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Tuesday, December 31, 2013

2013 की घुमक्कडी का लेखा-जोखा

साल 2013 घुमक्कडी के लिहाज से एक बेहतरीन साल रहा। इस साल मेरे कुछ बडे सपने पूरे हुए मसलन लद्दाख जाना। दो महायात्राएं हुईं और दोनों ही लद्दाख की। अभी भी बीते साल की घुमक्कडी के बारे में सोचता हूं तो स्वयं ही सिर गर्व से उठ जाता है। कभी विचार आता है कि क्या वे यात्राएं मैंने ही की हैं। क्या फिर से वैसी ही कोई यात्रा कर सकूंगा?
बाकी बातें बाद में करेंगे, पहले एक नजर इस साल हुई छोटी बडी सभी यात्राओं पर:

Monday, December 16, 2013

डायरी के पन्ने- 18

चेतावनी: ‘डायरी के पन्ने’ मेरे निजी और अन्तरंग विचार हैं। कृपया इन्हें न पढें। इन्हें पढने से आपकी धार्मिक और सामाजिक भावनाएं आहत हो सकती हैं।
1 दिसम्बर 2013, रविवार
1. पिछले पखवाडे डायरी नहीं लिख सका। इसका एकमात्र कारण है आलस। भगवान ने इस विद्या में मुझे पारंगत बनाया है। फिर भी पिछले पखवाडे की कुछ बातें हैं, जो लिखना चाहता हूं:
#1 ऋषिकेश से ऊपर फूलचट्टी में गंगा किनारे कैम्पिंग करने की योजना बनी। रेल से आने-जाने का आरक्षण भी हो गया। साथ में सहकर्मी विपिन और भरत भी चलने को तैयार हो गये। झांसी से विनय, दिल्ली से तारकेश्वर व देहरादून से भी कुछ मित्र राजी थे। असल में योजना मैंने और विपिन ने ही बनाई थी। बाद में कारवां बढता चला गया। हमारी छुट्टियां भी पास हो गई थीं।

Monday, December 9, 2013

गढमुक्तेश्वर में कार्तिक मेला

लगभग बीस साल पहले की बात है। हम चारों जने- पिताजी, माताजी, धीरज और मैं- आधी रात के आसपास गंगा मेले में पहुंचे। उससे पहले मैंने कोई नदी नहीं देखी थी। गंगा किनारे ही हमारा डेरा लगा था। रात को चांद की चांदनी में गंगा का थोडा सा प्रतिबिम्ब दिखा, या शायद नहीं दिखा लेकिन मान लिया कि मैंने गंगा दर्शन कर लिया। हम दोनों भाईयों के बाल उतरने थे। परम्परा है जीवन में एक बार गंगाजी को बाल अर्पण करने की। बहुत से लोग तो अपने बच्चों के बाल तब तक नहीं कटाते जब तक कि गंगाजी को अर्पित न कराये जायें।
हम ताऊजी के डेरे में रुके थे। हैसियत नहीं थी अपना डेरा लगाने की। खैर, बाल उतरे, दोनों गंजे हो गये, सभी गंजे गंजे कहकर हमारा मजाक उडाते रहे। रेत में घर बनाये, तोडे, गंगा में खूब डुबकी लगाई लेकिन किनारे पर ही। नरेन्द्र भाई कन्धे पर बिठाकर बहुत अन्दर ले गये। शायद नतीजा मालूम था, इसलिये चिल्लाता रहा। खूब भीतर जाकर जब उन्होंने मुझे गंगाधार में छोड दिया तो पता चल गया कि यह नतीजा कितना डरावना है।

Thursday, November 28, 2013

वाराणसी से मुरादाबाद पैसेंजर ट्रेन यात्रा

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यह ट्रेन नम्बर 54255 है जो वाराणसी से लखनऊ जाती है। वाराणसी से लखनऊ के लिये मुख्यतः तीन रूट हैं- इनमें सबसे छोटा सुल्तानपुर वाला है, उसके बाद प्रतापगढ वाला और उसके बाद फैजाबाद वाला। यह ट्रेन प्रतापगढ रूट से जायेगी। वैसे एक ट्रेन कृषक एक्सप्रेस बडा लम्बा चक्कर काटकर गोरखपुर के रास्ते भी लखनऊ जाती है।
पांच मिनट विलम्ब से पौने छह बजे गाडी चल पडी। बायें हाथ इलाहाबाद वाली लाइन अलग हो जाती है जबकि दाहिने हाथ सुल्तानपुर वाली डबल व विद्युतीकृत लाइन अलग होती है। स्टेशन से निकलते ही नई दिल्ली से आने वाली काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस खडी मिली। शायद इस पैसेंजर के निकलने का इन्तजार कर रही होगी। काशी विश्वनाथ एक घण्टे विलम्ब से चल रही थी।

Tuesday, November 19, 2013

इलाहाबाद से मुगलसराय पैसेंजर ट्रेन यात्रा

मुझे नये नये रेलमार्गों पर पैसेंजर ट्रेनों में घूमने का शौक है। मेरे लिये ऐसी यात्राएं एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने का साधन नहीं बल्कि साध्य होती हैं। अर्थात रेल यात्रा करना ही लक्ष्य होता है। इस बार मैं इलाहाबाद गया, वाराणसी गया और लखनऊ भी गया लेकिन इन स्थानों के दर्शनीय स्थलों को देखने नहीं बल्कि इनके मध्य में पडने वाली रेलवे लाइनों पर यात्रा करने। मेरी इन पैसेंजर यात्राओं का नेटवर्क बढता जा रहा है और इस कार्य में मुझे अपूर्व आनन्द भी मिलता है। पहले यात्रा करना, फिर घर लौटकर उनका लेखा-जोखा तैयार करना, स्टेशनों की लिस्ट को अपडेट करना, पैसेंजर के नक्शे को अपडेट करना; आहा! अभूतपूर्व आनन्द!
इसी तरह मेरा नेटवर्क इलाहाबाद तक तो पहुंच गया लेकिन बहुत कोशिशें कर लीं, उससे आगे नहीं बढ पाया। इसका कारण है कि इलाहाबाद और मुगलसराय के बीच मात्र एक ही पैसेंजर चलती है। इलाहाबाद से यह ट्रेन सुबह सवा सात बजे चलती है और वापसी में रात साढे आठ बजे इलाहाबाद लौटती है। यानी अच्छा खासा उजाला होने पर चलती है और मुगलसराय से अन्धेरे में लौटती है। मुझे ये यात्राएं उजाले में ही करना पसन्द हैं इसलिये एकमात्र चारा था इलाहाबाद से मुगलसराय जाना।

Saturday, November 16, 2013

डायरी के पन्ने- 17

चेतावनी: ‘डायरी के पन्ने’ मेरे निजी और अन्तरंग विचार हैं। कृपया इन्हें न पढें। इन्हें पढने से आपकी धार्मिक और सामाजिक भावनाएं आहत हो सकती हैं।
1 नवम्बर 2013, शुक्रवार
1. वही हुआ जिसका अन्देशा था। नजला हो गया और तबियत अचानक गिर गई। शाम तक नाक बढिया तरह बहने लगी और बुखार भी चढ गया। बुखार के लिये दवाई लेनी पडी। अगले दिन ठीक हो गया। नाक भी और बुखार भी। लेकिन अभी भी खांसने पर कभी कभार बलगम आ जाता है। यह ठीक हो गया तो ठीक, नहीं तो भविष्य में जल्दी ही जोरदार खांसी होने वाली है।

Thursday, November 14, 2013

दिल्ली चिडियाघर

अभी पिछले दिनों चिडियाघर जाना हुआ। दिल्ली घूमने का जिक्र एक दिन मैंने विपिन से कर दिया। वे तुरन्त राजी हो गये। मैंने अविलम्ब चिडियाघर का प्रस्ताव रखा, जिसे उन्होंने मान लिया। रविवार को जाना तय हुआ। शनिवार को धीरज भी गांव से आ गया था।
मैं पहले भी यहां आ चुका था लेकिन तब कैमरा नहीं था। इसलिये इस बार आने का मुख्य उद्देश्य फोटो खींचना ही था। दोपहर से लेकर शाम अन्धेरा होने तक का समय हमारे पास था।
चालीस रुपये प्रति व्यक्ति टिकट और साथ में मुझे कैमरे का पचास रुपये का टिकट भी लेना पडा। चिडियाघर में खाने की कोई भी वस्तु लाना मना है ताकि दर्शक जानवरों को न खिला दें। सूक्ष्म खान पान के लिये अन्दर इन्तजाम है।
मुझे जाने से पहले कुछ जानकारों ने बताया था कि प्रवेश करने के बाद बायीं तरफ मत जाना बल्कि दाहिनी तरफ जाना। कारण? कि बडे बडे जानवर शेर आदि दाहिनी तरफ ही हैं। अगर बायें जायेंगे तो बन्दरों व हिरणों से ही पाला पडेगा, जब तक शेरों तक आयेंगे तो काफी थक चुके होंगे। चूंकि मैं पहले आ चुका था, इसलिये इस बात की जानकारी मुझे भी थी लेकिन मेरा मकसद शेर वगैरा देखना नहीं था। इसलिये प्रवेश करते ही सभी सलाहों को नजरअन्दाज कर दिया। बायीं तरफ चल पडे।

Friday, November 1, 2013

डायरी के पन्ने - 16

चेतावनी: ‘डायरी के पन्ने’ मेरे निजी और अन्तरंग विचार हैं। कृपया इन्हें न पढें। इन्हें पढने से आपकी धार्मिक और सामाजिक भावनाएं आहत हो सकती हैं।
16 अक्टूबर 2013, बुधवार
1. अभिषेक साहब मिलने आये। वे पिछले सप्ताह भी आने वाले थे लेकिन नहीं आ पाये। फोटो तो ऐसा लगा रखा है कि लगता है जैसे कितने मोटे ताजे हों जबकि ऐसा है नहीं। खैर, आये तो आते ही क्षमा मांगने लगे कि पिछली बार मेरी वजह से आपको परेशानी उठानी पडी। भाभी ने चाय बना दी तो छोटे से प्याले में उन्हें चाय दी। कहने लगे कि चाय कम करो, बहुत ज्यादा है। मैंने कहा कि ज्यादा का आपको पता नहीं है अभी। आज सभी लोग यहां हैं तो आपको जरा सी चाय मिली है, नहीं तो इससे चार गुने बडे कप में पावभर से भी ज्यादा चाय मिलती और आपको पीनी पडती। चुपचाप पी लो, कोई कम-वम नहीं होगी। फिर कहने लगे कि चाय बहुत अच्छी बनी है। चाय थी भी अच्छी, अदरक डालकर बनाई थी। अदरक थोडा ज्यादा हो जाये तो चाय पीने का जो आनन्द आता है, शानदार होता है।

Wednesday, October 30, 2013

मेडता रोड से मेडता सिटी रेलबस यात्रा

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सवा दो बजे मेडता रोड पहुंचे। यहां बीकानेर से आने वाली लाइन मिल जाती है। मैं यहीं उतर गया। प्रशान्त को फोन किया तो पता चला कि वो नहीं आया है।
दस मिनट बाद ही मेडता सिटी जाने वाली रेलबस चलने वाली थी। पांच रुपये का टिकट लगता है और दूरी है पन्द्रह किलोमीटर। रेलबस इस दूरी को तय करने में बीस मिनट लगाती है। बस ठसाठस भरी थी। ड्राइवर ने आम बसों की तरह सवारियों से खूब कहा- अरे आगे हो जाओ, वहां बहुत जगह पडी है, देखो खिडकी पर लोग लटके हैं। ओये, तू सुनता क्यों नहीं? आगे बढ।
यह बस सिंगल एक्सल वाली बोगी की थी। डबल एक्सल की बोगियां होनी चाहिये थीं। सिंगल एक्सल बोगी वाली गाडियां एक तो हिलती बहुत हैं, फिर कभी कभी तेज झटका भी देती है, लगता है कि अब यह पटरी से उतर जायेगी। फिर भी इसकी स्पीड चालीस पचास के आसपास रही। रास्ते में दो मानवीय फाटक पडे, एक मेडता रोड से निकलते ही और दूसरा मेडता सिटी में। कई मानव रहित फाटक भी मिले। बस एक बार चली तो अपने गन्तव्य पर ही जाकर रुकी।

Monday, October 28, 2013

हिसार से मेडता रोड पैसेंजर ट्रेन यात्रा

22 अक्टूबर 2013
सुबह नई दिल्ली स्टेशन पहुंचा तो टिकट लेने वालों की उतनी लम्बी लाइन नहीं लगी थी, जितनी उम्मीद की थी। हिसार का सुपरफास्ट का एक टिकट ले लिया। गोरखधाम एक्सप्रेस सुपरफास्ट गाडी है। दूरी 184 किलोमीटर और टिकट 75 रुपये का है। स्क्रीन पर देखा कि यह गाडी बिल्कुल ठीक समय पर आ रही है। मुगलसराय रूट भारत भर में एक बदनाम रूट है। इस पर ट्रेनें लेट होनी ही होनी हैं। लेकिन कुछ ट्रेनें ऐसी हैं जिन्हें इस रूट पर इज्जत बख्शी जाती है। इन ट्रेनों में गोरखधाम के साथ साथ प्रयागराज, पुरुषोत्तम, कालका मेल आदि हैं। महाबोधि की यहां कोई इज्जत नहीं है। आज महाबोधि पांच घण्टे की देरी से चल रही थी। पुरुषोत्तम आ चुकी थी, गोरखधाम अपने निर्धारित समय पर आ जायेगी। भले ही गोरखधाम इस रूट पर कानपुर तक ही चलती हो, फिर भी है तो इसी रूट का हिस्सा ही।
पांच मिनट की देरी से गाडी आई। भयंकर भीड। लेकिन मुझे इसकी कोई चिन्ता नहीं क्योंकि यह सारी भीड दिल्ली वाली है। इस मजदूरों की भीड को हरियाणा में खासकर अर्धमरुस्थलीय भिवानी और हिसार से कोई मतलब नहीं। यही हुआ। आगे पांच छह डिब्बे साधारण श्रेणी वाले थे। जब गाडी चली तो मैं एक ऊपर वाली बर्थ पर लेट गया।

Thursday, October 24, 2013

हर की दून यात्रा- गंगाड से दिल्ली

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5 अक्टूबर 2013 की सुबह आठ बजे आंख खुली। खुलने को तो छह बजे भी खुली थी। जब देखा कि उजाला हो गया है, बाहर हलचल भी शुरू हो गई है तो डर भी कम हो गया और दो घण्टे के लिये गहरी नींद आ गई। यह स्थान नदी की पूर्व दिशा में है, ऊंचे ऊंचे पहाडों के नीचे इसलिये धूप देर से यहां पहुंचेगी। उठकर सबसे पहला काम किया कि बिस्कुट के दोनों पैकेट निपटा दिये, ऊपर से पानी पी लिया।
दोनों एडियों में छाले पडकर फूट चुके थे। रात सोते समय जुराबें बदलकर सोया था, इसलिये अब छालों पर खाल चिपक सी गई थी। लेकिन जब चलना शुरू करूंगा तो कुछ दूर जाते ही यह फिर से अलग हो जायेगी।
बाहर निकला। सामने गंगाड गांव पूरी तरह धूप में नहाया हुआ था। बराबर में पुल है, एक बंगाली आया हर की दून की तरफ से और यहीं बैठ गया। ये कई लोग हैं जिनमें दो महिलाएं व एक बुजुर्ग भी शामिल हैं। बाकी लोग धीरे धीरे आ रहे हैं और पीछे हैं।

Saturday, October 19, 2013

हर की दून यात्रा- दिल्ली से गंगाड

3 अक्टूबर का झारखण्ड यात्रा का आरक्षण था। एक दिन पहले यानी दो अक्टूबर को मन बदल गया। सोचा कि अभी अगस्त में रेल यात्रा तो की ही थी, इस बार हिमालय यात्रा हो जाये। जून में जब लद्दाख गया था, तब से हिमालय नहीं देखा। अक्टूबर की शुरूआत और मौसम खराब होना इस बात का सूचक था कि उच्च हिमालय में छह महीनों के लिये जाना रद्द। मणिमहेश में बर्फबारी की खबरें मिल चुकी थीं।
पूरा एक सप्ताह हाथ में था। इस साल ट्रेकिंग नहीं की थी सिवाय हिमानी चामुण्डाबशल चोटी के छोटे ट्रेकों के। ट्रेकिंग का मन था लेकिन खराब मौसम मना भी कर रहा था। अगर ट्रेकिंग करूं तो कहां जाना चाहिये? अविलम्ब मन में आया- हर की दून। यह अपेक्षाकृत आसान ट्रेक है और रुकने खाने का कोई झंझट नहीं। ठीक पिण्डारी ट्रेक की तरह। फिर भी बर्फबारी की आशंका तो थी ही। दूसरा विचार आया किन्नौर यात्रा का। इसमें नाको से लेकर छितकुल तक घूमना तय हुआ। वैसे भी यह साल हिमालय पार की यात्राओं पर केन्द्रित था। किन्नौर भी हिमालय पार की धरती है।

Wednesday, October 16, 2013

डायरी के पन्ने- 15

[डायरी के पन्ने हर महीने की पहली व सोलह तारीख को छपते हैं।]

1 अक्टूबर 2013, मंगलवार
1. आज की शुरूआत ही बडी खराब रही। एक चूहा मारना पड गया। रात जब अच्छी नींद सो रहा था तो उसने पैर में काट खाया। हालांकि दांत नहीं गडे, नहीं तो चार इंजेक्शन लगवाने पड जाते रेबीज के। काटे जाने के बाद मैंने लाइट जलाई तो चूहे को अलमारी में घुसते देखा। अलमारी का दरवाजा जरा सा खुला था। मैंने बिना देर किये दरवाजा पूरा भेड दिया। चूहा अन्दर कैद हो गया। फिर भी पूरी रात कटर कटर की आवाज आती रही। सुबह उठकर देखा तो लकडी की अलमारी में एक छेद मिला। चूहा गायब था। नीचे बुरादा पडा था। वाकई मेहनत काबिल-ए-तारीफ है।
हमारे यहां चूहे आते जाते रहते हैं, गिलहरियां भी। हमारे यहां से निकल जायेंगे तो नीचे वाले के यहां चले जायेंगे, इनका इसी तरह क्रम लगा रहता है। मैं निश्चिन्त था कि कल वो किसी और के यहां होगा।

Monday, October 14, 2013

एक लाख किलोमीटर की रेल यात्रा

जब गोवा से लौट रहा था तो 15 अगस्त 2013 की सुबह ठीक साढे चार बजे पुणे से बीस किलोमीटर आगे निकलते ही मेरी रेल यात्राओं के एक लाख किलोमीटर पूरे हो गये। उस समय मैं गहरी नींद सो रहा था। अहमदनगर के पास जब आंख खुली तो इस बात की अनुभूति होना स्वाभाविक ही था क्योंकि इस बात की जानकारी मुझे थी जब रात सोया था। बधाई देने वालों में पहला व्यक्ति कमल था।
8 अप्रैल 2005 को पहली बार ट्रेन में बैठा था। एक लाख किलोमीटर यात्रा करने में 8 साल 4 महीने और 7 दिन लगे। वैसे अभी तक 604 बार 327 ट्रेनों में यात्रा की। 322 बार 29544 किलोमीटर पैसेंजर में, 208 बार 36596 किलोमीटर मेल एक्सप्रेस ट्रेनों में और 74 बार 35495 बार सुपरफास्ट ट्रेनों में सफर कर चुका हूं। जहां तक दर्जे की बात है तो 526 बार 50034 किलोमीटर साधारण दर्जे में, 72 बार 49218 किलोमीटर शयनयान में, 3 बार 1327 किलोमीटर सेकण्ड सीटिंग में, 2 बार 752 किलोमीटर थर्ड एसी में और 1 बार 303 किलोमीटर एसी चेयरकार में यात्रा की।

Saturday, October 12, 2013

गोकर्ण, कर्नाटक

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मंगलौर से मडगांव पैसेंजर पकडी तो रास्ते में गोकर्ण रोड स्टेशन पर उतर गये। पहले योजना थी कि गोवा जायेंगे और चौबीस घण्टे तक वहीं रहेंगे। लेकिन मुझे गोवा रास नहीं आया, तो गोकर्ण उतर गया। वैसे एक दूसरा विकल्प मुरुडेश्वर भी था, लेकिन गोकर्ण के ओम बीच के बारे में बहुत सुना था, उसे देखने की इच्छा बलवती हो गई।
गूगल मैप ने कभी भी हमारा साथ नहीं छोडा, इसलिये बिना किसी से पूछे ही पता चल गया कि स्टेशन से गोकर्ण की दूरी ग्यारह किलोमीटर है। स्टेशन से करीब एक किलोमीटर दूर मुख्य सडक है, जहां से गोकर्ण की बस भी मिल सकती है। स्टेशन के बाहर सिर्फ ऑटो खडे थे। एक से किराया पूछा तो उसने डेढ सौ रुपये बताया। कमल ने तुरन्त कहा कि हम सौ देंगे। मैंने मना कर दिया कि ग्यारह किलोमीटर के हम सौ भी नहीं देंगे, पचास देंगे। सभी ऑटो वालों ने मना कर दिया। हम मुख्य सडक की ओर बढ चले।

Wednesday, October 9, 2013

शिमोगा से मंगलुरू ट्रेन यात्रा

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12 अगस्त को शिमोगा से सुबह चलने वाली मैसूर पैसेंजर में बैठे। आज की योजना थी इस ट्रेन से हासन तक जाना और आगे यशवन्तपुर-कारवार एक्सप्रेस से मंगलुरू तक यात्रा करना। आज की यात्रा का मुख्य आकर्षण सकलेशपुर और सुब्रह्मण्य रोड स्टेशनों के बीच घाट सेक्शन को देखना था।
कल बिरूर से शिमोगा टाउन तक पैसेंजर से यात्रा कर चुके थे, इसलिये आज इस खण्ड पर कुछ खास नहीं था करने को। साढे नौ बजे गाडी बिरूर पहुंची तो मेरा काम शुरू हो गया। गाडी में भीड बिल्कुल नहीं थी, हम आराम से बैठे थे। कमल ने अपना शयनासन ग्रहण कर लिया था और एक सीट को अपनी शायिका बना लिया था। एक चादर बिछाकर, एक ओढकर और बैग को सिर के नीचे रखकर वह शानदार नींद ले रहा था। सोने से पहले मुझसे कह दिया था कि जहां भी उतरना हो, जगा देना। देखा जाये तो कमल भले ही साथ हो, लेकिन यात्रा मैं अकेला ही कर रहा था। कमल को मैंने दिल्ली में ही मना किया था कि मत चल, लेकिन ना, नीरज जी के साथ एक बार यात्रा करने की इच्छा है। भुगत।

Thursday, October 3, 2013

लोंडा से तालगुप्पा रेलयात्रा और जोग प्रपात

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हमें लोंडा से बिरूर तक रानी चेन्नम्मा एक्सप्रेस से जाना था और बिरूर से तालगुप्पा तक बैंगलोर-तालगुप्पा एक्सप्रेस से। रानी चेन्नम्मा एक्सप्रेस रात 02:48 पर बिरूर पहुंचती है जबकि वहां से तालगुप्पा एक्सप्रेस 03:25 पर मिलती है अर्थात 37 मिनट बाद। दोनों गाडियों में हमारा आरक्षण था।
रानी चेन्नम्मा एक्सप्रेस एक घण्टे विलम्ब से लोंडा आई। यह आती तो कोल्हापुर से ही है, जो यहां से ज्यादा दूर नहीं लेकिन पता नहीं क्यों लेट हो गई। शायद सम्पर्क क्रान्ति की वजह से हुई होगी। सम्पर्क क्रान्ति लोंडा नहीं रुकती और हमारे सामने ही बैंगलोर की तरफ निकली थी।
शुरू में हमारा आरक्षण आरएसी में था। चार्ट बनने के बाद मेरी और प्रशान्त की सीटें तो कन्फर्म हो गईं लेकिन कमल आरएसी में ही रहा। कमल हमारी तरह रेलयात्री नहीं है इसलिये यह हमारे लिये जश्न मनाने की बात थी। कोई दया नहीं करेंगे। फिर रात तीन बजे उठना भी है, इसलिये कन्फर्म बर्थ वाले सो गये। कमल की आरएसी बर्थ एक अन्य यात्री के साथ इसी डिब्बे में थी।

Tuesday, October 1, 2013

डायरी के पन्ने- 14

[डायरी के पन्ने हर महीने की पहली व सोलह तारीख को छपते हैं।]

16 सितम्बर 2013, सोमवार
1. एक मित्र ने कहा कि आप दिल्ली में रहते हैं, पढे लिखे हैं फिर भी जातिवाद और अलग-अलग धर्मों की बात करते हैं। अगर कोई छोटी जाति का होगा तो क्या आप उससे बात नहीं करेंगे? या आपके धर्म का नहीं होगा तो क्या आप उसका अपमान करेंगे?
हालांकि मैंने उन्हें इस बात का स्पष्टीकरण दे दिया है, यहां उसका उल्लेख करना आवश्यक नहीं लेकिन इस बात ने मुझे कुछ सोचने को मजबूर कर दिया। वो यह कि मैं नीरज जाट के नाम से लिखता हूं। क्या ‘जाट’ शब्द लगाना अनिवार्य है? इस शब्द से जातिवादिता झलकती है। इसे हटाने का मन बना लिया। सोच लिया कि अब नीरज कुमार के नाम से लिखा करूंगा।
लेकिन नहीं हटा सका। असल में अब इस शब्द से मुझे लगाव हो गया है, बहुत ज्यादा लगाव। अब यह मेरे लिये जातिसूचक नहीं रहा। पांच साल पहले जब मुझे इस दुनिया का कुछ भी नहीं पता था, तब ब्लॉग बन गया, संयोग से। यह भी नहीं पता था कि आगे चलकर इस ब्लॉग के सहारे मैं कहां पहुंचूंगा। बस ऐसे ही बन गया, संयोग था। उस समय नाम के आगे ‘जाट’ लगाने की धुन थी। मेल आईडी बनाता था, उसमें ‘जाट’ लिख देता था। इसी तरह ब्लॉग पर भी ‘जाट’ लिखा गया। तब यह मेरे लिये जातिसूचक शब्द हुआ करता था।

Wednesday, September 25, 2013

दूधसागर जलप्रपात

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8 अगस्त 2013 की सुबह हम गोवा में थे। स्टेशन के पास ही एक कमरा ले रखा था। आज का पूरा दिन गोवा के नाम था। लेकिन मैंने सोच रखा था कि गोवा नहीं घूमूंगा। गोवा से मेरा पहला परिचय बडा ही भयानक हुआ जब मोटरसाइकिल टैक्सी वालों ने हमसे कल कहा था कि जेब में पैसे नहीं हैं तो गोवा घूमने क्यों आये? पैसे निकालो और मनपसन्द कमरा लो। तभी मन बना लिया था कि गोवा नहीं घूमना है। जहां पैसे का खेल होता हो, वहां मेरा दम घुटता है।
प्रशान्त और कमल ने एक टूर बुक कर लिया। वे आज पूरे दिन टूर वालों की बस में घूमेंगे, मैं यहीं होटल में पडा रहूंगा। वैसे भी बाहर धूप बहुत तेज है। धूप में निकलते ही जलन हो रही है।
जब वे चले गये तो ध्यान आया कि अगर इसी तरह चलता रहा हो मैं मडगांव-वास्को रेल लाइन पर नही घूम सकूंगा। आज मौका है। जेब में नेट है, नेट पर समय सारणी है। मडगांव से वास्को के लिये सवा एक बजे पैसेंजर जाती है। उससे वास्को जाकर वापस लौट आऊंगा। आज के लिये इतना काफी। अभी ग्यारह बजे हैं।

Monday, September 23, 2013

कोंकण रेलवे

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8 अगस्त की सुबह सुबह कल्याण उतरे हम तीनों। यहां से हमें दिवा जाना था जहां से मडगांव की पैसेंजर मिलेगी। हल्की हल्की बूंदाबांदी हो रही थी। प्रशान्त और कमल को यह कहकर चल दिया कि तुम पता करो धीमी लोकल किस प्लेटफार्म पर मिलेगी, मैं टिकट लेकर आता हूं।
टिकट काउण्टर पर बैठी महिला से मैंने सिन्धुदुर्ग के तीन टिकट मांगे। उसने खटर पटर की, फिर कहने लगी कि सिन्धुदुर्ग का टिकट तो नहीं मिलेगा। उससे अगला स्टेशन कौन सा है? मैंने कहा सावन्तवाडी। तुरन्त मिल गये पैसेंजर के तीन टिकट। दूरी 600 किलोमीटर से भी ज्यादा।
सुबह सवेरे जबकि दिन निकलना तो दूर, ढंग से उजाला भी नहीं हुआ था, लोकल में भीड बिल्कुल नहीं थी। आराम से सीटें मिल गई। पन्द्रह मिनट का भी सफर नहीं है कल्याण से दिवा का। सबसे आखिर वाले प्लेटफार्म पर नीले डिब्बों और डीजल इंजन लगी हमारी गाडी तैयार खडी थी।
गाडी में उम्मीद से ज्यादा भीड थी। फिर भी तीनों को सीटें मिल गईं, वो भी मेरे पसन्दीदा डिब्बे में- सबसे पीछे वाले में। मैं पैसेंजर ट्रेन यात्राओं में सबसे पीछे वाले डिब्बे में ही बैठना पसन्द करता हूं। इसके कई फायदे हैं। एक तो इसमें बाकी डिब्बों के मुकाबले भीड कम होती है। कभी कभी जब ट्रेन रुकती है तो सबसे पीछे वाला डिब्बा प्लेटफार्म से बाहर ही रुक जाता है। ऐसे में भला कौन चढेगा इसमें? दूसरा फायदा है इसका कि किसी मोड पर इंजन समेत पूरी ट्रेन दिखाई देती है। इससे ट्रेन व आसपास की दृश्यावली का अच्छा फोटो आता है।

Wednesday, September 18, 2013

जामनेर-पाचोरा नैरो गेज ट्रेन यात्रा

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अजन्ता से निकलने में थोडी देर हो गई। साढे तीन बजे तक पहुर पहुंचना आवश्यक था ताकि जामनेर वाली नैरो गेज की ट्रेन पकड सकें। फिर वहां से पुनः पहुर होते हुए ही पाचोरा तक इस ट्रेन से यात्रा करनी थी।
महाराष्ट्र परिवहन की बस से लेणी मोड से पहुर पहुंचने में देर ही कितनी लगती है? मैंने सुबह देख लिया था कि पहुर में तिराहे से कुछ ही दूर रेलवे फाटक है जहां से स्टेशन भी दिख रहा था। पैदल चल पडे। प्रशान्त के लिये पैदल चलना थोडा मुश्किल था, इसलिये वह सबसे पीछे पीछे आया। जब मैं फाटक पर पहुंचा तो ट्रेन के आने का समय हो गया था और फाटक भी लगने लगा था। मैंने दौड लगाई और जामनेर के तीन टिकट ले लिये।
ठीक चार बजे गाडी जामनेर पहुंच गई। अब इसे यहां से पांच बजे वापस चल देना है पाचोरा के लिये। हमें भूख लगी थी। अजन्ता से निकलते समय सोचा था कि पहुर में कुछ खायेंगे लेकिन गाडी के चक्कर में नहीं खा सके। इधर जामनेर स्टेशन भी इतने सन्नाटे में है कि दूर दूर तक कुछ नहीं दिखा। स्टेशन पर भेलपूरी मिली। भला जरा सी भेलपूरी से क्या होता?

Monday, September 16, 2013

डायरी के पन्ने- 13

[डायरी के पन्ने हर महीने की पहली व सोलह तारीख को छपते हैं।]

2 सितम्बर 2013, सोमवार
1. पंजाब यात्रा रद्द कर दी। असल में हमारे यहां से कई सहकर्मी छुट्टी जा रहे हैं। ऐसे में मैं कभी भी छुट्टियां नहीं लिया करता। अजीत साहब से मना करना पडा। उनसे न मिल पाने का मलाल है।
2. प्रशान्त दिल्ली आया। वह जोधपुर का रहने वाला है और पिछले दिनों हम गोवा गये थे। वह ट्रेनों का बडा शौकीन है और सात लाख किलोमीटर ट्रेन यात्रा कर चुका है। उसका लक्ष्य जल्द से जल्द बारह लाख किलोमीटर करने का है। इधर मैं तो एक लाख में ही खुश हो रहा हूं। आज उसे अपनी किसी रिश्तेदारी में सुभाष नगर रुकना था लेकिन मेरे आग्रह पर हमारे ही यहां रुक गया।

Friday, September 13, 2013

अजन्ता गुफाएं

6 अगस्त 2013 दिन मंगलवार था जब मैं नई दिल्ली स्टेशन से झेलम एक्सप्रेस में बैठा। गाडी पौने दो घण्टे लेट थी। रास्ते में फरीदाबाद से कमल भी आने वाला था।
यह दस दिनों का कार्यक्रम असल में एक ट्रेन यात्रा ही था। इसमें मुख्य रूप से पश्चिमी घाट की पहाडियों के दोनों ओर फैली रेलवे लाइनों पर यात्रा करनी थी। आरम्भ में इस यात्रा में मैं और प्रशान्त ही थे। कमल बाद में आया। कमल और मेरी मुलाकात पहली बार जब हुई, तभी अन्दाजा हो गया कि कमल के लिये यह यात्रा अच्छी नहीं हो सकती। कमल ने बताया था कि वह ज्यादातर कम्पनी के काम से ही घूमा है और उसमें भी ज्यादातर राजधानी एक्सप्रेस से। ऐसे में कैसे वह कई कई दिनों तक पैसेंजर ट्रेनों में बैठा रह सकता था? इसलिये उसकी मुश्किलों को कुछ कम करते हुए अपनी यात्रा में से मिराज से बिरूर तक की पैसेंजर यात्रा रद्द कर दी। उसके स्थान पर एक दिन गोवा को दे देंगे या फिर मालवन जायेंगे।

Wednesday, September 11, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा के तकनीकी पहलू

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अभी पिछले दिनों लद्दाख साइकिल यात्रा का पूरा वृत्तान्त प्रकाशित हुआ। इसमें 19 दिन साइकिल चलाई और कुल 952 किलोमीटर की दूरी तय की। सच कहूं तो जिस समय मैं साइकिल खरीद रहा था, उस समय दिमाग में बस यही था कि इससे लद्दाख जाना है। मैं शारीरिक रूप से कमजोर और सुस्त इंसान हूं लेकिन मानसिक रूप से पूर्ण स्वस्थ।
साइकिल खरीदते ही सबसे पहले गया नीलकण्ठ महादेव। ऋषिकेश से नीलकण्ठ तक सडक मार्ग से चढाई ज्यादा नहीं है, फिर भी जान निकाल दी इसने। इससे पहली बार एहसास हुआ कि बेटा, लद्दाख उतना आसान नहीं होने वाला। यहां एक हजार मीटर पर साइकिल नहीं चढाई जा रही, वहां पांच हजार मीटर भी पार करना पडेगा। वापस आकर निराशा में डूब गया कि पन्द्रह हजार की साइकिल बेकार चली जायेगी।
एक योजना बनानी आवश्यक थी। दूसरों के यात्रा वृत्तान्त पढे, दूरी और समय के हिसाब से गणनाएं की। लेकिन वो गणना किस काम की, जहां अनुभव न हो। साइकिल यात्रा का पहला अनुभव मिट्टी में मिल गया। यह किसी काम नहीं आया। भला 600-700 मीटर की ऊंचाई पर साइकिल चलाना 4000-5000 मीटर पर चलाने की बराबरी कर सकता है? कभी नहीं।

Saturday, September 7, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- इक्कीसवां दिन- श्रीनगर से दिल्ली

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24 जून 2013
कल जब मैं साइकिल से तेजी से लालचौक की तरफ बढ रहा था, तो इधर उधर होटलों पर भी निगाह मारता चल रहा था। शेख लॉज दिखा। मैं यहां रुककर मोलभाव करना चाहता था लेकिन तभी होटल के सामने खडे एक कर्मचारी ने मुझे देख लिया। उसने मुझसे रुकने को कहा, शायद इसीलिये मैं रुका नहीं। चलता रहा। आधा किलोमीटर आगे ही गया था कि वही कर्मचारी मोटरसाइकिल पर आया और होटल चलने को कहने लगा। जाना पडा।
मैंने पहले ही उससे कह दिया था कि मुझे सबसे सस्ता कमरा चाहिये। फिर भी उसने आठ सौ वाला कमरा दिखाया। मैंने दाम पूछते ही मना कर दिया। फिर दिखाया सात सौ वाला। इसमें अटैच बाथरूम नहीं था। मैं पांच सौ तक के लिये तैयार था लेकिन वह कमरा छह सौ का मिल गया।
जब खाना खाने नीचे रेस्टॉरेण्ट में बैठा था, तो खाने में विलम्ब होता देख मैंने कहा कि ऊपर कमरे में पहुंचा देना। उसी कर्मचारी ने मुझे ऐसे देखा जैसे अजनबी को देख रहा हो। पूछने लगा कि कौन से कमरे में। मैंने बता दिया तो उसकी आंखें आश्चर्यचकित लग रही थीं। बोला कि आप वही हो ना, जो साइकिल से लद्दाख से आये हैं। आप तो नहाने के बाद बिल्कुल ही बदल गये। पहचान में ही नहीं आ रहे।

Sunday, September 1, 2013

डायरी के पन्ने- 12

[डायरी के पन्ने हर महीने की पहली व सोलह तारीख को छपते हैं।]
18 अगस्त 2013, रविवार
1. पिछले दो तीन दिनों से अमित का परिवार आया हुआ है। साथ में दो सालियां भी हैं। जमकर मन लग रहा था कि आज उनके जाने का फरमान आ गया। हर एक से पूछा कि अगली बार कब आओगी, किसी ने ढंग का उत्तर नहीं दिया। साढे दस वाली ट्रेन से वे चले गये।
2. अमन साहब का फोन आया कि वे दिल्ली आ चुके हैं और कल हमारे यहां आयेंगे। अमन बोकारो के रहने वाले हैं और हमारी फोन पर हर दूसरे तीसरे दिन हालचाल पूछने के बहाने बातचीत होती रहती है। आज मेरी नाइट ड्यूटी है, तो कल पूरे दिन खाली रहूंगा। कह दिया कि पूरे दिन किसी भी समय आ धमको।

Friday, August 30, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- बीसवां दिन- मटायन से श्रीनगर

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23 जून 2013
पौने आठ बजे मैं चलने को तैयार हो गया। खाने का अगला ठिकाना सोनमर्ग में बताया गया। यानी कम से कम 40 किलोमीटर दूर। इसलिये यहां भरपेट खाकर चला। आमलेट और चाय के अलावा कुछ नहीं था, इसलिये चार अण्डों का आमलेट बनवा लिया।
आज इस यात्रा का आखिरी दर्रा पार करना है- जोजीला। मेरे पास लेह-श्रीनगर मार्ग का नक्शा और डाटा उपलब्ध नहीं था, इसलिये नहीं पता था कि जोजीला कितनी ऊंचाई पर है और कितना दूर है। किलोमीटर के पत्थरों पर गुमरी नामक स्थान की दूरियां लिखी आ रही थीं। यानी गुमरी जाकर पता चलेगा कि जोजीला कितना दूर है। मटायन से गुमरी 16 किलोमीटर है।
चढाई है जरूर लेकिन मामूली ही है। हर आठ-नौ मिनट में एक किलोमीटर चल रहा था यानी सात-आठ किलोमीटर प्रति घण्टे की स्पीड थी। इस स्पीड का अर्थ यही है कि चढाई है जरूर लेकिन तीव्र नहीं है।
सडक अच्छी ही बनी है और आसपास के चरागाहों में पशुपालक भी अपनी उपस्थिति बनाये रखते हैं। हरियाली तो है ही। थकान बिल्कुल नहीं हुई।

Wednesday, August 28, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- उन्नीसवां दिन- शम्शा से मटायन

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22 जून 2013
सुबह उठा तो बच्चों ने घेर लिया। पानी का मग्गा लाकर पकडा दिया। न चाहते हुए भी जाना पडा। शौचालय लद्दाखी तरीके वाला था। दो छोटे छोटे कमरे होते हैं ऊपर नीचे। ऊपर वाले के लकडी के फर्श में एक बडा सा छेद होता है ताकि गन्दगी नीचे गिरती रहे। साथ ही ऊपर वाले में मिट्टी का ढेर भी होता है जिसमें से थोडी थोडी मिट्टी नीचे गिरा देते हैं। इससे गन्दगी ढक जाती है, बदबू नहीं आती और वह बंजर मिट्टी खाद बन जाती है जिसे खेतों में डाल देते हैं।
मोटी मोटी बडी बडी रोटियां मिलीं चाय के साथ। घर की मालकिन ने आग्रह किया कि मैं लद्दाखी चाय पीऊं- नमकीन चाय जिसे बडी लम्बी प्रक्रिया से गुजरना पडता है। सही बात तो यह है कि मैंने आज तक यह लद्दाखी नमकीन चाय नहीं पी है। फिर भी मैंने मना कर दिया। मना करने के बाद दिमाग में आया कि पी लेनी चाहिये थी।

Monday, August 26, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- अट्ठारहवां दिन- मुलबेक से शम्शा

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21 जून 2013
हमेशा की तरह आराम से सोकर उठा। आज आराम कुछ भारी पड सकता है क्योंकि बताया गया कि आगे कारगिल के बाद सिर्फ द्रास में ही रुकने का इन्तजाम है। यहां से कारगिल 40 किलोमीटर और द्रास 100 किलोमीटर है। पूरी यात्रा में मैं कभी भी इतनी दूर तक साइकिल नहीं चला सका, चढाई तो दूर ढलान पर भी नहीं। आज कहीं भी ढलान नहीं है, अपवादस्वरूप कारगिल तक यदा-कदा ढलान मिल सकता है, उसके बाद जोजीला तक तो कतई नहीं। तो सीधी सी बात है कि कारगिल चार घण्टों में पहुंच जाऊंगा लेकिन किसी भी हालत में द्रास नहीं पहुंच सकूंगा। अन्धेरे में मैं साइकिल नहीं चलाया करता।
आज की एक और भी समस्या है। मुझे यात्रा शुरू करने से पहले ही बताया गया था कि कारगिल और द्रास के बीच में करीब पन्द्रह किलोमीटर का रास्ता ऐसा है जो पाकिस्तानी सेना की फायरिंग रेंज में आता है। सन्दीप भाई के यात्रा विवरण को पढा, वे मोटरसाइकिल पर थे लेकिन उन्होंने लिखा था कि इस रास्ते पर उन्हें कोई होश नहीं था सिवाय जल्दी से जल्दी इसे पार कर लेने के। फिर यह रास्ता चढाई भरा है। पन्द्रह किलोमीटर यानी मुझे चार घण्टे लगेंगे। मैं इसी को सोच-सोचकर डरा जा रहा था। यहां तक कि सोच भी लिया था कि इस रास्ते को किसी ट्रक में बैठकर पार करूंगा।

Friday, August 23, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- सत्रहवां दिन- फोतूला से मुलबेक

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20 जून 2013
यहां कोई पेड वेड तो थे नहीं कि टैण्ट पर छांव पड रही हो। जब सूरज निकला तो निकलते ही आग बरसाने लगा। टैण्ट के अन्दर यह आग और भी भयंकर लग रही थी। बाहर निकला तो शीतल हवाओं ने स्वागत किया। फटाफट टैण्ट उखाडा। साढे आठ बज चुके थे। देखा काफी सारे मजदूर मुझे देख रहे हैं। वो लद्दाखी चौकीदार पता नहीं सुबह भी आया या नहीं, लेकिन अब भी नहीं था। मैंने मजदूरों से उसके बारे मे पूछा तो बताया कि उसकी यहां चौकीदारी की रात की ही ड्यूटी होती है, दिन में वो अपने घर चला जाता है। असलियत शायद किसी को नहीं मालूम थी, लेकिन मैं जानता था कि वो पूरी रात अपने घर रहा था।
सवा नौ बजे यहां से चल पडा। फोतूला अभी भी आठ किलोमीटर है। चढाई तो है ही और जल्दी ही लूप भी शुरू हो गये। लेकिन चढाई मुश्किल मालूम नहीं हुई। फोतूला से करीब चार किलोमीटर पहले खराब सडक शुरू हो जाती है। इसका पुनर्निर्माण चल रहा है, फिर तेज हवाओं के कारण धूल भी काफी उडती है। चढाई भरे रास्ते पर जहां आपको अत्यधिक साफ हवा की आवश्यकता पडती है, यह धूल बहुत खतरनाक है।

Wednesday, August 21, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- सोलहवां दिन- ससपोल से फोतूला

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19 जून 2013
चूंकि नौ बजे ससपोल से चल पडा तो इसका अर्थ है कि साढे सात बजे उठ भी गया होऊंगा। कल लेह में नहाया था, आज तो सवाल ही नहीं। गेस्ट हाउस चूंकि घर ही होते हैं। और यह भी काफी बडा था। खूब ताक-झांक कर ली, कोई नहीं दिखा। आन्तरिक हिस्से में मैं झांका नहीं करता। कुछ देर बाद जब लडकी दिखाई पडी तो पता चला कि उसकी मम्मी लामायुरू गई हैं, वहां कोई पूजा है। घर में लडकी अकेली ही थी। उसने नाश्ते के बारे में पूछा, मैंने तुरन्त हां कर दी। पूछने लगी कि यहीं आपके कमरे में लाऊं या आप अन्दर चलोगे रसोई में। मेरी इच्छा तो थी कि लद्दाखी घर में अन्दर जाऊं लेकिन पापी मन अकेली लडकी की वजह से मना भी कर रहा था। कह दिया कि यहीं ले आओ। वह जैसा तुम चाहो कहकर चली गई। अचानक पुनः प्रकट हुई। बोली नहीं भैया, आप अन्दर ही चलो, कोई परेशानी नहीं है। मुझे काफी सारा सामान उठाकर लाना पडेगा। मैं झट पीछे पीछे हो लिया।

Monday, August 19, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- पन्द्रहवां दिन- लेह से ससपोल

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18 जून 2013
नौ बजे सोकर उठा। उठने के मामले में कभी जल्दबाजी नहीं की। रात शानदार नींद आई।
लेह शहर में मैं जनवरी में अच्छी तरह घूम चुका था, अब घूमने की आवश्यकता नहीं थी। खारदूंगला भी जाना चाहिये था लेकिन सबसे पहली बात कि मन नहीं था, दूसरी बात मौसम खराब होने और भारी बर्फबारी की वजह से खारदूंगला का परमिट भी नहीं दिया जा रहा था। फिर लगातार समाचार आ रहे थे कि हिमाचल और उत्तराखण्ड में बारिश ने भारी तबाही मचा दी है। लद्दाख में तो खैर उतना भय नहीं है लेकिन जोजीला के बाद जम्मू तक अवश्य बारिश व्यवधान पैदा कर सकती है। अगर कोई व्यवधान हो गया तो रास्ते में पता नहीं कितने दिन रुकना पड जाये। अब जरूरी था जल्द से जल्द इस यात्रा को समाप्त करके दिल्ली पहुंचना।
लेह से श्रीनगर तक तीन दर्रे पडते हैं- फोतू-ला, नामिक-ला और जोजी-ला। इनमें फोतू-ला सबसे ऊंचा है- 4100 मीटर। सारे उतार-चढावों को ध्यान में रखते हुए सात दिन में श्रीनगर पहुंचने का कार्यक्रम इस प्रकार बनाया- लेह से ससपोल, ससपोल से लामायुरू, लामायुरू से मुलबेक, मुलबेक से कारगिल या खारबू, कारगिल या खारबू से द्रास, द्रास से सोनामार्ग और सोनामार्ग से श्रीनगर।

Friday, August 16, 2013

डायरी के पन्ने- 11

[डायरी के पन्ने हर महीने की पहली व सोलह तारीख को छपते हैं।]

1 अगस्त 2013, गुरूवार
1. डायरी के पन्ने छपे तो आशीष लाल साहब ने बडी भावपूर्ण बात कह दी- जब कोई बीमार हो जाता है तो उसे देखने जाना ही बहुत महत्वपूर्ण होता है। जो करेगा वो तो डॉक्टर करेगा। आज उत्तराखण्ड घायल है नीरज, तुझे भी उसे देखने जाना चाहिये। बात अन्दर तक प्रविष्ट हो गई। सोच लिया कि गोवा के नाम की इन छुट्टियों में उत्तराखण्ड जाऊंगा। आशीष साहब के फेसबुक पेज पर गया तो वहां जाकर एक और दुविधा में पड गया। उनके यहां दूधसागर का जबरदस्त फोटो लगा था। यह फोटो देखकर दूधसागर देखने की चाह होने लगी।
पिछले साल भी सितम्बर में गोवा व दूधसागर का कार्यक्रम बनाया था जो ऐन वक्त पर रद्द हो गया और मैं रूपकुण्ड चला गया। इस बार भी शायद ऐसा ही होगा।

Wednesday, August 14, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- चौदहवां दिन- उप्शी से लेह

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17 जून 2013
सात बजे आंख खुली। देखा उसी कमरे में कुछ लोग और भी सोये हुए हैं। पता चला ये लेह से मनाली जा रहे थे। रात ग्यारह बजे जब उप्शी से गुजरे तो पुलिस ने रोक दिया। कहा आगे रास्ता बन्द है। मजबूरन इन्हें रातभर के लिये यहां शरण लेनी पडी। बाहर झांककर देखा तो सडक पर एक बैरियर लगा था व गाडियों की कतारें भी। लेह से दिल्ली जाने वाली बस भी यहीं खडी थी।
तंगलंग-ला पर दो दिनों से बर्फबारी हो ही रही है। मैंने भी इसे बर्फीला ही पार किया था। आज मौसम और बिगड गया होगा, तो रास्ता बन्द कर दिया। अब कहा जा रहा है कि जब तंगलंग-ला के दूसरी तरफ से कोई गाडी आ जायेगी, तभी यहां से आगे भेजा जायेगा। लेकिन मुझे एक सन्देह और भी है। यहां से रूमसे तक रास्ता बडे खतरनाक पहाडों के नीचे से होकर गुजरता है। रात बारिश हुई होगी तो थोडा बहुत भू-स्खलन हो गया होगा। उससे बचाने के लिये उप्शी में यातायात रोक रखा है। नहीं तो मीरु, ग्या, लातो व रूमसे में भी रुकने के इंतजाम हैं। वहां से तंगलंग-ला नजदीक भी है। पता नहीं कब तंगलंग-ला खुलेगा, उसके कम से कम दो घण्टे बाद कोई गाडी यहां तक पहुंचेगी, तब यहां से यातायात आगे बढेगा।

Monday, August 12, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- तेरहवां दिन- तंगलंग-ला से उप्शी

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16 जून 2013
सात बजे आवाजें सुनकर आंख खुली। थोडे से खुले दरवाजे से बाहर निगाह गई तो बर्फ दिखाई दी। यानी रात बर्फ पडी है। मजदूरों ने बढा-चढाकर बताया कि बहुत ज्यादा बर्फ गिरी है। मैंने बाहर निकलकर देखा तो पाया कि दो इंच से ज्यादा नहीं है। तंगलंग-ला यहां से ज्यादा दूर नहीं है, इसलिये वहां भी इससे ज्यादा बर्फ की सम्भावना नहीं। पुरानी बर्फ पर चलना मुश्किल भरा होता है, फिसल जाते हैं लेकिन ताजी बर्फ पर ऐसा नहीं है। ज्यादा बर्फ नहीं है तो फिसल नहीं सकते। हां, ज्यादा बर्फ में धंसने का खतरा होता है। यहां तो दो ही इंच बर्फ थी, सडक से तो वो भी खत्म हो गई थी। आने-जाने वाली गाडियों ने उसे कुचलकर खत्म कर दिया था। यह मेरे लिये और भी अच्छा था।
साइकिल पर भी थोडी सी बर्फ थी, उसे झाडकर हटा दिया। सामान बांधा व सवा आठ बजे निकल पडा। खाने-पीने का तो सवाल ही नहीं। पानी की बोतल जरूर भर ली। मेरी एक-एक गतिविधि मजदूरों के लिये तमाशा थी। उठने से लेकर अलविदा कहने तक उनकी भावहीन आंखें मेरे चेहरे व हाथों पर ही जमी रहीं।

Friday, August 9, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- बारहवां दिन- शो-कार मोड से तंगलंग-ला

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15 जून 2013
साढे सात बजे आंख खुली। ध्यान दिया कि तम्बू चू रहा है, वो भी कई जगहों से। कुछ बूंदें तो मेरे बिस्तर पर भी गिर रही थीं। जब तम्बू के ऊपर रेन कवर नहीं लगायेंगे, तो ऐसा ही होगा। अचानक यह सोचकर झुरझुरी दौड गई कि बारिश हो रही है।
बाहर निकला तो कुदरत बारिश से भी ज्यादा खतरनाक खेल खेल रही थी। बर्फ पड रही थी। अभी तंगलंग-ला पार करना बाकी है। यहां 4630 मीटर की ऊंचाई पर ही बर्फबारी हो रही है, तो 5300 मीटर ऊंचे तंगलंग-ला पर क्या हो रहा होगा, इसका अन्दाजा था मुझे।
बर्फबारी के बीच निकल पडूं या यहीं रुका रहूं- यह प्रश्न मन में था। मन ने कहा कि यहीं रुका रह। बर्फबारी जब बन्द हो जायेगी तो आठ किलोमीटर आगे डेबरिंग चले जाना। बाकी दूरी कल पूरी कर लेना। बर्फबारी में निकलना ठीक नहीं।

Wednesday, August 7, 2013

शो-कार (Tso Kar) झील

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शाम चार बजे शो-कार के लिये चल पडा। पहले तो मामूली सी चढाई है, उसके बाद मामूली ढलान। 16 किलोमीटर तक यही ढलान पैडल नहीं मारने देता। सिंगल सडक है और कोई आवागमन नहीं।
झील काफी दूर से ही दिखने लगती है। लेकिन नजदीकी मानव बस्ती थुक्जे गोम्पा 16 किलोमीटर दूर है। यहां से भी करीब चार किलोमीटर और आगे चलकर झील के नजदीक तक पहुंचा जा सकता है।
जब मैं थुक्जे से करीब 7-8 किलोमीटर दूर था तो दूर सामने से चार मोटरसाइकिल वाले आ रहे थे। सडक पर मामूली ढलान अवश्य है लेकिन यह पहाडी सडक नहीं है। झील क्षेत्र काफी विशाल है। पानी एक कोने में ही है, बाकी क्षेत्र विशाल मैदान है। 7-8 किलोमीटर दूर से ही थुक्जे दिख रहा था।
तो मोटरसाइकिल वाले आ रहे थे, उनसे करीब 100 मीटर दूर सडक से हटकर चार-पांच जानवर भी बडी तेजी से दौड लगा रहे थे। काफी दूरी होने से जानवर पहचान में नहीं आ रहे थे। वे मोटरसाइकिलों के साथ साथ भाग रहे थे तो जाहिर है मेरी तरफ आ रहे थे। मुझे लगा कुत्ते हैं। लद्दाखी कुत्ते कुछ बडे होते हैं। पता नहीं मुझसे क्या खता हो गई कि वे मेरी तरफ आ रहे हैं। मैं बुरी तरह डर गया।

Monday, August 5, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- ग्यारहवां दिन- पांग से शो-कार मोड

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14 जून 2013
सुबह साढे सात बजे आंख खुली। दोनों होटल संचालिकाओं ने जुले कहकर नये प्रभात की शुभकामनाएं दीं। अब मैं ‘जुले-जुले’ की धरती पर हूं। हर व्यक्ति एक दूसरे को जुले जुले कहने में लगा है। झारखण्डी मजदूर भी मौका मिलते ही जुले कहते हैं। विदेशी आते हैं भारत घूमने। हवाई अड्डे पर उतरते ही उन्हें सबसे पहले नमस्ते कहना सीखना होता है। लद्दाख में नमस्ते किसी काम का नहीं, यहां जुले का शासन है। सोचते होंगे बडा अजीब देश है, हजार किलोमीटर चले नहीं, अभिवादन का तरीका बदल गया। नमस्ते सीखा था इतनी मेहनत से, एक झटके में बेकार हो गया।
साइकिल पर जब सामान बांध रहा था तो स्पीति वाले तीर्थ यात्री मिले। उनमें से एक का नाम रणजीत सिंह है। बौद्ध नाम कुछ और है। उनके पिता पंजाबी थी, तो रणजीत नाम रख दिया। गांव में सभी रणजीत के ही नाम से जानते हैं, सभी कागज-पत्र रणजीत सिंह के हैं। बौद्ध नाम किसी को नहीं पता। पिन घाटी स्थित अपने गांव शगनम में ट्रैकिंग कराते हैं। न्यौता दिया कि कभी पिन-पार्वती पास या भाभा पास ट्रैक करना हो, तो अवश्य मिलना। भला नीचे का आदमी पिन-पार्वती या भाभा पास करने पहले शगनम क्यों जायेगा? सभी लोग मणिकर्ण या किन्नौर से ट्रैक शुरू करते हैं व मुद में खत्म करते हैं। उल्टा रिवाज कौन शुरू करना चाहेगा?

Friday, August 2, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- दसवां दिन- व्हिस्की नाले से पांग

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13 जून 2013
स्थान- व्हिस्की नाला। एक और नाला है ब्राण्डी नाला। कहते हैं यहां व्हिस्की व ब्राण्डी के ट्रक पलटे थे तो उन्हीं के नाम पर नाले बन गये। मुझे यह गलत लगता है। इन नामों की खोज जरूरी है। पिछले 20-25 साल से ही यह सडक अस्तित्व में है। उससे पहले पगडण्डी थी। यानी ट्रक अधिकतम 20-25 सालों से ही चल रहे हैं। अब खोज यह करनी है कि क्या पगडण्डी वाले जमाने में भी इसे व्हिस्की नाला ही कहते थे? अगर हां, तो दो ट्रक पलटने से बच जायेंगे।
सोने में कोई लापरवाही नहीं। शरीर जब भी कहे- उठ जाग मुसाफिर भोर भई, तभी उठते हैं। जबरदस्ती कभी नहीं। साढे आठ बजे आंख खुली। बाहर निकलकर देखा, बादल थे, हवा भी। क्या मानसून आ गया है? चार जून को मानसून ने केरल में दस्तक दे दी थी जब मैं दिल्ली से चला था। क्या आठ-नौ दिन में वह हिमालय भी पार कर गया? मुश्किल लग रहा है। पांच दिन पहले जब केलांग में था, तो घर पर बात की थी। मानसून उत्तर भारत में नहीं आया था। पांच दिनों में मानसून का उत्तर भारत पर छा जाना, हिमालय पर आ जाना व हिमालय भी पार कर जाना असम्भव है। नहीं, यह मानसून नहीं है। कुछ और ही मामला है।

Thursday, August 1, 2013

डायरी के पन्ने- 10

[डायरी के पन्ने हर महीने की पहली व सोलह तारीख को छपते हैं।]

16 जुलाई 2013, मंगलवार
1. ऑल इण्डिया रेडियो से एक फोन आया। वे एक पर्यटन कार्यक्रम में जयपुर के सिटी पैलेस के बारे में मुझसे बात करना चाह रहे थे। मैंने स्वीकृति दे दी तो बोले कि पांच मिनट बाद रिकार्डिंग के लिये पुनः फोन करेंगे। मैंने कहा कि मैं सिटी पैलेस गया जरूर हूं, लेकिन शहरों में घूमने की मेरी प्रवृत्ति नहीं है, इसलिये मैं अभी अचानक सिटी पैलेस के बारे में एक मिनट भी नहीं बोल सकता। मुझे इसके लिये तैयारी करनी पडेगी और आज मेरे पास इतना समय नहीं है कि तैयारी कर सकूं। बोले कि कुछ नहीं बोलना है, बस ऐसे ही कुछ भी कह देना है। मैंने कहा तो ठीक है, रिकार्ड करो- सिटी पैलेस बहुत अच्छी और सुन्दर जगह है। यह पुराने राजाओं द्वारा बनवाया गया एक बहुत बडा महल है। बस। अभी इस समय मैं इससे ज्यादा नहीं बोल सकता। मात्र एक मिनट भी बोलने का अर्थ है कम से कम आधे पेज की सामग्री पढना। हां, हिमालय या ट्रेकिंग या रेल यात्राओं के बारे में अभी का अभी आधे घण्टे तक बोलने को तैयार हूं। सखेद मना करना पडा।

Wednesday, July 31, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- नौवां दिन- नकी-ला से व्हिस्की नाला

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12 जून 2013
सुबह आठ बजे आंख खुली। बाहर कुछ आवाजें सुनाई पडीं। दो मोटरसाइकिलें व दो कारें रुकी थीं और यात्री हमारे टैण्ट के पास आकर फोटो खींच रहे थे। हमने टैण्ट रात बिल्कुल आपातकाल में लगाया था। पीछे 34 किलोमीटर दूर सरचू व आगे 11 किलोमीटर दूर व्हिस्की नाले पर ही आदमियों का निवास था। ऐसे सुनसान वीराने में हमारा यह टैण्ट आने-जाने वालों के लिये आकर्षण का केन्द्र था। ये लोग रोहतक के थे।
मैंने चलने से पहले गूगल मैप से रास्ते की दूरी व ऊंचाईयां नोट कर ली थीं। नकी-ला की स्थिति लिखने में भूल हो गई। मैंने लिखा- गाटा लूप (4600 मीटर) के दो किलोमीटर आगे 4740 मीटर की ऊंचाई पर नकी-ला है। इसके बाद नोट किया- नकी-ला से 19 किलोमीटर आगे 5060 मीटर की ऊंचाई पर लाचुलुंग-ला है। इस डाटा से यह पता नहीं चलता कि नकी-ला पार करने के बाद थोडी बहुत उतराई है या सीधे लाचुलुंग-ला की चढाई शुरू हो जाती है।

Monday, July 29, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- आठवां दिन- सरचू से नकी-ला

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11 जून 2013
साढे आठ बजे आंख खुली। सचिन कभी का जग चुका था। आज बडा लम्बा रास्ता तय करना है। कम से कम पांग तक तो जाना ही पडेगा जो यहां से 78 किलोमीटर दूर है। सरचू व पांग के बीच में खाने ठहरने को कुछ नहीं। साथ ही दो दर्रे भी पार करने हैं। ज्यादातर रास्ता चढाई भरा है। और ज्यादा पूछताछ की तो पता चला कि व्हिस्की नाले पर रहने खाने को मिल जायेगा। व्हिस्की नाला यानी लगभग 50 किलोमीटर दूर। हमें आज व्हिस्की नाले तक पहुंचना भी मुश्किल लगा। इसलिये भरपेट खाना खाने के बाद आलू के छह परांठे पैक करा लिये।
दस बजे यहां से चले। कल सोचा था कि आज पूरा दिन सरचू में विश्राम करेंगे, इसलिये उठने में देर कर दी। फिर आज जब उठ गये तो चलने का मन बन गया।
सरचू हिमाचल प्रदेश में है लेकिन यहां से निकलकर जल्द ही जम्मू कश्मीर शुरू हो जाता है। जम्मू कश्मीर में भी लद्दाख। वैसे भौगोलिक रूप से लद्दाख बारालाचा-ला पार करते ही आरम्भ हो जाता है लेकिन राजनैतिक रूप से यहां से आरम्भ होता है। वास्तव मे सरचू से करीब सात-आठ किलोमीटर आगे एक पुल है- ट्विंग ट्विंग पुल, वही हिमाचल व लद्दाख की सीमा है। हालांकि कहीं जम्मू कश्मीर या लद्दाख का स्वागत बोर्ड नहीं दिखा। सरचू मनाली से 222 किलोमीटर दूर है और लेह से 252 किलोमीटर। फिर भी इसे इस मार्ग का मध्य स्थान माना जाता है। आप सरचू पहुंच गये, मानों आधी दूरी तय कर ली।

Friday, July 26, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- सातवां दिन- जिंगजिंगबार से सरचू

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10 जून 2013
सुबह साढे पांच बजे आंख खुल गई। मेरठ से आया कुनबा जब जाने की तैयारी करने लगा तो शोर हुआ। मैं भी जग गया। तम्बू से बाहर निकला, सामने सचिन खडा था। पता चला वो भी बहुत थका है। वह कल जिस्पा में रुका था, गेमूर से 5-6 किलोमीटर आगे। एक ही दिन में 1000 मीटर चढने से उसकी भी हालत ज्यादा अच्छी नहीं थी।
यहां से सूरजताल 13 किलोमीटर व बारालाचा 16 किलोमीटर है। यानी 16 किलोमीटर तक हमें ऊपर चढना है। नाश्ता करके साढे सात बजे निकल पडे। आज 47 किलोमीटर दूर सरचू पहुंचना है।
यहां से निकलते ही चढाई शुरू हो गई, हालांकि ज्यादा तीव्र चढाई नहीं थी। सडक भी अच्छी है। कुछ आगे चलकर एक नाला पार करना पडा। इसमें काफी पानी था लेकिन ज्यादा फैला होने के कारण उतना तेज बहाव नहीं था। पार करने के बाद काफी देर तक अपने पैर ढूंढते रहे।

Wednesday, July 24, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- छठा दिन- गेमूर से जिंगजिंगबार

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9 जून 2013
गेमूर मनाली से 133 किलोमीटर दूर है। सात बजे आंख खुली। गांव के बीचोंबीच एक नाला है, बडा तेज बहाव है। कुछ नीचे इसी के किनारे सार्वजनिक शौचालय है। नाले के पानी का कुछ हिस्सा शौचालय में भी जाता है। बडी सावधानी से गया, फिर भी बर्फीले ठण्डे पानी में पैर भीग गये।
साइकिल धूल धूसरित हो गई थी। पुनः नाले का लाभ उठाया, दस मिनट में चकाचक।
यहीं नाश्ता किया। नौ बजे निकल पडा। आज का लक्ष्य 36 किलोमीटर दूर जिंगजिंगबार है। सचिन रात पता नहीं कहां रुका था, लेकिन आज वो जिंगजिंगबार में मिलेगा।
गेमूर से जिस्पा 5 किलोमीटर दूर है। सडक अच्छी बनी है, ढलान भी है। पौन घण्टा लगा। जिस्पा में होटलों की कोई कमी नहीं है। अगर कल गेमूर में रुकने का इंतजाम न मिलता तो मैं जिस्पा ही रुकता।

Monday, July 22, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- पांचवां दिन- गोंदला से गेमूर

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8 जून 2013
साढे आठ बजे आंख खुली। और अपने आप नहीं खुल गई। सचिन ने झिंझोडा, आवाज दी, तब जाकर उठा। वो हेलमेट लगाकर जाने के लिये तैयार खडा था। मैंने उसे कल ही बता दिया था कि भरपूर नींद लूंगा, इसीलिये उसने जल्दी उठकर मुझे नहीं उठाया। मेरी आंख खुलते ही उसने मेरी योजना पूछी। मैं भला क्या योजना बनाता? कल योजना बनाई थी भरपूर सोने की और अभी मेरी नींद पूरी नहीं हुई है। पता नहीं कब पूरी हो, तुम चले जाओ। मैं उठकर जहां तक भी पहुंच सकूंगा, पहुंच जाऊंगा। आज रात भले ही केलांग या जिस्पा में रहूं लेकिन कल जिंगजिंगबार में रात गुजारूंगा। उधर सचिन का इरादा आज जिस्पा या दारचा में रुककर अगली रात जिंगजिंगबार में रुकने का था। जिंगजिंगबार बारालाचा-ला का सबसे नजदीकी मानव गतिविधि स्थान है। आज तो पता नहीं हम मिलें या न मिलें, लेकिन कल जिंगजिंगबार में अवश्य मिलेंगे।
सचिन के जाने के बाद मैं फिर सो गया। साढे ग्यारह बजे आंख खुली। असल में पिछली दो रातें स्लीपिंग बैग में गुजारी थीं, उनसे पहली रात दिल्ली से मनाली बस में और उससे भी पहले चार नाइट ड्यूटी। नाइट ड्यूटी करके दिन में कम ही सोता था व यात्रा की तैयारी करता था। यानी पिछले एक सप्ताह से मैं ढंग से सो नहीं पाया था। आज सारी कसर निकल गई।

Friday, July 19, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- चौथा दिन- मढी से गोंदला

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7 जून 2013, स्थान मढी
पांच बजे आंख खुली। सोच रखा था कि आज जितनी जल्दी हो सके, निकल जाना है। बाद में रोहतांग जाने वाली गाडियों का जबरदस्त रेला हमें चलने में समस्या पैदा करेगा। फिर भी निकलते निकलते साढे छह बज गये। सचिन को साइकिल का अच्छा अभ्यास है, वो आगे निकल गया।
कुछ आगे चलकर खराब सडक मिली। इस पर कीचड ही कीचड था। जहां तक हो सका, साइकिल पर बैठकर ही चला। बाद में नीचे भी उतरना पडा और पैदल चला। पीछे से गाडियों का काफिला आगे निकलता ही जा रहा था, वे ठहरे जल्दबाज जैसे कि रोहतांग भाग जायेगा, कीचड के छींटे मुझ पर और साइकिल पर भी बहुत पडे।
मढी समुद्र तल से 3300 मीटर की ऊंचाई पर है और रोहतांग 3900 मीटर पर, दोनों की दूरी है सोलह किलोमीटर। शुरू में सडक लूप बनाकर ऊपर चढती है। जिस तरह आगे सरचू के पास गाटा लूप हैं, उसी तरह इनका भी कुछ नाम होना चाहिये था जैसे कि मढी लूप।
साढे आठ बजे चाय की गाडी मिली। यहां संकरी सडक की वजह से जाम भी लगा था। पन्द्रह मिनट बाद यहां से चल पडा।

Tuesday, July 16, 2013

डायरी के पन्ने- 9

1 जुलाई, दिन सोमवार
1. कल दैनिक जागरण के यात्रा पेज पर अपना लेख छपा- चादर ट्रेक वाला। मार्च में भेजा था, तब से प्रतीक्षा थी कि अब छपे अब छपे। पूरे पेज पर बिना कांट-छांट के छापा गया। यह थी अच्छी बात। बुरी लगने वाली बात थी कि केवल दिल्ली में ही छपा। यूपी में नहीं छपा। बाकी कहां छपा कहां नहीं, पता नहीं।
2. प्रभात खबर में 26 मई को मेरा एक यात्रा सम्बन्धी लेख छपा था। उसके ऐवज में आज 1500 रुपये का चेक और उससे भी शानदार उस पृष्ठ की एक प्रति मिली। जब कभी लेख छपा था तो मुझे देर से पता चला और मैं अखबार नहीं खरीद सका था। मेरी निराशा जब बोकारो के मित्र अमन को पता चली तो उन्होंने अपने यहां से वह पृष्ठ भेज दिया। पृष्ठ मुझ तक पहुंचता, मैं साइकिल उठाकर लद्दाख के लिये निकल चुका था। लौटने पर उन्होंने पुनः इसे भेजा। तब से प्रतीक्षा जारी थी। आज जब कोरियर आया तो सबसे पहले अमन का ही ख्याल आया कि उन्होंने भेजा होगा। लेकिन चेक देखकर यह ख्याल गडबडा गया। तुरन्त अमन को फोन करके चेक के बारे में पूछा। उन्होंने कहा कि उन्होंने तो कोई चेक नहीं भेजा। बाद में लिफाफे पर निगाह गई जहां प्रभात खबर की मोहर लगी थी तो पता चला कि यह प्रभात खबर की कारगुजारी है।

Monday, July 15, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- तीसरा दिन- गुलाबा से मढी

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6 जून 2013, स्थान-गुलाबा
पांच बजे अलार्म बजा लेकिन उठा सात बजे। बाहर निकला तो एक गाय अभी भी टैण्ट से सटकर बैठी थी। टैण्ट पर पतला गोबर भी कर रखा था, पानी से धो दिया। सामान समेटने, बांधने व साइकिल पर चढाने में साढे आठ बज गये। जब आगे के लिये चला तो आठ बजकर पचास मिनट हो गये थे।
आज सामान बांधने में एक परिवर्तन किया। टैण्ट को हैण्डल पर बांध दिया, हैण्डल के नीचे। इसके दो फायदे हुए, एक तो पीछे वजन कम हो गया और अगले पहिये पर भी कुछ वजन आ गया। अब गड्ढों व ऊबड-खाबड रास्तों पर चलने में अगला पहिया उठेगा नहीं। पीछे कैरियर के ऊपर बैग बांधा व बराबर में डिस्क ब्रेक के कुछ ऊपर कैरियर से ही स्लीपिंग बैग लटका दिया। हवा भरने का पम्प स्लीपिंग बैग से ही बंधा था। कल कुछ दूर चलते ही सारा सामान असन्तुलित हो गया था व एक तरफ झुक गया था। अब सबकुछ सन्तुलित लग रहा है। बाकी कुछ दूर चलने पर पता चल जायेगा।

Friday, July 12, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- दूसरा दिन- मनाली से गुलाबा

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5 जून 2013
सुबह पाँच बजे बस मंड़ी पहुँची। ज्यादा देर न रुककर फिर चल पड़ी। औट के पास जलोड़ी जोत जाने वाला भोपाल से आने वाला साइकिलिस्ट उतर गया। भुंतर में सारपास वाले उतर गये। सारपास ट्रेक कसोल से शुरू होता है।
जो जाये कुल्लू, बन जाये उल्लू। कंडक्टर ने सभी सवारियाँ उतार दीं। बोला यह बस आगे नहीं जायेगी। दूसरी बस में बैठा दिया। मुझे कोई परेशानी नहीं थी, लेकिन एक बस से साइकिल उतारकर दूसरी बस पर चढ़ाना श्रमसाध्य कार्य था।
आठ बजे मनाली पहुँचे। अच्छी धूप, अच्छा मौसम, सैलानियों की भीड़। साथ ही होटल वालों की भी। बस से उतरा नहीं कि होटल वालों ने घेर लिया।
साइकिल का पहले निरीक्षण किया। फिर सारा सामान बांध दिया। बांधने के लिये पर्याप्त सुतली लाया था। पीछे कैरियर पर ही बांधा - बैग भी, टैंट भी और स्लीपिंग बैग भी। यह बड़ा पेचीदा काम था और किसी आपातकाल में आसानी से खोला भी नहीं जा सकता था। इसका बाद में नुकसान भी उठाना पड़ा।
कपड़े वही पहने रखे, जो दिल्ली से पहनकर आया था, हाफ़ पैंट व टी-शर्ट। मनाली लगभग 2000 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। अच्छी धूप निकली होने के कारण ठंड़ का नामोनिशान तक नहीं था।
परसों साइकिल के दोनों धुरों में तेल डाला था। यह तेल बाहर बह गया और डिस्क पर फैल गया। दोनों पहियों में यही हुआ। ब्रेक लगने बंद। किसी तरह डिस्क की सफ़ाई की, तो ब्रेक थोड़े-थोड़े लगने लगे। अभी भी यही हाल था। ब्रेक अच्छी तरह नहीं लग रहे थे। कामचलाऊ थे। हालाँकि आज चढ़ाई भरा रास्ता है, ब्रेक की यदा कदा ही आवश्यकता पड़ेगी, लेकिन कल इसकी सफ़ाई सूक्ष्मता से करनी पड़ेगी क्योंकि कल मैं रोहतांग पार कर लूँगा।
ब्यास पार की और साइकिल यात्रा की विधिवत शुरूआत कर दी। करीब चार किलोमीटर बाद जब भूख बहुत लगने लगी तो चाय आमलेट खाये गये।
9 किलोमीटर दूर पलचान है - बारह बजे पहुँचा यानी तीन किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड़ से। आज इरादा था मढ़ी जाकर रुकने का। मढ़ी मनाली से 34 किलोमीटर दूर है। यानी अगर इसी स्पीड़ से चलता रहा तो ग्यारह घंटे लगेंगे, यानी रात आठ बजे के बाद ही पहुँचूंगा। अंधेरे में मैं चलना पसंद नहीं करता, इसलिय मढ़ी पहुँचना मुश्किल लगने लगा।
तरुण गोयल से बात हुई। वे हिमाचल के विशेषज्ञ हैं। उन्होंने बताया कि मढ़ी में कुछ भी खाने को नहीं मिलेगा। पहले मिल जाता था, लेकिन उच्च न्यायालय के आदेश के बाद अब नहीं मिलता। यह मेरे लिये बुरी ख़बर थी।
पलचान में चाऊमीन खाई। यहाँ गोयल साहब के कथन की पुष्टि हो गयी। लेकिन एक राहत की बात पता चली कि मढ़ी में शाम पाँच बजे तक ही मिलेगा, उसके बाद नहीं। मैं पाँच बजे से पहले किसी भी हालत में मढ़ी नहीं पहुँच सकता था, इसलिये यह राहत वाली बात मेरे किसी काम की नहीं थी।
पलचान से सोलांग जाने वाली सड़क अलग हो जाती है। रोहतांग के साथ-साथ सोलांग भी अत्यधिक भीड़ वाली जगह है। इसी वजह से इस तिराहे पर जाम लग जाता है।
पलचान से चार किलोमीटर आगे कोठी है। दो बजे पहुँचा। अब इतना तो पक्का हो ही गया है कि कोठी से आगे कुछ भी खाने को मिलने वाला नहीं। आलू के दो पराँठे पैक करा लिये। पौने तीन बजे यहाँ से चल पड़ा। आठ बजे तक मढ़ी पहुँचने का पक्का इरादा है।
रोहतांग से गाड़ियों का रेला वापस लौटने लगा। सिंगल सड़क, चढ़ाई, साइकिल की न्यूनतम गति व इस रेले ने परेशान किये रखा। चूँकि सभी गाड़ियाँ नीचे उतर रही थीं, इसलिये गोली की रफ़्तार से चल रही थीं।
कैरियर पर जो सारा सामान बांध दिया था, वो एक तरफ़ झुक गया। एक बार गाड़ियों की वजह से सड़क से नीचे उतरना पड़ गया, नीचे रास्ता बड़ा ऊबड़-खाबड़ था, साइकिल का अगला पहिया ऊपर उठ गया। एक तो पहले से ही रास्ता चढ़ाई वाला था, पिछले पहिये के मुकाबले अगला पहिया कुछ ऊपर था। फिर पिछले पहिये के ऊपर ही सारा सामान, बीस किलो से कम नहीं होगा। अगला पहिया भार-रहित था, ऊपर उठने के लिये पूरी तरह स्वतंत्र। यहाँ सोचा कि आगे रास्ता इससे भी ख़राब मिलने वाला है, तब कैसे होगा? अवश्य कुछ न कुछ करना पड़ेगा। अगले पहिये के ऊपर भी भार डालना पड़ेगा। लेकिन अगले पहिये पर तो मड़गार्ड़ तक नहीं है, सामान बांधना टेढ़ी खीर होगा।
उच्च हिमालय की एक बड़ी बुरी आदत है - दोपहर बाद बादल और शाम तक बारिश। बहुत बुरी आदत है यह, चूकता भी नहीं है कभी। साढ़े चार बजते-बजते बूंदाबांदी होने लगी। ऊपर मुँह उठाकर चारों तरफ़ देखा - काले-काले बादल। यानी भयंकर बारिश होने वाली है।
पाँच बजे तक गुलाबा पहुँच गया। अभी भी मढी 13 किलोमीटर दूर है। ख़राब मौसम को देखते हुए यहीं रुकने का फैसला कर लिया। यहाँ सीमा सड़क संगठन यानी बी.आर.ओ. का पड़ाव है। बी.आर.ओ. वालों से रुकने की बात की, उन्होंने मना कर दिया। टैंट लगाने का इरादा बना तो मूसलाधार बारिश होने लगी। मज़बूरन बी.आर.ओ. वालों के यहीं बारिश बंद होने तक रुके रहना पड़ा। गुलाबा में भी पहले रुकने व खाने-पीने का इंतज़ाम होता था, लेकिन उच्च न्यायालय के आदेश के बाद सब हट गये।
इसी दौरान तीन जने भीगते हुए आये। भले मानुसों ने - बी.आर.ओ. वालों ने - हमारे लिये चाय बना दी। ये लोग मोटरसाइकिलों पर थे और रोहतांग से लौट रहे थे। बारिश होने लगी तो यहाँ सिर बचाने को रुक गये। कम होने पर चले गये। साथ ही मेरी टोपी भी ले गये। मैंने अभी तक हेलमेट नहीं लगाया था, टोपी से ही काम चला रहा था। बूंदाबांदी में सिर बचाने को उन्होंने टोपी लेने की इच्छा ज़ाहिर की, मैंने सहर्ष दे दी। वे हालाँकि मोटरसाइकिलों पर थे, लेकिन एक के पास हेलमेट नहीं था। या फिर शर्म आ रही होगी उसे हेलमेट लगाते हुए।
मैंने बी.आर.ओ. वालों से रुकने के लिये फिर प्रार्थना की - खाने पीने को नहीं माँगूंगा व ओढ़ने-बिछाने को भी नहीं। उन्होंने अपनी मज़बूरी बताते हुए कहा कि हम साहब की आज्ञा के बिना आपको नहीं ठहरा सकते। साहब नीचे गये हैं, पता नहीं कब तक लौटेंगे। तो मुझे मज़दूरों के यहाँ ठहरा दो। वे मज़दूरों की झौंपड़ियों में गये, लेकिन उन्होंने भी मना कर दिया। ज्यादातर मज़दूर झारखंड़ी थे, मेरे हिमालय के होते तो मना नहीं करते।
अब टैंट लगाने के सिवा कोई चारा नहीं था। बारिश बंद होने पर कुछ ऊपर जाकर टैंट लगा भी दिया। टैंट लगा ही रहा था कि जंगल में से एक मज़दूर मेरे पास आया। उसने रोंगटे खड़े कर देने वाली सूचना दी - उधर जंगल में मत जाना। वहाँ जंगली कुत्ते हैं। कल वे एक बच्चे को खा रहे थे। किसके बच्चे को? पता नहीं। पहले तो हम सोचते थे कि बच्चे को भालू उठाकर ले गया होगा, लेकिन यह तो जंगली कुत्तों का काम निकला।
बच्चे के प्रति सहानुभूति तो जगी ही, लेकिन उससे भी ज्यादा जंगली कुत्तों व भालुओं का डर लगने लगा।
अंधेरा हो गया। नीचे आदमियों के बोलने की आवाजें भी मद्धम होने लगीं, उधर मेरा भी डर बढता रहा। तभी टैंट के बाहर बराबर में कुछ सरसराने की आवाज़ हुई। पक्के तौर पर यह कोई जानवर ही था। कुछ देर बाद उसने टैंट को सूंघा व शरीर भी रगड़ा। उसकी साँसें भी मुझे सुनायी दे रही थीं। मैं इतना डर गया कि काटो तो खून नहीं। यह भालू है और थोड़ी देर में टैंट को फाड़ देगा। बाहर झाँककर देखने की तो हिम्मत ही ख़त्म।
कुछ देर बाद पत्थर पर किसी चीज के टकराने की आवाज आयी। आधा डर तुरंत दूर हो गया। यह अपनी जानी पहचानी आवाज थी - खुर की आवाज। भालू के पंजे होते हैं, इसलिये वे ऐसी आवाज नहीं कर सकते। हिम्मत करके टैंट की चेन खोली। सिर बाहर निकाला। कुछ दूर कोई खड़ा था। टॉर्च की रोशनी मारी तो सारा डर खत्म। पाँच गायें थीं। इसके बाद तो उन्होंने टैंट के खूब चक्कर काटे। घास चरी, बाहर पड़ी साइकिल पर भी चढ़ीं। कोई डर नहीं लगा, इत्मीनान से सोया।
आज 21 किलोमीटर साइकिल चलाई। आज साइकिल चलाकर मैंने एक गलती भी की। आज ही दिल्ली से आया था। और आज ही साइकिल भी उठा ली। एक दिन मनाली में रुकना चाहिये था। शरीर आबोहवा के अनुकूल हो जाता।


मनाली में यह दृश्य आम है।

मनाली से दूरियां

मनाली से एक किलोमीटर आगे


अपने सफर के साथी

ओहो! पलट गई। पहले फोटो खींचेंगे, बाद में सीधा करेंगे।

सोलांग मोड पर लगा जाम

और सोलांग मोड पर पडी अपनी साइकिल

रोहतांग की ओर

कोठी

बीआरओ के ये नारे बडे कीमती हैं।



हेलमेट आवश्यक है- चाहे साइकिल हो या कोई और दुपहिया वाहन- चाहे पुलिस वाला हो या न हो। जिन्दगी तो अपनी ही है।


गुलाबा में अपना टैण्ट
अगले भाग में जारी...

मनाली-लेह-श्रीनगर साइकिल यात्रा
1. साइकिल यात्रा का आगाज
2. लद्दाख साइकिल यात्रा- पहला दिन- दिल्ली से प्रस्थान
3. लद्दाख साइकिल यात्रा- दूसरा दिन- मनाली से गुलाबा
4. लद्दाख साइकिल यात्रा- तीसरा दिन- गुलाबा से मढी
5. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौथा दिन- मढी से गोंदला
6. लद्दाख साइकिल यात्रा- पांचवां दिन- गोंदला से गेमूर
7. लद्दाख साइकिल यात्रा- छठा दिन- गेमूर से जिंगजिंगबार
8. लद्दाख साइकिल यात्रा- सातवां दिन- जिंगजिंगबार से सरचू
9. लद्दाख साइकिल यात्रा- आठवां दिन- सरचू से नकीला
10. लद्दाख साइकिल यात्रा- नौवां दिन- नकीला से व्हिस्की नाला
11. लद्दाख साइकिल यात्रा- दसवां दिन- व्हिस्की नाले से पांग
12. लद्दाख साइकिल यात्रा- ग्यारहवां दिन- पांग से शो-कार मोड
13. शो-कार (Tso Kar) झील
14. लद्दाख साइकिल यात्रा- बारहवां दिन- शो-कार मोड से तंगलंगला
15. लद्दाख साइकिल यात्रा- तेरहवां दिन- तंगलंगला से उप्शी
16. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौदहवां दिन- उप्शी से लेह
17. लद्दाख साइकिल यात्रा- पन्द्रहवां दिन- लेह से ससपोल
18. लद्दाख साइकिल यात्रा- सोलहवां दिन- ससपोल से फोतूला
19. लद्दाख साइकिल यात्रा- सत्रहवां दिन- फोतूला से मुलबेक
20. लद्दाख साइकिल यात्रा- अठारहवां दिन- मुलबेक से शम्शा
21. लद्दाख साइकिल यात्रा- उन्नीसवां दिन- शम्शा से मटायन
22. लद्दाख साइकिल यात्रा- बीसवां दिन- मटायन से श्रीनगर
23. लद्दाख साइकिल यात्रा- इक्कीसवां दिन- श्रीनगर से दिल्ली
24. लद्दाख साइकिल यात्रा के तकनीकी पहलू

Wednesday, July 10, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- पहला दिन- दिल्ली से प्रस्थान

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4 जून 2013
साइकिल उठाने का पक्का निश्चय कर रखा था। सोच लिया था कि लद्दाख जाऊँगा, वो भी श्रीनगर के रास्ते। मनाली के रास्ते वापसी का विचार था। सारी तैयारियाँ श्रीनगर के हिसाब से हो रही थीं। सबकुछ तय था कि कब-कब कहाँ-कहाँ पहुँचना है। उच्च हिमालयी क्षेत्रों व हिमालय पार में साइकिल चलाने का कोई अनुभव नहीं था, तो इस गणना की कोई महत्ता नहीं रह गयी थी। जैसे कि साइकिल यात्रा के पहले ही दिन श्रीनगर से सोनमर्ग जाने की योजना थी। यह दूरी 85 किलोमीटर है और लगातार चढ़ाई है। नहीं कह सकता था कि ऐसा कर सकूँगा, फिर भी योजना बनी।
दिल्ली से सीधे श्रीनगर के लिये दोपहर एक बजे बस चलती है। यह अगले दिन दोपहर बाद दो बजे श्रीनगर पहुँच जाती है। इस बस की छत पर रेलिंग नहीं लगी होती, इसलिये साइकिल खोलकर एक बोरे में बांधकर ले जाना तय हुआ।
दूसरा विकल्प था जम्मू तक ट्रेन से, उसके बाद बस या जीप। दिल्ली से जम्मू के लिये सुबह मालवा एक्सप्रेस निकलती है। इसका समय नई दिल्ली से साढ़े पाँच बजे है। कभी-कभी लेट भी हो जाती है। बस यात्रा की बजाय ट्रेन यात्रा ज्यादा सुविधाजनक है, इसलिये मेरा मन ट्रेन से भी जाने का था।
इस यात्रा की तैयारियाँ काफ़ी दिन पहले से शुरू हो गयी थीं। लेकिन आलसी जीव कैसी तैयारियाँ करते हैं, पता तो होगा ही। नतीज़ा यह हुआ कि तीन तारीख़ की शाम तक भी पूरी तैयारियाँ नहीं हो पायीं। रात ड्यूटी चला गया। जब मालवा एक्सप्रेस दिल्ली से निकली, तब भी बैग खाली ही था। घर आया, सो गया। आँख खुली ग्यारह बजे। जब बैग आधा ही भरा था, तो श्रीनगर वाली बस भी चली गयी। अब पहले पहल इरादा बना मनाली से यात्रा शुरू करने का। हिमाचल परिवहन की बसों की समय सारणी ऑनलाइन उपलब्ध रहती है। शाम चार चालीस वाली बस पसंद आ गयी।
अब पैकिंग का काम युद्धस्तर पर शुरू हुआ। सबसे पहले कपड़े - बाइस दिनों के लिये तीन जोड़ी - दो जोड़ी बैग में व एक जोड़ी पहन लिये। शून्य से कम तापमान का भी सामना करना पड़ेगा, पर्याप्त गरम कपड़े भी ले लिये। कपड़ों से ही बैग भर गया। इनके अलावा मंकी कैप, तौलिया, दस्ताने, जुराबें भी ले लिये। ऐसी यात्राओं पर मैं काजू, किशमिश, बादाम हमेशा रखता ही हूँ, वे भी ले लिये। मोबाइल, कैमरे चार्जर सहित व एक-एक अतिरिक्त बैटरी और मेमोरी कार्ड भी। दवाईयाँ कभी नहीं रखता, इस बार भी नहीं रखीं। हालाँकि रख लेनी चाहिये।
सवा चार बजे शास्त्री पार्क से चल पड़ा। लोहे के पुल से होता हुआ दस मिनट में कश्मीरी गेट। मनाली वाली बस तैयार खड़ी थी। साढ़े पाँच सौ का मेरा टिकट व पौने तीन सौ का साइकिल का टिकट। छत पर बांध दी।
कुछ लड़के और मिले। इनमें से ज्यादातर यूथ हॉस्टल के सारपास ट्रेक में हिस्सा लेने जा रहे थे। एक लड़का यूथ हॉस्टल की ही तरफ़ से तीर्थन घाटी में जलोड़ी जोत तक साइकिलिंग करने वाला था। गौरतलब है कि यूथ हॉस्टल के कार्यक्रमों में ज्यादातर पहली बार वाले यानी सिखदड़ होते हैं। साइकिल छत पर रखते ही उन्होंने पूछताछ शुरू कर दी। मैं किस मिट्टी का बना हूँ, रूपकुंड़ का नाम लेते ही उन्होंने जान लिया।
बस में बोरियत नहीं हुई। इसका एक कारण था, बगल वाली खाली सीट। दूसरा कारण था, सामने वाली सीट की पर्याप्त दूरी। खूब पैर फैलाकर व चौड़ा होकर बैठा रहा। हालाँकि चंड़ीगढ़ जाकर पूरी बस भर गयी। रात ग्यारह बजे चंड़ीगढ़ से चल पड़े।

साइकिल में पंक्चर लगाने का अभ्यास

महायात्रा के लिये प्रस्थान
अगले भाग में जारी...

मनाली-लेह-श्रीनगर साइकिल यात्रा
1. साइकिल यात्रा का आगाज
2. लद्दाख साइकिल यात्रा- पहला दिन- दिल्ली से प्रस्थान
3. लद्दाख साइकिल यात्रा- दूसरा दिन- मनाली से गुलाबा
4. लद्दाख साइकिल यात्रा- तीसरा दिन- गुलाबा से मढी
5. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौथा दिन- मढी से गोंदला
6. लद्दाख साइकिल यात्रा- पांचवां दिन- गोंदला से गेमूर
7. लद्दाख साइकिल यात्रा- छठा दिन- गेमूर से जिंगजिंगबार
8. लद्दाख साइकिल यात्रा- सातवां दिन- जिंगजिंगबार से सरचू
9. लद्दाख साइकिल यात्रा- आठवां दिन- सरचू से नकीला
10. लद्दाख साइकिल यात्रा- नौवां दिन- नकीला से व्हिस्की नाला
11. लद्दाख साइकिल यात्रा- दसवां दिन- व्हिस्की नाले से पांग
12. लद्दाख साइकिल यात्रा- ग्यारहवां दिन- पांग से शो-कार मोड
13. शो-कार (Tso Kar) झील
14. लद्दाख साइकिल यात्रा- बारहवां दिन- शो-कार मोड से तंगलंगला
15. लद्दाख साइकिल यात्रा- तेरहवां दिन- तंगलंगला से उप्शी
16. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौदहवां दिन- उप्शी से लेह
17. लद्दाख साइकिल यात्रा- पन्द्रहवां दिन- लेह से ससपोल
18. लद्दाख साइकिल यात्रा- सोलहवां दिन- ससपोल से फोतूला
19. लद्दाख साइकिल यात्रा- सत्रहवां दिन- फोतूला से मुलबेक
20. लद्दाख साइकिल यात्रा- अठारहवां दिन- मुलबेक से शम्शा
21. लद्दाख साइकिल यात्रा- उन्नीसवां दिन- शम्शा से मटायन
22. लद्दाख साइकिल यात्रा- बीसवां दिन- मटायन से श्रीनगर
23. लद्दाख साइकिल यात्रा- इक्कीसवां दिन- श्रीनगर से दिल्ली
24. लद्दाख साइकिल यात्रा के तकनीकी पहलू

Monday, July 8, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा का आगाज़

दृश्य एक: ‘‘हेलो, यू आर फ्रॉम?” “दिल्ली।” “व्हेयर आर यू गोइंग?” “लद्दाख।” “ओ माई गॉड़! बाइ साइकिल?”
“मैं बहुत अच्छी हिंदी बोल सकता हूँ। अगर आप भी हिंदी में बोल सकते हैं तो मुझसे हिन्दी में बात कीजिये। अगर आप हिंदी नहीं बोल सकते तो क्षमा कीजिये, मैं आपकी भाषा नहीं समझ सकता।”
यह रोहतांग घूमने जा रहे कुछ आश्चर्यचकित पर्यटकों से बातचीत का अंश है।

दृश्य दो: “भाई, रुकना जरा। हमें बड़े जोर की प्यास लगी है। यहाँ बर्फ़ तो बहुत है, लेकिन पानी नहीं है। अपनी परेशानी तो देखी जाये लेकिन बच्चों की परेशानी नहीं देखी जाती। तुम्हारे पास अगर पानी हो तो प्लीज़ दे दो। बस, एक-एक घूँट ही पीयेंगे।” “हाँ, मेरे पास एक बोतल पानी है। आप पूरी बोतल खाली कर दो। एक घूँट का कोई चक्कर नहीं है। आगे मुझे नीचे ही उतरना है, बहुत पानी मिलेगा रास्ते में। दस मिनट बाद ही दोबारा भर लूँगा।”
यह रोहतांग पर बर्फ़ में मस्ती कर रहे एक बड़े-से परिवार से बातचीत के अंश हैं।

Saturday, June 1, 2013

डायरी के पन्ने- 8

16 मई 2013
1. शाम पांच बजे गुडगांव से एक प्रशंसक मिलने आये। नाम भूल गया। ज्यादातर घुमक्कडी पर ही चर्चा हुई।

18 मई 2013
1. दिल्ली में गर्मी बढती जा रही है। तापमान 45 डिग्री के पास पहुंच गया। कूलर अत्यावश्यक हो गया। पिछले साल से निष्क्रिय पडे कूलर को चेक किया। मोटर खराब। ठीक कराने गया तो 800 रुपये मांगे। 1600 का नया ले आया। साफ सफाई करके कूलर चालू किया। सीजन की पहली ठण्डी फुहारयुक्त हवा मिल गई।
2. लैपटॉप नखरे करने लगा। ऑन नहीं हुआ। कहने लगा पहले बूटेबल डिवाइस दो, तब चलूंगा। यार, बूटेबल डिवाइस तो तेरे ही अन्दर है। चल जा, नहीं तो बूटेबल की जगह बूट मिलेंगे। जाट किसी के नखरे नहीं झेला करता। खैर, नहीं चला।

Tuesday, May 28, 2013

साइकिल से लद्दाख यात्रा

4 जून को दिल्ली से निकल जाने की योजना है और 27 जून को दिल्ली वापस आने की। पिछले साल साइकिल ली थी ना, बडी महंगी थी; पता नहीं था कि ऐसी साइकिलें सस्ती भी आती हैं, करण के चक्कर में ले बैठा। तभी से दिमाग में सनक थी कि इसे लद्दाख ले जाऊंगा।
एक बार ऋषिकेश ले गया नीलकण्ठ तक, पता चल गया कि लद्दाख जैसी अत्यन्त ऊंची जगहों पर साइकिल चलाना आसान नहीं होगा। उसके बाद चार पांच दिनों तक राजस्थान में भी चलाई, इतना थक गया कि आगे न चलाने की प्रतिज्ञा कर ली। लेकिन जैसे ही थकान उतरी, फिर से धुन चढ गई।
हिसाब लगाया। श्रीनगर से लेह के रास्ते मनाली 900 किलोमीटर है। रोज पचास किलोमीटर के औसत से भी चलाऊंगा तो अठारह दिन में मनाली पहुंचूंगा। यानी कम से कम बीस दिन की छुट्टी तो लेनी ही पडेगी। छुट्टी सीमा बीस से बढाकर सत्ताइस दिन कर दी और इसमें नुब्रा घाटी, पेंगोंग झील व चामथांग भी शामिल कर दिये। मोरीरी झील चामथांग का मुख्य आकर्षण है। लेकिन सत्ताइस दिन की छुट्टी मिलना आसान नहीं।
साहब से छुट्टी के बारे में बात की, तय हुआ कि बीस ही दिन की मिल सकती है। मैंने सत्ताइस दिन हटाकर बीस दिन की लगा दी। अभी पास नहीं हुई है, पूरी उम्मीद है कि पास हो जायेगी।

Monday, May 20, 2013

शिमला कालका रेल यात्रा

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27 अप्रैल 2013
सुबह सराहन में साढे पांच बजे उठा और अविलम्ब बैग उठाकर बस अड्डे की ओर चल दिया। तीन बसें खडी थीं, लेकिन चलने के लिये तैयार कोई नहीं दिखी। एक से पूछा कि कितने बजे बस जायेगी, उसने बताया कि अभी पांच मिनट पहले चण्डीगढ की बस गई है। अगली बस साढे छह बजे रामपुर वाली जायेगी।
चाय की एक दुकान खुल गई थी, चाय पी और साढे छह बजे वाली बस की प्रतीक्षा करने लगा।
बिना किसी खास बात के आठ बजे तक रामपुर पहुंच गया। यहां से शिमला की बसों की भला क्या कमी? परांठे खाये। नारकण्डा की एक बस खडी थी। मैंने उससे पूछा कि यह बस नारकण्डा कितने बजे पहुंचेगी तो उसने बताया कि पौने बारह बजे। साथ ही उसने यह भी बताया कि हम थानाधार, कोटगढ के रास्ते जायेंगे इसलिये सीधे रास्ते से जाने वाली बस के मुकाबले आधा घण्टा विलम्ब से पहुंचेंगे। बस के कंडक्टर ने ही सलाह दी कि पीछे पीछे सीधे रास्ते वाली बस आ रही है, आप उससे चले जाना। मैं उसकी यह सलाह सुनकर नतमस्तक रह गया।

Thursday, May 16, 2013

डायरी के पन्ने- 7

1 मई 2013, बुधवार
1. आज की तो वैसे मेरी छुट्टी थी, फिर भी कपडे वगैरह धोने के कारण दिल्ली ही रुकना पडा। दोपहर को जॉनी का फोन आया। मैं समझ गया कि जॉनी आज रोहित की सगाई करा रहा होगा। मेरे न पहुंचने पर याद कर रहा होगा।
लगभग दो महीने पहले ही रोहित ने मुझे बता दिया था कि दो मई को उसकी शादी है। इसके बाद पिछले दिनों उसने अपने सैंकडों मित्रों के साथ मुझे भी शादी का कार्ड ई-मेल से भेज दिया। मैंने इस मेल को नजरअंदाज कर दिया। दो महीने पहले सुनी हुई बात को तो मैं कभी का भूल गया था।
इसके बाद जॉनी का फोन आया कि तू सगाई में क्यों नहीं आया? मैंने यह कहकर पीछा छुडाया कि कल बारात में साथ चलूंगा। वैसे मेरा कोई इरादा नहीं था बारात में चलने का, और याद भी नहीं था। कल मेरी सायंकालीन ड्यूटी है। शाम को ही मोदीपुरम बारात जायेगी। सबसे पहले खान साहब से कहकर ड्यूटी बदलवाई गई। प्रातःकालीन ड्यूटी करूंगा और शाम को बारात कर लूंगा।

Monday, May 13, 2013

सराहन में जानलेवा गलती

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25 अप्रैल 2013
बशल चोटी के पास बाबाजी के साथ कुछ समय बिताकर वापस सराहन के लिये चल पडा। बाबाजी नीचे कुछ दूर तक रास्ता बताने आये। रास्ता स्पष्ट था, लेकिन धुंधला था। पत्थर ही बेतरतीबी से पडे हुए थे। बाबाजी ने बता दिया था कि नीचे जहां मैदान आयेगा, वहां से रास्ता बायें मुड जाता है। जबकि सीधे शॉर्टकट है। मैं इधर आते समय शॉर्टकट से आया था और मैदान के पास सही रास्ते को पकड नहीं सका था। सोच लिया कि इस बार भी शॉर्टकट से ही उतरूंगा, ज्यादा मुश्किल नहीं है।
मोबाइल में गाने बजाने शुरू कर दिये। पहली बार जंगल में चलते हुए गाने बजा रहा था। अटपटा सा लग रहा था।
मैदान आया। पगडण्डी बायें मुड गई। मैंने इसे छोडकर सीधे चलना ही उपयुक्त समझा। पहली गलती यही हुई।
यह एक शॉर्टकट था। आवाजाही न होने के कारण कोई पगडण्डी या निशान भी नहीं था। बाबाजी ने सलाह दी थी कि अगर शॉर्टकट से जाओ तो एक बडा ऊंचा पेड मिलेगा, उसे पार करते ही बायें मुड जाना और उतरते रहना। यहां देखा तो सारे के सारे पेड ऊंचे ही दिखे। इन स्थानीय लोगों ने उस एक पेड का नाम ‘ऊंचा पेड’ रखा हुआ है, मुझे क्या पता इस नाम का? मैं इसके बाद भी बायें नहीं मुडा, सीधे ही चलता रहा। यही दूसरी और जानलेवा गलती थी।

Thursday, May 9, 2013

सराहन से बशल चोटी तथा बाबाजी

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25 अप्रैल 2013
हमेशा की तरह उठने की वही बात- सिर पर सूरज आ गया जब मैं उठा। कल तो नहाया नहीं था। कमरे में गीजर भी लगा था, इरादा था नहाने का लेकिन देखा कि बिजली नहीं है तो इरादा बदलते कितनी देर लगती है?
बस अड्डे के पास एक ढाबा है जहां सुबह से शाम तक खाने पीने को मिलता रहता है। कल वहां जाकर चावल खाये थे। अब सुबह का समय, आलू के परांठे की तैयारी थी। एक परांठा मैंने भी बनवा लिया। साथ में चाय और आमलेट भी। पहले तो सोचा कि इतना बडा तीर्थ- भीमाकाली- यहां कहां अण्डे आमलेट मिलेंगे? फिर दिमाग में आया कि यह देवी भेड बकरे तक नहीं छोडती, अण्डा कहां ठहरता है? आमलेट को कहा तो तुरन्त हाजिर हो गया।
खा-पीकर डकार लेकर पैसे देकर जब बाहर निकला तो दुकान वाले से पूछा कि यहां से बशल चोटी दिखती है क्या? उसने एक ऐसी चोटी की तरफ इशारा कर दिया जो उस बूढे के सिर की तरह दिख रही थी जिस पर दो चार सफेद बाल ही रह गये हों। दो-चार जगह बर्फ थी वहां।

Monday, May 6, 2013

सराहन की ओर

23 अप्रैल 2013
कई दिनों की जद्दोजहद के बाद तय हुआ कि किन्नौर चला जाये। बीस दिन पहले की गई कांगडा यात्रा के दौरान दिल्ली से कांगडा जाने की बस यात्रा में बुरी हालत हो गई थी। उससे सबक लिया गया और कालका तक रेल से जाने के लिये हिमालयन क्वीन में आरक्षण भी करा लिया था। यह ट्रेन सराय रोहिल्ला से सुबह पौने छह बजे चलती है। डिपो से पांच बजे निकलने वाली पहली मेट्रो पकडी और कुछ ही देर में शास्त्री नगर और वहां से पैदल दस मिनट में सराय रोहिल्ला। जब मैं स्टेशन पहुंचा, तब तक ट्रेन प्लेटफार्म पर लगी भी नहीं थी।
पहले यह गाडी निजामुद्दीन से चलती थी और नई दिल्ली, सब्जी मण्डी रुकते हुए आगे की यात्रा करती थी। मैंने पहले भी इसे एक बार सब्जी मण्डी से पकडा है। उस समय यह ज्यादा मित्रवत प्रतीत होती थी। अब सराय रोहिल्ला से चलती है तो लगता है जैसे विदेश से चलती हो। इतनी सुबह नई दिल्ली के मुकाबले सराय रोहिल्ला विदेश जाने के बराबर ही है।
गाडी प्लेटफार्म पर लगी। इसमें बैठने की सीटें होती हैं। मेरी सीट खिडकी वाली थी, बराबर में किसी का आरक्षण नहीं था। तुरन्त लेट गया और सो गया। एक जगह टीटी आया टिकट चेक करने बस।

Friday, May 3, 2013

पालमपुर का चिडियाघर और दिल्ली वापसी

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6 अप्रैल 2013
बरोट में थे हम। सोकर उठे तो दिन निकल गया था। साढे आठ बज चुके थे। कल तय हुआ था कि आज हम रेल की पटरी के साथ साथ पैदल चलेंगे और जोगिन्दर नगर पहुंचेंगे। अपनी यह मंशा हमने चौकीदार को बताई तो उसने हमें जबरदस्त हतोत्साहित किया। रास्ता बडा खतरनाक है, भटक जाओगे, घोर जंगल है, भालू काफी सारे हैं, कोई नहीं जाता उधर से। हमने कहा कि भटकेंगे क्यों? रेल की पटरी के साथ साथ ही तो जाना है। बोला कि मेरी सलाह यही है कि उधर से मत जाओ।
नटवर से गुफ्तगू हुई। हिमानी चामुण्डा जाने से पैरों में जो अकडन हुई थी, वो अभी तक मौजूद थी। चौकीदार के हतोत्साहन से पैरों की अकडन भी जोश में आ गई और एक सुर में दोनों ने चौकीदार से पूछा कि अब जोगिन्दर नगर की बस कितने बजे है? सवा नौ बजे।
सवा नौ बजे लुहारडी से आने वाली बस आ गई और पौने दो घण्टे में इसने हमें जोगिन्दर नगर पहुंचा दिया। जाते ही पठानकोट जाने वाली बस मिल गई। इसमें टिकट लिया गया पालमपुर तक का। पालमपुर से आगे एक चिडियाघर है। मैंने तो खैर यह देखा हुआ है, नटवर की बडी इच्छा थी इसे देखने की। अगर नटवर की जिद न होती तो हम कांगडा उतरते और ततवानी तथा मसरूर देखते। आज रात दस बजे पठानकोट से हमारी ट्रेन है, इसलिये उसका भी ख्याल रखना पडेगा।

Wednesday, May 1, 2013

डायरी के पन्ने- 6

16 अप्रैल 2013, मंगलवार
1. अनुज धीरज दिल्ली आया। उसे कल नोएडा किसी प्राइवेट कम्पनी में नौकरी के लिये इंटरव्यू देने जाना है। वो अभी तक गांव के पास ही उसी कॉलेज में अध्यापक था, जिसमें पिछले साल उसने डिप्लोमा किया था।

17 अप्रैल 2013, बुधवार
1. धीरज नोएडा चला गया, मैं मेरठ चला गया। कल की मेरी छुट्टी है, पिछले सप्ताह गांव जाकर उसी दिन लौटना पडा था। आज खान साहब को अच्छी तरह समझा दिया कि इस बार मुझे न बुलाया जाए। मोहननगर से हरियाणा रोडवेज की हरिद्वार जाने वाली बस पकडी, खाली पडी थी। ‘
2. पता चला कि धीरज नोएडा में धक्के खा रहा है। असल में उसका इंटरव्यू ग्रेटर नोएडा सेक्टर 41 में था, जबकि वो ढूंढ रहा था नोएडा सेक्टर 41 में। बाद में उसे समझाया गया तब वो ग्रेटर नोएडा पहुंचा। शाम तक वापस लौट आया। इंटरव्यू अच्छा हुआ और बाद में फोन करके परिणाम बताये जायेंगे।

Monday, April 29, 2013

बरोट यात्रा

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5 अप्रैल 2013
छोटा सा बस अड्डा जोगिन्दर नगर का, उसमें भी बसों की भयंकर भीड। बडाग्रां से बीड जाने वाली एक बस खडी थी। हमें इससे क्या फायदा था? अगर यह बडाग्रां जाती तो चढते भी। एक बार तो मन में आया कि आज यहीं रुक जाते हैं, सुबह सात बजे चलने वाली छोटी गाडी से बैजनाथ पपरोला चले जायेंगे। वहां से आगे चिडियाघर और ततवानी, मसरूर। लेकिन तभी पता चला कि बरोट के लिये ढाई बजे सरकारी बस आयेगी।
बस आई। भीड टूट पडी। खैरियत कि हमें बैठने की जगह मिल गई। घटासनी जाकर आधे घण्टे के लिये बस रुक गई। घटासनी से सीधी सडक मण्डी चली गई जबकि बायें मुडकर बरोट।
घटासनी से चढाई शुरू हुई और झटींगरी में जाकर खत्म हुई। झटींगरी के बाद बस ऊहल घाटी में उतरने लगी। यहां से धौलाधार के बर्फीले पर्वतों के अलावा सुदूर किन्नौर के बर्फीले पर्वत भी दिख रहे थे। टिक्कन में ऊहल नदी पार की।