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Wednesday, July 31, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- नौवां दिन- नकी-ला से व्हिस्की नाला

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12 जून 2013
सुबह आठ बजे आंख खुली। बाहर कुछ आवाजें सुनाई पडीं। दो मोटरसाइकिलें व दो कारें रुकी थीं और यात्री हमारे टैण्ट के पास आकर फोटो खींच रहे थे। हमने टैण्ट रात बिल्कुल आपातकाल में लगाया था। पीछे 34 किलोमीटर दूर सरचू व आगे 11 किलोमीटर दूर व्हिस्की नाले पर ही आदमियों का निवास था। ऐसे सुनसान वीराने में हमारा यह टैण्ट आने-जाने वालों के लिये आकर्षण का केन्द्र था। ये लोग रोहतक के थे।
मैंने चलने से पहले गूगल मैप से रास्ते की दूरी व ऊंचाईयां नोट कर ली थीं। नकी-ला की स्थिति लिखने में भूल हो गई। मैंने लिखा- गाटा लूप (4600 मीटर) के दो किलोमीटर आगे 4740 मीटर की ऊंचाई पर नकी-ला है। इसके बाद नोट किया- नकी-ला से 19 किलोमीटर आगे 5060 मीटर की ऊंचाई पर लाचुलुंग-ला है। इस डाटा से यह पता नहीं चलता कि नकी-ला पार करने के बाद थोडी बहुत उतराई है या सीधे लाचुलुंग-ला की चढाई शुरू हो जाती है।
कल जब हम गाटा लूप खत्म होने के बाद तीन किलोमीटर चले आये व नकी-ला नहीं आया तो हमने यहीं सोचा कि नकी-ला पीछे छूट चुका है व उतराई शुरू नहीं हुई तो इसका यही अर्थ है कि लाचुलुंग-ला की चढाई शुरू हो चुकी है। जबकि वास्तव में नकी-ला अभी आया ही नहीं था। मैंने गलत डाटा नोट कर लिया था।
पौने दस बजे यहां से चले। सामान साइकिलों पर बांधने व साइकिलें ऊपर सडक पर चढाने में जान निकल गई। यह उच्च पर्वतीय बीमारी है, जरा सा श्रम करने में सांस चढ जाती है। सचिन का भी यही हाल था।
हमेशा की तरह सचिन आगे निकल गया। रास्ता धीरे धीरे ऊपर की ओर बढता जा रहा था। साइकिल चलाने में मुझे भयंकर परेशानी हो रही थी। हालांकि सडक अच्छी बनी थी, चढाई भी ज्यादा तीव्र नहीं थी, फिर भी चार पैडल मारते ही घुटनों की जान निकल जाती। दूसरी परेशानी पानी की थी। चूंकि दोनों दिशाओं में गाडियां आ-जा रही थीं, लेकिन किसी को रोककर पानी मांगने की हिम्मत नहीं हुई।
जब 4800 मीटर भी पार हो गया, तो इतना पक्का हो गया कि नकी-ला पीछे जा चुका है। अब लाचुलुंग-ला यानी 5060 मीटर तक जाकर ही चढाई से पीछा छूटेगा। यह मेरे गलत आंकडे का फल था। नकी-ला अभी आगे है।
जब साइकिल चलाना बस से बाहर हो गया तो नीचे उतर गया व पैदल चलने लगा। परेशानी अब भी हो रही थी लेकिन अब बार-बार रुकना नहीं पड रहा था। धीरे-धीरे खुद घिसटते हुए साइकिल धकेलना पैडल मारने के मुकाबले ज्यादा सुकून भरा था।
कल शाम जब बारिश हुई तो यही सोचा कि हिमालय के ऊंचाई वाले इलाकों में दोपहर बाद मौसम खराब हो जाता है, इसलिये बारिश हो रही है। लेकिन जब सुबह भी ऐसा ही मौसम देखा तो अपशकुन की आशंका होने लगी। यह हिमालय पार की धरती है, बादल भूल से आ गये व जाने का रास्ता भूल गये। इतना तो पक्का है कि बेचारे ये दुखियारे बादल ज्यादा नहीं बरसेंगे लेकिन तेज हवाओं ने हालत खराब कर रखी है। दो दिन पहले जब तेज धूप ने हाहाकार मचा रखा था, तो मैंने ऊपर वाले से रहम करने को कहा था। उसने अगले ही दिन बात मान ली, रहम कर दिया। धूप खत्म। तब अगर मालूम होता कि उसके पास धूप का विकल्प तेज ठण्डी हवाएं हैं, तो रहम करने को कहता ही नहीं। भाई मेरे, बीच का रास्ता भी तो होता है। बादल भेज दे बेशक लेकिन तूफान तो मत चला।
एक पतली सी जलधारा मिली। अमृत मिल गया। पानी पीया, नमकीन खाई, आधे घण्टे तक यहीं बैठा रहा। बारह बजे उठकर चला तो फिर से सांस लेने की समस्या आई, विश्राम करने के बाद भी पैदल घिसटना पडा।
नकी-ला, ऊंचाई 4930 मीटर। यहां से आगे काफी दूर तक सडक दिख रही थी। सडक पहले नीचे उतरी, एक नाला पार किया, फिर ऊपर चढी व दूर एक दर्रे में खो गई। निःसन्देह वह दर्रा लाचुलुंग-ला है। जहां सडक ने नाला पार किया, वहां कुछ तम्बू दिख रहे हैं। यह नाला व्हिस्की नाला है। कल भी हमने इस नाले को पार किया था।
असल में लाचुलुंग-ला से व्हिस्की नाला निकलता है और सरचू के पास नदी में जा मिलता है। लाचुलुंग-ला पार करके ही पांग पहुंचा जा सकता है। इसलिये सडक का व्हिस्की नाले के साथ साथ ऊपर बढना जरूरी है। लेकिन व्हिस्की नाला बडी गहरी खड्ड में बहता है। इसके साथ साथ सडक बनाना बडा मुश्किल था। आसान तरीका अपनाया गया।
जहां गाटा लूप हैं, वहां पहाड ज्यादा खडा नहीं है। तभी तो एक के ऊपर एक इक्कीस लूप बन गये। जितना ऊपर बढते गये, पर्वत ढलान की तीव्रता भी कम होती गई। गाटा लूप का ही चमत्कार है कि सडक तो काफी ऊपर चली गई, लेकिन व्हिस्की नाला नीचे खड्ड में ही बहता रहा। गाटा लूप के बाद भी सडक ऊंची होती गई, व्हिस्की नाला उतना ऊपर नहीं जा सका। आखिरकार नकी-ला से सडक को नीचे उतरना पडा। चार-पांच किलोमीटर बाद सडक व नाला दोनों मिल गये।
देखा जाये तो नकी-ला ‘नकली-ला’ है। ला माने दर्रा। दर्रे की एक पहचान है कि इसके दोनों तरफ ढलान होता है। हालांकि कभी कभी इसके अपवाद भी होते हैं। सबसे आसान पहचान है कि इसके दोनों किनारों से अलग-अलग नाले निकलते हैं। ये नाले आगे जाकर किसी नदी में गिरते हैं या खुद दूसरे नालों से मिलकर नदी बन जाते हैं। लेकिन नकी-ला से कोई नाला नहीं निकलता। इससे अगर नीचे व्हिस्की नाले की तरफ झांके तो पायेंगे कि व्हिस्की नाला नकी-ला के दोनों ओर है। सडक ज्यादा ऊपर चली गई थी, इसलिये उसे नीचे उतारना पडा। अगर ज्यादा अक्ल से काम लिया होता तो शायद नीचे उतारने की आवश्यकता ही न पडती। हर चढाई के बाद अगर थोडी बहुत उतराई आए तो उसे दर्रा नहीं कहा जा सकता। नकी-ला ‘नकली-ला’ है।
यह सडक कब बनी है, इतना तो पता नहीं लेकिन बनी आजादी के बाद ही है। उससे पहले भी यहां से आवागमन होता था, व्यापार होता था। तब पगडण्डी थी। वह पगडण्डी आज भी दिखाई देती है। जब हम गाटा लूप पर होते हैं, तो व्हिस्की नाले के दूसरी तरफ एक लकीर भी साथ साथ चढती दिखती है। वह लकीर लाचुलुंग-ला तक दिखती रहती है। जाहिर है पगडण्डी वाले जमाने में न तो गाटा लूप का अस्तित्व था, न नकी-ला का। सडक बन जाने पर पगडण्डी का महत्व खत्म हो गया लेकिन अति न्यून बारिश होने के कारण वह मिटी नहीं। कहीं कहीं ऊपर से चट्टान खिसकने या मिट्टी गिरने से कुछ दूर तक अदृश्य हो गई है, लेकिन अस्तित्व है अभी भी उसका।
नकी-ला के बाद सडक खराब हो जाती है। ऊपर से बूंदाबांदी भी शुरू। इस बूंदाबांदी में साढे चार किलोमीटर नीचे तम्बुओं तक साइकिल चलानी पडी। सचिन वहीं मिला। तम्बू का मालिक लद्दाखी था- सेरिंग सेन्दुप। उसने एक छोटे तम्बू में हमारी साइकिलें खडी करवा दीं, सामान भीगने से बच गया।
मैं पौने एक बजे यहां पहुंच गया था। आधे घण्टे बाद ही मौसम खुलने के आसार हो गये। सचिन ने ठान लिया कि कैसा भी मौसम हो, वो दो बजे यहां से चल देगा। मैं इसके लिये तैयार नहीं था। पहला कारण, छह किलोमीटर दूर लाचुलुंग-ला है जो 5060 मीटर ऊंचा है। जब नकी-ला तक जाने में ही हालत खराब हो गई, तो उससे भी ऊपर जाने में और भी बुरी हालत होने वाली है। दूसरा कारण मौसम। बूंदाबांदी भले ही रुक गई हो लेकिन चारों ओर काले बादल थे, हवा भी तूफानी गति से चल रही थी। कभी बूंदाबांदी या बारिश हो सकती है। 5000 मीटर की ऊंचाई पर भीगने का नतीजा मैं अच्छी तरह जानता हूं। मैं कभी भी दवाईयां लेकर नहीं चलता हूं। तो जान-बूझकर ऐसा काम क्यों करूं जिससे मुझे दवाईयां लेनी पडे।
आज यहीं रुकूंगा। कल पांग जाऊंगा। हालांकि आज मात्र 11 किलोमीटर ही साइकिल चलाई, फिर भी कोई मलाल नहीं है। सचिन आज पांग पहुंच जायेगा। कल जब तक मैं पांग पहुंचूंगा, वो शायद डेबरिंग पहुंच जाये। इस तरह वो मुझसे एक दिन आगे हो जायेगा। अब शायद हम लेह में ही मिलें।
व्हिस्की नाले पर आज मैं ही अकेला यात्री हूं। सेरिंग ने बताया कल पूरा तम्बू भरा था। अकेला यात्री होने के बडे मजे हैं। आप कुर्सी पर बैठकर खाने का हुक्म चलाना छोडकर सीधे स्टोव के पास पालथी मारकर बैठ सकते हैं। तवे पर खुद रोटी सेंककर खा सकते हैं। थोडा सा हाथ बढाकर कुकर उठाकर दाल ले सकते हैं। आपके बगल में लद्दाखी बैठा है, उससे घर-परिवार से लेकर दीन-दुनिया की बातें कर सकते हैं।
और आखिर में शुभरात्रि कहकर गद्दों व रजाईयों के ढेर पर सो सकते हैं।

टैण्ट में सचिन



नकी-ला की ओर




नकी-ला को मैं नकली-ला कहता हूं।


यहां से सडक दूर- दूर तक दिख रही है। पहले व्हिस्की नाले तक नीचे उतरी और फिर नाला पार करके दूसरे पहाड पर ऊपर चढकर दूर सामने लाचुलुंग-ला में खो गई।

यहां से व्हिस्की नाला, उसके बराबर में तम्बू और सडक ऊपर 5060 मीटर ऊंचे लाचुलुंग-ला पर जाती दिख रही है।



व्हिस्की नाले पर


सचिन बादलों की तरफ देखकर अन्दाजा लगा रहा है कि आगे बढूं या नहीं।


अगले भाग में जारी...

मनाली-लेह-श्रीनगर साइकिल यात्रा
1. साइकिल यात्रा का आगाज
2. लद्दाख साइकिल यात्रा- पहला दिन- दिल्ली से प्रस्थान
3. लद्दाख साइकिल यात्रा- दूसरा दिन- मनाली से गुलाबा
4. लद्दाख साइकिल यात्रा- तीसरा दिन- गुलाबा से मढी
5. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौथा दिन- मढी से गोंदला
6. लद्दाख साइकिल यात्रा- पांचवां दिन- गोंदला से गेमूर
7. लद्दाख साइकिल यात्रा- छठा दिन- गेमूर से जिंगजिंगबार
8. लद्दाख साइकिल यात्रा- सातवां दिन- जिंगजिंगबार से सरचू
9. लद्दाख साइकिल यात्रा- आठवां दिन- सरचू से नकी-ला
10. लद्दाख साइकिल यात्रा- नौवां दिन- नकी-ला से व्हिस्की नाला
11. लद्दाख साइकिल यात्रा- दसवां दिन- व्हिस्की नाले से पांग
12. लद्दाख साइकिल यात्रा- ग्यारहवां दिन- पांग से शो-कार मोड
13. शो-कार (Tso Kar) झील
14. लद्दाख साइकिल यात्रा- बारहवां दिन- शो-कार मोड से तंगलंगला
15. लद्दाख साइकिल यात्रा- तेरहवां दिन- तंगलंगला से उप्शी
16. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौदहवां दिन- उप्शी से लेह
17. लद्दाख साइकिल यात्रा- पन्द्रहवां दिन- लेह से ससपोल
18. लद्दाख साइकिल यात्रा- सोलहवां दिन- ससपोल से फोतूला
19. लद्दाख साइकिल यात्रा- सत्रहवां दिन- फोतूला से मुलबेक
20. लद्दाख साइकिल यात्रा- अठारहवां दिन- मुलबेक से शम्शा
21. लद्दाख साइकिल यात्रा- उन्नीसवां दिन- शम्शा से मटायन
22. लद्दाख साइकिल यात्रा- बीसवां दिन- मटायन से श्रीनगर
23. लद्दाख साइकिल यात्रा- इक्कीसवां दिन- श्रीनगर से दिल्ली
24. लद्दाख साइकिल यात्रा के तकनीकी पहलू

15 comments:

  1. photo aur aap ki de gayi jaankari ke leya thnx.

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  2. Itni uchai wali jagah pe road banana bahut muskil kam hai. pahado ke sanidhya me bhojan ka luft hi alag hai

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  3. मान गये जाट महाराज! आगे अभी और रोमांच बाकी है।

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  4. कठिन सफ़र, अदम्य साहस। इस जज्बे को सलाम
    - Anilkv

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  5. Neeraj Ji, Kamaal ki jagah aur usse bhi zyada kamaal ki photography.

    Manali Root se August 10 to 20 Bike se Laddaq jane ke liye kaisa rahega. Raaste mein Camera ki bettery charge karne ke liye light ka intazam hai ya nahi.

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  6. wajan kitna kum hua?

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  7. एक छुटका ऑक्सीजन सिलिण्डर भी लेकर चलना था, साँसों में भरा और साइकिल पर सवार।

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  8. गजब रोमांचक है भाई, हमें तो देख और पढ पढकर ही आनंद आ रहा है.

    रामराम.

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  9. bhut aanand aa raha hai neeraj bhai.aapko salam hai.

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  10. bhut aanand aa raha hai neeraj bhai.aapko salam hai.

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  11. main kabhi kabhi sochata hoon ki aadmi kya nahi kar sakta ? maine neeraj tumhare har ank padhe hain lekin pahli baar apni baat likh raha hoon ! bahut hi umda kaam par ho mitra . lage raho

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  12. तेरी आँख हमेशा आठ बजे ही क्यों खुलती है भाई ....और क्या साइकिल चलने से तुम्हारे पैर की पिंडलियाँ कडक नहीं होती थी ...और दर्रे की परिभाषा समझ नहीं आई .....ये तेरी ज्योग्राफी है मेरी समझ से परे .
    बहुत सस्पेंस चला सचिन का आखिर सचिन के दर्शन हुये और दाढ़ी भी बहुत बढ़ गई है ,कब हजामत होगी ?

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