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Monday, July 22, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- पांचवां दिन- गोंदला से गेमूर

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8 जून 2013
साढे आठ बजे आंख खुली। और अपने आप नहीं खुल गई। सचिन ने झिंझोडा, आवाज दी, तब जाकर उठा। वो हेलमेट लगाकर जाने के लिये तैयार खडा था। मैंने उसे कल ही बता दिया था कि भरपूर नींद लूंगा, इसीलिये उसने जल्दी उठकर मुझे नहीं उठाया। मेरी आंख खुलते ही उसने मेरी योजना पूछी। मैं भला क्या योजना बनाता? कल योजना बनाई थी भरपूर सोने की और अभी मेरी नींद पूरी नहीं हुई है। पता नहीं कब पूरी हो, तुम चले जाओ। मैं उठकर जहां तक भी पहुंच सकूंगा, पहुंच जाऊंगा। आज रात भले ही केलांग या जिस्पा में रहूं लेकिन कल जिंगजिंगबार में रात गुजारूंगा। उधर सचिन का इरादा आज जिस्पा या दारचा में रुककर अगली रात जिंगजिंगबार में रुकने का था। जिंगजिंगबार बारालाचा-ला का सबसे नजदीकी मानव गतिविधि स्थान है। आज तो पता नहीं हम मिलें या न मिलें, लेकिन कल जिंगजिंगबार में अवश्य मिलेंगे।
सचिन के जाने के बाद मैं फिर सो गया। साढे ग्यारह बजे आंख खुली। असल में पिछली दो रातें स्लीपिंग बैग में गुजारी थीं, उनसे पहली रात दिल्ली से मनाली बस में और उससे भी पहले चार नाइट ड्यूटी। नाइट ड्यूटी करके दिन में कम ही सोता था व यात्रा की तैयारी करता था। यानी पिछले एक सप्ताह से मैं ढंग से सो नहीं पाया था। आज सारी कसर निकल गई।
सबसे पहले नहाया। गीजर था, पानी गर्म करने में कोई समस्या नहीं थी। चार दिन पहले दिल्ली में ही नहाया था, अब छह सात दिन तक नहाने की सम्भावना भी नहीं।
पहले दिन आधी बाजू की टी-शर्ट व हाफ पैंट पहनकर चला था। दूसरे दिन भी यही कपडे। नतीजा दोनों हाथ कोहनी से ऊपर तक जल गये- धूप से। कल फुल बाजू की टी-शर्ट पहनी लेकिन हाफ पैंट नहीं बदली। दोनों पिण्डलियां जल गईं। चेहरे पर भी कुछ जलन है और चश्मा न होने के कारण आंखों में भी। आज हाफ पैंट हटाकर फुल पैंट पहन ली और सोच लिया कि केलांग पहुंचकर चश्मा खरीदूंगा।
चश्मे की मुझे कभी आदत नहीं रही, इसलिये इसकी कोई परवाह नहीं करता। मनाली में दो सौ का चश्मा मोलभाव करके पचास में खरीदा। पचास मीटर भी नहीं चला कि वो खो गया। उसके बाद कोठी में एक दुकान वाले से पुनः पचास में खरीदा। वो भी गुम हो गया। उसे असल में मैंने बैग में रख दिया था, अगले दिन ढूंढने लगा तो सामानों की भूल भुलैया में नहीं मिला। अब अपने ही आप मिल गया। चश्मे से कहा कि भाई, अब मत चले जाना। तुझे सिर आंखों पर बिठाकर रखूंगा व दिल्ली भी ले जाऊंगा।
गोंदला चन्द्रा नदी के किनारे स्थित है। नदी के उस तरफ भी एक गांव है। और उस गांव के ऊपर एक ग्लेशियर लटका है। ग्लेशियर कहते हैं हजारों सालों से जमी व ठोस हो चुकी विशाल हिम को। बडा भयंकर दिख रहा था यह।
गोंदला में रेस्ट हाउस के पास ही एक किला भी है। यह इतना छोटा सा है कि इसे वाच टावर कहना ज्यादा उपयुक्त होगा।
बारह बजकर चालीस मिनट पर रेस्ट हाउस से प्रस्थान किया। यहां से मुख्य सडक काफी ऊपर है। बीस मिनट लगे ऊपर सडक तक चढने में। एक बजे साइकिल टांडी की ओर दौडा दी। पूरा रास्ता ढलान वाला है लेकिन बुरी तरह टूटा फूटा है। दस किलोमीटर की दूरी एक घण्टे में तय की। टांडी में हिमाचल प्रदेश का आखिरी पेट्रोल पम्प भी है। यहां सूचना लिखी है कि अगला पेट्रोल पम्प 365 किलोमीटर आगे है।
टांडी में चन्द्रा व भागा नदियों का मिलन होता है। दोनों नदियां मिलकर चन्द्रभागा बनती हैं जो आगे जम्मू कश्मीर में प्रवेश करके चेनाब कहलाने लगती है। भागा नदी बारालाचा-ला से आती है। आगे का रास्ता भागा के साथ साथ है। जाहिर है चढाई है। टांडी में खाना खाया और पुल पार करके आगे बढ चला।
सूरज कमर के पीछे चमक रहा था। उसने ऐसी आग लगाई कि बार बार रुककर कमर खुजानी पड रही थी। बोतल में रखा पानी भी सीधे धूप में होने की वजह से बहुत गर्म हो गया था। 3000 मीटर की ऊंचाई पर ऐसी गर्मी की उम्मीद नहीं कर सकते लेकिन इस ऊंचाई पर छांव में ठण्ड लगती है व धूप में गर्मी।
टांडी से आगे हालात और खराब हो गये। सडक तो टूटी थी ही, अब चढाई भी शुरू हो गई। टांडी से चलने के एक घण्टे में चार किलोमीटर ही चल सका। टांडी से केलांग सात किलोमीटर है। आखिरी दो किलोमीटर अच्छी सडक है।
साढे चार बजे से साढे पांच बजे तक केलांग में ही रुका रहा। तीन दिन बाद आज एयरटेल का नेटवर्क मिला था। घर पर अपने सकुशल होने की खबर दी। साथ ही यार लोगों से भी बात हुई। मनदीप सपरिवार केलांग घूमने की योजना बना रहा था। रास्ते की जानकारी दी व सपरिवार केलांग न आने की हिदायत भी। रोहतांग पहुंचने से पहले ही गालियां शुरू हो जायेंगी व केलांग तक हर सदस्य गाली देगा। ये सभी गालियां मेरे खाते में ही आयेंगीं।
केलांग लाहौल स्पीति जिले का मुख्यालय है। इस जिले के दो मुख्य भाग हैं- लाहौल व स्पीति। दोनों भागों को कुंजम दर्रा अलग करता है। कुंजम अभी भी बन्द है लिहाजा स्पीति अपने जिला मुख्यालय से कटा हुआ है। हालांकि स्पीति जाने का सुगम मार्ग किन्नौर से होकर है। किन्नौर से स्पीति जाने वाली सडक बारहों महीने खुली रहती है।
क्यों न स्पीति को किन्नौर जिले में मिला दिया जाये? यही हाल पांगी का भी है। पांगी चम्बा जिले में है लेकिन ज्यादातर समय चम्बा से कटा रहता है। पांगी को लाहौल में मिला देना चाहिये।
केलांग से स्टिंगरी 6 किलोमीटर है और जिस्पा 25 किलोमीटर। रास्ता चढाई वाला है। रात दस बजे से पहले जिस्पा नहीं पहुंच सकूंगा। तो आज स्टिंगरी रुका जाये।
केलांग से निकला तो एक नाला पार करना पडा। इसने बता दिया कि बेटा, मेरी तो हैसियत कुछ भी नहीं है। आगे बडे बडे नाले मिलेंगे जो ट्रकों तक को बहा ले जाने की क्षमता रखते हैं। इसमें घुटनों तक पानी था व बहाव बडा जबरदस्त। साइकिल भी एक बार बह जाने से बची।
साढे छह बजे स्टिंगरी पहुंचा। यहां सेना का पडाव है। एक फौजी मिला। बंगाली था। उन्होंने कोशिश की कि मुझे कहीं बस्ती में ठिकाना मिल जाये। लेकिन असफल। मैं ‘सिविलियन’ था, इसलिये सेना के यहां नहीं रुक सकता था। आगे चल पडा।
जिस्पा यहां से 19 किलोमीटर है। पता चला कि 14 किलोमीटर आगे गेमूर है, जहां ठिकाना मिल जायेगा। चौदह किलोमीटर यानी तीन घण्टे। रात साढे नौ बजे तक पहुंचूंगा।
सडक बहुत अच्छी है लेकिन चढाई है। पहले एक घण्टे में पांच किलोमीटर चला। इसके बाद खराब सडक आ गई। पौने आठ बजे जब दूसरे वाहनों ने अपनी लाइटें जलानी शुरू कर दीं तो मैंने भी लाइट हेलमेट पर लगाकर जला ली। हेलमेट भी मेट्रो प्रदत्त व लाइट भी मेट्रो प्रदत्त। हमें ज्यादातर रात में ऊंचाई पर चढकर काम करना होता है, इसलिये सेफ्टी हेलमेट व इस पर लगाने के लिये एलईडी लाइट मिली हुई है। इसमें पीछे भी लाल रंग की जलती बुझती लाइट होती है जो यहां पीछे से आने वाले वाहनों के लिये संकेतक का काम करेगी।
जिस स्थान पर मैंने लाइट बैग से निकालकर हेलमेट पर चिपकाई, वहां पर एक सडक ऊपर जाती दिख रही थी। इसमें कई लूप भी थे यानी मुश्किल चढाई। रास्ता स्टिंगरी से ही चढाई वाला था लेकिन मैं इस लूप वाली तीव्र चढाई के लिये तैयार नहीं था। मना रहा था कि वह लेह वाला रास्ता न हो। तभी उस सडक से एक ट्रक आता दिखा। लेह रोड पर ही ट्रकों की ज्यादा आवाजाही रहती है। इसके बाद मेरे बगल से दो बुलेट गुजरीं। वे भी आगे जाकर उसी चढाई पर चढती दिखीं। पक्का हो गया कि मुझे भी वहीं से गुजरना होगा। तभी एक राहत भरी बात हुई। पंजाब की दो गाडियां मेरे पास से गईं व चढाई पर नहीं चढीं। इसके दो ही कारण हो सकते हैं- या तो आगे तिराहा है या फिर दोनों गाडियां रुक गईं हैं। ऐसे निर्जन स्थान पर व इस अन्धेरे में पंजाब की गाडियों का रुकना हजम नहीं हुआ। तिराहा ही हो सकता है।
मैं भी आगे बढा तो वास्तव में वहां तिराहा था। एक सडक नीचे जा रही थी, एक ऊपर। जाहिर है मैं नीचे वाली सडक पर चल पडा। कोई सूचना पट्ट भी नहीं था वहां। कुछ आगे चार महिलाएं मिलीं। वे नीचे नदी के पास से लकडी बीनकर लाई थीं। उन्होंने बताया कि ऊपर वाली सडक कोलोंग गांव जा रही है।
एक महिला ने कहा- चाकलेट दो। मैंने कहा चाकलेट नहीं है, टॉफी है पचास पैसे वाली। ठीक है, टॉफी ही दे दो। मैंने जेब में हाथ डाला तो पांच टॉफियां निकल पडीं। महिलाएं थीं चार। फिर भी मैंने पांचों टॉफियां एक महिला को दे दी कि बांट लो। उसने कहा कि हिसाब गडबड है। तीन टॉफियां और दो, तभी हमें बराबर बराबर यानी दो दो मिलेंगीं। मैंने कहा नहीं, हिसाब दुरुस्त है। पांच टॉफियां हैं और खाने वाले भी पांच हैं। लाओ, एक मुझे भी तो दो। सबकी हंसी छूट पडी- तुम बहुत कंजूस हो।
आखिरी पांच किलोमीटर ढलान वाले थे। अच्छी स्पीड मिली। साढे आठ बजे गेमूर पहुंच गया। एक दुकान खुली थी। मैंने ठहरने की बात की। बोला कि कमरा तो है लेकिन शौचालय नहीं है कमरे में। मुझे तो ‘कमरा है’ सुनते ही मुंह मांगी मुराद मिल गई। नहीं तो पांच किलोमीटर और आगे जिस्पा जाना पडता।
कमरे में दो बिस्तर व किराया पचास रुपये।
लगभग 3300 मीटर की ऊंचाई व पसीने से भीगे होने के बावजूद भी ठण्ड नहीं लगी। रात सोते समय भी नहीं। जबकि यहां सर्दियों में खूब बर्फ पडती है।
क्रिकेट मैच चल रहा था- चैम्पियन्स ट्रॉफी- शायद इंग्लैण्ड व आस्ट्रेलिया का। मेरी क्रिकेट में ज्यादा दिलचस्पी नहीं है लेकिन फिर भी सिद्धू की आवाज कान में पडी-
“इंसान अपना मुकद्दर खुद बनाता है, बाद में उसे होनी का नाम दे देता है।“

गोंदला से दिखता चन्द्रा के उस तरफ का नजारा

गोंदला का किला

दूर से दिखता गोंदला गांव

गोंदला से टाण्डी जाने वाली सडक



अगला पेट्रोल पम्प 365 किलोमीटर आगे है और सारा रास्ता ऊंचे ऊंचे पहाडों व दर्रों से होकर जाता है।

टाण्डी पुल भागा नदी पर बना है।

टाण्डी पुल से लिया गया फोटो। सामने दिख रहा है चन्द्रा भागा संगम।

टाण्डी से दूरियां

केलांग पहुंचने वाला हूं।


टाण्डी से पांच किलोमीटर आगे



केलांग में आपका स्वागत है।

केलांग



केलांग से आगे
अगले भाग में जारी...

मनाली-लेह-श्रीनगर साइकिल यात्रा
1. साइकिल यात्रा का आगाज
2. लद्दाख साइकिल यात्रा- पहला दिन- दिल्ली से प्रस्थान
3. लद्दाख साइकिल यात्रा- दूसरा दिन- मनाली से गुलाबा
4. लद्दाख साइकिल यात्रा- तीसरा दिन- गुलाबा से मढी
5. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौथा दिन- मढी से गोंदला
6. लद्दाख साइकिल यात्रा- पांचवां दिन- गोंदला से गेमूर
7. लद्दाख साइकिल यात्रा- छठा दिन- गेमूर से जिंगजिंगबार
8. लद्दाख साइकिल यात्रा- सातवां दिन- जिंगजिंगबार से सरचू
9. लद्दाख साइकिल यात्रा- आठवां दिन- सरचू से नकीला
10. लद्दाख साइकिल यात्रा- नौवां दिन- नकीला से व्हिस्की नाला
11. लद्दाख साइकिल यात्रा- दसवां दिन- व्हिस्की नाले से पांग
12. लद्दाख साइकिल यात्रा- ग्यारहवां दिन- पांग से शो-कार मोड
13. शो-कार (Tso Kar) झील
14. लद्दाख साइकिल यात्रा- बारहवां दिन- शो-कार मोड से तंगलंगला
15. लद्दाख साइकिल यात्रा- तेरहवां दिन- तंगलंगला से उप्शी
16. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौदहवां दिन- उप्शी से लेह
17. लद्दाख साइकिल यात्रा- पन्द्रहवां दिन- लेह से ससपोल
18. लद्दाख साइकिल यात्रा- सोलहवां दिन- ससपोल से फोतूला
19. लद्दाख साइकिल यात्रा- सत्रहवां दिन- फोतूला से मुलबेक
20. लद्दाख साइकिल यात्रा- अठारहवां दिन- मुलबेक से शम्शा
21. लद्दाख साइकिल यात्रा- उन्नीसवां दिन- शम्शा से मटायन
22. लद्दाख साइकिल यात्रा- बीसवां दिन- मटायन से श्रीनगर
23. लद्दाख साइकिल यात्रा- इक्कीसवां दिन- श्रीनगर से दिल्ली
24. लद्दाख साइकिल यात्रा के तकनीकी पहलू

17 comments:

  1. neeraj ji ram-ram.uttam yatra varnan aur adhbuth nazare charo or. maje aagye kasam se.

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  2. बस पढ़ते जा रहे हैं, बढ़ते जा रहे हैं, आनन्द भी उठाते जा रहे हैं।

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  3. चलते चलो। हम भी साथ साथ ही चल रहे हैं।

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  4. me bhi gum chuka hu Niraaj jat ke sath. lekin keval khayalo or in tasveerro me . bahut khoob aapke yatra varnan is kadar jivant hote he ki padne walo ko bhi ye lagta he ki vo bhi ghoom rahe he

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  5. आप तो मुकद्दर के सिकंदर हो नीरज भाई।
    यात्रा-वृतान्त पढ़कर काफी मजा आ रहा है। भाई वाह
    - Anilkv

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  6. wonderful. if there is not a post everyday, i feel miserable. god bless.

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  7. abe doctor ka naam bhi likh dete .....

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  8. जट महाराज के साथ घूम लो। इससे ज्यादा कुछ नही कह सकता।

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  9. जिस स्थान पर मैंने लाइट बैग से निकालकर हेलमेट पर चिपकाई, वहां पर एक सडक ऊपर जाती दिख रही थी। इसमें कई लूप भी थे यानी मुश्किल चढाई। रास्ता स्टिंगरी से ही चढाई वाला था लेकिन मैं इस लूप वाली तीव्र चढाई के लिये तैयार नहीं था। मना रहा था कि वह लेह वाला रास्ता न हो। तभी उस सडक से एक ट्रक आता दिखा। लेह रोड पर ही ट्रकों की ज्यादा आवाजाही रहती है। इसके बाद मेरे बगल से दो बुलेट गुजरीं। वे भी आगे जाकर उसी चढाई पर चढती दिखीं। पक्का हो गया कि मुझे भी वहीं से गुजरना होगा। तभी एक राहत भरी बात हुई। पंजाब की दो गाडियां मेरे पास से गईं व चढाई पर नहीं चढीं। इसके दो ही कारण हो सकते हैं- या तो आगे तिराहा है या फिर दोनों गाडियां रुक गईं हैं। ऐसे निर्जन स्थान पर व इस अन्धेरे में पंजाब की गाडियों का रुकना हजम नहीं हुआ। तिराहा ही हो सकता है।


    BADA CONFUSION HO GUYA NEERAJ JI.. JUB PEHLE CHADHAII WALE RASTE PE JANA THA THO PHIR NEECHE JANE WALI SADAK KYUN PAKAD LI???

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    1. ऊपर वाली सडक लूप बनाती हुई ऊपर जा रही थी। लूप वाली सडक पर चढाई ज्यादा तो होती ही है, वह दिखती भी खतरनाक है। फिर अन्धेरा और अत्यधिक थकान। जब मुझे दूसरा विकल्प दिखा यानी नीचे जाने वाली सडक दिखी तो स्वतः ही उसी पर चल दिया। सोचा कि कहीं तो पहुचूंगा ही। अगर गलत रास्ता होता तो किसी गांव में शरण मिल जाती या फिर टैण्ट लगाता लेकिन संयोग से वह नीचे वाला रास्ता सही रास्ता निकला।

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    2. दिमाग ........................!

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  10. अनुपम, अप्रतिम एवं अतुलनीय.....

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  11. यह लूप क्या होता है ?

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