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Thursday, April 18, 2013

एक बार फिर धर्मशाला

2 अप्रैल 2013
नटवर ने सुबह चार बजे दिल्ली की धरती पर पैर रखा। मैंने अपनी छुट्टियों की वजह से उसे पक्की तारीख नहीं बताई थी, इसलिये तीस मार्च को जब उसे यात्रा के दिनांक का पता चला तो तुरत-फुरत में आरक्षण कराना पडा। कुचामन से आने वाली मण्डोर एक्सप्रेस में जगह नहीं मिली तो फुलेरा से अजमेर- हरिद्वार एक्सप्रेस पकड ली।
शुरूआती योजना साइकिल चलाने की थी लेकिन नटवर जिद पर अड गया कि नहीं, साइकिल नहीं चलायेंगे। पहले तो मन में आया कि नटवर से कह दूं कि भाड में जा तू, मैं तो साइकिल ही चलाऊंगा लेकिन जैसे जैसे दिन नजदीक आते गये, मेरा साइकिल मोह कम होता गया। ऊपर से सन्दीप भाई ने भी साइकिल-धिक्कार-पुराण पढना शुरू कर दिया। रहा सहा जोश भी ठण्डा पड गया।
ठीक है नटवर भाई, साइकिल से नहीं जायेंगे। नटवर का कथन था- भगवान ने मेरी सुन ली।
किसी जमाने में अपने मित्रों की उच्च श्रेणी में एक डॉक्टर साहब हुआ करते थे- डॉक्टर करण। वे ठहरे पैसों वाले। उन्होंने बडी महंगी साइकिल ली थी। एक बार वो महंगी साइकिल मेरे हाथ लग गई। भगवान कसम! जो आनन्द आया उस चीज को चलाने में, लगा कि यही है असली चीज। कुछ नहीं रखा पैदल यात्रा में, कुछ नहीं रखा मोटरसाइकिल में। साइकिल ही असली है। और जब महीने भर चलाने के बाद साइकिल डॉक्टर के पास वापस जाने लगी, तो लगा जैसे गर्लफ्रेण्ड किसी और के साथ भाग गई।
खैर, हमने भी हिम्मत नहीं हारी। चौदह हजार रुपये लगाकर नई साइकिल ले ली। अपनी साइकिल हो गई। डॉक्टर वाली साइकिल अगर गर्लफ्रेण्ड थी तो यह घरवाली। परमानेण्ट। जीवन भर के लिये। हनीमून मनाने ऋषिकेश ले गया, नीलकण्ठ बाबा के दर्शन कराये। कुछ ही दिन बाद राजस्थान भी घुमा लाया।
लेकिन... शायद इसीलिये घरवाली बुरी होती है। गर्लफ्रेण्ड की बुराइयां कभी नहीं होतीं। ‘शादी’ के समय सपने देखे थे कि तुझे लद्दाख ले जाऊंगा, स्पीति ले जाऊंगा, पांगी ले जाऊंगा, नागालैण्ड ले जाऊंगा। लेकिन अब नाम लेते ही उबकाई सी आने लगती। तू घर में ही रह। मेरी बस ही अच्छी।
साइकिल यात्रा रद्द होने के बाद योजना बनी कि पहले सुन्दरनगर जायेंगे, फिर जंजैहली जायेंगे, फिर शिकारी देवी जायेंगे आदि आदि। नटवर खुश हुआ जा रहा था कि ट्रेकिंग करने को मिलेगी। वो वैसे तो रोहतांग तक गया है, लेकिन ट्रैकिंग कभी नहीं की। सोच रहा था कि ट्रैकिंग बडी खूबसूरत चीज होती होगी। उसके लिये जन्नत थी ट्रैकिंग। ऊपर से फोटोग्राफर ठहरा, पैदल चलते हुए कुदरत के जी भरकर फोटो खींचने को मिलेंगे।
सुबह साढे छह बजे कश्मीरी गेट बस अड्डे पहुंचे। जब मैंने उसे बताया कि शिकारी देवी नहीं जायेंगे तो किंकर्तव्यविमूढ हो गया। वो शिकारी देवी की सारी जीवनी, इतिहास, भूगोल पढकर आया था। सोच बना ली थी कि शिकारी माता के अलावा हिमालय में कहीं ट्रैकिंग हो ही नहीं सकती। काफी देर बाद जब वो ‘दुर्घटना’ से बाहर निकला तो पूछा कि फिर कहां जायेंगे।
“देखते हैं। हिमाचल जाने वाली जो भी पहली बस मिल जायेगी, उसी में चढ लेंगे। कहां जाना है, बस में बैठकर तय करेंगे।”
“शिकारी देवी क्यों नहीं?”
“वहां बहुत ज्यादा बर्फ है अभी। कल परसों तक हिमाचल में जमकर बर्फबारी और बारिश हो रही थी, तो शिकारी पर बर्फ और ज्यादा बढ गई होगी। वैसे तो वहां तक सडक भी बनी है, इसलिये बर्फ पर भी चला जा सकता है लेकिन हमारी योजना थी कि शिकारी के बाद कमरुनाग जायेंगे। वो पगडण्डी वाला रास्ता है और मैं बर्फीली पगडण्डी पर नहीं चलना चाहता।”
“मार्च में बर्फबारी???? हिमाचल में तो मई जून में बर्फ गिरती है। मार्च में नहीं गिरा करती।”
“अरे भाई, तुमने कहां सुन लिया कि यहां गर्मियों में बर्फ गिरती है? पूरे हिमालय क्षेत्र में सर्दियों में बर्फ गिरती है।”
“नहीं। मैंने सुना नहीं है। खुद देखा है... इन आंखों से। मैं बिना सबूत के बात नहीं किया करता। मेरे पास सबूत है कि हिमाचल में गर्मियों में बर्फ गिरती है, सर्दियों में नहीं।”
“बता भाई, क्या सबूत है?”
“मैं दो बार रोहतांग जा चुका हूं। तुम एक बार भी नहीं गये हो, इसलिये तुम्हें पता नहीं है। पहली बार सर्दियों में गया था- नवम्बर में। वहां बिल्कुल भी बर्फ नहीं थी। दूसरी बार जून में गया तो दस-दस फीट तक बर्फ थी वहां। मैंने खुद देखा है। वहां गर्मियों में ही बर्फ पडती है।”
मुझे यह सुनकर छत्तीसगढ यात्रा याद आ गई जहां मेरे सहयोगी पौराणिक कथाओं को सुनाकर ‘सबूतों’ के साथ उनकी सत्यता सिद्ध कर रहे थे। मेरे विरोध करने पर वे नाराज हो गये थे। कहीं यहां भी नाराजगी न फैल जाये, इसलिये उसके ‘सबूतों’ पर चुप रहा।
पहली बस धर्मशाला की मिली। कांगडा का टिकट ले लिया।
करनाल में महा-बेकार परांठे खाने पडे। नाइट ड्यूटी की थी, अब तक कुछ खाया भी नहीं था। भूख भयंकर लग रही थी, इसलिये ‘गन्दगी’ में मुंह मारना पडा।
दिल्ली से बस में हमने सबसे आगे वाली सीटें लीं। दोनों बेचारे रात भर के जगे थे, नींद आने लगी। ड्राइवर ने हडका दिया कि ओये, सोओगे नही। सोना है तो पीछे जाओ। चण्डीगढ में सबसे पहला काम यही किया।
आंख खुली तो हिमाचल में प्रवेश कर चुके थे। अम्ब में थे। यह ऊना जिले में पडता है। अब अम्ब तक रेल भी आने लगी है। इस लाइन पर मैं चुरारू टकराला तक गया हूं। उस समय यह लाइन चुरारू टकराला तक ही खुली थी।
यहां से कांगडा जाने के दो रास्ते हैं- एक सीधा रास्ता और दूसरा ज्वालामुखी होता हुआ। देहरा से दोनों रास्ते अलग होते हैं। देहरा ब्यास के किनारे बसा है और यहां से काफी पहले से ही धौलाधार के हिमाच्छादित पर्वत दिखने लगते हैं।
कांगडा उतरे तो समस्या आई कि अब कहां? सामने वाली बस कहां जा रही है? पालमपुर जा रही है। चल, पालमपुर चलते हैं। नटवर ने पूछा कि पालमपुर कितना दूर है? होगा कोई तीस किलोमीटर। क्या चीज है वहां देखने की? वैसे तो कुछ खास नहीं लेकिन काफी बडा कस्बा है और चाय के बागान भी हैं। बोला कि छोड इस बस को, मुझे प्रेशर बन रहा है। वहां से निपटने के बाद सोचेंगे।
और यह शौचालय बडे काम की जगह है। दिमाग पूरी तरह तनावरहित हो जाता है। आपको कोई निर्णय लेना हो, कुछ देर बैठकर आइये, यकीनन निर्णय लेकर ही उठेंगे। मैं इस कला का अक्सर प्रयोग करता रहता हूं। नटवर भी शायद इसे जानता होगा, तभी तो बाहर आते ही बोला कि धर्मशाला चलते हैं। मेरी तरफ से भी धर्मशाला की हां हो गई।
कांगडा से भला क्या कमी धर्मशाला की बसों की? आधे घण्टे में ही हम धर्मशाला में थे।
कमरा लेने का काम नटवर के जिम्मे छोड दिया। पहला कमरा देखा, चार सौ का, पसन्द नहीं आया। दूसरा ग्यारह सौ का, नापसन्द। तीसरा साढे तीन सौ का, नहीं। चौथा तीन सौ का, नहीं। मैं खीझ उठा। मैंने झल्लाकर पूछा कि लेना क्या चाहता है? बोला कि आगे और भी होटल हैं, ट्राइ मार लेते हैं। मैंने पूछा कि ट्राइ तो मार लेंगे लेकिन यह बता कि कैसा कमरा लेना है। क्या उम्मीदें हैं तेरी कमरे के बारे में? बता मुझे कि ऐसा कमरा लेना है जिसमें यह हो, वह हो, ऐसा हो, वैसा हो। चार कमरे देख लिये, चारों नापसन्द।
बोला कि व्यू... सामने का व्यू ठीक होना चाहिये। मैंने माथा पीट लिया। रात को तुझे सोना है या व्यू देखने हैं? बोला कि नहीं, सुबह जब उठेंगे तो कमरे से सामने का नजारा देखने लायक होना चाहिये। मैंने समझाया कि भाई, उठते ही हमें कमरा छोड देना है। चाहे व्यू वाला हो या नॉन व्यू वाला। आखिरकार वही तीन सौ वाला कमरा ले लिया।
पास में ही धर्मशाला का बस अड्डा था। मैं जब भी धर्मशाला जाता हूं तो बस अड्डे की कैण्टीन में ही खाना खाता हूं। सस्ता मिलता है और गुणवत्ता भी अच्छी होती है। खाना खा आये।
मैं पहले भी कई बार बता चुका हूं कि मुझे बचपन से ही नक्शे पढने का शौक रहा है जो आज तक जारी है। इसी वजह से मुझे सम्पूर्ण भारत के स्थानों की जानकारी है। पश्चिमी हिमालय यानी उत्तराखण्ड, हिमाचल और जम्मू कश्मीर की भी अच्छी जानकारी है। मैंने नटवर को हिमाचल का नक्शा देकर कहा कि मैक्लोडगंज को छोडकर जहां भी कहेगा, कल वहीं चलेंगे।
यह तो ध्यान नहीं कि नटवर ने कहां के बारे में कहा लेकिन पुरानी चामुण्डा पर सहमति बन गई। हालांकि पुरानी चामुण्डा नक्शे में कहीं नहीं है।

कांगडा यात्रा
1. एक बार फिर धर्मशाला
2. हिमानी चामुण्डा ट्रेक
3. हिमानी चामुण्डा से वापसी
4. एक बार फिर बैजनाथ

6 comments:

  1. यह शौचालय बडे काम की जगह है। दिमाग पूरी तरह तनावरहित हो जाता है। आपको कोई निर्णय लेना हो, कुछ देर बैठकर आइये, यकीनन निर्णय लेकर ही उठेंगे। मैं इस कला का अक्सर प्रयोग करता रहता हूं।

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  2. नीरज भाई आपका घूमने का जोश कनिले तारीफ है लगे रहो

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  3. बड़े हिम्मती हो भाई साईकिल गर्ल फ्रेंड साईकिल घरवाली और घूमना-शुमना बस के साथ ....साईकिल से बस तक का सफ़र ....बड़ी लम्बी रेंज है भैय्या तुम्हारी .... खैर अगले महीने लगभग पंद्रह दिन मुझे धर्मशाला में ही गुजरने हैं तुम्हारे यात्रा के अनुभव का लाभ उठाऊंगा। धन्यवाद।

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  4. अभी तो यात्रा का आगाज़ है.. दो-चार फोटो भी होता तो मज़ा आ जाता. भाई मैं १० मई २०१२ को भोजवासा में था उस दिस २ घंटे तक बर्फ़बारी हुई थी. जबकि हमारे यहाँ वाराणसी में लू चल रही थी. अगली कड़ी का इन्तेजार.....

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  5. वाह, बहुत सुन्दर तुलना की है साईकिल की, एक घरवाली, एक बाहर वाली हा हा .....

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