Buy My Book

Friday, May 3, 2013

पालमपुर का चिडियाघर और दिल्ली वापसी

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें
6 अप्रैल 2013
बरोट में थे हम। सोकर उठे तो दिन निकल गया था। साढे आठ बज चुके थे। कल तय हुआ था कि आज हम रेल की पटरी के साथ साथ पैदल चलेंगे और जोगिन्दर नगर पहुंचेंगे। अपनी यह मंशा हमने चौकीदार को बताई तो उसने हमें जबरदस्त हतोत्साहित किया। रास्ता बडा खतरनाक है, भटक जाओगे, घोर जंगल है, भालू काफी सारे हैं, कोई नहीं जाता उधर से। हमने कहा कि भटकेंगे क्यों? रेल की पटरी के साथ साथ ही तो जाना है। बोला कि मेरी सलाह यही है कि उधर से मत जाओ।
नटवर से गुफ्तगू हुई। हिमानी चामुण्डा जाने से पैरों में जो अकडन हुई थी, वो अभी तक मौजूद थी। चौकीदार के हतोत्साहन से पैरों की अकडन भी जोश में आ गई और एक सुर में दोनों ने चौकीदार से पूछा कि अब जोगिन्दर नगर की बस कितने बजे है? सवा नौ बजे।
सवा नौ बजे लुहारडी से आने वाली बस आ गई और पौने दो घण्टे में इसने हमें जोगिन्दर नगर पहुंचा दिया। जाते ही पठानकोट जाने वाली बस मिल गई। इसमें टिकट लिया गया पालमपुर तक का। पालमपुर से आगे एक चिडियाघर है। मैंने तो खैर यह देखा हुआ है, नटवर की बडी इच्छा थी इसे देखने की। अगर नटवर की जिद न होती तो हम कांगडा उतरते और ततवानी तथा मसरूर देखते। आज रात दस बजे पठानकोट से हमारी ट्रेन है, इसलिये उसका भी ख्याल रखना पडेगा।
पालमपुर से चामुण्डा रोड पर चामुण्डा से पांच-छह किलोमीटर पहले एक चिडियाघर है, छोटा सा है। काला भालू, तेंदुआ, जंगली सूअर और कुछ चिडियां यहां हैं। काला भालू तो खैर खुले में है, लेकिन बाकी सभी जानवर तथा पक्षी दोहरे जाल वाले पिंजरे में है। इतनी घनी जाली होगी तो भला फोटो कैसे खिंचे जा सकते हैं? इस बात से नटवर बडा खिन्न हुआ और मुझसे बहुत पहले ही चिडियाघर से बाहर निकल गया।
चार साल पहले भी मैं यहां आया था। अब यह ज्यादा उजाड दिखाई दिया। पहले सेही भी थी, अब गायब। शायद बाघ भी था, हालांकि बब्बर शेर अवश्य है। बहुत सारे पिंजरे खाली पडे हैं।
यहां से निकले तो मसरूर जाने का भी मन था लेकिन हम ‘बेगनासताल’ नहीं बनना चाहते थे। यहीं से कांगडा की बस मिल गई, जहां से सीधे पठानकोट।
आठ बजे के आसपास बस ने हमें चक्कीबैंक स्टेशन के सामने उतार दिया। यहां से पठानकोट स्टेशन पांच किलोमीटर के आसपास है। पैदल चलने का निश्चय हुआ। साथ ही यह भी निश्चय हुआ कि आज परम्परागत डिनर नहीं करेंगे। चलते चलेंगे और जो भी मन करेगा, खाते चलेंगे। सबसे पहले चाट, फिर जलेबी। कई दिनों से मन था कि मोमो खाये जायें। वो ख्वाहिश आज पूरी हुई पठानकोट में। नटवर मना करने लगा कि यह विदेशी चीज है, बल्कि चीनी आइटम है, इसलिये हम भारतीयों को नहीं खाना चाहिये। मेरा तर्क था कि शाकाहारी मोमो विशुद्ध भारतीय है। हां, तरीका जरूर बाहर से आया है लेकिन मोमो यानी भाप में पका समोसा।
पैदल ही जा रहे थे कि एक सरदारजी टम्पू लेकर बराबर में रुक गये। बोले कि बैठो, कहां जाना है। स्टेशन जाना है, कितने पैसे लोगे? बीस रुपये दे देना। नटवर ने तुरन्त मोलभाव किया, दस रुपये कहकर बैठ गये।
फिर भला कितनी देर लगती स्टेशन पहुंचने में?
ठीक समय पर धौलाधार एक्सप्रेस चल पडी।



तेंदुआ











हिमालयन काला भालू
हिमाचल कांगडा यात्रा समाप्त।

5 comments:

  1. अति सुन्दर चित्र, एक दो फोटो पठानकोट के भी हो जाते, और मोमो की बात सुनकर तो मुह में पानी आ गया....

    ReplyDelete
  2. सुन्दर चित्र

    ReplyDelete
  3. चित्र बहुत सुंदर हैं ..
    हम भी चिडियाघर घूम लिए ..

    ReplyDelete
  4. चिड़ियाघर वाकई में अच्छा है, हमें पता नहीं था, बिच रस्ते में भाई ने ये जगह का जिक्र किया और फिर हम यहाँ हो लिए.

    ReplyDelete
  5. Gopalpur Chidiaghar -Ultimate

    ReplyDelete