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Friday, August 2, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- दसवां दिन- व्हिस्की नाले से पांग

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13 जून 2013
स्थान- व्हिस्की नाला। एक और नाला है ब्राण्डी नाला। कहते हैं यहां व्हिस्की व ब्राण्डी के ट्रक पलटे थे तो उन्हीं के नाम पर नाले बन गये। मुझे यह गलत लगता है। इन नामों की खोज जरूरी है। पिछले 20-25 साल से ही यह सडक अस्तित्व में है। उससे पहले पगडण्डी थी। यानी ट्रक अधिकतम 20-25 सालों से ही चल रहे हैं। अब खोज यह करनी है कि क्या पगडण्डी वाले जमाने में भी इसे व्हिस्की नाला ही कहते थे? अगर हां, तो दो ट्रक पलटने से बच जायेंगे।
सोने में कोई लापरवाही नहीं। शरीर जब भी कहे- उठ जाग मुसाफिर भोर भई, तभी उठते हैं। जबरदस्ती कभी नहीं। साढे आठ बजे आंख खुली। बाहर निकलकर देखा, बादल थे, हवा भी। क्या मानसून आ गया है? चार जून को मानसून ने केरल में दस्तक दे दी थी जब मैं दिल्ली से चला था। क्या आठ-नौ दिन में वह हिमालय भी पार कर गया? मुश्किल लग रहा है। पांच दिन पहले जब केलांग में था, तो घर पर बात की थी। मानसून उत्तर भारत में नहीं आया था। पांच दिनों में मानसून का उत्तर भारत पर छा जाना, हिमालय पर आ जाना व हिमालय भी पार कर जाना असम्भव है। नहीं, यह मानसून नहीं है। कुछ और ही मामला है।
दस बजे जब यहां से चला तो सेरिंग साहब ने चोगलमसर स्थित अपने घर का पता व फोन नम्बर दे दिया था। मैं ठहरा दिल्ली में ‘अफसर’, वे भी अपने आठवीं में पढ रहे बेटे को मेरे जैसा बनाना चाहते हैं। इसलिये वे मुझे अपने घर पर आमन्त्रित कर रहे हैं। हालांकि वे उस समय घर पर नहीं रहेंगे, लेकिन सदस्य अवश्य रहेंगे। सदस्य मुझे नहीं जानते, ऐसे में उनके घर जाना अटपटा सा लग रहा है। सदस्यों को मेरे आने की कोई खबर नहीं होगी। मैं अचानक जाकर कहूंगा- व्हिस्की नाले पर सेरिंग साहब मिले थे, उन्होंने भेजा है। सदस्य शायद हिन्दी जानते हों, शायद नहीं जानते हों। नहीं, मैं नहीं जाऊंगा। उनका वहां होटल होता तो अलग बात थी या सेरिंग साहब होते तो भी और बात थी। नहीं जाऊंगा।
व्हिस्की नाला पार करने के लिये छोटा सा पुल भी बना है। पता नहीं पुल के नीचे पत्थर भर गये हैं या पानी ज्यादा आ गया है, पानी पुल के ऊपर से बह रहा है। ज्यादा पानी नहीं है, आराम से साइकिल पर बैठे बैठे ही पार कर गया।
अभी तक कई नाले पैदल पार करने पडे। एक बार तो बहाव इतना तेज था कि साइकिल समेत बह जाने का डर लगने लगा था। व्हिस्की नाले पर भी सुनाई पडा कि पांग से पहले बडा शक्तिशाली नाला है। जब मैं सरचू में था तो देर रात वहां एक गाडी आई। कह रहे थे कि पांग नाले पर बडी देर तक फंसे रहे, बाद में गाडी खराब भी हो गई। ऐसा भी एक नाला आने वाला है- यह सोच-सोचकर खून सूखा जा रहा था। आज उस नाले से मुलाकात होने वाली है।
व्हिस्की नाला पुल 4737 मीटर की ऊंचाई पर है। इससे छह किलोमीटर आगे लाचुलुंग-ला है, जो 5060 मीटर पर है। यह 4737 मीटर की ऊंचाई पर सोने का नतीजा था कि बिना हांफे, बिना पैदल चले लाचुलुंग-ला पहुंच गया। रास्ते में जगह-जगह सडक ठीक करते मजदूर मिले जो झारखण्डी होने के बावजूद जुले कहकर अभिवादन करते थे। मनाली से यहां तक जितने भी मजदूर मिले, सभी झारखण्डी।
लाचुलुंग-ला, मनाली लेह सडक पर पांच दर्रों में दूसरा सबसे ऊंचा। मेरे मोबाइल स्थित जीपीएस ने इसकी ऊंचाई बताई- 5047 मीटर। जिन्दगी में दूसरी बार 5000 मीटर की महा-ऊंचाई पर चढा। इससे पहले श्रीखण्ड महादेव गया था जो 5200 मीटर पर स्थित है। यह रिकार्ड भी लेह पहुंचते पहुंचते टूट जायेगा। तंगलंग-ला 5300 मीटर ऊंचा है।
लाचुलुंग-ला पहुंचते ही पेट में बडे जोर का डंका बजा। अविलम्ब सफाई करने का आदेश आया। आसपास नजर दौडाई तो एक बोतल पडी दिख गई, पानी भी दिख गया और एक छोटी सी छुपने की जगह भी। जब बैठा सुकून के क्षणों का आनन्द ले रहा था, तो ध्यान आया कि मैं तो लाचुलुंग-ला पर हूं। दर्रे हमेशा से पूजनीय स्थल रहे हैं। स्थानीय निवासी व व्यापारी जो प्राचीन काल से इन्हें पार करते आ रहे हैं, मानते हैं कि यहां एक देवता बैठा होता है जो हमें दुर्गम स्थानों पर इधर से उधर सुरक्षित पहुंचा देता है। दर्रों पर झण्डियां व छोटे छोटे मन्दिर आम बात है। मेरे सामने सडक के उस तरफ भी ऐसा ही एक देवता विराजमान था। यह लद्दाख है, इसलिये कोई बौद्ध देवता ही होगा। एक छोटा सा मन्दिर व चारों ओर प्रार्थना लिखी झण्डियां ही झण्डियां। मैं देवता के बिल्कुल सामने गन्दगी फैला रहा हूं, अवश्य वो नाराज हो जायेगा। यहां से उठकर अच्छी तरह हाथ धोकर देवता के सामने माथा टेकूंगा और कहूंगा- देवता जी, मुझे माफ करना लेकिन बडी भयंकर मजबूरी थी।
और जब बौद्ध झण्डियों से घिरे उस छोटे से मन्दिर के सामने माथा टेकने गया तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा- ये तो अपने शिवजी भगवान हैं। माथा जरूर टेका, साथ ही शिवजी से कह भी दिया- मित्र, तेरे सामने न सफाई देने की आवश्यकता है, न माफी मांगने की। तू सब जानता है। अपने पडोसी से भी कह देना कि बालक अपना ही है, क्रुद्ध न हो।
बारह बजे यहां से चला। 22 किलोमीटर दूर पांग तक उतराई है। लेकिन रास्ता बडा खराब है।
लाचुलुंग-ला से तीन ही किलोमीटर नीचे आया कि तेज बारिश होने लगी। मैंने शीघ्रता करते हुए रेनकोट पहना व बैग को भी रेन कवर पहना दिया। एक विदेशी भी मोटरसाइकिल पर पांग की तरफ जा रहा था। मुझे देखकर बोला- आर यू ओके? मैंने कहा- या या, ओके। बहुत बढिया। थैंक्यू।
जब ऊपर से नीचे तक मैं वर्षा विरोधी हो गया तो साइकिल पर बैठकर पीछे लाचुलुंग-ला की ओर देखा व कहा- शिवजी, समझा ले अपने पडोसी को। यह ठीक नहीं कर रहा। और शिवजी ने अपने लद्दाखी पडोसी को पता नहीं क्या समझाया, एक किलोमीटर के अन्दर बारिश बन्द।
दो बजे कंगलाजल पहुंचा। यह 4694 मीटर पर स्थित है। यहां लाचुलुंग-ला से आती जलधारा पार करनी होती है। यह बडे संकरे स्थान से बहती है व दोनों ओर सीधे खडे पहाड हैं, पुल भी नहीं है। कई झारखण्डी मजदूर यहां तैनात थे। यहीं वो स्थान है जिसके बारे में मैं सरचू से सुनता आ रहा था। लेकिन अब इसमें मामूली सा पानी था, बिना साइकिल से उतरे पार हो गया।
असल में दिन की तेज धूप में जब बर्फ पिघलती है तो इन नालों में भी पानी की मात्रा बढती जाती है। आज धूप निकली नहीं, बर्फ पिघली नहीं व नाला भी बढा नहीं। मानसून में जब धुआंधार बारिश होती है तो इन नालों की बन आती है। तब इनमें इतना भयंकर बहाव होता है कि ट्रकों तक को बहा ले जा सकते हैं। ऐसे नालों को तब पागल नाला कहा जाता है। मेरी निगाह में अभी तक यह अर्द्ध पागल नाला था। आसानी से पार कर लिया तो बडा सुकून मिला।
कंगला जल के पास सीधे खडे पहाड हैं। इनसे होकर सडक आगे बढती है तो बडा हैरतअंगेज लगता है। बार-बार पीछे मुड-मुडकर देखता हूं तो मुंह से यहीं शब्द निकलते हैं- ओ तेरे की।
तीन बजे पांग पहुंचा। सरचू के बाद यही बडा पडाव है। यहां बहुत सारे होटल हैं। ज्यादातर को महिलाएं देखती हैं। जैसे ही मैं आगे बढता, होटल वाली लद्दाखी महिलाएं कर्णप्रिय आवाज लगातीं- सर, यहां आ जाओ। आखिरकार मुझे रुकना ही था, एक में रुक गया।
अन्धेरा होने तक दो और आ गये। ये मनाली में टूर संचालक हैं जो आजकल पर्यटकों से पचासों हजार रुपये लेकर मोटरसाइकिल पर लेह का चक्कर लगवाते हैं। इनके ग्राहक बराबर वाले तम्बू यानी होटल में ठहरे थे।
इनके बाद दो बौद्ध तीर्थयात्री आये। ये स्पीति की पिन घाटी के शगनम गांव के रहने वाले थे व लेह जा रहे थे। होटल संचालिका ने इनकी शराब से खातिरदारी की। बौद्ध भिक्षु न शराब पी सकते हैं, न मांस खा सकते हैं जबकि गृहस्थ शराब भी पी सकता है, मांस भी खा सकता है। पूरे हिमालय में शराब तो आम बात है ही, अनाज की कम पैदावार के चलते मांस खाना भी आम है। लद्दाख जैसी जगहों पर तो यह जरूरी है।
ये कुल तीन तीर्थयात्री थे। तीसरा बराबर वाले होटल में खा-पी रहा था। इनका कोई खर्चा नहीं खाने का। इसके बाद नाच गाने का दौर शुरू हुआ। वृत्ताकार चक्कर लगाते हुए नृत्य होने लगा। इतने धीरे धीरे पैर उठाते कि लगता जैसे सो गये। हमने भी करीब घण्टे भर तक इसे देखा, फिर सोने चले गये।

व्हिस्की नाला


लाचुलुंग-ला पहुंचने वाले हैं।

लाचुलुंग-ला




लाचुलुंग-ला से आगे पांग की ओर



एक मजदूर ने फोटो खींचा।

कंगला जल

कंगला जल नाले पर तैनात बीआरओ के मजदूर



लाचुलुंग-ला के बाद पांग तक लगातार नीचे ही उतरना है, लेकिन सडक बडी खराब है।


भू-दृश्य में परिवर्तन



अजीब अनोखी आकृतियां।

इनके बनाने में जल के साथ साथ वायु का भी बडा हाथ है।

पांग

पांग में आपका स्वागत है।

पांग




अगले भाग में जारी...

मनाली-लेह-श्रीनगर साइकिल यात्रा
1. साइकिल यात्रा का आगाज
2. लद्दाख साइकिल यात्रा- पहला दिन- दिल्ली से प्रस्थान
3. लद्दाख साइकिल यात्रा- दूसरा दिन- मनाली से गुलाबा
4. लद्दाख साइकिल यात्रा- तीसरा दिन- गुलाबा से मढी
5. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौथा दिन- मढी से गोंदला
6. लद्दाख साइकिल यात्रा- पांचवां दिन- गोंदला से गेमूर
7. लद्दाख साइकिल यात्रा- छठा दिन- गेमूर से जिंगजिंगबार
8. लद्दाख साइकिल यात्रा- सातवां दिन- जिंगजिंगबार से सरचू
9. लद्दाख साइकिल यात्रा- आठवां दिन- सरचू से नकी-ला
10. लद्दाख साइकिल यात्रा- नौवां दिन- नकी-ला से व्हिस्की नाला
11. लद्दाख साइकिल यात्रा- दसवां दिन- व्हिस्की नाले से पांग
12. लद्दाख साइकिल यात्रा- ग्यारहवां दिन- पांग से शो-कार मोड
13. शो-कार (Tso Kar) झील
14. लद्दाख साइकिल यात्रा- बारहवां दिन- शो-कार मोड से तंगलंगला
15. लद्दाख साइकिल यात्रा- तेरहवां दिन- तंगलंगला से उप्शी
16. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौदहवां दिन- उप्शी से लेह
17. लद्दाख साइकिल यात्रा- पन्द्रहवां दिन- लेह से ससपोल
18. लद्दाख साइकिल यात्रा- सोलहवां दिन- ससपोल से फोतूला
19. लद्दाख साइकिल यात्रा- सत्रहवां दिन- फोतूला से मुलबेक
20. लद्दाख साइकिल यात्रा- अठारहवां दिन- मुलबेक से शम्शा
21. लद्दाख साइकिल यात्रा- उन्नीसवां दिन- शम्शा से मटायन
22. लद्दाख साइकिल यात्रा- बीसवां दिन- मटायन से श्रीनगर
23. लद्दाख साइकिल यात्रा- इक्कीसवां दिन- श्रीनगर से दिल्ली
24. लद्दाख साइकिल यात्रा के तकनीकी पहलू

16 comments:

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  2. yatra vrutant hamesha ki tarah mazedar raha. photos ne charchand laga diye. whiskey aur brandy nale ka ithihas avasya hona chahiye

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  3. देखकर और पढकर ही रोमांच हो रहा है, बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  4. LACHUNG LA PER YE SHIV MANDIR HAI... YE THO EK DUM NAI JANKAARI HAI MERE LIYE..
    BAHUT BAAR ISKA PHOTO DEKHA, KAI SAARE YATRA VARNAN PADHE, KAI SAARE BLOGS CHAANE PER YE JAANKAARI KISI NE NAHI DI.. BUS IN JHANDIYO K BAARE ME SAB BATATE THE..

    BADHIYA ...

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  5. Neeraj ji aap yatra me jaan daal dete ho aap ka jabab nahi

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  6. लदाख में प्रवेश के बाद, तस्वीरों के रंग बदलने लगे।
    - Anilkv

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  7. आखरी फोटो तो जोरदार है, गजब की.

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  8. Namaskaar Shreeman,
    Mai ek lambe samay se aapki yatra varnan ko padh raha hu. Aapka har lekh aapki ki hui yatra ko ek alag hi jeev roop de deta hai. Aapka lekh padhte samay aisa pratit hota hai, mano mai bhi is yatra ka utna hi maja loot raha hu jitna ki vastav me yatra karne wala. Waise aapke lekh par ye mera pehla sandesh hai, lekin fir bhi yakin kijiye aapke har lekh ko maine ek naye utsah ke sath padha hai.Sabse achchi cheej mujhe jo lagti hai wo ye ki aap un chund gine chune "safal" vyaktiyon ki suchi me hain jo ye jaante hain ki wo kya karna pasand karte hain. Shayad aapko ye thoda atpata lage lekin mere annubhav ke anusaar aise bahut kam log hai jo vastav me "khud" ko jaante hain. Aksar yahi dekha jaata hai ki kisi parikshak ke dwara aapke "shock" [Hobby] pooche jaane par aapko ye sochna padta hai ke vastav me aapka shock kya hai. Aur isse bhi badi to ye baat hai ke aksar jo "shock" hum sakshatkaar ke dauran samne wale ko batate hain, agar hum un par prakash daale to pata chalega ki un "shock" ko aakhiri samay hamne kab kiya tha.. ya aksar yaad hi nahi hota. Kul mila kar ye jaana, ke aap kya pasand karte hain, aur usse bhi jyada ye badi baat ki aapka us kriya me sammilit hona jise aap pasand karte vastav me sarhaniya hai. Mai aapke zazbe ve yatra varnan ke liye aapko dhero dili badhai deta hoon. Mujhe ummed hai ke aage bhi isi tarah aapke shandar lekh v yatra varnan sunne ka mauka hume milta rahega. Ek anurodh hai, kripya apne ek lekh me kisi bhi yatra par jaane se pehle sath me lene wali upyogi vastue/koi any jaankari juatana jaiai cheejo ka varnan bhi karein, ye naye ghumkkado ke liye Rambaan sabit hogi. Ek aur sujhav sanjhan karna chahta hoon, Bhariya sarkar ki ek "NGO" hai- YHAI-Youth hostel association of India. Ye kaafi kam bajat me kuch vishesh isthano par akele/parivar k sath jaane ka karykram rakhte hain. Is samuday ke sadsyan na keval in yatraon ka fayda le sakte hain balki is sanstha ke desh bhar me faile hue saste hotel/kamre ki suvidha ka fayda bhi le sakte hain. Aap agar chahe to ek baar inke baare me jaankari lein. Ek baar kisi ek vishes isthan ke yatra karne par, aap agli baar vahan "guide" ban kar jaa sakte hain jisse na sirf aapko muft me ghumakkadi k amauka milega varan mujhe yakin hain ke ye aapke liye ek naya anubhav hoga.

    Subhkamnayo k sath,
    Sumit Tomar.
    2005-08 [DNP]
    aapka junior

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    1. तोमर साहब, आपकी इतनी बडी टिप्पणी है लेकिन मजा आ गया पढकर। आपकी यह बात बडी अच्छी लगी कि “आप उन चन्द गिने चुने सफल व्यक्तियों की सूची में हैं जो यह जानते हैं कि वे क्या करना पसन्द करते हैं।” आपने सही कहा। वास्तव में... और मुझे गर्व भी है कि मैं अपना लक्ष्य और अपनी पसन्द जानता हूं।
      आपका अनुरोध कि साथ में क्या क्या लेकर चलें.. कोशिश करूंगा लिखने की। मैं वैसे तो ज्यादा सामान लेकर नहीं चलता और जो भी लेता हूं, उसे लिखना पसन्द नहीं करता। ध्यान रखूंगा।
      रही बात यूथ हॉस्टल की तो मैं इसका आजीवन सदस्य हूं। इसके कार्यक्रम सस्ते तो अवश्य होते हैं लेकिन नौसिखियों के लिये होते हैं। एक सामान्य ट्रेकिंग में भी गुंजाइश से ज्यादा समय लगाते हैं। मैंने इसी साल मई में सौरकुण्डी ट्रेक बुक किया था लेकिन अधिक समय लगने के कारण रद्द करना पडा। ये इस ट्रेक के लिये ग्यारह दिन लगाते हैं जबकि अपने प्रयासों से चार दिनों से इसे आसानी से किया जा सकता है। अगर हम ग्यारह दिनों की छुट्टी लेंगे तो कोई बडा काम करेंगे। यह उनके लिये सर्वोत्तम है जिन्होंने कभी ट्रेकिंग नहीं की।
      आपकी इस महा-टिप्पणी के लिये धन्यवाद। आशा है कि आगे भी इसी तरह की टिप्पणियां पढने को मिलेंगीं।

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  9. एक बात बताइयेगा...आपका GPS वहां कैसे चल पा रहा था... क्या वहां सिम का नेटवर्क आ रहा था... अथवा कोई और system है....

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    1. शर्मा जी, GPS सिम से नहीं चला करता। यह एक अलग डिवाइस यानी हार्डवेयर होता है जो अन्तरिक्ष में चक्कर लगा रहे नेवीगेशन सैटेलाइटों से डाटा लेता है। यह हमें चार चीजें बताता है- अक्षांश, देशान्तर, समुद्र तल से ऊंचाई और हमारे चलने की गति। इस डाटा के लिये अगर हम नक्शे का इंतजाम कर सकें (गूगल मैप डाउनलोड करके या फोन में मैप सेव करके) तो यह हमारी तत्काल स्थिति नक्शे पर बता देगा, नहीं तो यह चारों चीजों को अलग अलग बताता है कि तुम इस अक्षांश पर हो, इस देशान्तर पर हो, इस ऊंचाई पर हो आदि।

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    2. धन्यवाद..शायद आपके फ़ोन में standalone GPS hai..नहीं तो एंड्राइड फ़ोनों में बिना सिम नेटवर्क के नहीं चल पाते जीपीएस...

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  10. मित्र, तेरे सामने न सफाई देने की आवश्यकता है, न माफी मांगने की। तू सब जानता है। अपने पडोसी से भी कह देना कि बालक अपना ही है, क्रुद्ध न हो।

    प्रेरक पंक्तियां :-)
    प्रणाम

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  11. पहाड़ों के बीच रास्ते देने वाले दर्रे सदा ही पूजनीय रहे हैं। आपके लिये तब तो यह तीर्थयात्रा हो गयी।

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  12. पहाड़ो को गंदा नहीं करते ? यहाँ से आने वाली नदियों का पानी हम पीते है ... पर क्या करे ,जरुरत पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है हा हा हा
    .'अजीब अनोखी आकृतियां'।ये आकृतियां' ऐसी है मानो हाथो में थाल लेकर महिलाये स्वागत को खड़ी हो ....बहुत सुंदर ...

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