथा पढ़ने के लिए आपकी साईट पर जाता हूं। वाकई आप बहुत बढिया लिख रहे हैं- बहुत बढिया आपने किया है। आपके लेखन में जो अभिवृत्ति (attitude) है, वो भी काफ़ी ऊँची है। आप कई सारी बातों को सम्मिलित कर यथार्थ दृश्य प्रस्तुत करते हैं। शब्द पर्याप्त नही है और आपको निरंतर अपनी तारीफ सुनते हुए अजीब सा भी‌ लगता होगा, इसलिए रुकता हूं।
आपसे कुछ मार्गदर्शन चाहिए था। लद्दाख साईकिल यात्रा के बारे में।
मेरी साईकिल 5500 रू. मे ली हुई 18 गियर की एक सामान्य साईकिल है। क्रॉस बाईक की। जुलाई से अब तक कुल 1380 किलोमीटर चलाया है। दो शतक और तेरह अर्धशतक है। थोडी बार कुछ छोटी- मोटी पहाडी पर भी चलाई है। स्तर 3 और स्तर 2 के घाट/चढाईयों पर भी चलाया है। इसमें आपकी राय चाहिए थी।
मै 50 किलोमीटर किसी भी‌ (अर्थात् महाराष्ट्र की) सड़क पर आसानी से चला सकता हूं। 3-4 घंटे लग जाते है। 100 भी‌ आसानी से कर सकता हूं। पर आसान नही होता उसके बाद। दिन के पहले 4 घण्टों में जो स्टैमिना है वो बाद में बिल्कुल कम होता जाता है। 3-4 घण्टों के लिए 16-17 किमी रफ़्तार होती है; पर उसके बाद वो बिल्कुल गिर जाती है।
पुणे से कई साईकल-सवार मनाली- लेह जाते है। वे कहते हैं‌ कि वहाँ जाने के लिए क्वालिफिकेशन सिंहगढ़ 90 मिनट में‌ चढना है। आप जानते ही होंगे सिंहगढ़। पुणे के पास का एक किला है। इसमें 9 किलोमीटर की चढाई है। 6.5 किमी तक स्तर 2 का घाट और फिर 2 किमी समतल/ उतराई का रास्ता और फिर आखिरी 1.5 किमी स्तर 3 का घाट/ क्लाइंब। ये मै मुश्किल से ही चढ पाता हूं। पहले तो 1 किलोमीटर के बाद ही साईकिल हाथ में ले कर चलना पडा। दूसरी बार गया तो 7.5 किलोमीटर साईकिल पर जा सका लेकिन आखिरी 1.5 किलोमीटर भारी पडे और उसके लिए पैदल चलना पडा। और पहुंचने के लिए 2.15 घण्टे भी लगे। जबकि‌ कहते है वो दूरी 1.45 घण्टों में पार होनी चाहिए।
कोशिश तो करता हूं और अभ्यास करने की। पर महीने में 3-4 अर्धशतक और बीच बीच में मामूली 10-20 किमी चलाने के अतिरिक्त और ज्यादा नही‌ कर पा रहा हूं।
बाकी‌ तो ठीक है- दिन में 8-10 घण्टों तक चला सकता हूं। बहुत ज्यादा दर्द शरीर में नही होता है। jumps और योगा का अभ्यास करता हूं तब तो कुछ भी परेशानी नही होती है। पैर भी दुखते नही है।
आपसे यह मार्गदर्शन चाहिए था-
1. क्या इतना अभ्यास ठीक दिशा में‌ है? या 50% या 25% ही पर्याप्त है?
2. मुझे मनाली- लेह के लिए दूसरी 15- 20 हजार वाली साईकिल लेनी चाहिए? जबकि इससे भी मै दिन में सामान्य रास्ते पर या थोड़ी चढाई वाले रास्ते पर 125 किलोमीटर चला सकता हूं।
3. चढाई का अब भी एक तरह से बर्डन लगता है। मन में और पैरों में भी। उसे किस प्रकार चलना चाहिए? गति को बिलकुल भूल कर? गति का बड़ा बोझ होता है मन पर।
नीरज जी, मै बीच में काफी निराश हो गया था। एक बार 164 किलोमीटर दूरी पार कर पश्चिम तट पर जाने के लिए निकला। लेकिन आधे रास्ते में ही इतना थक गया कि बस पर लाद कर साईकिल वापस ले आया। मन में‌ लगा कि एक तो अब इस पूरी चेष्टा को बन्द ही करना है या फिर नए सिरे से शुरूआत करनी है। प्रैक्टिकल कारणों से बहुत ज्यादा साईकिल चलाना सम्भव भी नही हो पा रहा है।
आप जैसे समय हो मार्गदर्शन कर सकते हैं।
घुमक्कड़ी जिन्दाबाद!!
- आपका निरंजन

नीरज जाट:
निरंजन जी नमस्कार।
पहली बात तो अच्छी यह लगी कि आपने निःसंकोच होकर सारी बातें लिखी हैं। आप भी बिल्कुल वैसा ही सोचते हैं जैसा मैं सोचा करता था लद्दाख जाने से पहले।
अभी मैं सचिन के साथ मिज़ोरम गया था। सचिन पेशेवर साइकिलिस्ट है। उसने कहा था- हर साइकिलिस्ट मुम्बई-गोवा रूट करने के बाद मनाली-लेह के सपने देखने लगता है। मनाली-लेह साइकिल यात्रा हर साइकिलिस्ट का सपना होता है। इसे पूरा करने के लिये वे जी-तोड मेहनत करते हैं। तरह-तरह के स्टैण्डर्ड बनाते हैं। जैसे कि लद्दाख के लिये सिंहगढ डेढ घण्टे में पहुंचना भी इसी तरह का एक स्टैण्डर्ड है।
लेकिन ध्यान रहे इस तरह के स्टैण्डर्ड बनाने वाले पेशेवर लोग होते हैं यानी खिलाडी होते हैं। जैसा कि खेल का नियम है दूसरे को पीछे छोडकर स्वयं आगे निकल जाओ, यही नियम साइकिलिस्टों पर भी लागू होता है। यहां भी आगे निकलने और स्वयं को बडा दिखाने की होड लगी रहती है। अगर आप भी स्वयं को खिलाडी की श्रेणी में पाते हैं तो ठीक है, आपको नब्बे मिनट में सिंहगढ पर चढना ही पडेगा। लेकिन यदि आप खिलाडी नहीं हैं तो आपके लिये सिंहगढ जैसी कोई बाध्यता नहीं है, न ही पन्द्रह हजार वाली साइकिल की आवश्यकता। आपकी पांच हजार की साइकिल भी वही काम करेगी। आप इतनी मेहनत कर रहे हैं, इसे करते रहिये। आपको इसके बाद आवश्यकता है साइकिल से मित्रता करने की। क्या आप पंक्चर लगा सकते हैं? क्या आप इसके पुर्जे खोलकर पुनः जोड सकते हैं? क्या आप ब्रेक का एडजस्टमेण्ट कर सकते हैं? क्या आप गियर शिफ्टर की खराबी ठीक कर सकते हैं? लद्दाख जाने से पहले आपको ये सब करना पडेगा। जहां तक मुझे उम्मीद है आपकी साइकिल में डिस्क ब्रेक नहीं होंगे, साधारण साइकिल की तरह वाले ब्रेक होंगे, यानी पावर ब्रेक। उतराई पर जब लगातार ब्रेक लगाये रखने की आवश्यकता होती है तो ये घिस जाते हैं, आपको एक-दो अतिरिक्त ब्रेक-शू लेने पडेंगे।
जब हम साइकिल चलाते समय चेन दूसरे गियर पर शिफ्ट करते हैं तो यह काम एक क्लच-वायर करता है। क्लच-वायर हमेशा तनाव में रहता है। जहां यह गियर-चेंजर पर जुडा रहता है, वहां अक्सर यह आधे मिलीमीटर से लेकर दो तीन मिलीमीटर तक खिसक जाता है। इससे गियर बदलते समय चेन ठीक गियर पर नहीं चढती, कभी कभी तो दो गियरों के बीच में जा टिकती है। आपको इसका भी एडजस्टमेण्ट करना सीखना पडेगा।
मिज़ोरम यात्रा में मेरी साइकिल के साथ एक दुर्घटना हो गई थी। इसका गियर चेंजर अचानक टूट गया और चेन पर लटक गया। अब इसका क्या इलाज हो सकता था? सोचो एक बार। गियर चेंजर जहां एक्सल पर जुडा होता है, वहीं से टूट गया था। यह एल्यूमीनियम का होता है। एल्यूमीनियम की वेल्डिंग आसानी से नहीं होती। और मिज़ोरम के जंगलों में तो बिल्कुल नहीं। इसे जब जैसे-तैसे करके चेन से हटाया तो चेन जमीन पर स्पर्श करने लगी। हमारे पास अतिरिक्त गियर चेंजर नहीं था। सचिन ने बताया था कि ऐसा पहले भी कई साइकिलिस्टों के साथ हो चुका है। आपको एक सुझाव है कि एक अतिरिक्त गियर चेंजर भी ले लें। एक और समस्या आती है चेन की। वैसे तो चेन बडी ही सख्तजान होती है, आसानी से टूटती नहीं है, टूट भी जाती है तो टूटने के बावजूद भी आसानी से अलग नहीं होती। किसी तरह अलग हो भी जाये तो आसानी से जुडती भी नहीं है। एक छोटा सा टूल आता है चेन जोडने और अलग करके के लिये। आप इसे अवश्य ले लें और इससे चेन जोडने का अभ्यास भी कर लें।
बाकी जितने भी तरह के साइकिल में नट-बोल्ट होते हैं, उनके लिये स्पैनर, एलेन-की और प्लास भी ले लें।
यानी अपनी साइकिल के हर दुख-दर्द को आपको ही समझना पडेगा। इस पर बैठकर पैडल मारना तो बहुत बाद की बात है। पेशेवर साइकिलिस्ट विशेष तरह के बैग रखते हैं जो केवल साइकिलों के लिये ही बने होते हैं। लेकिन ये बडे महंगे आते हैं। आप साधारण बैग को रस्सियों से बांधकर भी काम चला सकते हैं। मैंने लद्दाख मे ऐसा ही किया था।
अब आती है बात दूरी और समय की। मैंने पहले भी कहा है कि अगर आप स्वयं को खिलाडी की श्रेणी में रखते हैं तो मेरा एक भी सुझाव आपके किसी काम का नहीं। अगर आपको कोई रिकार्ड बनाना है तो भी ये सुझाव आपके काम के नहीं। पेशेवर लोग एक सप्ताह में इस दूरी को तय कर लेते हैं, कुछ लोग आठ दिन भी लगा देते हैं। मैंने मनाली-लेह मार्ग को चौदह दिनों में तय किया था। कई बार तो दिनभर में बीस किलोमीटर से भी कम साइकिल चलाई। कई समस्याएं आती हैं। सबसे बडी समस्या है ऊंचाई की। मनाली से निकलकर जब आप 3000 मीटर की ऊंचाई को पार कर लेंगे तो लेह तक कभी भी इससे कम पर नहीं आ पायेंगे। ज्यादातर यात्रा 4000 मीटर से ऊपर ही होती है। 5000 मीटर की ऊंचाई के दर्रे पार करने होते हैं, तंगलंगला तो 5300 मीटर से भी ज्यादा है। मुझे तो इतनी ऊंचाई के बारे में सोचने मात्र से ही घबराहट होने लगती है।
जहां तक मुझे याद है कि आप बद्रीनाथ गये थे। बद्रीनाथ 3500 मीटर के आसपास है। फिर भी अगर मेरी याददाश्त गलत है तो आपसे गुजारिश है कि समय निकालकर एक बार 3000 मीटर की रेंज में दो-तीन दिन की ट्रेकिंग कर लें। हिमालय लांघने के लिये शारीरिक क्षमता से ज्यादा मानसिक क्षमता और हिमालय के मिजाज की जानकारी ज्यादा आवश्यक है।
जैसा कि आपने बताया कि लम्बी दूरी तय करके मन में आता है कि साइकिलिंग छोड दूं। यही समस्या मेरे सामने भी आई थी। और मैंने लम्बी दूरी की साइकिलिंग करना छोड भी दिया था। केवल एक किलोमीटर दूर ऑफिस ही जाया करता था साइकिल से। जब आखिरकार ओखली में सिर दिया, साइकिल लेकर मनाली पहुंच गया तो पहले ही दिन से मूसल पडने लगे थे। रोज मन करता था कि साइकिल को खाई में फेंक दूं और बस पकडकर दिल्ली लौट जाऊं। यार लोग पूछेंगे तो बता दूंगा कि भू-स्खलन हो गया था या कुछ और हो गया था। नकी-ला के पास तो सुबह से ही मन नहीं था साइकिलिंग का।
सुझाव यही है कि ठान लो कि करना ही है बस। कोई लक्ष्य मत बनाना कि रोज इतने किलोमीटर चलानी है। जब तक शरीर साथ दे, चलते रहो; जब साथ देने से मना कर दे तो रुक जाना। शरीर के विरुद्ध कभी मत जाना। 
बहुत ज्यादा हो गया है। बाकी फिर कभी...

निरंजन वेलणकर:
नीरज जी, बहुत बहुत धन्यवाद!!
वाकई आपका इतना बडा उत्तर!!!! बहुत खुशी हुई।
आपने कई बातें‌ सही कही है। आपकी मिजोरम भ्रमणगाथा की गाथाओं का बेसब्री से इन्तजार है। कई मायनों में यह यात्रा असाधारण है।
मै पेशेवर या खिलाडी बिलकुल भी नही हूं। आपसे प्रेरणा ले कर ही दस साल पहले छोडी साईकिल फिर से अपनायी! मै बद्रीनाथ में नही, पर उसके पास हनुमान चट्टी तक कुछ 7-8 किलोमीटर पैदल चल कर गया था। लेकिन जोशीमठ- औली पैदल चढाई वाले रास्ते से नही जा पाया था। पिछले साल धारचूला में भी कुछ मध्यम श्रेणी की‌ ट्रेकिंग की थी; पर वह भी थोडे दिन ही। बाकी लेह में आठ दिन रह चुका हूं। खारदूंगला- चांगला पर ऊँचाई की समस्या नही आयी थी।
नीरज जी, मुझे लगता है कि ऊँचाई इतनी समस्या नही होनी चाहिए। उसके लिए बस्त्रिका प्राणायाम और योगाभ्यास चल रहा है। शरीर की साँस लेने की क्षमता जितनी गहरी होगी, उतनी यह समस्या नही आएगी। और वैसे भी ऊँचाई के लिए हम कुछ कर भी सकते हैं। कहते है ना कि यदि शरीर acclimatize हो जाता है; समय देना पडता है और यदि नही हुआ, तो नीचे आना भी पड़ता है। मैने सुना है कि गाड़ी से जाते हुए भी कुछ लोगों को इसी‌ कारण यात्रा छोड के लौटना पड़ता है। उसके लिए साँस का अभ्यास और फिटनेस- स्टैमिना की तैयारी‌ चाहिए; जो कुछ तो साईकिलिंग के साथ भी होती है।
इसलिए मुझे ऊँचाई से ज्यादा एक तरह का भय या बर्डन निरंतर चलने वाली चढाई का है। क्योंकि सिंहगढ जैसी मामूली चढाई- इतनी मामूली तो नही, फिर भी लदाख की‌ तुलना में मामूली- जिसमें 9 किलोमीटर में‌ करीब 600 मीटर का क्लाइंब है- जो की खारदूंगला की लगभग 1/4 है (मात्र क्लाइंब में)! ऐसी चढाई पर भी इतनी बार रुकना पड़ता है और थके माँदे कैसे तो भी जाना पड़ता है। जाहिर है जिसमें इससे अधिक चढाई है- जैसे मनाली- मढी- 35 किलोमीटर में 1500 मीटर तो वहाँ पर चढना और साईकिल पर बैठ कर भी लगभग नामुमकिन हो जाएगा। इसका कुछ गुर भी सीखना पड़ेगा। जैसे बिल्कुल धीमी रफ्तार से 1-2 कॉम्बिनेशन पर बिना एग्जहॉस्ट हुए चलते रहो। ऐसे जा सके तो ही बिना उतरे इसे जा सकेंगे। खैर।
आपने बाकी तकनीकी बातें कही है वे भी सही है। ये भी‌ सीखना पड़ेगा और उसकी तैयारी भी करनी पड़ेगी। एक बात देखी है। कभी कभी हम ये सब काम करते हैं- पंक्चर, चेन ठीक करना, क्लच आदि; तो हममें उतना हुनर तो नही होता है और इससे गलती भी तो हो सकती है। एक बार मेरे मित्र ने स्वयं हवा भरी थी और पंक्चर हुआ। इसलिए कभी ऐसा भी सोचता हूं कि ये सभी पुर्जे साथ में रखेंगे और किसी मैकेनिक से ही इसे करवा लेंगे। क्योंकि हम करें‌ तो इतना बेहतर शायद ना हो। लेकिन बेसिक चींजें जरूर आनी चाहिए। ये करीब करीब आपके तम्बू जैसा ही है। आपने कहा भी है ना कि, आपने तम्बू लिया तो था, लेकिन उसे खोल कर लगाने की ऊर्जा भी नही रही। फिर भी दो बार उसे आपको लगाना पड़ा।
जितना बिल्कुल जरूरी है उतना साजो सामान तो रखना ही पडेगा। पर इसमें सामान ढोने की समस्या न बन जाए। मेरी साईकिल साधारण सी है; पावर ब्रेक है। पीछे कैरियर भी है। उस पर सामान बाँध सकता हूं। जरूरी स्पैनर आदि तो रखने पड़ेंगे। पर उससे बहुत ज्यादा लेना शायद सम्भव न हो। क्योंकि उस स्थिति में साईकिल चला पाना यही बात कठिनाई की होगी। जहाँ तक सम्भव हो रिपेयरिंग मैकेनिक से ही करनी‌ चाहिए। क्योंकि ऐसी चीजें नेट पर देखी तो निरंतर बढती जाएंगी। ये लो, वो लो। कहीं ना कही रुकना पडेगा ही। देखते है।
मुख्य बात चढाई भरे रास्तों का अभ्यास और बड़ी से बड़ी चढाई पार करने का आत्मविश्वास; यही लगती है।
आपके मार्गदर्शन से लगने लगा है कि साईकिल छोडने की बजाय उसे चलाना जारी रखूँ। जैसे भी हो, चलाता रहूँ। और आपने कहा है वो सही है। वहाँ छोटे छोटे चरणों में ही सफर करना है। मुश्किल से 40 या 50 किलोमीटर प्रति दिन। इतने भी बहुत हुए।
बहुत बहुत धन्यवाद!!
-
आपका निरंजन

नीरज जाट:
निरंजन जी, नमस्कार।
आप बेवजह ही दूरी और चढाई को लेकर परेशान हो रहे हैं। मैंने पिछली मेल में भी कहा था कि जिस तरह से आप तैयारी कर रहे हैं, उसे करते रहिये, आप आसानी से हर दूरी को तय कर लेंगे। आप ही बताइये, 9 किलोमीटर में 600 मीटर की चढाई और 35 किलोमीटर में 1500 मीटर की चढाई; कौन सी ज्यादा आसान है? निःसन्देह 35 किलोमीटर वाली चढाई ज्यादा आसान है क्योंकि उसमें ढाल कम है। लद्दाख की पूरी यात्रा में सिंहगढ जैसा तेज ढाल कहीं भी नहीं है। समस्या आती है तो बस यही कि चार घण्टे बाद, पांच घण्टे बाद शरीर थक जाता है। वो तो अभी भी थकता है।
बुरा मत मानना आपकी एक बात पढकर मुझे हंसी आ गई कि अगर साइकिल में कोई खराबी आयेगी तो मैकेनिक से ठीक करायेंगे। लद्दाख वाली सडक पर जहां कोई गांव तक नहीं दिखाई देता, वहां आप मैकेनिक को कहां ढूंढोगे? मनाली-लेह रोड पर सबसे ज्यादा संख्या में ट्रक चलते हैं, फिर मोटरसाइकिलें, कारें, मिनी बसें आदि। कोई खराबी आने की दशा में ड्राइवर को सबकुछ स्वयं ही ठीक करना होता है। इसी वजह से कभी कभी तो ट्रक आदि दस दस दिनों तक बीहड वीराने में खडे रहते हैं। लद्दाख को छोडिये, मैं एक बार दिल्ली में ही एक साइकिल मैकेनिक के पास अपनी साइकिल को ले गया तो उसने उसे देखने से ही मना कर दिया था। कहा था कि मैं साधारण साइकिल तो ठीक कर सकता हूं, गियर वाली में कुछ इधर-उधर हो गया तो मेरी गारण्टी नहीं होगी। मिज़ोरम के चम्फाई में जोकि काफी बडा शहर है, जिला मुख्यालय है, अपनी साइकिल को ले गया तो उसने भी यही कहा था। कुल मिलाकर कोई भी खराबी आने पर आपको ही ठीक करना पडेगा। लद्दाख में मैं तो बच गया था, पंक्चर तक नहीं हुआ।
अब आप पेशेवर साइकिलिस्टों से अवश्य मिलो। उनसे दूरी-समय के बारे में कोई बात मत करना, बल्कि वे किस तरह साइकिल की मरम्मत करते हैं और वो भी कम समय में, यह जरूर सीखने की बात है। मुझे भी सचिन से यही सब सीखने को मिला।
कुछ दिन पहले एक मेल आई थी, मुम्बई से एक साइकिलिस्ट ने की थी, लद्दाख यात्रा से सम्बन्धित ही। उन्होंने बताया कि वे महाराष्ट्र में कई मुश्किल रास्तों पर लम्बी साइकिल यात्राएं कर चुके हैं, मुम्बई-गोवा भी कर चुके हैं। अब लद्दाख जाना चाहते हैं। न्यूनतम सामान रखेंगे, फिर भी टैण्ट-स्लीपिंग बैग तो लेने ही पडेंगे। उन्होंने सुपर हल्के टैण्ट-स्लीपिंग बैग लिये हैं। अब उनके पास अधिकतम वजन बारह किलो होगा। मुझसे पूछ रहे थे कि मेरे पास कितना वजन था और वे इस बारह किलो को भी कम करना चाह रहे थे। मैंने उन्हें कोई जवाब नहीं दिया। जवाब दूं भी कैसे? 19 किलो सामान था मेरे पास। सचिन भी बीस किलो से ज्यादा सामान लेकर चल रहा था।
जब हम चढाई पर साइकिल ले जा रहे हों तो हमारे पास दस किलो सामान हो या बीस किलो, कोई फर्क नहीं पडता। बल्कि खाली साइकिल भी बोझ ही लगती है। लद्दाख यात्रा में मैं सारा सामान एक दुकान में रखकर बीस किलोमीटर दूर खाली साइकिल लेकर शो-कार झील देखने गया था तो यकीन मानिये, मुझे कुछ भी राहत महसूस नहीं हुई थी।
कौन कहता है कि पूरा रास्ता चढाई भरा है? रोहतांग से लेकर तांदी तक 60 किलोमीटर तक मुख्यतः उतराई है, बारालाचाला से सरचू और उससे भी आगे गाटा लूप तक 60 किलोमीटर की उतराई है, नकी-ला से व्हिस्की नाले तक उतराई है, लाचुलुंगला से पांग तक 22 किलोमीटर तक उतराई है, पांग के बाद पांच किलोमीटर की चढाई के बाद 35-40 किलोमीटर का मोरे मैदान भी ढलानयुक्त है। इसी तरह तंगलंगला से चोगलमसर तक 100 किलोमीटर का पूरा रास्ता ढलानयुक्त है।
बहुत हो गया, बाकी बाद में... …

निरंजन वेलणकर:
नमस्कार नीरज जी!
जी, मैने कुछ गलत ही सोच लिया था। आप बिलकुल सही बात कह रहे हैं।
शायद कर सकूँगा!
और आपने बताए चीजों के बारे में साईकिल रिपेयरिंग का प्रशिक्षण लेना पडेगा! उसे कई बार कर के देखना पड़ेगा।
विस्तार से जल्द लिखूँगा।
बहुत बहुत धन्यवाद! :)

नीरज जाट:
सोच रहा हूं कि इस वार्तालाप की एक पोस्ट बना दूं। आपका क्या विचार है?

निरंजन वेलणकर:
जी नीरज जी। बिल्कुल।
वैसे ये सब Frequently Asked Questions ही है। आप यदि पोस्ट लिखते हैं तो दूसरों के भी काम आ सकती है और आपका समय भी बच जाएगा। क्योंकि बहुत से लोग आपको करीब करीब यही बातें पूछते आएंगे।
आज मैने 54 किलोमीटर साईकिल चलायी। आत्मविश्वास लौट आया। वाकई आपका मार्गदर्शन महत्त्व का है!
आप चाहें तो मै आपको और कुछ प्रश्न/ बिन्दु बता सकता हूं-
1. किस प्रकृति के इन्सान को साईकिल किस तरह चलानी चाहिए (कोई भी उठ कर लम्बी‌ दौड या लदाख नही जा सकता; उसकी उतनी रुचि एवं अभ्यास चाहिए; आदि बातें)
2. साईकिल चलाने की क्षमता कैसे आंके, कसौटी क्या है?
3. आपने जो बातें बतायी है- उसका विवरण- गियर क्लच आदि न्यूनतम बातें जो रिपेयर करनी आनी चाहिए। ये वैसे आपके मिजोरम के आगामी पोस्ट में भी‌ आ जाएगा।
4. साईकिल से दोस्ती कैसे करें; उसकी देखभाल कैसे करें (अर्थात् आप यह कैसे करते है)?
5. बस/ ट्रेन में‌ ले जाते समय साईकिल को क्या नुकसान हो सकता है? क्या ध्यान देना चाहिए?
6. क्या अधिक अभ्यास से साईकिल की गति 25- 30 किमी/ घण्टा हो जाती है? (ऐसे मूढ प्रश्न भी कई लोगों‌ को पड़ सकते हैं; मुझे भी पड़ते थे!)
आपने कल जो बताया था, वाकई सच्चाई भरी बातें है। चढाई या दूरी की बजाय एक एक पेडल चलाने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। पहाड़ किसी को रोकता तो नही है!
आपसे और शेयर करता रहूँगा। फिलहाल आपकी मिजो यात्रा की प्रतीक्षा है। आप उसकी एक सारणी‌ भी‌ दे सकते है (जैसे आपने लद्दाख यात्रा संस्मरण के आरम्भ में‌ दी थी।)
बहुत बहुत धन्यवाद और शुभकामनाएँ।
आपका,
निरंजन

निरंजन वेलणकर:
नीरज जी,
आपसे और कुछ बोलना चाहता हूं। आप शायद व्यस्त होंगे। आपकी मिजोरम पोस्ट की भी प्रतीक्षा है।
परसों मैने तीसरा सैंकडा किया। 110 किलोमीटर छोटे घाट होने वाले रास्ते पर।
कुल ग्यारह घण्टे लगे। यात्रा के दो चरण बिलकुल स्पष्ट है। पहले 4-5 घंटों तक शरीर अच्छा काम करता है। उसके बाद बिल्कुल थकता है। गति में काफी अन्तर आता है। जाते समय आधे अन्तर के लिए 4.5 घण्टे लगे और आते समय उसी के लिए 6.5 घण्टे लगे। आते समय तो मामूली चढाई भी नीचे उतर कर चलनी पड़ी। निचले गियर्स पर चलना पड़ा। और मानसिक थकान भी हुई- बस लद्दाख यही हो गया!
इससे यही लगता है कि सबसे अधिक स्टैमिना पहले 5 और अधिकतम 6 घण्टे ही है। उसके बाद आधी ताकत रह जाती है। यानी चढाई वाले रास्ते पर पहले 4-5 घण्टों में 8 किलोमीटर की रफ्तार से चला जा सकता है तो उसके बाद करीब करीब पैदल ही चलना पडेगा। अर्थात् यह स्वाभाविक भी है।
बाद में विश्राम करने पर जरूर लगा कि लदाख भी जा सकता हूं। वैसे यह इतना सोचने का और आंकडों में उलझने का विषय है ही नही; पर मन उसी में फंस जाता है! खैर।
आप शायद मेरी पृच्छा पर कोई पोस्ट लिखना चाहते है तो उसके सम्बन्ध में और एक बात कहना चाहता हूं। वह यह कि आपने हिमालय के अलग अलग क्षेत्रों में जो सैकडों ट्रैक किए हैं- श्रीखण्ड महादेव से रूपकुण्ड तक- वे सभी‌ आपको तैयार करने में मददगार हुए होंगे। चाहे आपने साईकिल शायद 1 साल से ही अधिक चलायी न हो। आपके ट्रेकिंग के अनुभव और तजुर्बे का इस स्टैमिना या तैयारी में काफी अहम योगदान होगा। साईकिल चलाना और ट्रेकिंग करना अलग है पर जुड़ा भी है। ये बात आगामी साईकिलबाजों को जरूर ध्यान में रखनी होगी। क्योंकि लम्बे और कई दिन चलने वाले ट्रेकिंग द्वारा आपकी फिटनेस बढी; शरीर इस तरह के कार्य का अभ्यस्त हुआ। ऊँचाई भी आ गयी। आप विभिन्न ट्रेक के समय 4000 मीटर से अधिक ऊँचाई पर गए है। निरंतर कई दिन चले हैं। जिसने इतना ट्रेकिंग न किया हो, उसे यह कमी जरूर खलेगी। ट्रेकिंग माने ट्रेकिंग हो या रनिंग या स्विमिंग। शरीर को उतना आदी बनाना; धीरे धीरे तैयार करते जाना।
आपने बाकी जो बातें बतायी है; उस पर गौर कर रहा हूं। किसी अच्छे रिपेयर करने वाले के पास कुछ समय बिता कर साईकिल का पूरा हार्डवेयर समझ लेता हूं। या कोई क्रैश कोर्स।
और दिन भर के 12-15 घण्टों तक साईकिल चलाने का अभ्यास भी करना पड़ेगा। दिन का लक्ष्य किलोमीटर में रखना ठीक नही होगा। उसके बजाय 12-15 घण्टे चलते जाना है, बस। शायद पहले 6 घण्टों में 80 किलोमीटर और बाद में मात्र 30- 40 किलोमीटर ही हो, फर्क नही पड़ता। देखते हैं। शरीर और मन को भी अच्छा अभ्यास देना ही पड़ेगा। वो भी मात्र 3-4 घण्टे चलने का नही; दिन भर चलते रहने का। मन का भी तैयार होना इसके लिए जरूरी है। पता नही आप क्रिकेट के चहेते हैं या नही। फिर भी थोडा क्रिकेट में बोलता हूं। यहाँ 4-5 बल्लेबाज होने से काम नही चलेगा! पूरे 11 के 11 और जरूरत पडे तो सब्स्टियूट भी बल्लेबाज ही चाहिए! :) तब जा कर उसी स्टैमिना से 11 घण्टों तक काम किया जा सकेगा। और कसौटी क्रिकेट जैसे ही हालात होंगे! निरंतर 5 दिन बस वही! रन कितने ही बन रहे हो या विकेट मिल नही भी रहे हो; डटे रहना है! :)‌ देखते है।
बहुत धन्यवाद एवम् शुभकामनाएँ।
- निरंजन

नीरज जाट:
आपने पूछा:
किस प्रकृति के इंसान को साइकिल किस तरह चलानी चाहिये? साइकिल चलाने की क्षमता कैसे आंके?
कोई जरुरत ही नहीं है इस बात की कि किसे साइकिल चलानी चाहिये और किसे नहीं। कोई भी साइकिल चला सकता है। हमारे पास ज्यादा पैसे हैं, हमने महंगी साइकिल ले ली; सामने वाले ने साधारण साइकिल ही ली। क्या फर्क पडता है इस बात से? हर कोई क्षमतावान है। लद्दाख वाले रास्ते पर साधारण देशी साइकिल चलती हुई भी देखी हैं।
न्यूनतम बातें जो रिपेयर करनी आनी चाहियें।
वैसे तो इस बारे में लिख चुका हूं। कुल मिलाकर हमें पता होना चाहिये कि किस पुर्जे का क्या काम है। वो पुर्जा न हो तो क्या होगा? उसकी सेटिंग बिगड जाये तो क्या होगा? उसे ठीक कैसे करना है? हर पुर्जा यानी हर पुर्जा। छोटे से छोटा स्क्रू और नट भी।
साइकिल से दोस्ती कैसे करें, उसकी देखभाल कैसे करें?
सर्वोत्तम तरीका है साइकिल को अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी का हिस्सा बनाओ। कुछ दिन में आपको लगेगा कि इसमें कुछ आवाज आ रही है। कल तक नहीं आ रही थी। मामूली सी सरसराहट या टक-टक की आवाज भी हो सकती है यह। अब आगे का काम आपके ऊपर है कि आप इस आवाज पर ध्यान देंगे या नहीं। किसी मैकेनिक या जानकार को दिखाने की बजाय पहले स्वयं इस आवाज को ढूंढने की कोशिश कीजिये। पता चल जायेगा तो आगे क्या करना है, यह जानने में ज्यादा परेशानी नहीं आयेगी।
किसी दिन ब्रेक-शू खोल दीजिये। खोलकर फिर जोड दो। पहिये निकाल दो, हवा निकाल दो, ट्यूब निकाल दो। दोबारा ठीक कर लो। गियर-चेंजर खोल दो, जोड दो। इसी तरह समय मिलते ही उंगली करते रहो। जितनी ज्यादा उंगली करोगे, उतने ही ज्यादा उस्ताद बनोगे। किसी दिन हो सकता है कि बिगाडने के बाद ठीक न हो, और ज्यादा बिगड जाये। तब क्या करना है, आपको निर्णय लेना है। मैकेनिक को दिखा सकते हो।
बस/ट्रेन में ले जाते समय क्या नुकसान हो सकता है?
दोनों में नुकसान हो जाता है। ट्रेन में लगेज में बुक करोगे तो आपको पता ही है कि लगेज में सामान की कैसी दुर्गति होती है। इसमें भारी सामान ठूंस ठूंस कर भरा जाता है। ट्रेन भी काफी हिलती है। सबसे ज्यादा संवेदनशील गियर-चेंजर होता है। इसके अलावा डिस्क ब्रेक और हैण्डलबार भी संवेदनशील हैं। क्या नुकसान हो सकता है, आप स्वयं अन्दाजा लगा सकते हो। इससे बचने के लिये आप साइकिल को खोलकर अपनी सीट के नीचे रखकर ले जा सकते हो। मैं मिजोरम जाते समय राजधानी एक्सप्रेस में अपनी सीट के नीचे साइकिल रखकर ले गया था।
रही बात बस की तो यह ज्यादा सुरक्षित है। फिर भी छत पर रखेंगे तो अप्रत्याशित झटके तो लगेंगे ही। आप साइकिल को एक बार जमीन पर लिटाइये, आप देखेंगे कि पैडल इसके मध्य में आता है और पूरी साइकिल पडी-पडी ही इस पर घूम सकती है। बस में भी ऐसा होता है। आप एक तरफ रखोगे, यह पैडल पर केन्द्रित होकर पूरी छत पर चहलकदमी कर सकती है। बेहतरीन होगा अगर आप एक तरफ के पैडल को निकाल दें। केवल रबड का वो काला हिस्सा ही निकालना काफी है जिसपर हमारे पैर रखे होते हैं।
दूसरी बात, गियर चेंजर को ऊपर की तरफ रखना है। इससे कितने भी झटके लगें, कम से कम साइकिल का सबसे संवेदनशील हिस्सा तो सुरक्षित रहेगा। वैसे साइकिल अगर खडी रहे तो ज्यादा सुरक्षित है। छत पर साइकिल खडी रखने के लिये एक विशेष तरह के जबडे भी आते हैं।
क्या अधिक अभ्यास से साइकिल की गति 25-30 किलोमीटर प्रति घण्टा हो सकती है?
अभ्यास और तकनीकी फेरबदल करके साइकिल की गति 70 किलोमीटर प्रति घण्टा तक हो सकती है। मेरा मानना है कि अगर हमें गति चाहिये तो मोटरसाइकिल सर्वोत्तम है। साइकिल धीरे-धीरे चलती है, इसीलिये इसे पसन्द किया जाता है।

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7 comments:

  1. नीरज जी आपने इस पोस्ट मे साईकल यात्रा व उस यात्रा से सम्बंधित समान के बारे मे बडी महत्वपूर्ण जानकारी दी.यह केवल लद्दाख यात्रा के लिए ही नही ब्लकी अन्य यात्राओ के लिए भी महत्वपूर्ण है.

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  2. Aapke blog me ab wo wali baat nahi rahi.... plzz come back.....

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    1. वो वाली यानी... कौन सी बात?

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  3. भाई आपकी देखा देखी तो मैंने भी साइकिल ले लीI रोजाना ४५ मिनट से ज्यादा तो नहीं चला पाता हूँI हाँ ऊँगली करता रहता हूँI मेरी वाली बिना गीयर की है तो ज्यादा नखरे भी नहीं करती हैI सर्दियों की शुरुआत में हिमालय दिखाने की सोच रहा हूँ उसेI एक बात जानने का मन था ... जेब कितनी ढीली हुई लद्दाख यात्रा में आपकी???

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  4. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन अक्ल का इक्वेशन - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  5. Namashkar neeraj ji apne bahut dino se koi yatra post nahi kiya bahut intezar hai

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