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Saturday, September 7, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- इक्कीसवां दिन- श्रीनगर से दिल्ली

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24 जून 2013
कल जब मैं साइकिल से तेजी से लालचौक की तरफ बढ रहा था, तो इधर उधर होटलों पर भी निगाह मारता चल रहा था। शेख लॉज दिखा। मैं यहां रुककर मोलभाव करना चाहता था लेकिन तभी होटल के सामने खडे एक कर्मचारी ने मुझे देख लिया। उसने मुझसे रुकने को कहा, शायद इसीलिये मैं रुका नहीं। चलता रहा। आधा किलोमीटर आगे ही गया था कि वही कर्मचारी मोटरसाइकिल पर आया और होटल चलने को कहने लगा। जाना पडा।
मैंने पहले ही उससे कह दिया था कि मुझे सबसे सस्ता कमरा चाहिये। फिर भी उसने आठ सौ वाला कमरा दिखाया। मैंने दाम पूछते ही मना कर दिया। फिर दिखाया सात सौ वाला। इसमें अटैच बाथरूम नहीं था। मैं पांच सौ तक के लिये तैयार था लेकिन वह कमरा छह सौ का मिल गया।
जब खाना खाने नीचे रेस्टॉरेण्ट में बैठा था, तो खाने में विलम्ब होता देख मैंने कहा कि ऊपर कमरे में पहुंचा देना। उसी कर्मचारी ने मुझे ऐसे देखा जैसे अजनबी को देख रहा हो। पूछने लगा कि कौन से कमरे में। मैंने बता दिया तो उसकी आंखें आश्चर्यचकित लग रही थीं। बोला कि आप वही हो ना, जो साइकिल से लद्दाख से आये हैं। आप तो नहाने के बाद बिल्कुल ही बदल गये। पहचान में ही नहीं आ रहे।
सुबह कश्मीर रेलवे में यात्रा करने की इच्छा है। श्रीनगर से बारामूला और फिर वापस श्रीनगर, फिर काजीगुण्ड, पुनः श्रीनगर। इस काम में दोपहर बाद हो जाती। एक बार सोचा कि सारा सामान लेकर चलता हूं, काजीगुण्ड उतर जाऊंगा। वहां से किसी बस में या अमरनाथ वाले किसी ट्रक में साइकिल को लाद दूंगा। फिर सोचा कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो बुरी फजीहत हो जायेगी। श्रीनगर आना पडेगा।
सुबह उठा सात बजे लेकिन थकान अभी भी इतनी ज्यादा थी कि कश्मीर रेल देखना रद्द करने में कोई समय नहीं लगा। फिर नौ बजे उठा। ग्यारह बजे मैं बस अड्डे पर था। पता चला यहां से जम्मू की आखिरी बस निकल चुकी है। अब कल सुबह ही कोई बस मिल सकेगी। निराशा तो थी लेकिन सूमो तैयार खडी थी जम्मू के लिये। जब मैं सूमो स्टैण्ड पहुंचा तो मात्र एक सवारी की ही आवश्यकता थी। साइकिल देखकर वे हिचक भी रहे थे लेकिन साइकिल से उन्हें एक यात्री से भी ज्यादा पैसे मिलने वाले थे, इसलिये तैयार हो गये। श्रीनगर से जम्मू का किराया सात सौ है, जबकि साइकिल का बताया उन्होंने एक हजार रुपये यानी सत्रह सौ रुपये। मैंने बिना मोलभाव किये पन्द्रह सौ दिये, थोडी ना-नुकूर के बाद वे राजी हो गये। साइकिल सूमो की छत पर बाकी यात्रियों के सामान के साथ बांध दी गई।
मैं चूंकि सबसे आखिरी सवारी था, इसलिये सबसे पीछे वाली सीट मिली। यह बेहद असुविधाजनक होती है, फिर भी...।
कश्मीर की भीड भरी सडक पर सूमो अपनी गति से चलती जा रही थी। हमारे निकलने के बाद इसी सडक पर कहीं आतंकवादियों ने सुरक्षाबलों की एक चौकी पर हमला कर दिया और पांच सैनिक शहीद हो गये। यह घटना मुझे सुबह दिल्ली पहुंचने पर पता चली।
काजीगुण्ड श्रीनगर से साठ किलोमीटर दूर है। यहां से आगे निकले तो सडक के नीचे से रेलवे लाइन गुजरती दिखी। यह निःसन्देह काजीगुण्ड-ऊधमपुर लाइन का हिस्सा थी। इसके बाद एक चेक-पोस्ट पर गाडी कुछ देर रुकी। फिर जवाहर सुरंग के लिये चढाई शुरू हो गई। काफी चढने के बाद सुरंग आई। जैसे ही सुरंग से बाहर निकले, तो हम कश्मीर को पीछे छोड चुके थे। अब जम्मू तक यात्रा पर्वतों के बीच से होनी थी।
बनिहाल में खाना खाने के लिये रुके। एक निहायत घटिया मुस्लिम होटल पर उसने गाडी रोकी। पता नहीं बाकी यात्री कैसे खा सके, मेरा मन उस होटल में घुसने का भी नहीं हुआ। मैंने खाना नहीं खाया। हालांकि सामने हिन्दू होटल, वैष्णों होटल व पंजाबी होटल भी थे, लेकिन उनकी भी हालत ज्यादा अच्छी नहीं थी।
मेरी आंखें लगातार रेलवे लाइन को ढूंढती जा रही थीं। बनिहाल में कुछ नीचे स्टेशन दिखाई पडा। स्टेशन के नाम का चकाचक पीला बोर्ड लगा दिखा, हालांकि नाम नहीं पढा जा सका। ऐसा लगा कि यहां रेलवे लाइन का सारा काम पूरा हो चुका है। कहीं कोई अधूरा निर्माण कार्य नहीं दिखाई पडा। मैं खुश हो गया कि अब कश्मीर बाकी देश से जुडने में ज्यादा दूर नहीं है। यहां काम पूरा होने का अर्थ था बनिहाल सुरंग भी पूरी हो गई है। उस समय मालूम नहीं था कि चार दिनों बाद मनमोहन सिंह इस सुरंग का उद्घाटन करने आने वाले हैं।
आज जब आप इसे पढ रहे हैं, खबर यह है कि बनिहाल सुरंग के दोनों तरफ ट्रेन चलने लगी है। पहले काजीगुण्ड तक ट्रेन चलती थी, अब बनिहाल तक चलती है। इसके और आगे बढने की जल्द ही उम्मीद है।
चेनाब नदी तक ढलान है। नदी पार करके फिर से चढाई शुरू हो जाती है। यह पटनीटॉप की चढाई है। पटनीटॉप के बाद जम्मू तक फिर उतराई ही उतराई है।
जम्मू पहुंचा तो अन्धेरा हो चुका था। अब मुझे साइकिल को बस पर लादना था। मेरी इच्छा किसी भी सरकारी बस से जाने की थी लेकिन ऐसा नहीं हो सका। बाहर प्राइवेट बस वाले खडे थे। मैंने मात्र जिज्ञासावश पूछ लिया कि साइकिल का कितना किराया लगेगा। उसने बताया तीस रुपये। यह महज एक जाल था, जिसमें मैं फंसता चला गया। यह जिन्दगी की सबसे घटिया बस यात्रा थी। इस यात्रा का इससे ज्यादा उल्लेख करके लद्दाख साइकिल यात्रा की उपलब्धियों का आनन्द कम नहीं करना चाहता।
दिल्ली पहुंचा। लोहे के पुल से साइकिल ले जाने लगा तो वहां बैरियर लगे थे। यमुना भयंकर रूप से रौद्र रूप में थी। लेकिन साइकिल को कौन रोक सकता है?

लद गई अपनी साइकिल

चौबीस घण्टे अति व्यस्त रहने वाला लोहे का पुल
अगले भाग में जारी...

मनाली-लेह-श्रीनगर साइकिल यात्रा
1. साइकिल यात्रा का आगाज
2. लद्दाख साइकिल यात्रा- पहला दिन- दिल्ली से प्रस्थान
3. लद्दाख साइकिल यात्रा- दूसरा दिन- मनाली से गुलाबा
4. लद्दाख साइकिल यात्रा- तीसरा दिन- गुलाबा से मढी
5. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौथा दिन- मढी से गोंदला
6. लद्दाख साइकिल यात्रा- पांचवां दिन- गोंदला से गेमूर
7. लद्दाख साइकिल यात्रा- छठा दिन- गेमूर से जिंगजिंगबार
8. लद्दाख साइकिल यात्रा- सातवां दिन- जिंगजिंगबार से सरचू
9. लद्दाख साइकिल यात्रा- आठवां दिन- सरचू से नकी-ला
10. लद्दाख साइकिल यात्रा- नौवां दिन- नकी-ला से व्हिस्की नाला
11. लद्दाख साइकिल यात्रा- दसवां दिन- व्हिस्की नाले से पांग
12. लद्दाख साइकिल यात्रा- ग्यारहवां दिन- पांग से शो-कार मोड
13. शो-कार (Tso Kar) झील
14. लद्दाख साइकिल यात्रा- बारहवां दिन- शो-कार मोड से तंगलंगला
15. लद्दाख साइकिल यात्रा- तेरहवां दिन- तंगलंगला से उप्शी
16. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौदहवां दिन- उप्शी से लेह
17. लद्दाख साइकिल यात्रा- पन्द्रहवां दिन- लेह से ससपोल
18. लद्दाख साइकिल यात्रा- सोलहवां दिन- ससपोल से फोतूला
19. लद्दाख साइकिल यात्रा- सत्रहवां दिन- फोतूला से मुलबेक
20. लद्दाख साइकिल यात्रा- अठारहवां दिन- मुलबेक से शम्शा
21. लद्दाख साइकिल यात्रा- उन्नीसवां दिन- शम्शा से मटायन
22. लद्दाख साइकिल यात्रा- बीसवां दिन- मटायन से श्रीनगर
23. लद्दाख साइकिल यात्रा- इक्कीसवां दिन- श्रीनगर से दिल्ली
24. लद्दाख साइकिल यात्रा के तकनीकी पहलू

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