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Friday, August 23, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- सत्रहवां दिन- फोतूला से मुलबेक

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20 जून 2013
यहां कोई पेड वेड तो थे नहीं कि टैण्ट पर छांव पड रही हो। जब सूरज निकला तो निकलते ही आग बरसाने लगा। टैण्ट के अन्दर यह आग और भी भयंकर लग रही थी। बाहर निकला तो शीतल हवाओं ने स्वागत किया। फटाफट टैण्ट उखाडा। साढे आठ बज चुके थे। देखा काफी सारे मजदूर मुझे देख रहे हैं। वो लद्दाखी चौकीदार पता नहीं सुबह भी आया या नहीं, लेकिन अब भी नहीं था। मैंने मजदूरों से उसके बारे मे पूछा तो बताया कि उसकी यहां चौकीदारी की रात की ही ड्यूटी होती है, दिन में वो अपने घर चला जाता है। असलियत शायद किसी को नहीं मालूम थी, लेकिन मैं जानता था कि वो पूरी रात अपने घर रहा था।
सवा नौ बजे यहां से चल पडा। फोतूला अभी भी आठ किलोमीटर है। चढाई तो है ही और जल्दी ही लूप भी शुरू हो गये। लेकिन चढाई मुश्किल मालूम नहीं हुई। फोतूला से करीब चार किलोमीटर पहले खराब सडक शुरू हो जाती है। इसका पुनर्निर्माण चल रहा है, फिर तेज हवाओं के कारण धूल भी काफी उडती है। चढाई भरे रास्ते पर जहां आपको अत्यधिक साफ हवा की आवश्यकता पडती है, यह धूल बहुत खतरनाक है।
प्यास लग रही थी, पानी था नहीं अपने पास। एक जगह एक कार खडी दिखी, मैं भी उनके पास सांस लेने के बहाने जा खडा हुआ। उन्होंने एक साइकिल वाले को देखकर आश्चर्ययुक्त पूछताछ करनी शुरू की। यहां मुझे पानी का एक इशारा करने भर की देर थी, भरी बोतल मिल गई।
ग्यारह बजे 4088 मीटर ऊंचे फोतूला पर पहुंच गया। यह लेह-श्रीनगर रोड पर स्थित तीन दर्रों में सबसे ऊंचा है। यहां पहुंचकर बडी राहत मिली कि पहली ही बार में इस सबसे ऊंचे दर्रे को पार कर लिया। अब जो भी दर्रे मिलेंगे, इससे नीचे ही होंगे। यहां दूरदर्शन का एक प्रसारण केन्द्र भी है।
फोतूला से 12 किलोमीटर आगे हानिसकोट गांव है। रास्ता ढलानयुक्त है। कुछ ही नीचे उतरा था कि कुछ मोटरसाइकिल वाले मिले, लेह और आगे मनाली जा रहे थे। पूरी तरह ढका होने के कारण वे यह नहीं जान सके कि यह भारतीय है या विदेशी। उन्होंने विदेशी समझा। जब मैं ढलान पर तेजी से उतरता जा रहा था तो एक ने चिल्लाकर दूसरे से कहा- ओये, इसे रोक, साइकिल वाले को। बातचीत करेंगे। हम भारतीयों की आदत है कि हम विदेशियों के बारे में आपस में तो खूब बात कर लेते हैं लेकिन उनसे सीधे बात करना पसन्द नहीं करते। कभी कभी अपवाद भी मिल जाते हैं। उनके लिये मैं अभी तक विदेशी ही था। किसी ने मुझे रुकने को नहीं कहा। बल्कि मैं खुद ही रुक गया। मेरे रुकते ही सब मेरे पास आ गये और पूछने लगे- सर, यू आर फ्रोम? मैंने अपने उसी ठेठ लहजे में कहा- भाई, दिल्ली। हंसी का फव्वारा फूट पडा और कहने लगे- धीरे का झटका जोर से लगा।
वे भी दिल्ली के ही थे। सबके पास बडी बडी मोटरसाइकिलें थीं। फिर भी कह रहे थे कि उनकी हालत खराब हुई जा रही है। चढाई पर मोटरसाइकिलें बहुत तंग करती हैं, चढती ही नहीं हैं, पता नहीं तुम कैसे साइकिल चढा लेते हो? सभी ने मेरे और साइकिल के साथ फोटो खींचे।
हानिसकोट से 9 किलोमीटर आगे बौद्ध खारबू है। यह जगह कारगिल जिले में है। लद्दाख में दो जिले हैं- लेह और कारगिल। लेह जहां बौद्ध प्रधान है वहीं कारगिल मुस्लिम प्रधान। अब यदा कदा मुसलमान भी दिखने लगे और लडकियां भी सिर ढके मिलने लगीं, छोटी छोटी बच्चियां भी। कारगिल जिले में खारबू नाम के दो गांव हैं। यह बौद्ध खारबू है। दूसरा खारबू मुस्लिम प्रधान है और कारगिल-द्रास के बीच में है। मैं कल वहां से गुजरूंगा।
बौद्ध खारबू 3500 मीटर की ऊंचाई पर है। गांव में हरियाली है, आसपास के पहाड लद्दाखी हैं यानी सूखे हैं। तेज धूप थी, आसमान में बादलों का नामोनिशान नहीं था, इसलिये पौने एक बजे जब यहां पहुंचा तो असहनीय गर्मी लग रही थी। सवा घण्टा एक ढाबे में रुका रहा, भोजन व हल्की नींद ले ली।
बौद्ध खारबू के बीच से एक नदी बहती है जो आगे सिन्धु में जाकर मिल जाती है। एक रास्ता भी सिन्धु की तरफ गया है और उसी खालसी-बटालिक सडक में जाकर मिल जाता है जिसे मैंने कल देखा था। अगर हम इसी नदी के साथ साथ इसी रास्ते पर चलते जायें तो उसी बटालिक वाले रास्ते पर पहुंच जायेंगे लेकिन वहां जाने के लिये परमिट लेना पडता है, इसलिये कारगिल जाने के लिये अभी एक दर्रा और पार करना पडेगा- नामिकला।
बौद्ध खारबू से 7 किलोमीटर आगे खंगराल है जहां तक रास्ता इसी नदी के साथ साथ है इसलिये ढलानयुक्त है। खंगराल से 11 किलोमीटर आगे नामिकला है। यह सारी दूरी चढाई है। सडक अच्छी बनी है।
मैं इसी सडक पर धीरे धीरे चल रहा था, तभी पीछे से एक मारुति आई। मेरी स्पीड तकरीबन चार की रही होगी, मारुति पांच की स्पीड से चल रही थी और मुझसे आगे निकल गई। कुछ गडबड थी उसमें। पूरा एक परिवार बैठा था। कुछ दूर जाकर वो एक मोड पार करके नजरों से ओझल हो गई। मैं उस मोड पर पहुंचा तो देखा बेचारी रुकी खडी है। यात्री बाहर निकलकर टहल रहे हैं। एक किलोमीटर ही आगे गया होऊंगा कि फिर से मारुति आगे निकल गई उसी चिर-परिचित स्पीड से। कुछ देर बाद पुनः मैंने उसे पछाड दिया जब वो आराम कर रही थी। ऐसा तीन बार हुआ। तीसरी बार तो यात्री जब निकले, मेरी तरफ एक मुस्कान छोडते हुए गये। और जब मैं उनसे आगे निकला तो मैं भी मुस्कान छोडता हुआ गया। तीन बार ऐसा होने से लगा कि साइकिल और मारुति की रेस हो रही है, कभी साइकिल आगे, कभी मारुति। अन्त में मारुति आंखों से हमेशा के लिये ओझल हो ही गई।
चार बजे जब 3600 मीटर का लेवल पार कर लिया और नामिकला छह किलोमीटर रह गया तो साइकिल चलानी मुश्किल होने लगी। यह उच्च पर्वतीय बीमारी नहीं थी। मैं लगातार 4000 मीटर से ऊपर साइकिल चलाता आ रहा था, आज सुबह सफलतापूर्वक फोतूला भी पार कर लिया, फिर यहां कम ऊंचाई पर मुश्किल क्यों? असल में शरीर ने मना कर दिया था। शरीर बहुत थक गया था। आज जब से चलना शुरू किया चढाई ही चढाई रही, अगर फोतूला से बौद्ध खारबू तक घण्टे भर की उतराई को छोड दें तो। फिर जालिम मौसम। शरीर बुरी तरह थक चुका था, आराम की सख्त जरुरत थी। जैसे जैसे नामिकला नजदीक आता गया, शरीर मना करता गया। आखिरकार दो किलोमीटर पहले ऐसे हालात हो गये कि पैदल चलना पडा।
पांच बजे नामिकला पहुंचा। इसकी ऊंचाई 3820 मीटर है। यहां लगे सूचना पट्ट पर इसकी ऊंचाई 12198 फीट लिखी है जिसका अर्थ है 3718 मीटर। जबकि मेरा जीपीएस इसे 3820 मीटर बता रहा था। अपने यन्त्र की बात मानूंगा मैं।
यहां एक अदभुत नजारा दिखता है। एक दिशा में कुछ दूर तक रेतीले पहाड हैं, फिर उनके बाद विशाल चट्टानी पहाड। देखने में बडा अदभुत लगता है यह।
दर्रे पार करके वैसे तो उतराई आती है लेकिन नामिकला इसका अपवाद है। करीब दो किलोमीटर तक बिल्कुल भी उतराई नहीं है बल्कि मामूली सी चढाई है। मेरे यन्त्र ने दो किलोमीटर आगे ऊंचाई बताई- 3823 मीटर यानी नामिकला से ऊंचा। इसके बाद तेजी से उतराई आती है। सडक अच्छी है, मजा आता है साइकिल चलाने में। एक बार तो चार पांच किलोमीटर तक एक मेटाडोर से आगे निकलने की जुगत में रहा लेकिन अपनी हैसियत को देखते हुए ब्रेक लगा लगाकर उसके पीछे ही रहना पडा।
मुलबेक से तीन किलोमीटर पहले वाखा है। मुझे यहां मुसलमान ही दिखाई दिये। अभी तक लेह में ही थोडे बहुत मुसलमान दिखे थे। यानी अब मुसलमानों की शुरूआत हो गई। उधर तीन किलोमीटर आगे मुलबेक है जो बौद्धों का आखिरी गांव है। वाखा-मुलबेक मुस्लिम-बौद्ध सीमा है। कारगिल की तरफ बढेंगे तो मुसलमान और लेह की तरफ जायेंगे तो बौद्ध।
3250 मीटर की ऊंचाई पर बसे मुलबेक में पौने सात बजे एक गेस्ट हाउस में कमरा लिया। चार सौ से कम करके तीन सौ में मिल गया। यहां कई गेस्ट हाउस हैं जहां तीन चार या पांच सौ तक के रेट हैं। इससे पहले एक और गेस्ट हाउस में गया था, वो पांच सौ कह रहा था। मैंने तीन सौ के लिये कहा तो चार सौ तक आ गया था, उससे नीचे नहीं। उसी ने बताया कि मुलबेक से एक किलोमीटर नीचे कई गेस्ट हाउस हैं। वहां अगर इससे कम में मिल जाये तो कहना। उसने यह भी शर्त रखी कि आखिरकार आपको लौटकर मेरे पास ही आना पडेगा। ऐसी नौबत नहीं आई क्योंकि तीन सौ में मिल गया था।
मुलबेक में बुद्ध की एक विशालकाय मूर्ति है जो बडी चट्टान पर बनाई गई है। शुक्र है कि धर्म परिवर्तन के समय मुसलमान लद्दाखियों ने इसे बख्श दिया। मुलबेक इसी के कारण प्रसिद्ध है। गेस्ट हाउस जाते समय यह मेरे रास्ते में पडी थी। सोचा कि सुबह इसे देखूंगा लेकिन रात किये वादे सुबह किसे याद रहते हैं?
आज 59 किलोमीटर साइकिल चलाई जिसमें दो दर्रे फोतूला और नामिकला भी पार किये। दूरी तो खैर ज्यादा नहीं है लेकिन सोचकर रोमांच हो आता है कि साइकिल से एक ही दिन में दो दर्रे पार कर लिये वो भी 4100 मीटर व 3800 मीटर ऊंचे।

फोतूला से कुछ नीचे लगा टैण्ट



फोतूला की ओर


फोतूला ज्यादा दूर नहीं





रास्ते में मिले दिल्ली के मोटरसाइकिलबाज।



बौद्ध खारबू गांव



नामिकला की ओर जाती सडक





सामने नामिकला है।


आज ही नामिकला भी पार कर लिया- एक ही दिन में दो दो दर्रे साइकिल से।







मुलबेक में इसी गेस्ट हाउस में रुका था।

मेरा कमरा


लाइट चली गई इसलिये मोमबत्ती जलाकर खाना खाया। अपने ही आप कैण्डल लाइट डिनर हो गया।
अगले भाग में जारी...

मनाली-लेह-श्रीनगर साइकिल यात्रा
1. साइकिल यात्रा का आगाज
2. लद्दाख साइकिल यात्रा- पहला दिन- दिल्ली से प्रस्थान
3. लद्दाख साइकिल यात्रा- दूसरा दिन- मनाली से गुलाबा
4. लद्दाख साइकिल यात्रा- तीसरा दिन- गुलाबा से मढी
5. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौथा दिन- मढी से गोंदला
6. लद्दाख साइकिल यात्रा- पांचवां दिन- गोंदला से गेमूर
7. लद्दाख साइकिल यात्रा- छठा दिन- गेमूर से जिंगजिंगबार
8. लद्दाख साइकिल यात्रा- सातवां दिन- जिंगजिंगबार से सरचू
9. लद्दाख साइकिल यात्रा- आठवां दिन- सरचू से नकी-ला
10. लद्दाख साइकिल यात्रा- नौवां दिन- नकी-ला से व्हिस्की नाला
11. लद्दाख साइकिल यात्रा- दसवां दिन- व्हिस्की नाले से पांग
12. लद्दाख साइकिल यात्रा- ग्यारहवां दिन- पांग से शो-कार मोड
13. शो-कार (Tso Kar) झील
14. लद्दाख साइकिल यात्रा- बारहवां दिन- शो-कार मोड से तंगलंगला
15. लद्दाख साइकिल यात्रा- तेरहवां दिन- तंगलंगला से उप्शी
16. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौदहवां दिन- उप्शी से लेह
17. लद्दाख साइकिल यात्रा- पन्द्रहवां दिन- लेह से ससपोल
18. लद्दाख साइकिल यात्रा- सोलहवां दिन- ससपोल से फोतूला
19. लद्दाख साइकिल यात्रा- सत्रहवां दिन- फोतूला से मुलबेक
20. लद्दाख साइकिल यात्रा- अठारहवां दिन- मुलबेक से शम्शा
21. लद्दाख साइकिल यात्रा- उन्नीसवां दिन- शम्शा से मटायन
22. लद्दाख साइकिल यात्रा- बीसवां दिन- मटायन से श्रीनगर
23. लद्दाख साइकिल यात्रा- इक्कीसवां दिन- श्रीनगर से दिल्ली
24. लद्दाख साइकिल यात्रा के तकनीकी पहलू

13 comments:

  1. बहुत सुन्दर जगह है, बेहद सुन्दर चित्र.

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  2. सुन्दर अति सुन्दर, और क्या कहू बस.......

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  3. वाह, पढ़कर लग रहा है कि पेड़ों के अभाव में जीवन कैसे बीतता होगा।

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  4. आपकी हर पोस्ट लाजवाब है और फोटो का तो कहना ही क्या अति सुंदर ा

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  5. BHAI YH BTA KADE PHUNCHANNGE SHRINAGAR PHADO MEIN DARR LAAG RYA SE..RAM RAM

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  6. अदम्य साहस की अदभुत दास्तान। वाह !!
    - Anilkv

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  7. नीरज भाई बहुत खूबसूरत चिञ है।एक चिञ मे आपकी साईकल किसने उठा रखी हे? आपने अनुमती कैसे दे दी?

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  8. शानदार
    हमेशा की तरह

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  9. एक बात है नीरज बाबू (बुरा मत मानना और मान भी जाओ तो क्या ?) लेकिन आप को कहीं न कहीं इस बात का गहराई से अहसास था कि आप को विदेशी समझा जा रहा है....और आप ने लगभग पोस्टों में गाहे बगाहे इंगित भी किया है !!

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  10. photo bahut hi sandar liye hai niraj,mera bhi man ho gaya jane ko,

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  11. बहुत सुंदर ...अगर बोद्ध की बड़ी मूर्ति की भी तस्वीर होती तो मज़ा आता

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