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Monday, April 29, 2013

बरोट यात्रा

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5 अप्रैल 2013
छोटा सा बस अड्डा जोगिन्दर नगर का, उसमें भी बसों की भयंकर भीड। बडाग्रां से बीड जाने वाली एक बस खडी थी। हमें इससे क्या फायदा था? अगर यह बडाग्रां जाती तो चढते भी। एक बार तो मन में आया कि आज यहीं रुक जाते हैं, सुबह सात बजे चलने वाली छोटी गाडी से बैजनाथ पपरोला चले जायेंगे। वहां से आगे चिडियाघर और ततवानी, मसरूर। लेकिन तभी पता चला कि बरोट के लिये ढाई बजे सरकारी बस आयेगी।
बस आई। भीड टूट पडी। खैरियत कि हमें बैठने की जगह मिल गई। घटासनी जाकर आधे घण्टे के लिये बस रुक गई। घटासनी से सीधी सडक मण्डी चली गई जबकि बायें मुडकर बरोट।
घटासनी से चढाई शुरू हुई और झटींगरी में जाकर खत्म हुई। झटींगरी के बाद बस ऊहल घाटी में उतरने लगी। यहां से धौलाधार के बर्फीले पर्वतों के अलावा सुदूर किन्नौर के बर्फीले पर्वत भी दिख रहे थे। टिक्कन में ऊहल नदी पार की।
पांच बजे बरोट पहुंच गये। पीडब्ल्यूडी के रेस्ट हाउस के सामने से होकर जब बस निकली, तभी सोच लिया कि इसी में रुकने की कोशिश करते हैं। नटवर भी सहमत था।
रेस्ट हाउस में कोई नहीं दिखा तो एक हॉल में चले गये, जहां चार-पांच लोग दारू पी रहे थे। हावभाव से ही पता चल रहा था कि कोई बडे पैसे वाले हैं। दिल्ली के थे। पहले तो उन्होंने हमारा जबरदस्त इंटरव्यू लिया, बाद में रसोईये के पास भेज दिया। कमरा उपलब्ध था, इसलिये मिल गया। बाद में पता चला कि ये लोग दिल्ली में प्रॉपर्टी डीलर हैं, एक तो कॉलोनियों का निर्माण कराता है। परिचय होने के बाद इनसे बात करने में मेरा दम घुटने लगा। मुझे इन्होंने फोन नम्बर भी दिया, यह कहते हुए कि दिल्ली एनसीआर में कोई मकान चाहिये तो बात करना। दिखावे के लिये मैंने नम्बर तो ले लिया, मुंह फेरते ही उडा भी दिया। नीरज, यार तू भी किन बडे लोगों में जा फंसा था?
बरोट का यह रेस्ट हाउस अपने ब्रिटिशकालीन लकडी के रेस्ट हाउस के कारण प्रसिद्ध है। यह चीड की लकडी का बना है, पॉलिश की वजह से चिकना और चमकदार दिखता है। चीड की सुगन्ध जमकर आती है। काफी बडे आकार का एक कमरा, एक छोटा कमरा और बडा सा प्रसाधन कक्ष- गीजर भी। किराया 480 रुपये।
बरोट का नाम भारत के शुरूआती जल-विद्युत संयन्त्रों के कारण लिया जाता है। यहां ऊहल में एक नदी और आकर मिलती है। दोनों नदियों के संगम से कुछ आगे एक बांध है। बांध से पानी बडे बडे पाइपों में पहाड के दूसरी तरफ अपेक्षाकृत निचाई पर बसे जोगिन्दर नगर ले जाया जाता है। नीचे ही विद्युत संयन्त्र है। 10 मार्च 1933 को इसका उद्घाटन हुआ था।
इस बांध को बनाने के लिये ही पठानकोट से जोगिन्दर नगर तक छोटी लाइन की रेल बिछाई गई। इतना ही नहीं, चमत्कार तो इसके बाद हुआ। जोगिन्दर नगर से एक रेल लाइन सीधे ऊपर पहाड पर चढाकर इसे दूसरी तरफ बरोट में उतारा गया है। यह ब्रॉड गेज है। जोगिन्दर नगर के पास जो पावर हाउस है, उसकी ऊंचाई 1200 मीटर है, बरोट 1800 मीटर पर है और इनके बीच में जो पर्वत श्रंखला है, वो 2600 मीटर ऊंची है। यानी रेलवे लाइन 1200 मीटर से शुरू होकर सीधे बिना किसी मोड-तोड के 2600 मीटर तक चढती है, उसके बाद बरोट की तरफ सीधे उतर जाती है। यह लाइन आदमियों और सामान को बरोट पहुंचाने के काम में आती थी। 2600 मीटर की ऊंचाई पर विंच कैम्प है। जोगिन्दर नगर से विंच कैम्प तक अभी भी इस पर ट्रॉली चलती है, जबकि विंच कैम्प से बरोट तक लाइन बन्द है। हालांकि रेल की पटरियां अवश्य हैं।
रेस्ट हाउस में सामान रखकर कन्धों पर कैमरे लटकाये दोनों भाई बरोट भ्रमण पर निकल पडे। बांध के ऊपर से गुजरकर नदी के उस तरफ पहुंचे। यहां से एक छोटी सी नहर निकली है, जिसका पानी आगे जाकर पाइपों के जरिये नीचे जाता है। हर बांध की तरह यहां भी फोटो खींचने की जबरदस्त मनाही है।
एक जगह चाय पी। नटवर ने बडा घिनौना काम किया। चार अण्डे फोडकर एक गिलास में डालकर कच्चे ही पी गया। मैं भले ही आमलेट और उबले अण्डे खा लेता हूं, लेकिन कच्चे अण्डे पीने के नाम से ही उबकाई आती है। लोग-बाग पता नहीं क्या-क्या खा जाते हैं?
आगे बढते रहे। छोटा सा बरोट गांव कभी का पीछे छूट गया। खेतों में काम करते ग्रामीण घरों में लौटने लगे। कुत्ते हम अजनबियों पर भौंकते रहे लेकिन दूर-दूर से ही।
बांध से लगभग दो किलोमीटर चलने के बाद एक पुल मिला। हम नदी के दाहिनी तरफ चल रहे थे, रेस्ट हाउस बायीं तरफ है, बांध से हमने नदी पार की थी, दूसरा पुल ढूंढते ढूंढते यहां तक आ गये। अब पुनः नदी पार करके सडक पकडकर रेस्ट हाउस चले जायेंगे।
अरे, यह क्या? रेल की लाइन?
समझते देर नहीं लगी कि यह वही रेल लाइन है जो जोगिन्दर नगर से आई है। अभी तक तो सुना और पढा था, अब सामने प्रत्यक्ष देखकर इसकी भयावहता का अन्दाजा हो रहा है। शुरूआत ही पैंतालिस डिग्री के ढलान से होती है और कुछ ऊपर जाकर यह ढलान और बढ जाता है- कम से कम साठ डिग्री। आदमी भी सीधा चढना चाहे तो नहीं चढ सकता।
इसपर चलने वाली ट्रॉली को मोटी लोहे की रस्सियों से खींचा जाता था। अब चूंकि इस तरफ ट्रॉली नहीं चलती, इसलिये सबकुछ क्षतिग्रस्त है। यहीं पास में चाय की दुकान है। हमने चाय बनवा ली। और पता करने लगे कि इसके साथ साथ चढने की क्या सम्भावना है? बोला कि शानदार सम्भावना है। ऊपर चढ जाओगे तो क्या पता कि दूसरी तरफ नीचे उतरने के लिये आपको ट्रॉली मिल जाये। नहीं तो पैदल का रास्ता भी है। बस से दो घण्टे लगते हैं, इधर से तीन घण्टे में पहुंच जाओगे।
हमने कल इसी रेल लाइन के साथ साथ चलने का इरादा बना लिया।
ऊहल नदी पार करने के लिये पुल तो बनकर तैयार है लेकिन सडक से नहीं जुड सका। किनारों से काफी ऊंचा भी है। एक तरफ तो ईंटों और पत्थरों पर चढकर पुल पर चढना होता है, दूसरी तरफ नीचे उतरने के लिये लोहे की सीढी लगी है। सीढी से उतरकर कुछ खेतों से निकलते हुए हम सडक पर पहुंचे। यह बडाग्रां जाने वाली सडक है। इस पर बरोट की तरफ चले। कुछ ही देर में रेस्ट हाउस पहुंच गये।

बरोट









यह रही रेल लाइन। इस फोटो में उतना ढलान नहीं दिख रहा है। अगले फोटुओं में सब दिखेगा।

इसकी शुरूआत ही बडी तीखी ढलान से होती है, जो आगे जाकर और तीखी हो जाती है।

यह है वो पुल जिस पर चढने के लिये एक तरफ पत्थर हैं और दूसरी तरफ सीढी।



पांच छह सालों से यह पुल ऐसा ही है।


पुल के उस तरफ पहाड पर ऊपर चढती एक लकीर दिख रही है। वही रेल लाइन है।


बरोट का रेस्ट हाउस




बडाग्रां और बिलिंग के रास्ते बीड 49 किलोमीटर है। अभी बडाग्रां तक ही सडक बनी है। बरोट से बीड जाने के लिये अभी जोगिन्दर नगर से जाना पडता है।

फोटोग्राफर: नटवर लाल
अगले भाग में जारी...

15 comments:

  1. रेलगाड़ी की इतनी सीधी चढ़ाई तो कहीं नहीं देखी..

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  2. नीरजभाई जबरदस्त जगह है, में तो रेलगाड़ी देखके हैरान रह गया,

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  3. कभी कभी सोचता हूँ अगर ये ब्लॉग अंग्रेजी में होता तो दुनिया के नामी-गिरामी ब्लोग्स में एक होता....

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    1. शेखर साहब , अपना जाट राम वैसे ही वर्ल्ड फेमस है ! सिर्फ हौसला बढाइये !!

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  4. बहुत खूबसूरत लग रही है जगह .....
    एक अनुरोध है ,हिन्दी में ही लिखते रहिये , इस भाषा में भी अच्छा पढने वाले हैं :)

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  5. नीरज जी, वाह क्या खूबसूरत घाटी हैं. रेलवे लाइन तो वाकई चमत्कार हैं. और आगे इसे सरकार सरंक्षित भी नहीं रख सकी. यदि रेल लाइन संभव ना हो तो कम से कम रोप वे ही बनवा दे. और तो और विकास की बदहाली तो इस पुल के रूप में दिख रही हैं. सरकार पर सरकारे बदलती रहती हैं. अफसर आते जाते रहते हैं. इनकी जेबे भरती रहती हैं. पर देश के विकास की और पर्यटन की किसी को चिंता नहीं हैं. वन्देमातरम..

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  6. Doosri nadi ka naam hai 'lama dugh'

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  7. You have been tagged here: http://www.tarungoel.in/2013/05/02/bajaj-scooter-hid-4501-the-king-of-old-times/

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  8. स्वामी जी ओमानन्द सरस्वती की लिखी पुस्तक "मांस मनुष्य का भोजन नहीं " में शाकाहारी जाटों के बारे में बहुत कुछ लिखा है । पूरी पुस्तक http://www.jatland.com/home/Human_Beings_are_Vegetarians पर उपलब्ध है । पुस्तक के कुछ अंश :

    निरामिषभोजी सिंह और सिंहनी
    सन् १९३७ ई० के लगभग की घटना है कि एक साधु ने किसी शेर के बच्चे को पकड़कर उसका दूध आदि के द्वारा पालन-पोषण किया । वह बड़ा होने पर भी केवल दूध आदि का ही भोजन करता रहा । वह सिंह उस साधु के साथ सभी नगरों में खुला घूमता था । उसने कभी किसी जीव जन्तु को हानि नहीं पहुंचाई । वह साधु उस सिंह को साथ लिये हुये दिल्ली में भी आया था । पालतू कुत्ते के समान वह शेर उस साधु के पीछे घूमता था । अनेक वर्षों तक यह प्रदर्शन उस साधु ने भारत के अनेक बड़े बड़े नगरों में घूमकर दिया और सिद्ध कर दिया कि मांसाहारी हिंसक शेर भी दुग्धाहारी और अहिंसक बन सकता है ।
    इसी प्रकार महर्षि रमण ने भी एक सिंह को अहिंसक और अपना भक्त बना लिया था । वे योगी थे, शुद्ध सात्त्विक भोजन (आहार) करते थे । उनका भोजन रोटी, फल, शाक, सब्जी, दूध इत्यादि था । वे मांस, मछली, अण्डे आदि के भक्षण के सर्वथा विरोधी थे । शुद्ध सात्त्विक आहार पर बड़ा बल देते थे । उनका मत था कि स्वस्थ और समृद्ध शरीर में ही स्वस्थ मन तथा दृढ़ आत्मा का निवास होता है । वे कहा करते थे - Vegetables are the best food which contain all that is necessary for maintaining the body.
    शाकाहारी भोजन में वे सब शक्तियां विद्यमान हैं जो शरीर को पुष्ट और शक्तिशाली बनाने के लिये आवश्यक हैं । महर्षि रमण अपने देशी, विदेशी सभी शिष्यों को सात्त्विक निरामिष भोजन का आदेश देते थे तथा वैसा ही अभ्यास कराते थे । उन्होंने अपने शिष्य Mr. Evans Wentz आदि सब को निरामिषभोजी बना दिया था ।

    अहिंसक सिंह
    महर्षि रमण का आश्रम जंगल में था, जहां शेर, चीते तथा हिंसक पशु रहते थे । एक दिन महर्षि जी भ्रमणार्थ गये तो उन्हें किसी दुःखी सिंह के करहाने की आवाज सुनाई दी । वे धीरे-धीरे उस ओर चले तो क्या देखते हैं कि एक सिंह के पैर में आर-पार एक कांटा निकल गया है । शेर का पैर पक गया था और उस पर पर्याप्त सूजन आ गया था । वह कई दिन से भूखा-प्यासा, चलने में असमर्थ तथा पीड़ा से व्याकुल, विवश पड़ा हुआ था । महषि जी धीरे से उसके निकट गये । शनैः-शनैः उसके कांटे को निकाला, जख्म को साफ करके जड़ी बूटियों का रस उसमें डाला और पट्टी बांध दी । इस प्रकार पांच दिन मरहम पट्टी करने से वह सिंह स्वस्थ हो गया और महर्षि के आश्रम तक चलकर उनके पीछे आया और उनके पैर चाटकर चला आया । वह शेर इसी प्रकार सप्ताह दस दिन में आता था और महर्षि के पैर चाटकर चला जाता था । वह किसी आश्रमवासी को कुछ नहीं कहता था ।
    योगदर्शन के सूत्र अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः के अनुसार योगी के अहिंसा में प्रतिष्ठित होने पर शेर आदि हिंसक पशु भी योगी के प्रभाव से हिंसा छोड़ देते हैं । यही अवस्था महर्षि रमण के संसर्ग में इस शेर की हुई ।

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  9. कच्चे अंडो में न जाने कितने कीटाणु होते है -- उन्हें पकाकर ही खाया जाना चाहिए ---वैसे में खुद कच्चे अंडे के पीले भाग को गरम दूध के साथ पीती हूँ जब मुझे तेज जुकाम होता है --रात को पीती हूँ सुबह जुकाम गायब ! बरोट बहुत ही सुंदर जगह है और रेल्वे लाईन देखकर तो पसीना आ गया --कहीं पूरी ट्रेन गिर गई तो ? आखरी फोटू बहुत सुंदर है प्रोफइल फोटू बना दो --मस्त है । .

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