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Monday, August 5, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- ग्यारहवां दिन- पांग से शो-कार मोड

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14 जून 2013
सुबह साढे सात बजे आंख खुली। दोनों होटल संचालिकाओं ने जुले कहकर नये प्रभात की शुभकामनाएं दीं। अब मैं ‘जुले-जुले’ की धरती पर हूं। हर व्यक्ति एक दूसरे को जुले जुले कहने में लगा है। झारखण्डी मजदूर भी मौका मिलते ही जुले कहते हैं। विदेशी आते हैं भारत घूमने। हवाई अड्डे पर उतरते ही उन्हें सबसे पहले नमस्ते कहना सीखना होता है। लद्दाख में नमस्ते किसी काम का नहीं, यहां जुले का शासन है। सोचते होंगे बडा अजीब देश है, हजार किलोमीटर चले नहीं, अभिवादन का तरीका बदल गया। नमस्ते सीखा था इतनी मेहनत से, एक झटके में बेकार हो गया।
साइकिल पर जब सामान बांध रहा था तो स्पीति वाले तीर्थ यात्री मिले। उनमें से एक का नाम रणजीत सिंह है। बौद्ध नाम कुछ और है। उनके पिता पंजाबी थी, तो रणजीत नाम रख दिया। गांव में सभी रणजीत के ही नाम से जानते हैं, सभी कागज-पत्र रणजीत सिंह के हैं। बौद्ध नाम किसी को नहीं पता। पिन घाटी स्थित अपने गांव शगनम में ट्रैकिंग कराते हैं। न्यौता दिया कि कभी पिन-पार्वती पास या भाभा पास ट्रैक करना हो, तो अवश्य मिलना। भला नीचे का आदमी पिन-पार्वती या भाभा पास करने पहले शगनम क्यों जायेगा? सभी लोग मणिकर्ण या किन्नौर से ट्रैक शुरू करते हैं व मुद में खत्म करते हैं। उल्टा रिवाज कौन शुरू करना चाहेगा?
नौ बजे पांग से चल पडा। पांग 4486 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। आज का लक्ष्य 52 किलोमीटर दूर 4800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित डेबरिंग पहुंच जाने का है ताकि कल तंगलंग-ला पार कर सकूं।
पांग से चला तो चलते ही चढाई का सामना करना पडा। लेकिन गूगल मैप का अध्ययन कह रहा था कि बस यही थोडी सी चढाई है। उसके बाद मोरे का समतल मैदान आने वाला है। यह थोडी सी चढाई भी पांच किलोमीटर तक खिंच गई व डेढ घण्टा तथा काफी सारी ऊर्जा भी ले गई। इस पर चढकर जब 4745 मीटर पर पहुंचा और सामने लम्बा मैदान व सीधी सडक दिखी तो पैर पैडल मारने को तथा हाथ गियर-अनुपात बढाने को कुलबुलाने लगे।
यह मोरे मैदान है जो चौडाई में तो ज्यादा नहीं लेकिन लम्बाई में 60 किलोमीटर दूर तंगलंग-ला के नीचे तक फैला है। डेबरिंग तक तो सडक भी इसी मैदान में है। उसके बाद सडक तंगलंग-ला पार करने ऊपर चढने लगती है, मैदान नीचे रह जाता है।
इस मैदान के एक तरफ पांग है, दूसरी तरफ तंगलंग-ला। पांग 4486 मीटर की ऊंचाई पर है, तंगलंग-ला 5300 मीटर पर। जाहिर है मैदान का ढाल पांग की तरफ होना चाहिये। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से ढलान तंगलंग-ला की तरफ है। यह ढलान शो-कार मोड तक ही रहता है, उसके बाद यही मैदान चढाई वाला होने लगता है।
असल में मोरे मैदान एक बरसाती नदी का आधे से दो किलोमीटर चौडा पाट है। लद्दाख में चूंकि बरसात नहीं होती, फिर भी कुदरत ने जल निकासी का प्रबन्ध कर रखा है। पूरा रास्ता इस मैदान के बायें किनारे पर ही रहता है, कभी भी इसे पार नहीं करता। पांग के ऊपर जहां से यह शुरू हुआ है, इसकी ऊंचाई 4745 मीटर है। 36 किलोमीटर दूर शो-कार मोड पर सडक 4627 मीटर पर है। इसके बाद मामूली सी चढाई शुरू हो जाती है। 8 किलोमीटर आगे डेबरिंग 4800 मीटर पर है, उसके बाद तंगलंग-ला। बाद में मैं शो-कार भी गया था, जो 4530 मीटर पर है। शो-कार (Tso Kar) एक झील है, जो मनाली-लेह सडक से 20 किलोमीटर हटकर है।
इन तथ्यों से एक बात स्पष्ट है कि एक नदी पांग की तरफ से आती है, दूसरी तंगलंग-ला से। शो-कार मोड पर दोनों मिल जाती हैं व शो-कार झील में जा मिलती हैं। हां, यह बात अलग है कि दोनों बरसाती नदियां हैं और यहां बरसात दुर्लभ है। पानी न होने से नदियां सूखी हैं व मैदान जैसी लगती हैं।
ढलान हो और सडक शानदार बनी हो व सीधी भी हो, तो साइकिल अधिकतम स्पीड से चलनी ही चलनी है। जगह-जगह पुल आते, सडक की एकरूपता भंग होती तो ब्रेक लगाने पडते।
शो-कार मोड से करीब 15 किलोमीटर पहले खराब सडक शुरू हो गई। वैसे तो ज्यादा खराब भी नहीं है, गड्ढे भी नहीं हैं, पर्याप्त चौडी यानी टू-लेन है लेकिन इन सबके बावजूद कंकड बहुत ज्यादा हैं। नई बनने की तैयारी है, बस तारकोल बिछने की देर है। कंकडयुक्त सडक पर साइकिल ज्यादा तेज नहीं चलाई जा सकती, पंक्चर होने का डर होता है।
एक ब्रिटिश साइकिलबाज मिला। साथ में मामूली सा सामान। उसने पूछा- हाय! हाऊ आर यू? मुझसे कोई पूछे हाऊ आर यू, कैसे हो तो मेरे मुंह से एक ही शब्द निकलता है- मस्त। यहां भी अपनी मस्ती दर्शा दी। उसने कुछ और भी पूछा लेकिन जिसे शिष्यों की ही भाषा समझ नहीं आती, वो गुरू की बात कैसे समझ सकता है? वो ब्रिटिश था। उसकी फर-फर अंग्रेजी मैं तब समझूंगा, जब पहले भारतीय अंग्रेजी समझ सकूं। खैर, वो आगे निकल गया।
आगे चलकर देखा, उसकी साइकिल सडक किनारे पडी है, खुद गायब है। यह शो-कार मोड से कुछ पहले की बात है। यहां बहुत बडा मैदान है, सडक कुछ ऊपर है। महाराज अवश्य नीचे पानी किनारे गया होगा। क्यों गया होगा, यह कहने की आवश्यकता नहीं।
हरियाणा की एक कार खडी मिली। बोनट खुला हुआ, पता चला कार गर्म हो गई है, कूलैण्ट भी पर्याप्त है। कुल चार जने, हिसार के थे। हमारी बात होने लगी। तभी वो अंग्रेज पीछे से आया। मेरा तो उसे पता चल ही चुका था कि अंग्रेजी में ठप है। इस बार उसने कार वालों से संवाद शुरू किया- हे, हाऊ आर यू? कारवाले तीन अन्दर बैठे थे, एक बाहर टहल रहा था। ‘हाऊ आर यू’ विशेषकर बाहर वाले से पूछा गया था। उसने सुनकर मुझसे पूछा- भाई, यो के कह रया सै? मैंने कहा- न्यू कहदे बेरा ना। पट्ठे ने ‘बेरा ना’ ही कह दिया। इसके बाद बोनट खुला देखकर शायद कार के बारे में पूछने लगा। मैंने फिर ‘बेरा ना’ का इशारा कर दिया तो उसने दोहरा दिया- भाई, ना बेरा हमनै। अंगरेजी जाणते तो यहां बोनट खोलकै खडे होत्ते?
सवा दो बजे शो-कार मोड पहुंचा। यहां दो तीन तम्बू मिले। मुझे यहां तम्बू मिलने की उम्मीद नहीं थी। पांग से आलू के दो परांठे पैक कराकर लाया था। कोल्ड ड्रिंक के साथ परांठे निपटा दिये। सोचा आठ किलोमीटर आगे डेबरिंग है, घण्टे भर में पहुंच जाऊंगा। उसके बाद आगे तो बढूंगा नहीं, इससे अच्छा है शो-कार देख आऊं।
सारा सामान उतारकर यहीं रख दिया। पानी की बोतल, रेनकोट व साइकिल के पंक्चर का सामान साथ लेकर मैं चार बजे झील देखने चल पडा। वापस लौटकर यहीं पर रात रुक जाऊंगा।
एक मिनी बस भी खडी थी। चाय वाय पी रहे थे यात्री। लेह जा रहे थे। बस में बैठे एक यात्री ने मुझसे पूछा- बेटे, तुम यहीं के रहने वाले हो क्या? मैंने कहा- नहीं, आपकी ही तरह हूं। बोले- पहले कभी लद्दाख आये हो?
-हां, आया हूं।
-तो यह बताओ कि आगे पेड कहां मिलेंगे? ऑक्सीजन की बडी समस्या है। खुद तो देखा जाये, लेकिन बच्चों की समस्या नहीं देखी जाती।
-हवा की कमी पेड न होने की वजह से नहीं है। यह अत्यधिक ऊंचाई की वजह से है। आप अभी 4700 मीटर पर हो। यहां से आगे चढाई शुरू हो जायेगी। 5300 मीटर ऊंचे तंगलंग-ला को पार करके आप नीचे उतरना शुरू हो जाओगे व 3400 मीटर पर लेह पहुंचोगे। लेह पहुंचने पर आपको सांस लेने में बहुत आसानी रहेगी। और हां, लेह में थोडी बहुत हरियाली भी मिल जायेगी।

पांग से आगे कुछ चढाई है।

चढाई से दिखता पांग



धूप निकली हो तो लद्दाख की कई पहाडियां स्वर्णिम हो जाती हैं।

मोरे मैदान









यह चित्र मेरे लैपटॉप का स्क्रीन सेवर है।





यह है भेड चराने वाले लद्दाखी घुमन्तू गडरियों का ठिकाना

आज आखिरी पन्द्रह किलोमीटर के आसपास ऐसी सडक पर चलना पडा।

ऐसा रंग संयोजन केवल लद्दाख में ही सम्भव है।


शो-कार मोड
अगले भाग में जारी...

मनाली-लेह-श्रीनगर साइकिल यात्रा
1. साइकिल यात्रा का आगाज
2. लद्दाख साइकिल यात्रा- पहला दिन- दिल्ली से प्रस्थान
3. लद्दाख साइकिल यात्रा- दूसरा दिन- मनाली से गुलाबा
4. लद्दाख साइकिल यात्रा- तीसरा दिन- गुलाबा से मढी
5. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौथा दिन- मढी से गोंदला
6. लद्दाख साइकिल यात्रा- पांचवां दिन- गोंदला से गेमूर
7. लद्दाख साइकिल यात्रा- छठा दिन- गेमूर से जिंगजिंगबार
8. लद्दाख साइकिल यात्रा- सातवां दिन- जिंगजिंगबार से सरचू
9. लद्दाख साइकिल यात्रा- आठवां दिन- सरचू से नकी-ला
10. लद्दाख साइकिल यात्रा- नौवां दिन- नकी-ला से व्हिस्की नाला
11. लद्दाख साइकिल यात्रा- दसवां दिन- व्हिस्की नाले से पांग
12. लद्दाख साइकिल यात्रा- ग्यारहवां दिन- पांग से शो-कार मोड
13. शो-कार (Tso Kar) झील
14. लद्दाख साइकिल यात्रा- बारहवां दिन- शो-कार मोड से तंगलंगला
15. लद्दाख साइकिल यात्रा- तेरहवां दिन- तंगलंगला से उप्शी
16. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौदहवां दिन- उप्शी से लेह
17. लद्दाख साइकिल यात्रा- पन्द्रहवां दिन- लेह से ससपोल
18. लद्दाख साइकिल यात्रा- सोलहवां दिन- ससपोल से फोतूला
19. लद्दाख साइकिल यात्रा- सत्रहवां दिन- फोतूला से मुलबेक
20. लद्दाख साइकिल यात्रा- अठारहवां दिन- मुलबेक से शम्शा
21. लद्दाख साइकिल यात्रा- उन्नीसवां दिन- शम्शा से मटायन
22. लद्दाख साइकिल यात्रा- बीसवां दिन- मटायन से श्रीनगर
23. लद्दाख साइकिल यात्रा- इक्कीसवां दिन- श्रीनगर से दिल्ली
24. लद्दाख साइकिल यात्रा के तकनीकी पहलू

23 comments:

  1. आपको अंग्रेजी नहीं आती तो अंग्रेज को ही थोडा जाट भाषा सिख देते। फोटो हमेशा की तरह शानदार। उस इलाके की खूबसूरती को आपने बहुत अच्छे से कैमरे में कैद किया है. बधाई

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  2. सही कहा...
    रंग संयोजन देखना हो तो बस लद्दाख ही है, ऐसा लगता है बस बात कर देखते ह इराहो....
    अद्भुत जगह है....

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  3. इससे अच्छा है शो-कार देख आऊं।

    DEKH AAYE THO HUME BHI DIKHA DETE..
    PHOTO UPLOAD KARNE ME 2 MINUTE HE LAGTE..

    UNCHAII AUR UTRAAI KI MATHEMATICAL SAMEEKSHA ME ULJHA DIYA IS BAAR THO..

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    1. आपकी बात का रिप्लाई जरूर करना पडेगा।
      क्या आपको लगता है कि मैं शो-कार देखने गया और यहां वर्णन नहीं करूंगा? वर्णन होगा और बहुत शानदार होगा। अगली पोस्ट का इन्तजार करो बस।
      और हां, फोटो अपलोड करने में दो मिनट नहीं आधा घण्टा लगता है। मेरी मेहनत की इतनी सस्ती कीमत मत लगाओ। :)

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    2. DARNE K LIYE DHANYAWAAD!!

      Are nahi aisa nahi.. mujhe laga ki jheel ko skip ker diya post me.. AApki mehtant k tho hum kayal hain neerajji.. Her post k sath aur hote jaate hain.. keemat lagane jaisa tho nahi kaha..

      parson ka intejaar rahega bhaiji..

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  4. मैंने कहा- न्यू कहदे बेरा ना

    Je ke hove hai..

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    1. “बेरा ना” माने पता नहीं।
      “न्यू कहदे बेरा ना” यानी उससे बोल कि पता नहीं।

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    2. जै ऐक नई बोली सिखने मिली मन्ने थारे से छोरो ..
      वर्ना जै बोली का मन्ने “बेरा ना”..

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  5. अंगरेजी जाणते तो यहां बोनट खोलकै खडे होत्ते?
    हा .. हा .. हा

    - Anilkv

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  6. वाह, आनंद आरहा है, शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  7. Replies
    1. चित्र इतने नयनाभिराम है... पर अगर बड़े आकार में लगाओ तो मजा दुगुना हो जायेगा

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  8. इतना बड़ा मैदान देख कहीं किसी को नगर बसाने की समक्ष न लग जाये।

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  9. वह जाने की इच्छा और बढ गई ....

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  10. shaandaar photo, maza aa gya Neeraj bhai
    बल्ले बल्ले हिमांक
    तेरा नही मुक़ाबला ?

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  11. Neeraj ji ram-ram.bahut sunder photo aur aapke bech -bech me jaato wali bahsa ka pryog isileya toh aap great ho.

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  12. Shayad agar tum Saridiyo mein yahan jaate to aur bhi sunder photo dekhne ko milte...

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  13. इस सड़क को मैंने फिल्म 'जब तक है जान '.में देखा है जहाँ मोटर साइकिल पर शाहरुख जाता है और बेक ग्राउंड में गाना बजता है ..

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