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Monday, August 12, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- तेरहवां दिन- तंगलंग-ला से उप्शी

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16 जून 2013
सात बजे आवाजें सुनकर आंख खुली। थोडे से खुले दरवाजे से बाहर निगाह गई तो बर्फ दिखाई दी। यानी रात बर्फ पडी है। मजदूरों ने बढा-चढाकर बताया कि बहुत ज्यादा बर्फ गिरी है। मैंने बाहर निकलकर देखा तो पाया कि दो इंच से ज्यादा नहीं है। तंगलंग-ला यहां से ज्यादा दूर नहीं है, इसलिये वहां भी इससे ज्यादा बर्फ की सम्भावना नहीं। पुरानी बर्फ पर चलना मुश्किल भरा होता है, फिसल जाते हैं लेकिन ताजी बर्फ पर ऐसा नहीं है। ज्यादा बर्फ नहीं है तो फिसल नहीं सकते। हां, ज्यादा बर्फ में धंसने का खतरा होता है। यहां तो दो ही इंच बर्फ थी, सडक से तो वो भी खत्म हो गई थी। आने-जाने वाली गाडियों ने उसे कुचलकर खत्म कर दिया था। यह मेरे लिये और भी अच्छा था।
साइकिल पर भी थोडी सी बर्फ थी, उसे झाडकर हटा दिया। सामान बांधा व सवा आठ बजे निकल पडा। खाने-पीने का तो सवाल ही नहीं। पानी की बोतल जरूर भर ली। मेरी एक-एक गतिविधि मजदूरों के लिये तमाशा थी। उठने से लेकर अलविदा कहने तक उनकी भावहीन आंखें मेरे चेहरे व हाथों पर ही जमी रहीं।
सडक पर कीचड हो गई थी। पानी भी जमा हुआ था। साइकिल का पहिया जमे पानी से गुजरता तो पटर-पटर की आवाज आती। लेकिन ज्यादा दूर साइकिल नहीं चला पाया। सांस लेने में परेशानी होने लगी। हालांकि रात 5130 मीटर की ऊंचाई पर सफलतापूर्वक बिताई थी लेकिन फिर भी शरीर का अनुकूलन नहीं हो पाया। ऊपर से भूख। मुझे खाना खाये चौबीस घण्टे हो चुके थे।
साइकिल से उतरना पडा व पैदल चलना पडा। चप्पल व मोजे कब तक पैरों की रक्षा करते? जल्दी ही ये भीग गये व पैरों की उंगलियां ठण्डी पडने लगीं। रास्ते पर चलने के दो ही विकल्प थे- या तो कीचड में चलो या दो इंच बर्फ में। मैंने यथासम्भव दूसरा विकल्प चुना।
इन परेशानियों के बावजूद एक शानदार बात भी थी। सभी पहाडियां बर्फ से ढक गई थीं। नीचे की घाटियों में बर्फ नहीं पडी थी। मौसम खुला था। मैं नीचे मोरे मैदान को शुरू होते देख सकता था जो पचास किलोमीटर दूर पांग तक चला गया है। दूर गडरिये व उनकी भेडें पहाड पर धब्बे से दिखाई पड रहे थे।
पीछे कुछ दूर सडक पर ही एक जानवर दिखाई दिया। शरीर कुत्ते जैसा था लेकिन लद्दाखी कुत्तों की मुझे बखूबी पहचान है। यह हड्डियों का ढांचा ही दिखाई दे रहा था। बडी तेजी से मेरी ओर बढ रहा था। पूंछ लम्बी थी, मुंह पैनापन लिये था। मैदान में होता तो शायद मैं इसे गीदड घोषित कर देता लेकिन पता नहीं लद्दाख में गीदड होते हैं या नहीं। भेडिये जरूर होते हैं। तो क्या यह भेडिया है?
उंगलियां सुन्न होने के बावजूद भी मैंने पत्थर उठाने का निश्चय कर लिया। लेकिन मेरी ‘फायरिंग रेंज’ में आने से पहले ही यह सडक छोडकर पहाड पर चढ गया। हिमाच्छादित वनस्पतिविहीन पहाड पर काफी ऊपर तक यह जाता दिखता रहा। जान में जान आई।
दो ट्रक खडे मिले। एक को स्टार्ट होने के लिये धक्कों की आवश्यकता थी। मुझे देखते ही कहा गया भाई, जरा धक्का लगवा देना। चार-पांच आदमियों ने सहायता की। खाली ट्रक था, फिर भी महाराज जरा सा हिलता, फिर वही आकर जम जाता। हे लो हे लो करते ही सांस फूल जाती। तीन चार बार यह महा-श्रम किया गया। नतीजा न निकलते देख सब हट गये।
मैंने मोबाइल जीपीएस में ऊंचाई देखी- 5250 मीटर। आहा! मैंने अपना 5200 मीटर तक चढने का रिकार्ड तोड दिया। अभी थोडी देर में तंगलंग-ला पहुंचूंगा तो नया कीर्तिमान स्थापित हो जायेगा।
तंगलंग-ला -17582 फीट। इसका अर्थ है 5359 मीटर। इसके नीचे लिखा है 5328 मीटर जबकि मेरा यन्त्र बता रहा है 5311 मीटर। इन तीनों में प्रामाणिक चाहे कुछ भी हो, मैं अपने यन्त्र की बात मानूंगा- 5311 मीटर। अब देखना है कि यह रिकार्ड कब टूट पाता है।
यहीं एक छोटा सा मन्दिर है। हर दर्रे पर छोटे मन्दिर होते ही हैं, लेकिन यह उनसे काफी बडा है। पक्का भी है लेकिन छत ठीक नहीं। कल जो बर्फ पडी थी, वो मन्दिर के अन्दर भी मिली। मन्दिर सर्वधर्मा है। इसमें मक्का मदीना से लेकर ईसा मसीह, बौद्ध, जैन, नानक, गोविन्द सिंह सब हैं। बाकी जो जगह बच गई है, उसमें तैंतीस करोड में से कुछ विराजमान हैं। लेकिन वर्चस्व अपने शिवजी का ही है।
कुछ देर यहां बैठने का इरादा था। बहुत थक गया था मैं लेकिन जैसे ही मन्दिर की चौखट पर बैठा, जल्द ही पता चल गया कि ज्यादा देर यहां नहीं बैठा जा सकता, जमीन अत्यधिक ठण्डी थी।
पता नहीं कहां से एक लद्दाखी प्रकट हुआ, जुले जुले हुई। उसने वहीं पडी एक झाडू उठाई व मन्दिर की सीढियों पर जमी बर्फ हटाने लगा।
अब बारी थी साइकिल पर बैठने की। अभी तक मैं पैदल ही आया था। जैसे ही बैठा, पैडल पर पैर का दबाव डाला, तो साइकिल नहीं चली, पैडल कहीं अटक गया। नीचे उतरकर देखा तो चेन पर बर्फ जमी पडी थी। यह कच्ची बर्फ नहीं थी, ठोस बर्फ थी। दोनों पैडलों के बीच में ठोस बर्फ का ढूह लगा हुआ था। मैं कीचड में से साइकिल निकालकर लाया था तो पिछले पहिये से यहां पानी गिरता रहा व बर्फ बनता रहा। वही पानी व बर्फ फैलकर चेन तक आ गये। एक छोटा सा पत्थर उठाकर चेन की बर्फ तोडी, तब बात बनी।
तंगलंग-ला से आगे भी करीब तीन किलोमीटर तक सडक बहुत खराब है। लेकिन उसके बाद शानदार सडक आ जाती है। तंगलंग-ला से रूमसे 32 किलोमीटर है, पूरा रास्ता अच्छा बना है, ढलान है। न भूख महसूस हुई न प्यास। दो घण्टे लगे इस दूरी को तय करने में। रूमसे 4200 मीटर पर है, 5300 मीटर से आने पर गर्मी लगनी ही थी। कुछ कपडे उतार देने पडे। यहां भरपेट खाना खाया। कल से भूखा था मैं।
रूमसे- इससे 250 किलोमीटर पीछे दारचा है। दारचा व रूमसे के बीच में कोई गांव नहीं। हां, सरचू में नदी के दूसरी तरफ अवश्य एक गांव है। वो बौद्ध गांव है, छोटा सा गोम्पा भी दिखाई देता है लेकिन वो गडरियों के पडाव से ज्यादा नहीं है। कितना दुर्गम व निर्जन इलाका है यह! चार ऊंचे दर्रे हैं। अच्छा है कि रास्ता खुलते ही हिमाचली, लद्दाखी व नेपाली यहां जगह जगह अस्थायी तम्बू लगा लेते हैं, नहीं तो यात्रा करनी मुश्किल हो जाती। सरचू, पांग सब अस्थायी तम्बू कालोनियां हैं।
तंगलंग-ला से आने वाली एक नदी के साथ साथ रास्ता आगे बढता है। रास्ते में ग्या, लातो, मीरु आदि गांव आते हैं। यहां भी सीधे खडे चट्टानी व मिट्टी के पहाडों के नीचे से निकलना रोमांच पैदा करता है। उससे भी रोमांचक है बिजली की लाइन को देखना जो लेह से रूमसे तक जाती है।
साढे चार बजे उप्शी पहुंचा। मौसम अब तक काफी खराब हो चुका था। आज ही कारु जाने का इरादा था जो यहां से 14 किलोमीटर आगे है लेकिन मौसम ने नहीं जाने दिया। कारु में एयरटेल का नेटवर्क काम करता है। आठ दिन हो गये जब आखिरी बार केलांग में नेटवर्क आया था। फोन पर घरवालों व मित्रों को अपनी खुशहाली की सूचना देने को उतावला हो रहा था। आज उप्शी में रुकना पडेगा, यह उतावलापन एक दिन और सही।
उप्शी सिन्धु किनारे स्थित है। एक रास्ता सिन्धु के साथ साथ ऊपर भी जाता है। उस रास्ते पर 200 किलोमीटर आगे चीन सीमा के पास हनले है, जहां अपना एक मित्र मिलिट्री में है। वहां चूंकि कोई भी नेटवर्क नहीं है, इसलिये मेरा इरादा था कि अचानक उसके सामने प्रकट होऊंगा, लेकिन यह सब यात्रा शुरू करने से पहले की बात थी। अब जबकि मैं पांच दर्रे पार कर चुका हूं, सिन्धु के साथ साथ ऊपर जाने की सोचकर ही सिर घूम जाता है। वैसे भी इस सडक पर चलने के लिये लेह से परमिट लेना आवश्यक है।
उप्शी में 100 रुपये में एक बिस्तर मिल गया। साथ ही पिछले कई दिनों से चार्जिंग चार्जिंग चिल्ला रहे मोबाइल व कैमरे भी फुल हो गये।

बर्फ में खडी साइकिल

पीछे मुडकर देखने पर

तंगलंगला की ओर

उस भेडिये ने मेरा पीछा भी किया, बाद में मेरे रुक जाने पर वो ऊपर पहाडी पर चला गया।



तंगलंगला से नीचे मोरे मैदान की तरफ देखने पर।



सामने तंगलंगला है।

आहा! वो रहा तंगलंगला। इस दर्रे ने पिछले तीन दिनों से जान खा रखी है।

तंगलंगला

तंगलंगला दुनिया का दूसरा सबसे ऊंचा मोटर योग्य दर्रा है। पहले स्थान पर कौन है, इसे तो जानते ही होंगे। खारदूंगला।

तंगलंगला पर सर्वधर्म मन्दिर।



तंगलंगला के दूसरी तरफ का नजारा और नीचे उतरती सडक।




तंगलंगला के उस तरफ एकदम शानदार सडक बनी है।









रूमसे गांव

ग्या गांव।






रूमसे से उप्शी तक पूरा रास्ता ऐसे ही दृश्यों से भरा है।



जहां मानव आबादी है, गांव हैं वहां हरियाली भी मिलती है।



उप्शी में सिन्धु के पहले दर्शन होते हैं।

उप्शी, सिन्धु और मौसम खराब




अगले भाग में जारी...

मनाली-लेह-श्रीनगर साइकिल यात्रा
1. साइकिल यात्रा का आगाज
2. लद्दाख साइकिल यात्रा- पहला दिन- दिल्ली से प्रस्थान
3. लद्दाख साइकिल यात्रा- दूसरा दिन- मनाली से गुलाबा
4. लद्दाख साइकिल यात्रा- तीसरा दिन- गुलाबा से मढी
5. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौथा दिन- मढी से गोंदला
6. लद्दाख साइकिल यात्रा- पांचवां दिन- गोंदला से गेमूर
7. लद्दाख साइकिल यात्रा- छठा दिन- गेमूर से जिंगजिंगबार
8. लद्दाख साइकिल यात्रा- सातवां दिन- जिंगजिंगबार से सरचू
9. लद्दाख साइकिल यात्रा- आठवां दिन- सरचू से नकी-ला
10. लद्दाख साइकिल यात्रा- नौवां दिन- नकी-ला से व्हिस्की नाला
11. लद्दाख साइकिल यात्रा- दसवां दिन- व्हिस्की नाले से पांग
12. लद्दाख साइकिल यात्रा- ग्यारहवां दिन- पांग से शो-कार मोड
13. शो-कार (Tso Kar) झील
14. लद्दाख साइकिल यात्रा- बारहवां दिन- शो-कार मोड से तंगलंगला
15. लद्दाख साइकिल यात्रा- तेरहवां दिन- तंगलंगला से उप्शी
16. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौदहवां दिन- उप्शी से लेह
17. लद्दाख साइकिल यात्रा- पन्द्रहवां दिन- लेह से ससपोल
18. लद्दाख साइकिल यात्रा- सोलहवां दिन- ससपोल से फोतूला
19. लद्दाख साइकिल यात्रा- सत्रहवां दिन- फोतूला से मुलबेक
20. लद्दाख साइकिल यात्रा- अठारहवां दिन- मुलबेक से शम्शा
21. लद्दाख साइकिल यात्रा- उन्नीसवां दिन- शम्शा से मटायन
22. लद्दाख साइकिल यात्रा- बीसवां दिन- मटायन से श्रीनगर
23. लद्दाख साइकिल यात्रा- इक्कीसवां दिन- श्रीनगर से दिल्ली
24. लद्दाख साइकिल यात्रा के तकनीकी पहलू

13 comments:

  1. ''इतनी जल्‍दी क्‍या है प्‍यारे, देख प्रकृति के नजारे'', सचमुच.

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  2. Itne sare photos de kar agli kasar puri kar di, sachmuch badhiya

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  3. हमें जल्दी नहीं है। हम आपके कैमरा से सभी प्रकृति के नज़ारे देख रहें हैं। धन्यवाद

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  4. अद्भुत है यह जगह, नीरज....

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  5. रिकोर्ड तोड़ने के लिए बधाई।
    - Anilkv

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  6. बहुत ही बढ़िया वर्णन एवं फोटोज| घूमते रहो..........

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  7. YE POST DEKH K THO MERI BOLTI BAND HAI.. SUBAH SE GYARAHVI BAR DEKH RAHA..

    PHOTOS DEKH DEKH K MUN HE NAHI BHAR RAHA.. KYA GAZAB NAZARE HAIN..

    WAAH !!!

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  8. ऐसा लगता है की मंगल ग्रह का नज़ारा देख रहे हैं.

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  9. पिछली पोस्ट की फोटुओं की कसर इस पोस्ट में पूरी की भाई तूने !! एक बात और इस वीराने में अकेले चलने का साहस भरा काम जो तुमने किया है वो वाकई सराहनीय है !

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  10. प्रकृति के अजब रंग,
    सब के सब एक संग।

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  11. नीरज ऐसा लगता है आपकी साथ साथ हम भी घुम रहे है और फोटो के बारे मै जितनी तारिफ की जाये उतनी कम है

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  12. ''इतनी जल्‍दी क्‍या है प्‍यारे, देख प्रकृति के नजारे'....सचमुच प्रकृति बिखरी पड़ी है और इसे दिखाने वाले की जय हो ...पिछली कड़ी की फोटू की कमी को इस पोस्ट ने धो दिया ...

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