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Friday, July 26, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- सातवां दिन- जिंगजिंगबार से सरचू

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10 जून 2013
सुबह साढे पांच बजे आंख खुल गई। मेरठ से आया कुनबा जब जाने की तैयारी करने लगा तो शोर हुआ। मैं भी जग गया। तम्बू से बाहर निकला, सामने सचिन खडा था। पता चला वो भी बहुत थका है। वह कल जिस्पा में रुका था, गेमूर से 5-6 किलोमीटर आगे। एक ही दिन में 1000 मीटर चढने से उसकी भी हालत ज्यादा अच्छी नहीं थी।
यहां से सूरजताल 13 किलोमीटर व बारालाचा 16 किलोमीटर है। यानी 16 किलोमीटर तक हमें ऊपर चढना है। नाश्ता करके साढे सात बजे निकल पडे। आज 47 किलोमीटर दूर सरचू पहुंचना है।
यहां से निकलते ही चढाई शुरू हो गई, हालांकि ज्यादा तीव्र चढाई नहीं थी। सडक भी अच्छी है। कुछ आगे चलकर एक नाला पार करना पडा। इसमें काफी पानी था लेकिन ज्यादा फैला होने के कारण उतना तेज बहाव नहीं था। पार करने के बाद काफी देर तक अपने पैर ढूंढते रहे।
एक ट्रेकिंग दल यहां से नाले के साथ साथ ऊपर चढने लगा। वे निश्चित तौर पर चन्द्रताल जा रहे होंगे। उन्हें वहां पहुंचने में कई दिन लगेंगे। बर्फ तो यहीं से आरम्भ हो गई है, पूरे रास्ते वे बर्फ में ही चलते रहेंगे। गनीमत है कि उन्हें ज्यादा उतराई चढाई नहीं करनी पडेगी।
कुछ और आगे बढे तो वाहनों की कतारें मिलीं। अब तक इतना तो अभ्यास हो चुका है कि वाहनों की कतारों का अर्थ है- आगे तेज बहाव वाला नाला। यहां भी ऐसा ही है। बडा भयंकर बहाव था। लेकिन अच्छी बात यह थी कि बराबर में पुल का काम चल रहा था। पुल लगभग पूरा हो चुका था, बस चादरें बिछानी बाकी थीं। जोर शोर से काम चल रहा था। लग रहा था कि घण्टे भर में काम पूरा हो जायेगा। इसी के भरोसे दोनों ओर गाडियां रुकी थीं। कोई भी नाले से नहीं निकलना चाहता था।
हम साइकिल वालों की तो हमेशा ही प्रशंसा होती रही। मौका मिलते ही दूसरे लोग हमसे बातें करते, साथ फोटो भी खिंचवाते। यहां भी ऐसा ही हुआ। एक गुजराती समूह ने हमें घेर लिया, फोटो खींचे व साइकिल चलाने की भी इच्छा जाहिर की। मैंने उन्हें साइकिल चलाने दी। जब तक उन्होंने साइकिल के मजे लिये, मैंने देख लिया कि उस अधूरे पुल से पार हुआ जा सकता है। इसके बाद जब साइकिल लेकर मैं पुल पर चढा, मुझसे पहले साइकिल उस पार जा चुकी थी। मजदूरों ने सारा काम कर दिया। यही हाल सचिन का हुआ।
कुछ आगे जाकर जब मैंने पीछे मुडकर देखी तो एक जल्दबाज गाडी नाले में फंसी खडी थी। आधे घण्टे बाद जब पुल चालू हो गया, दोनों तरफ की सभी गाडियां अपने अपने गन्तव्य को जा चुकीं, वह गाडी वहीं फंसी रही। जब तक हम इतना आगे न निकल गये कि उसे देखना असम्भव हो गया, वह वहीं खडी दिखती रही।
सचिन अच्छा साइकिलबाज है। मुम्बई-गोवा व मुम्बई-औरंगाबाद सहित कई रास्तों पर साइकिल चला चुका है। उधर मैंने कभी पहाडों पर साइकिल नहीं चलाई सिवाय नीलकण्ठ की एकदिनी यात्रा के। जाहिर है वह मुझसे आगे ही रहा।
बारालाचा से करीब छह किलोमीटर पहले बर्फ का साम्राज्य शुरू हो जाता है। बर्फ हटाकर सडक साफ की गई है। चढाई है फिर भी मजा आता है चलने में। यहां भी मुझे फोटो खिंचवाने के लिये रोका गया।
सवा ग्यारह बजे सूरज ताल पहुंचा- 4770 मीटर- बारालाचा से तीन किलोमीटर पहले। इस छोटी सी झील के चारों तरफ बर्फीले पहाड तो हैं ही, झील में भी बडी मात्रा में बर्फ है। अगर थोडी और गर्मी होती और झील में बर्फ न होती तो निःसन्देह यह गजब की सुन्दर लगती।
चारों तरफ बर्फ ही बर्फ हो, ऊपर से सूरज चमक रहा हो तो किसकी मजाल कि बिना काला चश्मा लगाये आंखें खोल सके? एक समस्या और भी है कि फोटो खींचने के लिये चश्मा हटाना पडेगा। कैमरे के अन्दर झांकने या स्क्रीन पर देखने के लिये काला चश्मा उपयुक्त नहीं। लेकिन चश्मा हटाया नहीं जा सकता, लगाकर फोटो नहीं खिंच सकता तो सभी फोटो अन्दाजे से खींचे गये हैं। मुझे वैसे तो मैन्युअल फोटोग्राफी पसन्द नहीं और यहां सम्भव भी नहीं। फिर भी अन्दाजे से खींचे गये फोटो काफी अच्छे आये हैं।
कुछ दूर एक शेड दिख रहा था। सोचा वहीं बारालाचा-ला है। पास गया तो हकीकत पता चली। यह टूटा हुआ शेड था, बारालाचा अभी भी दूर है। बारालाचा 4900 मीटर की ऊंचाई पर है, मैं अभी 4850 मीटर पर था। पूरी यात्रा में अभी तक इतनी ऊंचाई पर नहीं आया था, कमजोरी महसूस होने लगी- उच्च पर्वतीय कमजोरी। और जब पता चला कि यह शेड बारालाचा-ला नहीं है, पूरा शरीर नाकारा हो गया। भूख भी लग रही थी, यहीं बैठ गया व काजू-किशमिश-बादाम खाने लगा। आधे घण्टे बाद जब शरीर का नाकारापन दूर हुआ, ऊर्जा महसूस हुई तो आगे बढा।
पौने एक बजे बारालाचा-ला पहुंचा। यह दर्रा रोहतांग से भी 1000 मीटर ऊंचा है। जाहिर है बर्फ भी ज्यादा होगी। लेकिन ऊंचाई बर्फ का पैमाना नहीं है। आगे लद्दाख शुरू होने वाला है तो ऊंचाई और भी ज्यादा होने के बावजूद बर्फ की सम्भावना कम होती जायेगी।
बारालाचा-ला के बाद सडक बिल्कुल खराब है। बर्फ के आधिक्य के कारण सडक पर भी पानी ही पानी था। डेढ बजे भरतपुर (4700 मीटर) पहुंचा। यहां भी रहने-खाने का इन्तजाम है। एक बुलडोजर सडक से बर्फ हटा रहा था। यहां सचिन मिल गया। वो खा-पीकर चलने को तैयार बैठा था। मैंने दाल-चावल की इच्छा जाहिर की, लेकिन चावल तैयार नहीं थे तो ब्रैड आमलेट का भोग लगा लिया। काफी थकान हो रही थी, इसलिये सचिन को सरचू में मिलने की बात कहकर आधे घण्टे के लिये सो गया। सचिन सरचू चला गया, जो यहां से 25 किलोमीटर दूर है।
ढाई बजे सोकर उठा। आधे घण्टे सोने में ही काफी ताजगी आ गई। सरचू तक पूरा रास्ता ढलानयुक्त है, लेकिन खराब सडक की वजह से ढलान का पूरा फायदा नहीं उठाया जा सका। अगर बार-बार ब्रेक न लगाये जायें, तो साइकिल में इतने जबरदस्त झटके लगेंगे कि किसी नट-बोल्ट के टूटने का खतरा बढ जायेगा। एक बोल्ट भी टूटने से साइकिल बे-काम की हो सकती है। दूसरा नुकसान, शरीर का सारा वजन हाथों पर आ जाता है, तेज चलने से हाथों पर बडे तेज झटके लगते हैं।
भरतपुर से छह किलोमीटर आगे किलिंग सराय है। नाम ऐसा भयंकर क्यों है, पता नहीं। किलिंग सराय यानी हत्यारी सराय। यह एक बडे मैदान में स्थित है। मुख्यतः बीआरओ का एक पडाव है। रुकने खाने का भी इंतजाम है। कुछ ही देर पहले भरतपुर में पेट भरने के कारण यहां नहीं रुका।
किलिंग सराय से सरचू 19 किलोमीटर है। सडक अच्छी है, हालांकि बीच में एक-दो किलोमीटर खराब है। जहां खराब थी, तो मजदूर इसे ठीक करने पर लगे थे। इसी खराब सडक पर सचिन मिला- साइकिल का पंक्चर लगा रहा था। उसने बताया कि साइकिल के पिछले डिस्क ब्रेक में समस्या है, ठीक काम नहीं कर रहा है। पिछला ब्रेक खराब होना उतनी बडी समस्या नहीं लेकिन ढलान पर अगले ब्रेक के भरोसे चलना खतरनाक है। मैंने गौर से देखा तो पाया कि उसका कैरियर बैग ब्रेक पर ही टिका है और ब्रेक को काम नहीं करने दे रहा। मैंने कहा अभी कुछ नहीं किया जा सकता, धीरे धीरे सरचू पहुंच, वहीं जाकर देखेंगे क्या किया जा सकता है।
सडक पर मोड तो खत्म हो गये, ढलान खत्म नहीं हुआ। ऊपर से अच्छी सडक। साइकिल चलाने के लिये इससे अच्छा और क्या हो सकता है? करीब 15 किलोमीटर सरचू तक ऐसा ही रहा।
बराबर में एक नदी बह रही है। मिट्टी की अधिकता के कारण यह काफी गहरी हो गई है और दोनों किनारे बिल्कुल खडे हैं। इन खडे किनारों पर बडी अजीब-अजीब आकृतियां बनी हैं। ये आकृतियां दुनिया के प्राकृतिक आश्चर्यों में शुमार की जानी चाहिये।
अभी बताया था कि सीधी सडक है। इसका कारण है कि यह बहुत लम्बा एक मैदान है। पहाड दूर हैं। इसी मैदान में काफी सारी तम्बू कालोनियां भी हैं।
जहां सात बजे तक सरचू पहुंचने की उम्मीद थी, इस ढलानदार मैदान के कारण छह बजे ही पहुंच गये।
सचिन यहां भी मुझसे आगे ही रहा। सरचू से एक किलोमीटर पहले एक दुकान के सामने खडा मिला। बोला कि बडा महंगा है सरचू। यहां 500 रुपये का एक बिस्तर है। यहां एक ही दुकान थी। दूसरे, सरचू इस मार्ग का मुख्य पडाव है, इसलिये काफी सारी दुकानें व होटल होने चाहिये। मैंने कहा सरचू आगे है। एक मोड के कारण यह दिखाई नहीं दे रहा था। जैसे ही हमने मोड पार किया, काफी सारे तम्बू-होटल दिख पडे।
सरचू मनाली से 222 किलोमीटर दूर है और लेह 252 किलोमीटर। सरचू को मनाली-लेह मार्ग का मध्य बिन्दु माना जाता है। ट्रक, बसें और स्व-वाहन यहां अक्सर एक रात रुकते हैं।
एक होटल में गये- 200 रुपये प्रति बिस्तर। महंगा लगा। आगे बढे तो एक नेपाली के यहां 100 रुपये प्रति बिस्तर मिल गये। यहां अब तक का सबसे स्वादिष्ट खाना मिला- आलू जीरा, दाल व मक्खन लगी रोटी।
यह स्थान 4300 मीटर की ऊंचाई पर है, फिर भी गर्मी लग रही थी। रजाई से मुंह बाहर निकालता तो ठण्डी शुष्क हवा थोडी ही देर में नाक को शुष्क कर देती। कुदरती सिस्टम है कि नाक हमेशा आर्द्र रहती है, कभी शुष्क नहीं होती। लेकिन यहां हो जाती है। दूसरे, अगर रजाई में मुंह घुसाता तो हल्की हवा के कारण सांस चढने लगती। बडी मुश्किल से नींद आई।
रात ग्यारह बजे एक बस आई। वह कहीं रास्ते में खराब हो गई थी, इसलिये विलम्ब से आई। होटल वाले ने दाल चावल देने से मना कर दिया। आमलेट ही उपलब्ध हो सकता था। काफी खुशामद करने पर वो दाल चावल बनाने पर राजी हुआ। बीस लोगों का भोजन बना। सोने के लिये जितनी जगह यहां थी, यहां सोये, बाकी इधर उधर के तम्बुओं में। इनमें एक जापानी भी था। वो यहीं स्वयं जगह बनाकर एक रजाई ओढकर सो गया। सुबह सात बजे बस के प्रस्थान की बात तय थी।

जिंगजिंगबार

यह नाला काफी चौडाई में बह रहा था। फोटो सचिन ने खींचा।

बडी देर लगी इसे पार करने में- चौडाई के साथ साथ इसमें पत्थर भी थे जो सन्तुलन बिगाड देते थे।

और पार करने के बाद पैरों की मालिश। दूर दो ट्रेकर पहाड पर चढते दिख रहे हैं जो चन्द्रताल तक जायेंगे।

फंसी खडी गाडी

बारालाचा-ला की ओर

पीछे मुडकर देखने पर

बारालाचा से काफी पहले ही बर्फ शुरू हो गई।

पीछे मुडकर देखने पर

इतनी दुर्गम जगह पर साइकिल? लोग गाडियों से उतरकर साथ फोटो खिंचवाकर गौरवान्वित होते थे।




पीछे मुडकर देखने पर

सूरजताल के प्रथम दर्शन

सूरजताल- बारालाचा से तीन किलोमीटर पहले

सूरजताल के बराबर से गुजरती सडक


एक टूटा हुआ शेड

धिक्कार है!


बारालाचा-ला


बारालाचा के बाद ऐसा रास्ता है भरतपुर तक।



भरतपुर के पास भी एक झील है।



सचिन पंक्चर ठीक करता हुआ।

सीधा और ढलानयुक्त रास्ता

इसी की बदौलत हम एक घण्टे पहले सरचू पहुंच गये।

गहरी घाटी वाली ‘सरचू’ नदी।

इसी नदी के किनारों पर ये आकृतियां बनी हैं।


रास्ते में ऐसी कई टैण्ट कालोनियां हैं। बडी खर्चीली हैं ये।

सरचू से छह किलोमीटर पहले




सरचू

सरचू में सूर्यास्त


अगले भाग में जारी...

मनाली-लेह-श्रीनगर साइकिल यात्रा
1. साइकिल यात्रा का आगाज
2. लद्दाख साइकिल यात्रा- पहला दिन- दिल्ली से प्रस्थान
3. लद्दाख साइकिल यात्रा- दूसरा दिन- मनाली से गुलाबा
4. लद्दाख साइकिल यात्रा- तीसरा दिन- गुलाबा से मढी
5. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौथा दिन- मढी से गोंदला
6. लद्दाख साइकिल यात्रा- पांचवां दिन- गोंदला से गेमूर
7. लद्दाख साइकिल यात्रा- छठा दिन- गेमूर से जिंगजिंगबार
8. लद्दाख साइकिल यात्रा- सातवां दिन- जिंगजिंगबार से सरचू
9. लद्दाख साइकिल यात्रा- आठवां दिन- सरचू से नकीला
10. लद्दाख साइकिल यात्रा- नौवां दिन- नकीला से व्हिस्की नाला
11. लद्दाख साइकिल यात्रा- दसवां दिन- व्हिस्की नाले से पांग
12. लद्दाख साइकिल यात्रा- ग्यारहवां दिन- पांग से शो-कार मोड
13. शो-कार (Tso Kar) झील
14. लद्दाख साइकिल यात्रा- बारहवां दिन- शो-कार मोड से तंगलंगला
15. लद्दाख साइकिल यात्रा- तेरहवां दिन- तंगलंगला से उप्शी
16. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौदहवां दिन- उप्शी से लेह
17. लद्दाख साइकिल यात्रा- पन्द्रहवां दिन- लेह से ससपोल
18. लद्दाख साइकिल यात्रा- सोलहवां दिन- ससपोल से फोतूला
19. लद्दाख साइकिल यात्रा- सत्रहवां दिन- फोतूला से मुलबेक
20. लद्दाख साइकिल यात्रा- अठारहवां दिन- मुलबेक से शम्शा
21. लद्दाख साइकिल यात्रा- उन्नीसवां दिन- शम्शा से मटायन
22. लद्दाख साइकिल यात्रा- बीसवां दिन- मटायन से श्रीनगर
23. लद्दाख साइकिल यात्रा- इक्कीसवां दिन- श्रीनगर से दिल्ली
24. लद्दाख साइकिल यात्रा के तकनीकी पहलू

21 comments:

  1. गजब, अभिभूत कर देने वाला.

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  2. Bahut Majedar, Kya Sarchu se Jammu and Kashmir ka Ladakh region start hota hai?

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  3. अभिभूत करते दृश्य, कितना सुन्दर है देश हमारा।

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  4. अतिसुन्दर ! ऐसे ही नही हमारे देश को सोने की चिडि़या कहा जाता है।

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  5. हिमालय के श्वेत धवल पर्वतों के बीच नीरज जी की यात्रा सरचू पहुँच चुकी है। नयनाभिराम दृश्य एवं उत्कृष्ट विवरण। भई वाह !!
    - Anilkv

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  6. Bahut maza araha padh ker .. photo's tho kamaal hai neerajji..

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  7. नीरज भाई , बखान करने के लिये शब्द नहीं है !

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  8. सचिन की शक्ल क्यों नहीं दिखा रहे हो
    पैंट नहीं पजामी पहनी है आपने :-)

    प्रणाम

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  9. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(27-7-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

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  10. kya sarchu himachal me hai.photos bahut sunder aayi hai jaat ram ji

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  11. नयनाभिराम.......

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  12. दुनि‍या भर में भारत जैसा सुंदर कुछ भी नहीं

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  13. सचिन की तस्वीर में हमारी भी रूचि है...एकाध क्‍लोजअप चेपा जाए। वृत्‍तांत शानदार बन पड़ा है इसके प्रिंट आउट अपने विद्यार्थियों को देकर इस पर प्रोजेक्‍ट करवाया जाएगा... पहले पूरा हो जाए।

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  14. Shandaar lekh aur manbhavan chitra....................

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  15. बहुत ही खूबसूरत, बहुत ही सुंदर, ग़ज़ब का नज़ारा हैं, विशेषकर सूर्यास्त वाला चित्र....तुसी ग्रेट हो सर जी.......

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  16. आपकी यह यात्रा रहस्मय होती जा रही है . काश श्री सचिन के दर्शन , लादाख दर्शन के साथ हो जाते . मैं इस रास्ते से जुलाई 1 9 9 4 में बस यात्रा कर चूका हूँ . उन दिनों सड़क अच्छी थी . बर्फ का नामो निशाँ न था . लगता है इस बार बर्फ़बारी कुछ ज्यादा हुई है

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  17. मनाली - लेह पैसेंजर के ड्राईवर साहब ध्यान दें, आपका सिग्नल लोअर है, कृपया गाड़ी स्टार्ट करें।

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  18. इतने कठिन नाम याद कैसे रहते है नीरज ....और वो गॉंव का फोटू नहीं दिखाया जिस पर ग्लेशियर खड़ा था

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