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Friday, August 9, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- बारहवां दिन- शो-कार मोड से तंगलंग-ला

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15 जून 2013
साढे सात बजे आंख खुली। ध्यान दिया कि तम्बू चू रहा है, वो भी कई जगहों से। कुछ बूंदें तो मेरे बिस्तर पर भी गिर रही थीं। जब तम्बू के ऊपर रेन कवर नहीं लगायेंगे, तो ऐसा ही होगा। अचानक यह सोचकर झुरझुरी दौड गई कि बारिश हो रही है।
बाहर निकला तो कुदरत बारिश से भी ज्यादा खतरनाक खेल खेल रही थी। बर्फ पड रही थी। अभी तंगलंग-ला पार करना बाकी है। यहां 4630 मीटर की ऊंचाई पर ही बर्फबारी हो रही है, तो 5300 मीटर ऊंचे तंगलंग-ला पर क्या हो रहा होगा, इसका अन्दाजा था मुझे।
बर्फबारी के बीच निकल पडूं या यहीं रुका रहूं- यह प्रश्न मन में था। मन ने कहा कि यहीं रुका रह। बर्फबारी जब बन्द हो जायेगी तो आठ किलोमीटर आगे डेबरिंग चले जाना। बाकी दूरी कल पूरी कर लेना। बर्फबारी में निकलना ठीक नहीं।
तभी एक कोने में से दबी सी आवाज निकली- अभी निकल पड। क्यों निकलूं अभी? एक तो बर्फ इतनी ज्यादा नहीं है कि चला ही नहीं जायेगा। सामने देख, जमीन पर नाम भी नहीं है बर्फ का। थोडी बहुत किसी कठोर चीज पर ही जमी है बस। दूसरे, हवा नहीं चल रही है। हवा चली होती तो बर्फीली हवा शरीर को अन्दर तक बेध देती। तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात कि पता नहीं कब तक ऐसा मौसम रहे। अगर दो-तीन दिन और ऐसा ही रहा तो तंगलंग-ला बन्द हो जायेगा। इस समय तेरा परम कर्तव्य है कि शीघ्रातिशीघ्र जैसे भी हो, तंगलंग-ला पार कर ले।
यह तीसरी बात माननी पडी। यात्रा शुरू करने से पहले ही तंगलंग-ला का खौफ था। अगर आज मैं रुक गया तो तंगलंग-ला हावी हो जायेगा। वो कल और ज्यादा मनमानी करेगा। ठीक है कि उसके आगे मेरी कोई औकात नहीं। लेकिन मैं भी उसके सामने डटकर दिखा दूंगा कि तू कुछ है, तो मैं भी कुछ हूं। चल नीरज, तूने चार दर्रे पार कर लिये, पांचवें को भी पार कर।
पर्याप्त गरम कपडे पहनकर ऊपर से रेनकोट पहन लिया और पौने दस बजे यह स्थान छोड दिया। सडक खराब तो थी ही, लेकिन कुछ दूर तक मोरे मैदान का ही हिस्सा थी इसलिये ठीकठाक स्पीड पर साइकिल चली। यहां से तंगलंग-ला 25 किलोमीटर दूर है।
कुछ आगे चला तो दूर से एक तम्बू से एक तगडा कुत्ता भौंकता हुआ आने लगा। जब वो सडक पर आ गया तो मैं रुक गया। वो भी वहीं रुक गया। मैंने आगे बढने की कोशिश की तो वो भी आगे बढने लगा। भौंकता रहा। मैं पुनः रुक गया। अच्छा हुआ कि उसकी भौंक सुनकर दूसरे कुत्ते नहीं आये। तभी उस तम्बू से एक मोटी महिला बाहर निकली, हांफती हुई दौडती हुई कुत्ते के पास आई व पत्थर मारकर भगा दिया।
असल में मोरे मैदान एक विशाल चरागाह भी है। इसमें कोई गांव बस्ती तो है नहीं, लेकिन घुमन्तु भेड-पालक व याक-पालक अपनी ‘प्रजा’ के साथ डेरा डाले रहते हैं। इनके घर अस्थायी तम्बू होते हैं। पूरी ‘प्रजा’ की सुरक्षा की जिम्मेदारी वफादार कुत्तों पर होती है। ये लद्दाखी बडे बडे कुत्ते तेन्दुए तक से भिड जाते हैं। आमतौर पर ये कुत्ते आदमी को कुछ नहीं कहते। रास्ता चौबीस घण्टे चलता-फिरता है, इन्हें कोई मतलब नहीं होता कि कौन आ रहा है, कौन जा रहा है। आज बर्फ पड रही थी। भेडपालक तम्बुओं में ही बन्द थे, तो यह कुत्ता शायद बोर हो गया होगा। मुझे देखकर सोचा होगा कि सुबह से खाली पडा हूं, चल थोडा सा भौंक आऊं।
सिर पर जो रेनकवर था, वो इतना बेशर्म था कि सिर घुमाने पर भी नहीं घूमता था। इधर उधर देखने के लिये पहले साइकिल रोकनी पडती, फिर पूरा शरीर घुमाना पडता। तब जाकर इधर उधर के दृश्य दिखते। यह था डेबरिंग न पहुंचने का पहला कारण। दूसरा कारण, अगर मुझे डेबरिंग के तम्बू दिखे भी होंगे तो उन्हें भेडपालकों के तम्बू समझ लिया होगा। पुनः कोई कुत्ता न आ जाये, और ज्यादा जोर से पैडल मारकर खिसक गया होऊंगा। मुझे पता ही नहीं चला कि कब डेबरिंग निकल गया।
डेबरिंग मेरे लिये बहुत जरूरी था। मैं सुबह दो परांठे खाकर चला था। दूरी आठ किलोमीटर थी तो डेढ दो घण्टे में डेबरिंग पहुंच जाना था। वहां मौसम को देखकर या तो रुकना था, या और परांठे खाकर व पैक कराकर ले चलना था। चाय भी पीनी थी। डेबरिंग के निकल जाने का पता ही नहीं चला। पता भी तब चला जब बहुत आगे निकल चुका था।
बीआरओ के एक पडाव पर एक मजदूर से पूछा कि डेबरिंग कितना दूर है। एक तो इन मजदूरों के चेहरे पर कोई भाव नहीं होता। न आंखों में चमक, न चेहरे पर मुस्कान, न उदासी, न खुशी। कोई भाव नहीं, बिल्कुल भावहीन। ऐसे लोगों को मुर्दा कहा जाता है। उसने इसी मुर्दाभाव से जवाब दिया- डेबरिंग तो पीछे छूट गया। उधर मैं सुनना चाह रहा था- डेबरिंग आगे इतना दूर है। जब मैंने मुर्दाभावयुक्त यह नकारात्मक उत्तर सुना तो अनसुना कर दिया व आगे बढ गया।
तंगलंग-ला की चढाई कभी की शुरू हो चुकी थी। एक समय ऐसा आया कि पैडल मारना मुश्किल होने लगा। तब पैदल चलना पडा साइकिल खींचते हुए। यह उच्च पर्वतीय बीमारी थी। अब हवा की शान्ति भी खत्म हो चुकी थी। बडे जोर का तूफान चलने लगा। उसके साथ कभी बर्फ फाहों के रूप में गिरती, कभी बजरी के रूप में। बजरी गोली की गति से आती व कपडों पर टकराती, चेहरे पर भी। दोनों हाथों की उंगलियां अत्यधिक ठण्डी हो गईं। चूंकि मैंने जूते नहीं पहने थे, इसलिये चप्पल के साथ जुराबें भी पहन लीं। शुरू में पैरों की उंगलियां भी ठण्डी पडीं, लेकिन पैर लगातार गतिमान होने के कारण उनमें गर्मी बनी रही।
दो बजे जब जोरों से बजरी गिर रही थी, तो बीआरओ के एक तम्बू में घुसा। एक तो काला तम्बू, फिर अन्दर अन्धेरा, काले स्लीपिंग बैग व काले ही मजदूर। शुरू में लगा खाली अन्धेरे कमरे में घुस गया हूं। धीरे धीरे आंखें अभ्यस्त हुईं। देखा स्लीपिंग बैगों में मजदूर घुसे पडे हैं। अनवरत बातों का सिलसिला चल रहा है। ताश भी खेल रहे हैं। मैंने उनसे कहा थोडी देर आराम करूंगा, उसके बाद चला जाऊंगा।
भूख भयंकर लग रही थी। सुबह दो परांठे ही तो खाये थे। वैसे तो बैग में सूखे मेवे और नमकीन भी रखे थे लेकिन यहां मजदूरों के सामने बैठकर अकेले कैसे खा सकता था?
चलते समय उनसे पूछा तंगलंग-ला अभी कितना दूर है? बोले बहुत दूर है। फिर भी? पच्चीस तीस किलोमीटर। यह सुनकर मुझे बडी हंसी आई। पिछले चार घण्टों से लगातार चल रहा हूं, उस समय पच्चीस किलोमीटर था- यह पक्का है। कम से कम पन्द्रह किलोमीटर चल ही दिया होऊंगा। अब दस किलोमीटर से ज्यादा नहीं है किसी भी हालत में।
पुनः तूफान में चल पडा। एक जानकारी मिली कि आगे भी बीआरओ के तम्बू लगे हैं। सोच लिया कि अगर आगे बढना मुश्किल हो जायेगा, तो अगले तम्बुओं में रात रुक जाऊंगा।
सामने से एक गाडी आकर रुकी। अकेला ड्राइवर ही था। धिक्कारने लगा कि ऐसे मौसम में ज्यादा साहसी मत बन। किसी ट्रक पर साइकिल लाद व तंगलंग-ला पार कर ले। साथ ही यह भी कहा कि यहां इतनी तेज हवा चल रही है, तंगलंग-ला पर तो और भी तेज है, उड जायेगा।
उसके जाने के बाद सोचा कि कह तो ठीक ही रहा है। मैं अभी तक खुद को घसीट ही रहा था, चल नहीं रहा था। हवा की बहुत कमी महसूस हो रही थी। हो भी क्यों ना, 5000 मीटर की ऊंचाई कोई हंसी मजाक थोडे ही है? चार कदम चलता, रुक जाता। ऊपर से बर्फीली हवा। दस्ताने पहने होने के बावजूद भी हाथों की सभी उंगलियां सुन्न हो चुकी थीं। एक ऐसी जगह पर रुक गया जहां हवा कम लग रही थी। किसी ट्रक में साइकिल चढाऊंगा व तंगलंग-ला पार करके रूमसे तक पहुंचूंगा। दो-ढाई बजे थे। साइकिल से सामान भी खोल दिया ताकि ट्रक को एक तो ज्यादा देर रुकना न पडे, दूसरे साइकिल चढाने में मेहनत भी कम करनी पडे।
सबसे पहले सेना का ट्रक आया। हाथ दिया तो रोक लिया। मैंने अपनी समस्या बताई। बोले की पीछे बहुत सारे ट्रक आ रहे हैं, उनमें रख लेना और आगे बढ गया। मेरी पहली कोशिश नाकाम। और वे किसी ‘सिविलियन’ की सहायता क्यों करने लगे? वे ठहरे देश के रक्षक, सीमाओं पर लडने वाले... एक सिविलियन से कैसी बराबरी? सिविलियनों की सहायता तो वे तब करते हैं, जब ऊपर से सहायता करने के आदेश आते हैं- बाढ सेवा, भूकम्प सेवा में। इसी तरह एक फौजी का आतंक मैंने एक बार ऊधमपुर स्टेशन पर देखा था। टिकट लेने वालों की लम्बी लाइन लगी थी। फौजी को भी टिकट लेना था। एक ही खिडकी। वो भला कैसे सिविलियनों के साथ लाइन में लग सकता था? सीधा खिडकी पर पहुंचा, वर्दी में था। क्लर्क ने टिकट देने से मना कर दिया। कहा लाइन में लगो। बस, सुनते ही फट पडा। गाली गलौच व हाथापाई। मैं फौजी हूं, साला हम बॉर्डर पर जाकर दुश्मन से लडें, गोलियां खायें और यहां सिविलियनों के साथ लाइन में खडे हों। बहुत उत्पात मचाया उसने। क्लर्क का रोज पाला पडता होगा ऐसे लोगों से, टिकट नहीं दिया।
इसके बाद दो ट्रक आये। हाथ दिया तो रुक गये। मना कर दिया। बोले जगह नहीं है। मैंने कहा केबिन के ऊपर छत खाली है व रेलिंग भी लगी है। बोले तो चढा लो। मैंने कहा अकेला तो नहीं चढा पाऊंगा, आप थोडी सहायता कर दो। बोले इस बर्फीले तूफान में सहायता? वे भी चले गये।
फिर तीन टैंकर आये। इनमें भी रेलिंग होती है व ऊपर चढने को सीढियां भी। हाथ दिया, मना करते हुए निकल गये।
इनके बाद और ट्रक भी आयेंगे, उनमें भले मानुस भी होंगे, लेकिन मेरा धैर्य खत्म हो चुका था। पुनः सामान बांधा और चल पडा। और हां, इन सभी ट्रक व टैंकर वालों को श्राप दिया कि जाओ, तुम्हारे अगले पहिये में पंक्चर हो जाये। पता नहीं श्राप फलीभूत हुआ या नहीं।
बर्फ ज्यादा तो नहीं थी लेकिन उसकी वजह से सडक पर कीचड हो गया था। चप्पल व जुराबें मैंने पहन रखी थीं, बहुत परेशानी हुई।
आखिरकार मजदूरों के तम्बू मिले। जान में जान आई। ऊंचाई 5130 मीटर। यानी तंगलंग-ला चार किलोमीटर से ज्यादा नहीं। अगर मुझे भोजन मिल गया होता तो मैं आज ही इसे पार कर सकता था। भूख, ऊंचाई, चढाई, तूफान; इन सभी ने मिलकर शरीर को शक्तिहीन बना दिया था। फैसला कर लिया कि यहीं रुकूंगा। एक तम्बू में घुस गया। सभी झारखण्डी मजदूर। आंखें अभ्यस्त हुईं तो देखा पैर रखने की भी जगह नहीं। सभी स्लीपिंग बैगों में घुसे पडे हुए। फिर भी उन्होंने कहा सामान ले आओ, जगह बन जायेगी। मैंने पूछा कोई स्लीपिंग बैग फालतू है क्या? बोले नहीं है। एक ने कहा मेरे बैग में आ जाना। मैं सामान ले आया। टैण्ट बाहर साइकिल पर ही बंधा रहने दिया। स्लीपिंग बैग था मेरे पास, अगर उनके पास फालतू बैग होता तो मैं अपने वाले को खोलने से बच जाता। लोग इधर उधर हुए, मेरे लायक जगह बन गई।
जब मैंने अपना स्लीपिंग बैग खोला तो हंसने लगे। इतना नरम, इतना नाजुक, इतने छोटे से पैकेट में आ सकने वाला बैग भला क्या ठण्ड रोकेगा? वे ठहरे रुई के फौजी बैगों में सोने वाले, तह करें तो रजाई से कम जगह न घेरे। सलाह देने लगे कि इतनी ठण्ड में यह बैग काम ही नहीं करेगा, हमारे किसी के बैग में सो जाओ। मैंने कहा अगर किसी को भी मेरे बैग पर शक है, तो मुझसे अदला बदली करके आजमा ले। अगर गर्मी न लगने लगे तो कहना।
चूंकि मैं भूखा था व यहां खाना भी मिल सकता था, लेकिन मैंने नहीं खाया। कारण है कि खाने के पैसे इनकी मजदूरी में से कटते हैं। यहां खाना बहुत महंगा है, इसलिये बहुत पैसे कटते हैं। मुझे लेटने को जगह मिल रही है, इतना ही काफी है।
खाने के लिये मैंने काजू, किशमिश व नमकीन निकाल लिये। अपने पास जगह की तंगी के कारण बराबर वाले के स्लीपिंग बैग पर रख दिये। आधा पैकेट काजू का था, मैंने कहा सभी को बांट दो। वो सबको बांट दिया गया। मैं नमकीन खाने लगा, पानी पीने लगा। तभी बराबर वाले ने किशमिश का पैकेट उठाकर अपने बैग के अन्दर रख लिया। नमकीन खाकर जब मैंने पैकेट मांगा तो बोला कौन सा पैकेट? मैंने कहा किशमिश का। बोला वो तो बंट गया। मैंने कहा मेरा बेवकूफ मत बना, निकाल अन्दर से। तब उसने बैग के अन्दर से निकालकर दिया।
यहां सबसे बडा खतरा चोरी होने का था। सभी चोर थे, मैदान से आये थे। मेरे पास सीमित सामान था। एक भी चोरी हो जाने पर आगे की यात्रा पर इसका असर पड सकता था। मोबाइल व कैमरा तो मैंने अपने साथ स्लीपिंग बैग में ही रखे। बाकी सिर के नीचे रख लिये। बाहर साइकिल व टैण्ट थे, सभी ने सलाह दी कि इन्हें भी तम्बू के अन्दर कर लो, लद्दाखी चरवाहे उन्हें उठाकर ले जा सकते हैं। मैंने कहा वे कुछ नहीं ले जायेंगे। वे पहाडवासी हैं, उन्हें चोरी करना नहीं आता।
जिन्दगी में पहली बार इतनी ऊंचाई पर सो रहा हूं- 5130 मीटर की ऊंचाई पर। आप जो इसे पढ रहे हैं, 90 प्रतिशत लोग इतनी ऊंचाई तक गये भी नहीं होंगे।
फोटो की शिकायत होगी इस पोस्ट को पढकर। शिकायत जायज है, लेकिन सुबह से शाम तक जितना भी चला, बर्फीले तूफान में ही चला। सवाल ही नहीं उठता कि दस्ताना खोलकर कैमरा ऑन करके फोटो खींचूं। अगले भागों में बहुत फोटो देखने को मिलेंगे।


मनाली-लेह-श्रीनगर साइकिल यात्रा
1. साइकिल यात्रा का आगाज
2. लद्दाख साइकिल यात्रा- पहला दिन- दिल्ली से प्रस्थान
3. लद्दाख साइकिल यात्रा- दूसरा दिन- मनाली से गुलाबा
4. लद्दाख साइकिल यात्रा- तीसरा दिन- गुलाबा से मढी
5. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौथा दिन- मढी से गोंदला
6. लद्दाख साइकिल यात्रा- पांचवां दिन- गोंदला से गेमूर
7. लद्दाख साइकिल यात्रा- छठा दिन- गेमूर से जिंगजिंगबार
8. लद्दाख साइकिल यात्रा- सातवां दिन- जिंगजिंगबार से सरचू
9. लद्दाख साइकिल यात्रा- आठवां दिन- सरचू से नकी-ला
10. लद्दाख साइकिल यात्रा- नौवां दिन- नकी-ला से व्हिस्की नाला
11. लद्दाख साइकिल यात्रा- दसवां दिन- व्हिस्की नाले से पांग
12. लद्दाख साइकिल यात्रा- ग्यारहवां दिन- पांग से शो-कार मोड
13. शो-कार (Tso Kar) झील
14. लद्दाख साइकिल यात्रा- बारहवां दिन- शो-कार मोड से तंगलंगला
15. लद्दाख साइकिल यात्रा- तेरहवां दिन- तंगलंगला से उप्शी
16. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौदहवां दिन- उप्शी से लेह
17. लद्दाख साइकिल यात्रा- पन्द्रहवां दिन- लेह से ससपोल
18. लद्दाख साइकिल यात्रा- सोलहवां दिन- ससपोल से फोतूला
19. लद्दाख साइकिल यात्रा- सत्रहवां दिन- फोतूला से मुलबेक
20. लद्दाख साइकिल यात्रा- अठारहवां दिन- मुलबेक से शम्शा
21. लद्दाख साइकिल यात्रा- उन्नीसवां दिन- शम्शा से मटायन
22. लद्दाख साइकिल यात्रा- बीसवां दिन- मटायन से श्रीनगर
23. लद्दाख साइकिल यात्रा- इक्कीसवां दिन- श्रीनगर से दिल्ली
24. लद्दाख साइकिल यात्रा के तकनीकी पहलू

13 comments:

  1. barish me kitna bhayanak lag raha hoga,

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  2. फोटोज के बारे में पहले ही सूचित कर देना, अच्छा लगा।
    आप अपने मनोभावों और अपनी कमजोरियों को जिस निरपेक्ष तरीके से शब्दों में बताते हैं, इन्हें पढने में मजा आता है।
    पहाडवासी चोरी नहीं करते, मेरा ये विश्वास दृढ हो गया आपकी विचारों से।
    केवल इसी ब्लॉग को पढने के बाद लगता है कि हां किसी घुमक्कड का ब्लॉग पढ रहे हैं।

    धन्यवाद और प्रणाम

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  3. नीरज भाई , आपकी यात्रा तो ठीक ठाक चल रही है!
    फोटोज के बारे में पहले ही सूचित कर देना, अच्छा लगा।
    पर सचिन का क्या हाल है , रस्ते में भेंट हुआ या नहीं ................!!!!

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  4. तो आप श्राप भी देते हैं मुनिवर ?
    - Anilkv

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  5. आप को सलाम है।एशे ही चलते रहों मुसाफिर।

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  6. Itni visham paristhitiyan buni hui hai safar me..

    Pehli wali photo tho bahut zabardasst hai..

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  7. आज की बुलेटिन काकोरी कांड की ८८ वीं वर्षगांठ और ईद मुबारक .... ब्लॉग बुलेटिन में आपकी पोस्ट (रचना) को भी शामिल किया गया। सादर .... आभार।।

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  8. इस लेह यात्रा में आपने विदेशियों को भी मात दे दी अपने दृढ निश्चय से .... और इस यात्रा का लाभ क्या हुआ ये वो नहीं जान सकता जिसने कभी गाडी से नीचे उतर के न देखा हो....

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  9. साहस का काम है..रोचक भी..

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  10. बेहद रोमांचक वृतांत

    श्राप तो मिलने ही थे ट्रकों को

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  11. aapki himmat aur jajbe ko bayan karne ke liye koi shabd nhi.
    shubhkamnayen............

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  12. फोटू की कमी खल रही है ..कम से से कम गिरती हुई बर्फ का एक फोटू तो होना ही चाहिए था ..और तम्बू का भी जहाँ पैर रखने की जगह नहीं थी और चोर मजदुर थे .....

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  13. आपकी इस ब्लॉग-प्रस्तुति को हिंदी ब्लॉगजगत की सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुतियाँ ( 6 अगस्त से 10 अगस्त, 2013 तक) में शामिल किया गया है। सादर …. आभार।।

    कृपया "ब्लॉग - चिठ्ठा" के फेसबुक पेज को भी लाइक करें :- ब्लॉग - चिठ्ठा

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