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Monday, August 26, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- अट्ठारहवां दिन- मुलबेक से शम्शा

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21 जून 2013
हमेशा की तरह आराम से सोकर उठा। आज आराम कुछ भारी पड सकता है क्योंकि बताया गया कि आगे कारगिल के बाद सिर्फ द्रास में ही रुकने का इन्तजाम है। यहां से कारगिल 40 किलोमीटर और द्रास 100 किलोमीटर है। पूरी यात्रा में मैं कभी भी इतनी दूर तक साइकिल नहीं चला सका, चढाई तो दूर ढलान पर भी नहीं। आज कहीं भी ढलान नहीं है, अपवादस्वरूप कारगिल तक यदा-कदा ढलान मिल सकता है, उसके बाद जोजीला तक तो कतई नहीं। तो सीधी सी बात है कि कारगिल चार घण्टों में पहुंच जाऊंगा लेकिन किसी भी हालत में द्रास नहीं पहुंच सकूंगा। अन्धेरे में मैं साइकिल नहीं चलाया करता।
आज की एक और भी समस्या है। मुझे यात्रा शुरू करने से पहले ही बताया गया था कि कारगिल और द्रास के बीच में करीब पन्द्रह किलोमीटर का रास्ता ऐसा है जो पाकिस्तानी सेना की फायरिंग रेंज में आता है। सन्दीप भाई के यात्रा विवरण को पढा, वे मोटरसाइकिल पर थे लेकिन उन्होंने लिखा था कि इस रास्ते पर उन्हें कोई होश नहीं था सिवाय जल्दी से जल्दी इसे पार कर लेने के। फिर यह रास्ता चढाई भरा है। पन्द्रह किलोमीटर यानी मुझे चार घण्टे लगेंगे। मैं इसी को सोच-सोचकर डरा जा रहा था। यहां तक कि सोच भी लिया था कि इस रास्ते को किसी ट्रक में बैठकर पार करूंगा।
नाश्ता वाश्ता करके साढे नौ बजे यहां से चल पडा। सीधे तौर पर मैं कम से कम दो घण्टे विलम्ब से चला। शुरू में तो सडक अच्छी है, लेकिन उसके बाद खराब मिलने लगी। जगह जगह काम भी चल रहा था, इसलिये तेज धूप में धूल धक्कड का भी सामना करना पडा।
पूरी घाटी आबादी वाली है। एक के बाद एक गांव मिलते गये और लद्दाख की इस मरुस्थलीय धरती पर हरियाली भी दिखती गई। अभी तक यही देखता आया था कि जहां भी हरियाली मिले, समझो कि गांव है। मुलबेक के बाद बौद्ध खत्म हो गये, मुसलमान शुरू हो गये। बौद्धों की पारिवारिक आबादी कम होती है, मुसलमानों की ज्यादा। उसका असर यहां साफ दिखाई देने लगा था। रहन सहन और पहनावे के स्तर में गिरावट आने लगी थी।
अगर आप नदी के बहाव के साथ साथ चल रहे हों, तो ढलान ही मिलेगा। अपवादस्वरूप यदा कदा चढाई भी मिल जाती है। ऐसा ही यहां हुआ। कारगिल तक रास्ता नदी के साथ साथ है, इसलिये ढाल है। मुलबेक 3250 मीटर की ऊंचाई पर है और कारगिल 2650 मीटर पर।
कारगिल से पांच किलोमीटर पहले ऊंचाई 2900 मीटर है। और लग भी नहीं रहा था कि कारगिल जाने के लिये इतना नीचे उतरना पडेगा। यह एक तरह से अच्छा ही था क्योंकि कारगिल के बाद फिर से चढाई शुरू होने वाली है। लेकिन पांच किलोमीटर पहले जब अचानक कारगिल घाटी दिखी तो सारी खुशियों पर पानी फिर गया। ऊंचाई 2900 से सीधे 2650 तक गिर गई। इस ढाल पर चलने में अच्छा तो लगा, स्पीड भी मिली लेकिन कारगिल के बाद की चढाई सताने लगी। अगर यह उतराई न होती, तो कारगिल के बाद मैं इतनी चढाई चढने से बच जाता।
एक बजे कारगिल पहुंचा। एक नदी का पुल पार करके दाहिने रास्ता श्रीनगर जाता है और बायें पदुम। श्रीनगर की ओर चल पडा। यहां नेटवर्क मिला तो घर पर अपनी सलामती की सूचना दे दी।
आज जुम्मा था और यह समय जुम्मे की नमाज का होता है। मस्जिदों में अजान लग रही थी, भाषण भी हो रहे थे। फिर भी कारगिल के बाजार में काफी भीड थी। यहां एक अलग मुखमुद्रा के लोग दिखने लगे जिन्हें दार्द कहते हैं। ये सिन्धु के पास बटालिक की तरफ रहते हैं और ज्यादातर मुसलमान हैं।
कोई ढंग का होटल नहीं दिखा। होगा भी तो भीडभाड की वजह से दिखा नहीं होगा। जरा सी देर में कारगिल से आगे निकल गया। फिर से वही बंजर और वीरान इलाका। कारगिल में खाना खाना था, भूखा ही रह गया।
सडक बेहद खराब और चढाई भी। पैदल भी चलना पडा। सिंगल सडक है जिसके कारण यातायात वन-वे के तरीके से चलता है।
कारगिल जिस नदी के किनारे बसा है वो आगे सिन्धु में जा मिलती है, लेकिन हमें सिन्धु तक नहीं जाना है। कारगिल से कुछ आगे बायें से एक और नदी इसमें मिल जाती है। सडक इस नदी के साथ साथ हो लेती है और कारगिल वाली नदी को छोड देती है।
यह लेह-श्रीनगर मार्ग का अब तक का सबसे खराब हिस्सा था। कोई गांव भी नहीं था, आबादी भी नहीं थी जिससे खाने की सम्भावना जगे। एक पुलिस वाले से पूछा तो बताया कि पांच किलोमीटर आगे खाना मिल जायेगा। बडी तसल्ली मिली।
कुछ आगे चला तो बीआरओ वाले दिखने लगे। इस पतली सी सडक को डबल बनाने का काम चल रहा है। रेतीले इलाके में सडक बनेगी तो सडक भी शुरूआती दौर में रेत का ढेर ही होगी, इसलिये साइकिल नहीं चलाई जा सकी। पैदल चलना पडा। इसी धूल धक्कड के बीच एक ढाबा दिखा तो भूखे पेट में जान आई। भरपेट राजमा चावल खा लिये। उतने अच्छे तो नहीं बने थे, जितनी उम्मीद की थी, लेकिन भूखा बेचारा भरपेट हो गया।
पौने तीन बजे यहां आया था, साढे तीन बजे चल दिया। कारगिल से बीस किलोमीटर आ गया, द्रास अभी भी चालीस किलोमीटर है। इसी तरह का रास्ता मिला तो कल भी द्रास पहुंच जाऊं तो गनीमत है।
खाना खाकर दो किलोमीटर चला कि शानदार सडक आ गई। यह नई बनी थी, इसलिये कोई गड्ढा तक नहीं और चौडी भी काफी थी। कुछ दूर चलकर इस नदी में बायें से एक और नदी आकर मिल रही है। सडक इस नई नदी के साथ साथ चल पडी। यह नदी जोजीला से आती है, इसे द्रास नदी या द्रास नाला भी कहते हैं। जहां इन दोनों नदियों का संगम है वहां नजारा बडा शानदार था। द्रास नदी पर एक छोटा सा पुल भी था।
मैं कारगिल से करीब पन्द्रह किलोमीटर आगे आ गया लेकिन अभी तक पाकिस्तान की फायरिंग रेंज वाला इलाका नहीं आया। किसी से पूछा भी नहीं। बाद में पता चला कि यह संगम ही वही इलाका है। द्रास नदी तो खैर जोजीला से आती है लेकिन दूसरी नदी पाकिस्तान के नियन्त्रण वाले इलाके से आती है और वह यहां से ज्यादा दूर भी नहीं है। कुछ ऊंची पहाडियों पर पाकिस्तान का नियन्त्रण है तो यह इलाका उनकी फायरिंग रेंज में आ जाता है। लेकिन सडक निर्माण के कारण वह सूचना पट्ट हटा दिया गया था जिस पर चेतावनी लिखी थी। अगर चेतावनी वाला बोर्ड मुझे दिख जाता तो कसम से, जान निकल जाती इसे पढते ही। मैंने तो फायरिंग वाले इलाके में रुककर नजारे का आनन्द भी लिया, पीनी भी पीया और फोटो भी खींचे।
सवा पांच बजे खारबू पहुंचा। यह 2800 मीटर की ऊंचाई पर है। यहां मुझे रुकने का इन्तजाम मिलने की उम्मीद थी। मैं पहले ही बता चुका हूं कि मुलबेक के बाद सारा इलाका मुसलमानों का है तो खारबू भी मुस्लिम है। छोटा सा गांव है। एक बूढे से रुकने की बाबत पूछा तो उसने मना कर दिया। निराश होकर थोडा आगे चलकर फिर रुक गया। अपने घर के सामने एक आदमी अपनी दो छोटी छोटी प्यारी प्यारी बच्चियों के साथ बैठा था। मैंने उससे भी रुकने के लिये पूछा, तो उसका भी नकारात्मक उत्तर मिला। तभी बच्चियां मेरे पास आ गईं और चॉकलेट मांगने लगीं। मैं वैसे तो रास्ते में मिलने वाले बच्चों की आदत खराब नहीं किया करता लेकिन वे इतनी प्यारी थीं कि मैंने दोनों को दो दो टॉफियां दे दीं।
अब आखिरी विकल्प था मेरे पास, आपातकालीन विकल्प। टैण्ट लगाऊंगा। रास्ते में थोडी थोडी दूरी पर बीआरओ के ठिकाने मिलते रहते हैं। आगे जहां भी ऐसा ठिकाना मिलेगा, उसके पास ही टैण्ट लगा दूंगा।
अच्छी सडक लेकिन चढाई। सायंकालीन समय, पश्चिम की ओर जाती सडक, फिर बराबर में नदी। यह एक ऐसा कुदरती तोहफा था कि सारी निराशाएं खत्म हो गईं।
खारबू से आठ किलोमीटर आगे एक गांव मिला- शम्शा। दूर से एक साइकिल वाले को आता देखकर कुछ बच्चे दौडे आये और हेलो हेलो कहते गये। मैं लेह से ही ऐसे वाकयों से परिचित था। चढाई चढते समय जबकि मुझे सांस चढ रही हो, पसीना आ रहा हो और मैं चढाई को कोस रहा होऊं, ऐसे समय में ये बच्चे मुझे दुश्मन लगते। दूर से हंसते हुए आते, चॉकलेट मांगते, हाथ मिलाने को कहते, नाम पता पूछते। ऐसा एकाध बार हो तो ठीक लेकिन बार बार कई कई दिनों तक ऐसा ही होता रहे, तो बच्चों को देखते ही गुस्सा आने लगता। अब तक मैंने इन पर ध्यान देना बन्द कर दिया था और उनकी किसी भी बात का जवाब नहीं देता था। काले चश्मे के अन्दर से इन बच्चों पर भी कडवी निगाह डालता मैं बिना रुके आगे निकल गया।
शम्शा से आगे निकल आया। बिल्कुल सुनसान में एक दस बारह साल का लडका खडा मिला। उसने मुझे रुकने का इशारा किया। पता नहीं किस बला के वशीभूत होकर मैं रुक गया। और सांस लेने व सुस्ताने के लिये रुकना भी था। उसने पूछा कि कहां जाओगे? मैंने कहा श्रीनगर। बोला कि आज कहां रुकोगे? मैंने कहा आगे रुकूंगा बीआरओ के कैम्प के पास। बोला कि वो तो पांच छह किलोमीटर आगे है, अन्धेरा हो जायेगा वहां पहुंचते पहुंचते। आप हमारे घर चलो।
यह सुनते ही मेरे कान खडे हो गये। सुना था कि पहाडों पर सुनसान इलाकों में भूत होते हैं, जो दिन में तो दिखते नहीं लेकिन रात को दिख जाया करते हैं। मैंने तुरन्त उसके पैरों की तरफ देखा। पैर तो ठीक थे। आगे की ओर ही थे और जमीन पर भी टिके थे। सुन रखा था कि भूतों के पैर उल्टे होते हैं और जमीन से कुछ ऊपर होते हैं।
“कहां है तुम्हारा घर?”
“वहां ऊपर पहाडी पर।”
“घर में और कौन कौन हैं?”
“मां बाप और भाई बहन।”
“वे तेरी पिटाई तो नहीं करेंगे।”
“नहीं, बिल्कुल नहीं।”
“पहले भी तुम्हारे यहां कोई इस तरह आया है?”
“नहीं, लेकिन नीचे आये हैं। हमारा घर ऊपर है, तो कोई जाता नहीं।”
“पैसे कितने लोगे?”
“पैसे? आप हमारे यहां मेहमान बनकर चलोगे। मेहमानों से पैसे नहीं लिया करते।”
मैं सहमत हो गया। साइकिल से भारी बैग खोला और उसने अपनी कमर पर लटका लिया। साथ ही साइकिल को ऊपर जाती पगडण्डी पर धक्के भी लगाता गया।
“क्या नाम है तुम्हारा?”
“मुश्ताक अहमद।”
“कितने भाई बहन हैं?”
“हम छह भाई बहन हैं। मैं दूसरे नम्बर का हूं। बडा भाई कारगिल में काम करता है।”
“पिताजी क्या करते हैं?”
“बाप? वो यहीं काम करता है खेतों पर। कुछ देर बाद आयेगा वो घर।”
बढिया स्वागत हुआ मेरा उसके घर पर। घर अन्दर से अच्छा बना था लेकिन छोटा और सदस्य ज्यादा होने का असर साफ दिख रहा था। मैं इन छह भाई बहनों के बारे में सोच रहा हूं। गांव के दूसरे घरों में भी ऐसी ही संख्या होगी। कारगिल जिला लद्दाख में आता है। चारों ओर रेतीले और बंजर पहाड। गांव भर के आसपास ही हरियाली। खेत के नाम पर ज्यादा कुछ नहीं। क्या करेंगे ये बच्चे बडे होकर? बाप ने तो अल्लाह के आदेश का पालन कर दिया।
अल्लाह ने आदेश शानदार दे रखा है कि बच्चे पैदा करते जाओ। पालन पोषण तो मैं कर ही दूंगा। अरबों खरबों कीडे मकोडों को पालता हूं, तुम्हें भी पाल दूंगा।
जाते ही चाय के साथ रोटी मिली। फीकी थी, मुझे अच्छी भी नहीं लगी लेकिन एक रोटी तो खानी पडी। पता चला कि पढाई तो अंग्रेजी में होती है लेकिन उर्दू भी पढनी पडती है, जबकि लेह जिले में ऐसी बाध्यता नहीं है। वे लोग उर्दू के स्थान पर हिन्दी पसन्द करते हैं। उर्दू के कारण मुझे यहां भाषा की कोई समस्या नहीं आई।
रात होने पर घर का मालिक भी आ गया। वो कुछ चिन्तित सा लग रहा था। बाद में पता चला कि वह इसलिये चिन्तित है कि मेहमान को क्या खिलाया जाये। चावल बने थे और मीट। बच्चों को नहीं मालूम था कि इन पहाडों से बाहर ऐसे भी लोग रहते हैं जो मीट नहीं खाया करते, बाप को मालूम था। उसने पूछा तो मैंने मना कर दिया। यही उसकी निराशा का कारण था। उसने बताया कि घर में कुछ नहीं है, अब लडके को नीचे भेजना पडेगा ताकि थोडी बहुत दाल ले आये। मैंने कहा कि कोई बात नहीं, मैं शाम भरपूर खाना खाकर आया था, फिर यहां रोटी भी खाई थी, इसलिये भूख नहीं है। लेकिन वह अतिथि को भूखा नहीं रख सकता था।
उनका यह अतिथि प्रेम देखकर मुझे लगा कि आज मुझे मांसाहार करना पडेगा। अगर मैं कुछ नहीं खाऊंगा तो इन्हें भी बुरा लगेगा और ऐसा करना अतिथि का कर्तव्य भी नहीं है। आखिर मुझे एक युक्ति सूझी। पूछा कि सुबह की कोई सब्जी बची है क्या? बोले कि हां, घास की सब्जी है आधी कटोरी लेकिन मेहमान को हम बासी सब्जी नहीं देंगे। मैंने पूछा कि अण्डे हैं? अण्डे थे घर में। बस, बात बन गई। मैंने आमलेट बनवा लिया और आग्रह करके वो आधी कटोरी घास की सब्जी भी ले ली। सबको चावल में मिलाकर खा गया। हमारे यहां जैसे पालक बथुवा आदि होते हैं, इसी तरह वहां भी इसी तरह की एक घास होती है जिसकी सब्जी बनाई जाती है।
जमीन पर ही गद्दे बिछ गये और रजाईयां ओढकर सो गया। गर्मी लग रही थी क्योंकि पता नहीं कितने दिनों में मैं इतना नीचे आया था।
आज साइकिल ने बडा तंग किया। गियर शिफ्टिंग मशीन गडबड करने लगी। और गडबड भी बुरे वक्त पर करती। जब भी चढाई आती, न्यूनतम गति और पहले गियर की आवश्यकता पडती, तभी अपने आप दूसरा गियर लग जाता। कई बार ऐसा हुआ। सम्भवतः खराब सडक पर अत्यधिक धूल मिट्टी के कारण उसमें यह खराबी आ गई होगी।






कारगिल की ओर








कारगिल शहर


कारगिल

कारगिल के बाद





सडक की मरम्मत चल रही है।



यहीं वो संगम है जो पाकिस्तानी सेना की फायरिंग रेंज में आता है। यहां बायें से द्रास नदी आती है और सामने वाली नदी पाकिस्तान के नियन्त्रण से आती है। सम्भवतः सामने दूर जो पहाडी दिख रही है, वो पाकिस्तानी नियन्त्रण वाली हो। सडक निर्माण के कारण चेतावनी बोर्ड हट गया और मैं बेधडक होकर यहां से निकला। अगर चेतावनी दिख जाती तो बडी समस्या हो जाती।


द्रास की ओर।

द्रास की ओर। सडक ने दिल जीत लिया।


सबसे बायें मुश्ताक अहमद, उसके बाद और बच्चे।


अगले भाग में जारी...

मनाली-लेह-श्रीनगर साइकिल यात्रा
1. साइकिल यात्रा का आगाज
2. लद्दाख साइकिल यात्रा- पहला दिन- दिल्ली से प्रस्थान
3. लद्दाख साइकिल यात्रा- दूसरा दिन- मनाली से गुलाबा
4. लद्दाख साइकिल यात्रा- तीसरा दिन- गुलाबा से मढी
5. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौथा दिन- मढी से गोंदला
6. लद्दाख साइकिल यात्रा- पांचवां दिन- गोंदला से गेमूर
7. लद्दाख साइकिल यात्रा- छठा दिन- गेमूर से जिंगजिंगबार
8. लद्दाख साइकिल यात्रा- सातवां दिन- जिंगजिंगबार से सरचू
9. लद्दाख साइकिल यात्रा- आठवां दिन- सरचू से नकी-ला
10. लद्दाख साइकिल यात्रा- नौवां दिन- नकी-ला से व्हिस्की नाला
11. लद्दाख साइकिल यात्रा- दसवां दिन- व्हिस्की नाले से पांग
12. लद्दाख साइकिल यात्रा- ग्यारहवां दिन- पांग से शो-कार मोड
13. शो-कार (Tso Kar) झील
14. लद्दाख साइकिल यात्रा- बारहवां दिन- शो-कार मोड से तंगलंगला
15. लद्दाख साइकिल यात्रा- तेरहवां दिन- तंगलंगला से उप्शी
16. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौदहवां दिन- उप्शी से लेह
17. लद्दाख साइकिल यात्रा- पन्द्रहवां दिन- लेह से ससपोल
18. लद्दाख साइकिल यात्रा- सोलहवां दिन- ससपोल से फोतूला
19. लद्दाख साइकिल यात्रा- सत्रहवां दिन- फोतूला से मुलबेक
20. लद्दाख साइकिल यात्रा- अठारहवां दिन- मुलबेक से शम्शा
21. लद्दाख साइकिल यात्रा- उन्नीसवां दिन- शम्शा से मटायन
22. लद्दाख साइकिल यात्रा- बीसवां दिन- मटायन से श्रीनगर
23. लद्दाख साइकिल यात्रा- इक्कीसवां दिन- श्रीनगर से दिल्ली
24. लद्दाख साइकिल यात्रा के तकनीकी पहलू

34 comments:

  1. ईश्वर कश्मीर को किसी की नज़र न लगे। इतना सौन्दर्य दिया है, थोड़ी शान्ति भी दे दे।

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  2. Hard to believe people like मुश्ताक अहमद are in this world. God bless

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  3. भाई, मुझे तो यह बताओ कि यह साइकिल कौन सी है, कितने में खरीदी और इसमें आगे-पीछे दोनों शाक एब्जार्बर लगे हैं क्या..

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    1. मेरे पास Format की साइकिल है। अभी फिलहाल उसका मॉडल नम्बर नहीं पता। इसमें एल्यूमिनियम बॉडी, एल्यूमिनियम रिम, दोनों पहियों में डिस्क ब्रेक, केवल अगले पहिये में सस्पेंशन (शॉक एब्जार्वर), 7x3 का गियर अनुपात है। इसे पिछले साल 15000 में खरीदा था झण्डेवालां साइकिल बाजार से। किसी भी कम्पनी की हो, अगर उपरोक्त चीजें हैं तो सभी इतने ही रेट में उपलब्ध हैं।

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  4. कश्मीर की पहचान ये लम्बे लम्बे पेड़ ...कारगिल शहर बहुत खुबसूरत लगा भीड़ भी काफी थी---यही वो जगह थी जहाँ पिछली लड़ाई हुई थी ---तेरा दिल सडक ने जीता और मेरा जीत लिया खबसूरत नजारों ने ....वाह !!!!!
    मुस्लिम बच्चे कितने खुबसूरत है ..ये लोग इतने बच्चे क्यों पैदा करते है जब खिला नहीं सकते, एक बात समझ नहीं आई जब खाने को नहीं था तो बगेर पैसे लिए वो लड़का तुम्हे घर क्यों ले गया???
    कारगिल को देखकर एक गीत याद आ रहा है ----"ये कश्मीर है ....

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    1. दर्शन कौर जी,
      हम बडे बडे महानगरों में रहने वाले हमेशा ऐसा ही सोचते हैं। हमारे यहां खाने खिलाने के लिये बहुत भोजन है, लेकिन हम चाहते हैं कि कोई अतिथि तो क्या, रिश्तेदार तक न आ धमके।
      जबकि वहां ऐसा नहीं है। वे ऐसा नहीं सोचते।

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  5. pakistan ki range ki photo khinch kar badi himmat dikhayi....kbi socha nhi tha ki kargil me itni bheed b hogi...kbi vha jaunga to ye post boht kaam ayega....Thanks for posting such things....

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  6. "मैंने तुरन्त उसके पैरों की तरफ देखा। पैर तो ठीक थे। आगे की ओर ही थे और जमीन पर भी टिके थे"

    शुक्र है, आप बाल-बाल बचे। हा- हा- हा !!!

    - Anilkv

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  7. Mushtak Ahmed ka parivar kafi accha laga, is yatra ka sabse majedar pahlu ...sath main mehman ka swagat..

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  8. काश क़ि घर में एक अदद अंडा भी न होता .. तो इस यात्रा के साथ एक नया तजुर्बा जुड़ जाता ..

    आगे काम भी आता ..

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    1. सही कह रहे हो शर्मा जी। हर काम की कभी न कभी शुरूआत करनी ही होती है। इस बहाने मांसाहार की शुरूआत हो जाती, तो पूरी दुनिया अपनी हो जाती। कहीं भी आलू रोटी के लिये न भटकना पडता। लगता है किस्मत में अभी अण्डे खाने ही लिखे हैं।

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  9. नीरज भाई,
    कारगिल से आगे नदी किनारे की वोह मोटी सी दीवार दिखी की नहीं...
    वही दीवार है, जो पाकिस्तानी फायरिंग रेंज से सड़क और काफिले को बचने बनाई गए है...

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    1. हां जी, दिखी थी। एक तरफ पहाड और दूसरी तरफ नदी की साइड में दीवार। मैं सोच तो रहा था कि क्या मामला है लेकिन नजरअन्दाज कर दिया। आपने उसके बारे में बताकर अच्छा किया। धन्यवाद।

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  10. नीरज भाई , मांसाहार मत करना ! बाकी सब अपने आप ठीक हो जाएगा ! फोटो जबरदस्त !

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    1. अमन भाई, मांसाहार को तो तैयार बैठे हैं। लेकिन शाकाहार के संस्कार इतने मजबूत हैं कि आसानी से शुरूआत नहीं हो पा रही।

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    2. नीरज भाई , मेरे मांसाहार के संस्कार इतने मजबूत है की चाह कर भी तौबा नहीं कर पा रहा हूँ लेकिन दिल से मांसाहारी बने रहने का इच्छा नहीं करता !

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  11. Muslaman ka atithi prem dekhkar mansahar karne ko taiyar ho gaye . Aesa kesa atithi prem ?????????? Bachcheko dekhakar sari thakan dur ho jati he .
    Tum jalim kya janoge . Muslaman atithiprem ki bat se bahut naraj hu . Bachche to allha ki den he . Ha ha ha

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    1. श्री गायत्री जी, आप मेरे मुसलमान के घर में ठहरने से नाराज हैं, मैं आपकी इस संकीर्ण सोच पर नाराज हूं। हम कहीं भी घूमने जाते हैं। और कोशिश करते हैं कि वहां के स्थानीय माहौल में स्थानीय खाना भी मिल जाये तो यात्रा सफल हो जाये। लद्दाख जाते हैं तो बौद्धों के यहां, दक्षिण में जाते हैं तो तमिल-मलयालियों के यहां रुकना परम सौभाग्य मानते हैं। अगर कश्मीर गये तो कश्मीरियों के यहां रुकने पर ऐतराज क्यों?????
      ध्यान रहे कि मैं किसी मुसलमान के यहां नहीं रुका था। मैं कश्मीर में था और एक कश्मीरी परिवार में रुका था।

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    2. Neeraj , aapane likha he isaka aatithi prem dekhakar aaj muje mansahar bhi karna padega , me ghar se or mansahar se bhi naraj nahi hu magar atithi prem dekhakar khana padega .
      Hamara to itane din ka koi prem hi nahi he. Aap samaj gaye hoge jab aapke ghar me aaya tha .
      Jao is bat par me aashirvad deta hu ki aapake marrige ho jae . Shrp to nahi de shakta . Hamare ghar aap aaye the to pyar se 1/2 rotala diya tha vo bhi nahi khaya tha . Aap hamare HIRO he . UMESH JOSHI

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  12. खूबसूरत बच्चे, खूबसूरत नजारे
    मुसाफिर चल चला चल

    प्रणाम

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  13. नीरज जी बहुत बढिया याञा वणॅन व चिञ भी।अतिथी देवो भवः इस परमपरा को उस बचचे मुसताख अहमद ने बनायी रखी।

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  14. ULTIMATE PHOTOGRAPHY.....KARGIL VALLEY BEAUTIFUL....

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  15. शानदार वर्णन। कश्‍मीर में मुश्‍ताक के मिलने से हमें राहम मिली वरना कम से कम अपना अनुभव तो कश्‍मीरियों के साथ बहुत सुखद नहीं है... लद्दाखी कहीं अधिक जीवंत व सहृदय लोग लगे हमें तो।

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  16. अमां हमें तो लगा कि आप पाकिस्तान की ओर तो नहीं निकल लिए । क्या धांसू यात्रा और क्या धांसू फ़ांसू फ़ोटो हैं । हमें खुशी और फ़ख्र है कि आप जैसे जाबांज़ मित्तर हैं हमारे । घुमक्कडी जिंदाबाद ।

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  17. image pr caption ko jaroori karo neeraj bhai chaho to is masale pr voting kra lo

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    Replies
    1. सुपर बाजार साहब,
      हर फोटो पर कैप्शन लगाना मुझे ठीक नहीं लगता। अगर फोटो कहीं प्रतियोगिता में जा रहे हैं, तब तो ठीक है। जिस फोटो पर कैप्शन नहीं लगा है, मुझे उम्मीद है कि आप समझ जाते होंगे कि इस फोटो में क्या है और क्या दिखाने की कोशिश की गई है। जहां मुझे लगता है कि आप नहीं समझ सकेंगे, मैं कैप्शन लगा देता हूं।

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    2. "जहां मुझे लगता है कि आप नहीं समझ सकेंगे, मैं कैप्शन लगा देता हूं।"

      ----यानी नीरज को सब पता है कि लोग क्या समझ पायेंगे क्या नहीं ? क्या बात है जी...क्या कान्फीडेंस है जी ...क्या ज्ञान है जी....

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  18. Neeraj Bhai aap ghumakkar ho, yani ekdam neutral ho. Kahan rukte ho kahan khate ho kya khate ho is baat se koi antar nahi padta.
    Jo lok is tarah ki baat kartein hain wo bahot choti samaj wale hote hain.
    Aap lage raho.
    Thanks.

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  19. यूं तो अपना अपना शौक है जी...... पर हम तो यह सोचा रहे हैं पर पता ही नहीं चल रहा कि क्या काम-धाम छोड़कर व्यर्थ घूमने से ...अपने देश में लूट, भ्रष्टाचार,बलात्कार कम होसकते हैं क्या...

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    1. neeraj ke na ghumane se loot,bharshtachar,rape kam ho jayenge. aap ek travel blog pe ho. aapko travel enjoy karna chahiye.
      in my opinion, ye ek personal travel blog hai. jo bhi likha ja raha hai, wo neeraj ke apne vichar hain. kisi aur ko kyun problem honi chahiye.
      cities ke ac me rahne main aur ladakh travel kkarne me- wo bhi cycle pe- bahut fark hai. ise kewal wahi samajh sakta hai,jisne ye kiya hai.

      very well written neeraj, best blog in hindi, aise hi ghumte rahiye aur hame nai-nai jaghon ke darshan ghar baithe karate rahiye.

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    2. neeraj ke na ghumane se loot,bharshtachar,rape kam ho jayenge. aap ek travel blog pe ho. aapko travel enjoy karna chahiye.
      in my opinion, ye ek personal travel blog hai. jo bhi likha ja raha hai, wo neeraj ke apne vichar hain. kisi aur ko kyun problem honi chahiye.
      cities ke ac me rahne main aur ladakh travel kkarne me- wo bhi cycle pe- bahut fark hai. ise kewal wahi samajh sakta hai,jisne ye kiya hai.

      very well written neeraj, best blog in hindi, aise hi ghumte rahiye aur hame nai-nai jaghon ke darshan ghar baithe karate rahiye.

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    3. नीरजजाटजी, क्यों काम-धाम छोडकर व्यर्थ घूमते हो?
      श्याम गुप्ता जी की तरह दोहे, कविता, भजन-आरती लिखकर अपने देश में लूट, भ्रष्टाचार, बलात्कार कम करो भाई।
      आपको अन्दाजा भी नहीं है कि श्याम गुप्ता जी ने कितना अंकुश लगा दिया है, इन बुराईयों पर, बस आप और लग पडो तो समाप्त ही समझो।
      और एक-आध पोस्ट में Miss Diva और Fation shows के अखबारों की कटिंग भी लगाते रहियेगा।

      प्रणाम

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  20. shyam gupta ?ye kya cheez hai? बड़ी ही निम्न स्तर की सोच है इसकी

    इस के लिए जवाब तो मेरे पास भी बहुत अच्छा है लेकिन ये ब्लॉग किसी और का है उसकी मर्यादा का ख़याल रखते हुए कुछ नहीं लिख रहा .

    ट्रक के पीछे लिखा होता है " जलो मगर दिए की तरह खामखा फ़ुको मत "

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  21. neeraj ji ... kaafi achha likha hai aap ne.... pic kamal ki hai

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