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Friday, July 19, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- चौथा दिन- मढी से गोंदला

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7 जून 2013, स्थान मढी
पांच बजे आंख खुली। सोच रखा था कि आज जितनी जल्दी हो सके, निकल जाना है। बाद में रोहतांग जाने वाली गाडियों का जबरदस्त रेला हमें चलने में समस्या पैदा करेगा। फिर भी निकलते निकलते साढे छह बज गये। सचिन को साइकिल का अच्छा अभ्यास है, वो आगे निकल गया।
कुछ आगे चलकर खराब सडक मिली। इस पर कीचड ही कीचड था। जहां तक हो सका, साइकिल पर बैठकर ही चला। बाद में नीचे भी उतरना पडा और पैदल चला। पीछे से गाडियों का काफिला आगे निकलता ही जा रहा था, वे ठहरे जल्दबाज जैसे कि रोहतांग भाग जायेगा, कीचड के छींटे मुझ पर और साइकिल पर भी बहुत पडे।
मढी समुद्र तल से 3300 मीटर की ऊंचाई पर है और रोहतांग 3900 मीटर पर, दोनों की दूरी है सोलह किलोमीटर। शुरू में सडक लूप बनाकर ऊपर चढती है। जिस तरह आगे सरचू के पास गाटा लूप हैं, उसी तरह इनका भी कुछ नाम होना चाहिये था जैसे कि मढी लूप।
साढे आठ बजे चाय की गाडी मिली। यहां संकरी सडक की वजह से जाम भी लगा था। पन्द्रह मिनट बाद यहां से चल पडा।
कैरियर पर रखा बैग एक तरफ झुक गया था। उसे सीधा करने के लिये एक मोड पर साइकिल रोकी व बडी सी चट्टान का सहारा लेकर खडी कर दी। रस्सी खोलकर बैग ठीक करने लगा। तभी एक स्कार्पियो आकर रुकी। सभी पेशाब के सताये हुए। एक आदमी मेरे पास आया। बोला यहां से हटो। महिलाओं को पेशाब करना है। उसने इस अन्दाज से कहा कि हम बडी गाडी वाले हैं, तू साइकिल....। मुझे उसका यह अन्दाज पसन्द नहीं आया। मैंने कहा नहीं हटूंगा। मैं यहां पहले से हूं। मुझे देखकर अगर आपको शर्म आ रही है तो यहां रुकना ही नहीं चाहिये था। बोला कि ठीक है, उधर से मुंह फेरकर खडे हो जाओ। मैंने कहा नहीं, आपको जो करना हो, जहां करना हो, करो। लेकिन मुझे परेशान मत करो। मैं आपके कहने से न तो यहां से हटूंगा, न ही मुंह फेरूंगा। आपको दूसरी जगह गाडी रोकनी चाहिये थी।
आखिरकार वे जिस काम के लिये रुके थे, निपटाया। महिलाओं ने उस बडी चट्टान के पीछे जिस पर मैंने साइकिल टिका रखी थी और पुरुषों की तो सारी दिशाएं अपनी हैं।
रोहतांग लगभग 3900 मीटर पर है। 3800 मीटर पर मुझे हाई एल्टीट्यूड सिकनेस होने लगी। सांस लेने में परेशानी व जल्दी जल्दी थकान। फिर पानी की कमी भी थी। बोतल खाली हो चुकी थी। एक कार वाले से पानी मांगा भी लेकिन एक ही बार में वो खत्म हो गया। फिर किसी और से मांगने की हिम्मत नहीं हुई।
शरीर आराम की भी मांग करने लगा। भूख भी लगने लगी। सुबह ब्रेड आमलेट खाकर चला था और चाय वाली गाडी पर चाय बिस्कुट खाये थे। शरीर में ऊर्जा की खपत अत्यधिक थी लेकिन भरपाई न्यूनतम। ऐसे में सूखे मेवे काम आ जाया करते हैं। एक पुलिया पर साइकिल रोक दी व आधे घण्टे तक शरीर को ऊर्जित करने की कोशिश करने लगा। इस कोशिश से पर्याप्त ऊर्जा नहीं मिली। यह मिली कुछ आगे चलकर जब पानी मिला। पानी मिलते ही शरीर ने तुरन्त कहा- चल भाई, जल्दी रोहतांग पार कर ले।
रोहतांग दर्रा। पर्यटकों के लिये यह बर्फ के ढेर और मौजमस्ती से ज्यादा कुछ नहीं है लेकिन घुमक्कड यहां आकर इमोशनल हो जाया करते हैं। क्योंकि अभी तक वे पर्यटकों के क्षेत्र में घुमक्कडी करने की कोशिश कर रहे थे, अब उनका अपना क्षेत्र शुरू होने वाला है- घुमक्कडों का क्षेत्र। सुना है कि रोहतांग के उस तरफ की दुनिया बिल्कुल अलग ही है। अब वो दुनिया मुझसे ज्यादा दूर नहीं।
मेला सा लगा था रोहतांग पर। मौजमस्ती करने के तरह तरह के साधन। आधे घण्टे यहां बैठा रहा, दो कप चाय सुडक ली।
रोहतांग से आगे बढा तो दो परिवार मिले। सडक के दोनों ओर बर्फ थी, वे खेल रहे थे। उन्होंने मुझे रोका, पानी मांगा। कहने लगे कि भाई, यहां बर्फ तो भरपूर है लेकिन पानी नहीं। गला सूखा जा रहा है। अपनी तकलीफ तो देखी जाये, लेकिन बच्चों की नहीं देखी जाती। मैंने बोतल निकाली, पूरी भरी थी, उन्हें दे दी। पांच छह बच्चे थे। बडों ने हिदायत दी कि किसी को भी एक घूंट से ज्यादा पानी नहीं मिलेगा। मैंने कहा ऐसा अत्याचार मत करो। यह सारा पानी तुम्हारा है, खाली बोतल दे देना मुझे। उन्होंने कहा नहीं भाई, आप साइकिल चला रहे हो। हमसे भी ज्यादा जरुरत आपको है पानी की। मैंने कहा नहीं, आगे ढलान है। मुझे नीचे ही उतरते जाना है। बहुत पानी मिल जायेगा रास्ते में। आखिरकार मुझे सधन्यवाद खाली बोतल मिली व ढेर सारे फोटो भी।
रोहतांग से चला। ढलान है। कुछ दूर तक सडक अच्छी है लेकिन पानी भी है। ठण्डा है। सीधे बर्फ से पिघलकर आ रहा है इसलिये ठण्डा है। साइकिल पर अब पैडल मारने की आवश्यकता ही नहीं। तीन दिनों बाद ऐसा मौका मिला कि बिना पैडल मारे साइकिल चलती रहे। मोटरसाइकिल वालों के कितने मजे हैं!
लेकिन ढलान के बावजूद भी साइकिल अपेक्षित तेजी से नहीं चल सकी। सडक अच्छी बनी थी, तेज चलता तो अत्यधिक ठण्डे पानी के छींटे पैरों पर पडते। फिर हवा भी अच्छी खासी चल रही थी, पैर जल्दी ही ठण्डे हो जाते।
तीन चार किलोमीटर के बाद खराब सडक आ गई जो 18-20 किलोमीटर आगे कोकसर में ही ठीक हुई। इस खराब सडक पर अक्सर कीचड भी मिल जाती तो नीचे उतरकर चलना पडता। नहीं तो नुकीले पत्थर ऐसे तैयार थे जैसे अभी पंक्चर करेंगे।
ऊपर चढने में पैरों की अच्छी कसरत होती है तो नीचे उतरना भी आरामदायक नहीं है। सडक खराब हो तो ब्रेक से उंगलियां नहीं हटाई जा सकतीं। थोडी थोडी देर बाद रुककर उंगलियों को आराम देना होता। फिर शरीर का ज्यादातर वजन भी हाथों पर ही आ पडता। कोहनियां दुखने लगतीं।
अब पर्यटकों की गाडियों का काफिला खत्म हो चुका था। दूर-दूर तक खाली सडक। कभी कभार ही कोई दिखता।
सवा दो बजे ग्रामफू पहुंचा। यहां से स्पीति इलाके के लिये सडक गई है। पहले तो सडक चन्द्रा नदी के साथ साथ गई है और फिर कुंजम दर्रा पार करके स्पीति नदी के साथ साथ चलने लगती है। पता चला वो पूरी सडक अत्यधिक खराब है। अभी कुंजम दर्रा नहीं खुला था।
तीन बजे कोकसर पहुंच गया। यहां सचिन मिल गया। बोला डेढ घण्टे से प्रतीक्षा कर रहा हूं। मैंने समझाया हम दोनों सोलो ट्रैवलर हैं, प्रतीक्षा नहीं किया करते।
भूखा था, भरपेट चावल खाये। साढे तीन बजे यहां से चल पडे। इसके बाद बेहतरीन सडक मिल गई। चन्द्रा पार की और टाण्डी का लक्ष्य लेकर आगे चल पडे। चन्द्रा के साथ साथ चलने में पिछले दिनों की सारी थकान भूल गये। रास्ते में एक छोटा सा नाला भी नीचे उतरकर पार करना पडा। इसने झलक दिखा दी कि आगे और भी बडे नाले मिलेंगे तो उन्हें पार करना कितना चुनौती भरा रहेगा।
पांच बजे सिस्सू पहुंचे। यहां एक छोटी सी कृत्रिम झील भी है जिसमें चन्द्रा का पानी आता है। चन्द्रा के पानी का भरपूर उपयोग करके लोगों ने यहां काफी पेड-पौधे लगा रखे हैं और अच्छी खासी हरियाली भी है।
इसके बाद ढलान खत्म और रास्ता एक लेवल में हो गया। कहीं चढाई भी मिल जाती तो स्पीड कम हो जाती। साढे छह बजे जब गोंदला से चार किलोमीटर पीछे थे, तभी सोच लिया कि यहीं रुक जाते हैं। तरुण गोयल ने गोंदला के अपने एक मित्र डॉ विशाल का फोन नम्बर दिया था।
सात बजे गोंदला पहुंच गये। नाला पार करके एक मन्दिर के पास जब विशाल से बात हुई तो उन्होंने नीचे रेस्ट हाउस के पास आने को कहा। वे वैसे तो कांगडा के हैं लेकिन यहां डाक्टर हैं। रेस्ट हाउस के बराबर में ही अस्पताल है। हमारा ठिकाना रेस्ट हाउस में हो गया और खाना मित्र के यहां। रेस्ट हाउस में गीजर भी है, कल नहाऊंगा।
सचिन ने कल का कार्यक्रम पूछा। मैंने कहा मैं चार पांच रातों से अच्छी तरह नहीं सो पाया हूं। आज भरपूर नींद लेने का मौका है। नींद के साथ कोई अत्याचार नहीं करूंगा। कल जब भी अपने आप आंख खुलेगी, तभी उठूंगा। चाहे दस बजे या बारह। बोला कि नहीं, सुबह छह सात बजे उठेंगे और निकल पडेंगे। कम से कम दारचा तक तो पहुंच ही जाना चाहिये। मैंने मना कर दिया- नहीं, हम दोनों एकल घुमक्कड हैं। तुम अपनी योजना बनाओ, मैं अपनी योजना बनाता हूं। अगर दोनों की योजनाओं में मित्रता हो गई तो हम साथ रहेंगे। नहीं तो तुम अपने रास्ते, मैं अपने रास्ते। इस बात पर दोनों में सहमति हो गई।
तीन दिनों से हाफ पैण्ट पहनने के कारण घुटनों से नीचे पैर जल गये हैं। हाथ भी नहीं लगाया जा रहा। कल फुल पैण्ट पहननी पडेगी।
आज 64 किलोमीटर साइकिल चलाई।

मढी से दिखता रोहतांग दर्रा

मढी में टैण्ट और जाटराम



कीचड वाली सडक





बीआरओ जिन्दाबाद


एक लम्बा जाम

हिमालयी सडकों के डॉक्टर

बर्फ काटकर बनाई गई सडक


यह मुख्य सडक छोडकर शॉर्ट कट से नीचे उतरने की कोशिश कर रहा था। नतीजा सामने है।

रोहतांग ज्यादा दूर नहीं।



रोहतांग के पास खडी गाडियां

बर्फ पर चलने वाली गाडी

रोहतांग पर बर्फ पर मौजमस्ती

रोहतांग पर जाटराम

रोहतांग पर अन्धेरा होने की प्रतीक्षा करते ट्रक। जब पर्यटक चले जायेंगे, तब ये आगे बढेंगे।


यही वो परिवार था जिसने एक घूंट पानी मांगा था।

रोहतांग दर्रा- अब चढाई खत्म, उतराई शुरू

सडक पर फैला बर्फीला पानी

खराब सडक और बर्फीला पानी



यह लाहौल है। यहां के पहाडों पर पेड नहीं होते। रोहतांग पार करने पर सबसे पहला परिवर्तन।



कोकसर में राजमा चावल का भोग

कोकसर

चन्द्रा नदी


यह था पहला नाला।


सिस्सू




गोंदला के पास नाला
अगले भाग में जारी...

मनाली-लेह-श्रीनगर साइकिल यात्रा
1. साइकिल यात्रा का आगाज
2. लद्दाख साइकिल यात्रा- पहला दिन- दिल्ली से प्रस्थान
3. लद्दाख साइकिल यात्रा- दूसरा दिन- मनाली से गुलाबा
4. लद्दाख साइकिल यात्रा- तीसरा दिन- गुलाबा से मढी
5. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौथा दिन- मढी से गोंदला
6. लद्दाख साइकिल यात्रा- पांचवां दिन- गोंदला से गेमूर
7. लद्दाख साइकिल यात्रा- छठा दिन- गेमूर से जिंगजिंगबार
8. लद्दाख साइकिल यात्रा- सातवां दिन- जिंगजिंगबार से सरचू
9. लद्दाख साइकिल यात्रा- आठवां दिन- सरचू से नकीला
10. लद्दाख साइकिल यात्रा- नौवां दिन- नकीला से व्हिस्की नाला
11. लद्दाख साइकिल यात्रा- दसवां दिन- व्हिस्की नाले से पांग
12. लद्दाख साइकिल यात्रा- ग्यारहवां दिन- पांग से शो-कार मोड
13. शो-कार (Tso Kar) झील
14. लद्दाख साइकिल यात्रा- बारहवां दिन- शो-कार मोड से तंगलंगला
15. लद्दाख साइकिल यात्रा- तेरहवां दिन- तंगलंगला से उप्शी
16. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौदहवां दिन- उप्शी से लेह
17. लद्दाख साइकिल यात्रा- पन्द्रहवां दिन- लेह से ससपोल
18. लद्दाख साइकिल यात्रा- सोलहवां दिन- ससपोल से फोतूला
19. लद्दाख साइकिल यात्रा- सत्रहवां दिन- फोतूला से मुलबेक
20. लद्दाख साइकिल यात्रा- अठारहवां दिन- मुलबेक से शम्शा
21. लद्दाख साइकिल यात्रा- उन्नीसवां दिन- शम्शा से मटायन
22. लद्दाख साइकिल यात्रा- बीसवां दिन- मटायन से श्रीनगर
23. लद्दाख साइकिल यात्रा- इक्कीसवां दिन- श्रीनगर से दिल्ली
24. लद्दाख साइकिल यात्रा के तकनीकी पहलू

34 comments:

  1. पढ़ने में हर्ष भी हो रहा है, रोमांच भी।

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  2. गज़ब की हिम्मत है नीरज भाई तुम्हारी .. वाह !! इस बार फोटो ज्यादा थी और फिर पढने में और भी मज़ा आया ..
    दिल करता है एक प्रोग्राम मैं भी बना दूँ जल्दी से!! कितनी खूबसूरत जगह है।

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  3. बहुत अच्छा लगता है आपके यात्रा वर्णन पढ़ कर कभी कभी मन करता है आपके साथ घुमने का ऐसे ही आगे बढ़ते रहो god bless you

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  4. नीरज जी मैं रोहतांग २ बार गया हूँ. उतना मज़ा तब नहीं आया था, जितना अब आपके फोटोज और यात्रा विवरण को पढ़कर, गज़ब, बहुत गज़ब, आपने तो हिमालय की सुन्दरता को बहुत ही अच्छे रूप में दिखाया हैं. धन्य हो, धन्य हो, वन्देमातरम...

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  5. acha yatra vratant.musafir chalte jao.

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  6. Superb photos, bhai aap ne photos bahut hi badhiya khiche hai

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  7. Wah! maja aagaya, laga main bhi ghum aaya

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  8. Bhadhayi ho Neeraj ji. Rohtang to me bhi gaya hu. fir se yatra ki yade taza kar di photo naynabhiraam he.

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  9. हिमाचल, उत्तराखंड और कश्मीर के राजमा चावल की बात ही कुछ और है...

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  10. Maja aa gyaya mano mai dobaara ghum raha hoon un pahaarro me. Lage raho Jaatt bhai.

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  11. aapne cycle ka stand nikaal diya h kya?

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    1. This comment has been removed by the author.

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    2. LAGA THO HAI BHAI SAHAB.. Zara gaur se dekhiye..
      MTB cycles me mariyal sa stand hota hai..cycle k alawa 25 kilo vajan nahi jhel sakta.

      (LO JI JAAT BHAI MAINE EK KAM HALKA KER DIYA TUMHAARA)

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  12. Ultimate photography borther... superb place.....Jannat k nazare the yah... :0 Keep it up

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  13. घुमक्कडी करना और यात्रा ब्लॉग लिखने में आपका कोई सानी नहीं है।
    वर्ना यहां मैं-मैं-मैं मैं ये, मैं वो, मैं फलाना, मैं ढिकाना करके लिखने वाले कई घुमक्कड बकवास पेल रहे हैं।
    पहाडों पर मोटरसाईकिल पर जाने वाले हजारों मिल जायेंगे (कई हजार तो हर साल हेमकुंड जाते ही हैं) लेकिन साईकिल पर उंगलियों पर गिनने लायक ही जाते हैं।
    लाहौल की ऊंचाई कितनी है जी, मेरे ख्याल से 4000 मीटर के बाद पेड नहीं होते, बस छोटी झाडियां रह जाती हैं और 4500 मीटर के बाद केवल घास और 5000 मीटर के बाद वो भी खत्म। इस बारे में मेरी दुविधा दूर कीजियेगा।

    प्रणाम

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    1. अमित भाई,
      लाहौल औसतन 3000 मीटर ऊंचा है। वैसे तो यहां 6000 मीटर ऊंची चोटियां भी हैं लेकिन सामान्य जनजीवन और सडकें आदि 3000-3500 मीटर पर हैं।
      बाकी कि 4500 के बाद घास होती है, उसके बाद वो भी खत्म, यह सब हिमालय तक ही है। हिमालय पार यानी लद्दाख आदि पर यह नियम लागू नहीं होता।

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  14. भाई, ऐसे कठिन रास्तों में, लम्बी दूरियों को आनंद के साथ तय किया है आपने। शानदार प्रयास एवं गजब का हौंसला है आपका। 3 इडियट स्टाइल में हम तो यही कहेंगे - जाटराम जी, तुस्सी ग्रेट हो .. सलाम कबूल करो।
    - Anilkv

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  15. निसंदेह आपकी घुमक्कडी लाजबाब है. आप दुनिया दारी में भी बेमिसाल हैं लेकिन साथी घुमक्कड लोंगो के साथ कुछ सख्ती से पेश आते हैं . ऐसा क्यूँ जी ?
    और इस बारे क्या विचार हैं ?https://www.facebook.com/groups/manimaheshyatra/?fref=ts

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  16. अहा !! बहुप्रतिक्षित अंक आ गया.. काश्मीर इसीलिये तो स्वर्ग कहलाता है ।

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    1. रस्तोगी साहब, यह कश्मीर नहीं हिमाचल है।

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  17. very very nice pics neeraj bhai thanks.

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  18. neeraj bhai ladhak ghune wale aamtor per y batate hai ki ladhak pohcne per 2 din thak jyda ghumna nahi chaya pehle body ko wah ke mossam ka anukul dhalne dana chaeya.kya yah baat theek ha??

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  19. main to nishabd ho gaya hoon bhai

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  20. यात्रा में पानी कितना महत्वपूर्ण होता है यह बात आप से ज्यादा कोई नही जान सकता हूँ। इससे ज्यादा मैं कुछ लिख भी नही सकता।

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  21. Neeraj ji, Rohtang mein charon taraf barf hi barf hai, kya wahan sardi nahi hoti jo aap tshirt aur short mein ghoom rahe ho.

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  22. श्रीराम.....
    नीरज भाई नमस्ते ...बहुत खूब ,रोहतांग ,मनाली,कुल्लू ,मनीकरण तो मै भी गाय था,मगर
    बस से ,आपकी घुमाक्कडी देखकर आनद आया.फोटो भी लाजबाब है.बस इतनाही कहुंगा कि
    जिओ यारो जी भर - भरके . मेरी शुभाकामानाये ........कोकण टूर के इंतजार मे आपका दोस्त
    मुकुंद ...धुळे ..MH -09

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  23. आगे का रास्ता बहुत ही मजेदार और जोखिम भरा लग रहा है पर जहाँ नीरज वह ख़ुशी ही ख़ुशी यानी कमल ही कमल---नहाने का दिन नजदीक आ गया --जय हो ...शुभ यात्रा

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  24. Bahut Umdah naqqashi aur tashver kushi hai Niraj Ji, aap ke himmat qabile daad hai,
    tell me some thing.
    1- aap ka camera kaun sa hai, aur mai kaun sa camera le sakta hun,
    2- khani pine ka kharch bhi lekhte rahe,
    3- yaad rakh ker kaise likh dete hai y report.
    main ne shuru ker diya hai padhna, and now at 4rth day,, pichture ke sath bada maja ata hai,, thanks for sharing,,,,
    Motiullah Riyadh,,,

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