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Wednesday, August 14, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- चौदहवां दिन- उप्शी से लेह

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17 जून 2013
सात बजे आंख खुली। देखा उसी कमरे में कुछ लोग और भी सोये हुए हैं। पता चला ये लेह से मनाली जा रहे थे। रात ग्यारह बजे जब उप्शी से गुजरे तो पुलिस ने रोक दिया। कहा आगे रास्ता बन्द है। मजबूरन इन्हें रातभर के लिये यहां शरण लेनी पडी। बाहर झांककर देखा तो सडक पर एक बैरियर लगा था व गाडियों की कतारें भी। लेह से दिल्ली जाने वाली बस भी यहीं खडी थी।
तंगलंग-ला पर दो दिनों से बर्फबारी हो ही रही है। मैंने भी इसे बर्फीला ही पार किया था। आज मौसम और बिगड गया होगा, तो रास्ता बन्द कर दिया। अब कहा जा रहा है कि जब तंगलंग-ला के दूसरी तरफ से कोई गाडी आ जायेगी, तभी यहां से आगे भेजा जायेगा। लेकिन मुझे एक सन्देह और भी है। यहां से रूमसे तक रास्ता बडे खतरनाक पहाडों के नीचे से होकर गुजरता है। रात बारिश हुई होगी तो थोडा बहुत भू-स्खलन हो गया होगा। उससे बचाने के लिये उप्शी में यातायात रोक रखा है। नहीं तो मीरु, ग्या, लातो व रूमसे में भी रुकने के इंतजाम हैं। वहां से तंगलंग-ला नजदीक भी है। पता नहीं कब तंगलंग-ला खुलेगा, उसके कम से कम दो घण्टे बाद कोई गाडी यहां तक पहुंचेगी, तब यहां से यातायात आगे बढेगा।
सवा दस बजे उप्शी से चल पडा। रास्ता सिन्धु के दाहिने किनारे के साथ साथ है। कारु यहां से 14 किलोमीटर है और वहां मुझे एयरटेल का नेटवर्क मिलने वाला है। अभी तक दुनिया में किसी को नहीं पता कि मैं कहां हूं और मुझे भी नहीं पता कि दुनिया कहां है। कारू में पता चलेगा।
पांच कनाडाई साइकिल वाले मिले। मनाली से आ रहे थे व लेह जा रहे थे। उनकी साइकिलें व पहनावा देखकर लगा कि पेशेवर साइकिलिस्ट होंगे। रात लातो में रुके थे।
कारु में बहुत बडा सैनिक अड्डा भी है। मैं अक्सर सैनिक महत्व की जगहों पर रुकना नहीं चाहता और फोटो तो कभी नहीं। लेकिन ज्यादातर रास्ता ढलानयुक्त था, रुकने की आवश्यकता ही नहीं पडी।
कारु में प्रवेश से बिल्कुल पहले एक रास्ता सिन्धु पार करके हेमिस जाता है। हेमिस में लद्दाख क्षेत्र का सबसे बडा गोम्पा है। देखा हेमिस जाने के लिये सिन्धु पार करके चढाई चढनी है तो वहां जाने का इरादा बदल लिया।
बारह बजे कारू पहुंचा। यहां से पेंगोंग झील जाने के लिये रास्ता अलग होता है। मोटरसाइकिलों व कारों की भीड देखी। चांग-ला बन्द है, इसलिये सभी को यहीं रोका हुआ है।
नेटवर्क आ गया तो सबसे पहले घर पर बात हुई। पता चला उत्तराखण्ड में जबरदस्त बारिश हो रही है और बादल भी फट रहे हैं। केदारनाथ व गंगोत्री क्षेत्र में भयंकर तबाही होने की खबर पता चली। मैंने अपने बारे में बताया कि यहां ऊंचे दर्रों पर थोडी सी बर्फ अवश्य गिरी है, मौसम भी खराब है लेकिन लद्दाख में इससे ज्यादा की उम्मीद भी नहीं है। घरवाले चिन्ता में बैठे थे कि कहीं लडका भी किसी बादल फटने की भेंट न चढ गया हो, बात करके तसल्ली मिली।
अब मुझे डर है वापसी की यात्रा का। हिमालय पार का तो भरोसा है, सही सलामत जोजीला तक पहुंच जाऊंगा। उससे आगे हिमालय शुरू हो जायेगा, मानसून उत्तर भारत पर कब्जा जमा ही चुका है, मुझे भी परेशान कर सकता है। फिर श्रीनगर से जम्मू की 300 किलोमीटर की दूरी जो बस से तय करनी है, भी आपदाविहीन नहीं है। अगर बारिश ज्यादा हो गई तो वो रास्ता भी बन्द हो सकता है।
मैं जब यात्रा पर होता हूं, तो खाने के साथ कोल्ड ड्रिंक लेना पसन्द करता हूं। अभी तक तय रेट से दस रुपये ज्यादा चुकाने पड रहे थे, अब एक भी रुपया फालतू नहीं। तीस रुपये मतलब तीस रुपये। मनाली में पैंतीस की मिली थी। पूछा तो बताया भाई पहाड है, महंगी हो ही जाती है आते आते। कारू तक तो सौ रुपये की हो जानी चाहिये थी। लद्दाख की बनी हुई नहीं थी, नीचे की ही है बनी हुई।
साढे बारह बजे कारू से चल पडा। लेह 35 किलोमीटर है, आज ही पहुंचना है। स्टैक्ना दस किलोमीटर है। किलोमीटर के पत्थरों पर ज्यादातर अंग्रेजी में लिखा है, लेकिन अक्सर हिन्दी भी दिख जाती है। स्टैक्ना (Stakna) को सटकना लिखा देखकर हंसी आ गई। स्टैक्ना में गोम्पा भी है। बिल्कुल भी इच्छा नहीं है गोम्पा देखने की। लेह पहुंचना है बस। यात्रा का पहला चरण जल्द से जल्द पूरा करना है।
डेढ बजे स्टैक्ना पार हो गया। यहां से तीन किलोमीटर आगे रणबीरपुर है। बौद्ध देश में हिन्दू नाम देखकर लगा कि नया गांव ही होगा लेकिन जब याद आया कि 1933 में राहुल सांकृत्यायन ने भी अपनी लद्दाख यात्रा में इस स्थान का जिक्र किया था तो इसकी प्राचीनता का आभास हुआ। रणबीरपुर में मुसलमान दिखाई दिये।
रणबीरपुर से तीन किलोमीटर आगे ठिक्से है। ठिक्से भी अपने गोम्पा के कारण प्रसिद्ध है। दो बजे जब ठिक्से पहुंचा तो बिल्कुल भी इच्छा नहीं थी साइकिल से उतरने की। बैठे बैठे ही गोम्पा का एक फोटो खींचा और आगे बढ गया।
जनवरी में जब लद्दाख आया था तो ठिक्से आने की बडी प्रबल इच्छा थी। शे तक तो आ गया था लेकिन बस न मिलने के कारण उससे चार किलोमीटर आगे ठिक्से तक नहीं आ पाया था। आज आ भी गया, गोम्पा को ढंग से देखने का समय भी था लेकिन मन नहीं था।
कारू के बाद से ही लगातार मानव आबादी मिलती जा रही है। छोटे बडे गांव भी रास्ते में आते जा रहे हैं। सिन्धु के पानी का भरपूर प्रयोग करके इलाके को हरा-भरा बनाने की सफल कोशिश की गई है। चारों ओर मिट्टी के बंजर व उजाड पहाड और बीच बीच में ठेठ हरियाली आंखों को बडा सुकून देती। जनवरी में जब यहां आया था तो पेड खुद ठिठुरे थे, पत्तियों का नामो-निशान नहीं था। तब पेडों के ये ढांचे ऐसे लगते थे मानों बडे पैमाने पर निर्माण कार्य चल रहा हो व यह पिलर आदि के लिये लगाये गये सरिये हों।
शे में प्रवेश करते ही वो स्थान दिख गया जहां जनवरी में पूजा चल रही थी। आज वहां कोई नहीं था। उससे आगे शे पैलेस जो तब बिल्कुल खाली था, अब पर्यटकों से भरा है। शे पैलेस के सामने कई गाडियां खडी थीं व कुछ दुकानें भी थीं। मैंने बाहर से ही एक फोटो लिया और अपनी राह ली।
सिन्धु घाट पर धूल ही धूल थी, नवीनीकरण का काम चल रहा था। दो दिन पहले तक इच्छा थी कि सिन्धु घाट पर कुछ समय बिताऊंगा, लेकिन अब जल्दी थी लेह पहुंचने की।
चोगलमसर में छोटा सा जाम लगा मिला। जनवरी में भी यह भीड-भाड वाला स्थान था, अब भी है। व्हिस्की नाले वाले सेरिंग साहब याद आ गये। वे यहीं के रहने वाले थे व अपने घर जाने का न्यौता दिया था। फोन नम्बर भी दिया था। उसी समय सोच लिया था कि उनके घर नहीं जाऊंगा, नहीं गया।
जेल के सामने कुछ देर रुका। यहां मैंने जनवरी में कई दिन बिताये थे। भाई विकास सीआरपीएफ में है तो उसकी तैनाती यहीं थी। अब विकास की कम्पनी यहां नहीं है तो यह स्थान मेरे किसी काम का नहीं। जेल से आगे थोडी सी चढाई है। मैं तंगलंग-ला पार करके लगातार नीचे ही उतरता जा रहा था, भूल गया था चढाईयों को। इस दो-तीन किलोमीटर की चढाई को चढने में बडी परेशानी हुई। इसी चढाई पर चलते हुए अगर पीछे देखें तो बडा शानदार नजारा दिखता है। लेकिन इस बार सब सूखा हुआ था। जनवरी में जब चप्पे चप्पे पर बर्फ थी, तो मजा आता था इस नजारे को देखने में। अब उतना मजा नहीं आया। हालांकि ऊंचे पहाडों पर पिछले दो दिनों में थोडी सी बर्फ अवश्य पडी है।
चार बजे सवारी लेह के मुख्य चौक पहुंची। यहीं से श्रीनगर वाली सडक बायें जाती है। मुझे पता था कि अगर मैं लेह शहर में प्रवेश करता हूं, तो पूरा रास्ता चढाई भरा है। इसलिये पहले तो सोचा कि हवाई अड्डे की तरफ मुड जाता हूं। रास्ते में कोई होटल मिल जायेगा तो रुक जाऊंगा। फिर सोचा कि आज लेह ही रुकते हैं। यात्रा का एक अहम हिस्सा समाप्त हो रहा है, तो लेह रुककर ही इसका जश्न मनाया जाये। कल तो दूसरा हिस्सा शुरू कर ही देना है- लेह-श्रीनगर वाला। शहर की तरफ साइकिल मोड दी।
चढाई है। अस्पताल तक तो साइकिल चला ली, उसके बाद नहीं चला सका। बहुत ज्यादा चढाई है। पैदल लेकर चल पडा। लेह शहर की सडकों की मुझे ठीक-ठाक जानकारी है। टैक्सी स्टैण्ड के पास यह सडक तीन हिस्सों में बंट जाती है। एक बायें जाती है मुख्य बाजार की तरफ, यहीं आगे शान्ति स्तूप भी चली जाती है। दूसरी हल्की सी दाहिने डीसी ऑफिस की तरफ व तीसरी... अगर ध्यान से न चलें तो यह तीसरी खारदूंग-ला वाली सडक दिखाई ही नहीं देती।
मैंने टैक्सी स्टैण्ड के पास ही एक होटल में कमरा देखा। गीजर की सख्त आवश्यकता थी। उन्होंने कहा सुबह ही गर्म पानी आयेगा। किराया सात सौ रुपये। मुझे गीजर चाहिये था। सात सौ भी दूं और गीजर न मिले, यह कमरा छोड दिया। इसके बाद मुख्य बाजार की तरफ चल पडा। बाजार पार करके एक पतली गली के मुहाने पर कई गेस्ट हाउसों के विज्ञापन दिखाई दिये। छह सौ में एक कमरा मिला। गीजर यहां भी नहीं मिला लेकिन कहा कि सुबह सात से ग्यारह बजे तक गर्म पानी उपलब्ध रहेगा। उसने बताया कि लेह में गीजर नहीं हैं। उसके स्थान पर लकडी से पानी गर्म करने का सिस्टम है जो आपके बाथरूम में स्वतः ही आता रहेगा। मैं यहीं ठहर गया।
कितने दिनों बाद आज शीशा मिला। अपना चेहरा देखा। अरे, यह कौन है? बन्दर भी इससे अच्छे दिखते होंगे। फिर यह बेतरतीब बढी दाढी। दाढी रखने का शौक था तो इसे अच्छी तरह रखता था। अब मतलब ही नहीं अच्छी तरह रखने का। अपना चेहरा मुझे ही अच्छा नहीं लगा। तभी नाई के यहां जाकर दाढी सफाचट करा आया। चेहरा काला हो गया है, लद्दाख की निशानी। अब आगे की पूरी यात्रा में इसे ढककर रखूंगा। दिल्ली जाकर लगे कि चेहरा ज्यादा नहीं बिगडा है। सबसे ज्यादा नुकसान नाक का हुआ है। जल गई तो अब पपडी उतर रही है।
मैं लेह तीन दिन विलम्ब से पहुंचा। एक दिन तो रोहतांग से पहले ही खराब हो गया था जब दिन भर में गुलाबा से मढी मात्र तेरह किलोमीटर ही चला। दूसरा दिन खराब हुआ व्हिस्की नाले पर जब मैं खराब मौसम और अत्यधिक ऊंचाई के कारण ग्यारह किलोमीटर से आगे नहीं बढ सका और तीसरा दिन खराब हुआ तंगलंग-ला पर। दस दिन की योजना थी लेह पहुंचने की, तेरह दिन लग गये।
खारदूंग-ला यानी दुनिया की सबसे ऊंची सडक। जाने का मन तो था लेकिन यात्रा शुरू करने से पहले। अब मैं 3400 मीटर की ऊंचाई पर हूं। खारदूंग-ला यहां से 40 किलोमीटर आगे है लेकिन लेह से 2000 मीटर ऊपर भी है। 40 किलोमीटर तो मैं चल देता लेकिन अब 2000 मीटर ऊपर चढना बस की बात नहीं है। नहीं जाऊंगा खारदूंग-ला। वैसे भी मौसम खराब चल रहा है, दोपहर तक तो वो बन्द भी रहा था। न जाने का एक बहाना और मिल गया।
होटल वाले से विमर्श चल रहा था इस यात्रा के बारे में। मैंने पूछा अभी तक तो सडक ज्यादातर खराब ही रही, आगे कैसी है? बोला बेहतरीन है। रास्ते में गांव भी मिलते रहेंगे। कल आप आराम से कारगिल पहुंच जाओगे। मैंने कहा नहीं भाई, साइकिल है, मोटरसाइकिल नहीं। तीन दिन लगेंगे कारगिल पहुंचने में। शायद चार दिन भी लग जायें। उसने ऐसे देखा जैसे कह रहा हो कारगिल पहुंचने में अगर चार दिन लगायेगा तो किस बात का साइकिलबाज?
लेह शहर में घूमने का कोई इरादा नहीं है। वैसे तो जनवरी में अच्छी तरह घूमा था यहां। तब गलियों में बर्फ जमी रहती थी व उस ठोस बर्फ पर चलते हुए ऐसा लगता कि पता नहीं कब फिसल जायें। बहुत डर डर कर चलना होता था। आज बर्फ तो नहीं है लेकिन वो डर अभी तक कायम है।
लेह का एक भी फोटो नहीं खींचा। मैं फोटो तभी खींचता हूं, जब मन करता है। मन नहीं किया, फोटो भी नहीं खींचा।
कमरे में टीवी भी लगा था। अब तक केदारनाथ में प्रलय आ चुकी थी। मुझे उसका कोई आभास तक नहीं था। मैं समाचार चैनल देखना पसन्द नहीं करता। चार घण्टे ये चैनल देखकर उतनी जानकारी नहीं मिलती जितनी अगले दिन पन्द्रह मिनट अखबार पढकर मिल जाती है।
सोने से पहले सोच रहा हूं अपनी यात्रा के पहले चरण के बारे में। मनाली-लेह सडक पर साइकिल चलाने के बारे में। 474 किलोमीटर की दूरी, पांच दर्रे, कहीं कहीं अच्छी सडक भी है लेकिन कुल मिलाकर खराब सडक, कई कई दिनों तक कोई गांव नहीं; ये सब चीजें इसे दुनिया की खतरनाक सडक का दर्जा दे देते हैं। इस सडक पर कुछ भी चलाना बडे जोखिम का काम है। साइकिल से इस सडक को पार करना, अपनी बहुत बडी सफलता व उपलब्धि मान रहा हूं। गर्व हो रहा है स्वयं पर।

उप्शी में लगा बैरियर और वाहनों की कतारें

उप्शी में हिमाचल परिवहन की लेह से दिल्ली जाने वाली बस

उप्शी के पास पेट्रोल पम्प

सिन्धु तीरे लेह की ओर



कनाडाई साइकिलबाज लेह की ओर

कारू सैन्य इलाके में लगा किलोमीटर का पत्थर

कारू






स्टैक्ना गोम्पा



मनाली से 450 किलोमीटर दूर

हरियाली देखकर यकीन नहीं होता कि यह लद्दाख है लेकिन पहनावा देखकर हो जाता है।

ठिक्से गोम्पा



चोगलमसर




लेह में आपका स्वागत है।

लेह का मुख्य चौक

लेह शहर का प्रवेश द्वार
अगले भाग में जारी...

मनाली-लेह-श्रीनगर साइकिल यात्रा
1. साइकिल यात्रा का आगाज
2. लद्दाख साइकिल यात्रा- पहला दिन- दिल्ली से प्रस्थान
3. लद्दाख साइकिल यात्रा- दूसरा दिन- मनाली से गुलाबा
4. लद्दाख साइकिल यात्रा- तीसरा दिन- गुलाबा से मढी
5. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौथा दिन- मढी से गोंदला
6. लद्दाख साइकिल यात्रा- पांचवां दिन- गोंदला से गेमूर
7. लद्दाख साइकिल यात्रा- छठा दिन- गेमूर से जिंगजिंगबार
8. लद्दाख साइकिल यात्रा- सातवां दिन- जिंगजिंगबार से सरचू
9. लद्दाख साइकिल यात्रा- आठवां दिन- सरचू से नकी-ला
10. लद्दाख साइकिल यात्रा- नौवां दिन- नकी-ला से व्हिस्की नाला
11. लद्दाख साइकिल यात्रा- दसवां दिन- व्हिस्की नाले से पांग
12. लद्दाख साइकिल यात्रा- ग्यारहवां दिन- पांग से शो-कार मोड
13. शो-कार (Tso Kar) झील
14. लद्दाख साइकिल यात्रा- बारहवां दिन- शो-कार मोड से तंगलंगला
15. लद्दाख साइकिल यात्रा- तेरहवां दिन- तंगलंगला से उप्शी
16. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौदहवां दिन- उप्शी से लेह
17. लद्दाख साइकिल यात्रा- पन्द्रहवां दिन- लेह से ससपोल
18. लद्दाख साइकिल यात्रा- सोलहवां दिन- ससपोल से फोतूला
19. लद्दाख साइकिल यात्रा- सत्रहवां दिन- फोतूला से मुलबेक
20. लद्दाख साइकिल यात्रा- अठारहवां दिन- मुलबेक से शम्शा
21. लद्दाख साइकिल यात्रा- उन्नीसवां दिन- शम्शा से मटायन
22. लद्दाख साइकिल यात्रा- बीसवां दिन- मटायन से श्रीनगर
23. लद्दाख साइकिल यात्रा- इक्कीसवां दिन- श्रीनगर से दिल्ली
24. लद्दाख साइकिल यात्रा के तकनीकी पहलू

12 comments:

  1. Prakruti kitni ajib cheeze hai,

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  2. आपकी यह यात्रा, आपके लिए गर्व का, हमारे लिए सुखद आश्‍चर्य का विषय.

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  3. Garv kane jaisi baat hai he, her kisi k bus ki bat nahi itni door durgam pahadiyon per cycle se jana paanch darre par parna..

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  4. गर्व होना भी चाहिये

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  5. Dadhi moonchen safaachat karai thi tho dikha bhi dete.. photo dekgne walon ki najer nahi lagti... :-))

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  6. सितम्बर में, मैं भी लेह पहुँचने वाला हूँ लेकिन आपने 15 दिनों पहले ही पहुंचा दिया।

    वैसे ऊपर आपकी ये पंक्तियाँ काफी अच्छी लगी - "अभी तक दुनिया में किसी को नहीं पता कि मैं कहां हूं और मुझे भी नहीं पता कि दुनिया कहां है"

    हमेशा की तरह बेहतरीन तस्वीरें।

    - Anilkv

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  7. भाई साहब् आपका साफ सुथरा चेहरा देखने की कामना है। काफी दिनो से दाढी रखी हुई ना आपने।

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  8. नीरज जी नमस्कार! जो बात शब्द बयां न कर सके वह एक तस्वीर बयां कर देती है। आप की यात्रा मंगलमय हो!

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  9. बहुत सुन्दर चित्र..उतना ही सुन्दर वृत्तान्त।

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  10. एक बार हवाई जहाज से और दूसरी बार सायकिल से वेलकम टू लेह !!!

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  11. यह गोम्पा किसे कहते है भाई .....लेह पहुचने की बधाई ....केदारनाथ की तबाही को देखकर मुझे तेरी और अतुल की याद आई थी

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  12. बेहद खूबसूरत वर्णन....सुंदर शैली...आपके अदम्य साहस की दाद देता हूँ

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