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Saturday, February 23, 2013

लेह पैलेस और शान्ति स्तूप

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21 जनवरी को पूरे दिन आराम करता रहा। अगले दिन यानी 22 जनवरी को लेह घूमने निकल पडा। 25 तारीख को वापसी की फ्लाइट है और मेरे पास इतने दिनों तक कुछ भी काम नहीं है। ये तीन दिन अब लेह और आसपास दस पन्द्रह किलोमीटर तक घूमने में बिताये जायेंगे।
सबसे पहले पहुंचा लेह पैलेस। इस नौ मंजिले महल का निर्माण तिब्बत में स्थित पोटाला राजमहल के अनुरूप किया गया है। नामग्याल सम्प्रदाय के संस्थापक सेवांग नामग्याल ने 1533 में इसका निर्माण शुरू किया और इनके भतीजे सेंगे नामग्याल ने इसे पूरा किया। इसमें मुख्यतः मिट्टी की ईंटों का प्रयोग हुआ है, जैसा कि लद्दाख में हर जगह होता है।
पैलेस बन्द था। मुख्य द्वार पर ताला लगा हुआ था। इसके सामने सेमो पहाडी पर एक गोनपा भी दिख रहा था। यहां से गोनपा तक जाने के लिये कच्ची पगडण्डी बनी थी, मैं इस पर चल पडा। ज्यादा चढाई नहीं थी। ऊपर गोनपा से लेह शहर का बडा भव्य नजारा दिख रहा था। कमी थी बस समय की कि सूर्य मेरे सामने था, अगर सूर्योदय का समय होता तो यहां से शहर का और भी शानदार नजारा देखने को मिलता तथा और भी शानदार फोटो आते।
मैं गोनपा के अन्दर नहीं गया। बाहर ही बाहर से कुछ फोटो खींचे और वापस चल पडा। गोनपा तक एक सडक भी आती है, जो यहीं पर खत्म हो जाती है। लद्दाख के बाकी सभी हिस्सों की तरह यहां भी तीन चार इंच बर्फ जमी पडी थी। मैं पिछले कई दिनों से बर्फ पर ही चल रहा था, इसलिये अब वैसा डर नहीं लगता था, जैसा पहले लगता था। इस सडक पर कुछ दूर चलने पर पता चला कि यह खारदुंगला वाली सडक से निकली हुई है।
खारदुंग ला- यानी भारतीय रिकार्ड के अनुसार दुनिया की सबसे ऊंची सडक- 5600 मीटर से भी ज्यादा। यह ऊंचाई ब्रिटिश समय में मापी गई थी। अब अत्याधुनिक जीपीएस यन्त्र आ गये हैं, जिनसे पता चला है कि खारदुंग ला की ऊंचाई 5300 मीटर के आसपास है और यह दुनिया की सबसे ऊंची सडक नहीं है। तिब्बत और चिली में इससे भी ऊंची सडकें हैं। इस गलत जानकारी के कारण भारत की किरकिरी तो होती ही है। अब समय है कि भारत को अपने इस ‘विलक्षण’ रिकार्ड को अपडेट कर लेना चाहिये।
जिस दिशा से मैं गोनपा तक चढा था, अब उससे विपरीत दिशा में नीचे उतरा। यह पगडण्डी पहाडी के उत्तर दिशा में है और इस कारण इधर बर्फ काफी है। जल्दी ही नीचे उतरकर मैं एक सडक पर पहुंचा।
ऊपर पहाडी से दूर एक और गोनपा दिख रहा था। वो शान्ति स्तूप है। मैं इसी दिशा के अनुसार चल पडा। सडक पर जगह जगह पानी जमा हुआ था जिससे भयानक फिसलन बन गई थी। रास्ते में दो तीन छोटे छोटे तालाब भी मिले जो पूरी तरह जमे थे। एक तालाब पर बच्चे आइस हॉकी खेल रहे थे।
ढलानदार सडक पर जहां भी जमी बर्फ मिलती, मेरा हलक सूख जाता। फिसलने का डर था, हालांकि अति सावधानी के कारण कहीं फिसला नहीं।
शान्ति स्तूप का निर्माण जापानियों ने कराया है। जापान में बौद्ध धर्म है और वे भारत को बुद्ध भूमि होने के कारण काफी पवित्र मानते हैं। भारत और नेपाल में उन्होंने कई स्थानों पर इस तरह के शान्ति स्तूपों का निर्माण कराया। मैंने एक शान्ति स्तूप नेपाल के पोखरा में भी देखा था।
स्तूप तक पहुंचने के लिये वैसे तो सडक भी बनी है लेकिन पैदल मार्ग से जाने पर साढे पांच सौ सीढियां चढनी होती हैं। स्तूप 4000 मीटर से भी ज्यादा ऊंचाई पर है। मैं आज पांचवीं बार 4000 मीटर से ऊपर चढा हूं। इससे पहले अमरनाथ, श्रीखण्ड महादेव, तपोवन और रूपकुण्ड की यात्रा में इस लेवल को पार कर चुका हूं।
यहां से लेह और इसके आसपास का दृश्य और भी शानदार दिखता है। सूर्य पश्चिमांचल होने जा रहा था। दूर उत्तर दिशा में सफेदी ओढे पहाड नजर आ रहे थे। अचानक ध्यान आया कि वहीं पर खारदुंग ला है। मैं गूगल मैप और गूगल अर्थ पर नक्शे देखता रहता हूं, इसलिये मुझे पता है कि वहीं पर खारदुंग ला है। और गौर से देखा तो सफेदी के बीच टेढी मेढी जाती सडक भी दिख गई। यहीं से अनुमान लगाया कि खारदुंग ला खुला है। बाद में यह अनुमान सही निकला।
जब तक शान्ति स्तूप से नीचे उतरकर लेह के मुख्य बाजार में आया, तो छह बज चुके थे और अन्धेरा होने लगा था। आज मोमो की एक दुकान मिल गई। साढे छह के बाद जब जेल पहुंचा तो सर्दी सहनशक्ति से बाहर हो चुकी थी।
एक बात मन को कचोटने लगी। मैं परसों से यहां खाली पडा हूं। कल तो जेल से बाहर भी नहीं निकला। जेल से खारदुंग ला बिल्कुल स्पष्ट दिखता है। फिर क्यों ध्यान नहीं आया कि यह खारदुंगला है? मैं कल अगर परमिट ले लेता तो आज खारदुंगला पार करके दो दिनों के लिये नुब्रा घाटी जा सकता था जहां दो कूबड वाले ऊंट मिलते हैं। कल 23 तारीख की दोपहर तक परमिट मिलेगा, 24 को केवल खारदुंगला तक ही जाया जा सकता है।
इतना भी काफी है। कल खारदुंगला जाने का परमिट लूंगा और पता करूंगा कि सुबह कितने बजे वहां के लिये बस जायेगी।

लेह पैलेस

दरवाजे पर ताला लगा है।



लेह पैलेस के सामने ऊपर एक गोनपा- केसल सेमो

केसल सेमो से दिखता लेह शहर







खारदुंगला रोड पर दौडता ट्रक

चलो, यहां से नीचे उतरते हैं। पहले मैं इस तरह बर्फ पर चलने में बेहद डरता था लेकिन लद्दाख ने मुझे बर्फ पर चलना सिखा दिया।

ऊपर दाहिने कोने में केसल सेमो दिख रहा है। मैं वहीं से आया हूं।


शान्ति स्तूप


शान्ति स्तूप से दिखता खारदुंग ला। वहां जाती सडक भी दिख रही है।

शान्ति स्तूप से दिखता लेह पैलेस और केसल सेमो।



शान्ति स्तूप से लेह शहर का सायंकालीन दृश्य।

सूखे पेड ऐसे लग रहे हैं जैसे बडे पैमाने पर निर्माण कार्य चल रहा है।

बुरी तरह जमी बर्फ।



लद्दाख यात्रा श्रंखला
1. पहली हवाई यात्रा- दिल्ली से लेह
2. लद्दाख यात्रा- लेह आगमन
3. लद्दाख यात्रा- सिन्धु दर्शन व चिलिंग को प्रस्थान
4. जांस्कर घाटी में बर्फबारी
5. चादर ट्रेक- गुफा में एक रात
6. चिलिंग से वापसी और लेह भ्रमण
7. लेह पैलेस और शान्ति स्तूप
8. खारदुंगला का परमिट और शे गोनपा
9. लेह में परेड और युद्ध संग्रहालय
10. पिटुक गोनपा (स्पिटुक गोनपा)
11. लेह से दिल्ली हवाई यात्रा

9 comments:

  1. चादर झीनी बरफ चढ़ गयी..

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  2. खूब बढ़िया फोटोस......

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  3. लेह शहर के किसी भी कोने से खारदूंगला दर्रा दिखाई नहीं देता है उसके लिये शहर से ऊपर 20 किमी खारदूंगला रोड़ पर जाना पड़ता है। मैंने बाइक यात्रा में इस मार्ग पर भयंकर 10-12 किमी की भयंकर बर्फ़ाबारी झेलते हुए टॉप तक पहुँचा था।

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  4. वाह सुंदर चि‍त्र और वि‍वरण

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  5. शानदार चित्रकथा

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  6. "सूखे पेड ऐसे लग रहे हैं जैसे बडे पैमाने पर निर्माण कार्य चल रहा है।"

    दिल्ली का व्यापक अनुभव है आपको :D

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  7. सुन्दर अति सुन्दर, आपकी लेखनी तो बढ़िया है ही, फोटोज उसमे और रंग भर देते है

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