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Monday, December 31, 2012

2012 की घुमक्कडी का लेखा जोखा

2012 चला गया। इस साल घुमक्कडी में एकाध नहीं बल्कि तीन महान उपलब्धियां हासिल हुईं। आगे बताया जायेगा तीनों महान उपलब्धियों के साथ साथ पिछले बारह महीनों में की गई हर छोटी बडी यात्रा के बारे में।
1. मावली- मारवाड मीटर गेज ट्रेन यात्रा- मावली से मारवाड तक चलने वाली 152 किलोमीटर की दूरी तय करने वाली इस ट्रेन में 7 फरवरी को यात्रा की गई। इससे एक दिन पहले रेवाडी से रींगस होते हुए फुलेरा तक की यात्रा भी इसी ट्रिप का हिस्सा है।


Friday, December 28, 2012

टहला बांध और अजबगढ

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जब नीलकंठ महादेव से वापस जयपुर जाने के लिये चल पडे तो टहला से कुछ पहले अपने बायें एक बडी झील दिखाई पडी। इसमें काफी पक्षी आनन्द मना रहे थे। सर्दियां आने पर उत्तर भारत में पक्षियों की संख्या बढ जाती है। ये बढे हुए पक्षी सुदूर उत्तरी ध्रुव के पास यानी साइबेरिया आदि ठण्डे स्थानों से आते हैं। विधान ने बिना देर किये मोटरसाइकिल सडक से नीचे उतारकर झील के पास लगा दी।
इसका नाम या तो मंगलसर बांध है या फिर मानसरोवर बांध। हमें देखते ही बहुत से पक्षी इस किनारे से उडकर दूर चले गये। मैं और विधान अपने अपने तरीके से इनकी फोटो खींचने की कोशिश करने लगे।
मैं ना तो पक्षी विशेषज्ञ हूं, ना ही बडा फोटोग्राफर। फिर भी इतना जानता हूं कि पक्षियों की तस्वीरें लेने के लिये समय और धैर्य की जरुरत होती है। चूंकि कोई भी पक्षी हमारे आसपास नहीं था, सभी दूर थे, इसलिये मनचाही तस्वीर लेने की बडी परेशानी थी।
मैं चाहता था कि एक ऐसी तस्वीर मिले जिसमें पक्षी पानी में तैरने के बाद उडने की शुरूआत करता है। उसके पंख उडने के लिये फैले हों और पैर पानी में हों। हालांकि इस तरह की एक तस्वीर लेने में कामयाबी तो मिली लेकिन मुझे यह तस्वीर ज्यादा पसन्द नहीं आई।
फिर भी कुछ बेहतरीन फोटो आये हैं, जिसमें लाइन बनाकर तैरते पक्षी हैं। 60 गुना बडा करने वाला कैमरा बहुत काम आया। आज पता चला कि बर्ड फोटोग्राफी करने के लिये जूम कितनी काम की चीज है। जूम के साथ स्टेबलाइजर भी काम की चीज है। इतना बडा जूम करने के बाद हाथ में कैमरा लेते हैं तो हमें ऑब्जेक्ट दिखाई भी नहीं देता- इधर उधर हो जाता है।
टहला से चलने के बाद हम उस तिराहे पर पहुंचे जहां से सीधा रास्ता अजबगढ जाता है और बायें वाला भानगढ। हम सीधे चल पडे। कुछ दूर चलते ही एक छोटा सा बांध मिला। इसमें दो तीन जने नहा रहे थे। हमें भी देखते ही तलब लग गई। कपडे उतारकर पानी में घुसे तो लगा जैसे कि हरिद्वार में हर की पैडी पर नहा रहे हों। बेहद ठण्डा पानी।
यहां से अजबगढ ज्यादा दूर नहीं है। अजबगढ की कहानी भी कुछ कुछ भानगढ से मिलती जुलती है। किला भी है और कुछ पुराने खण्डहर भी। अजबगढ में घुसने से पहले एक बडा बांध भी है। यहां भी काफी पक्षी थी लेकिन वे हमारी पहुंच से बाहर थे।

Wednesday, December 26, 2012

नीलकंठ महादेव मन्दिर- राजस्थान का खजुराहो

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26 नवम्बर 2012 की शाम के सवा चार बजे थे, जब हमने भानगढ से प्रस्थान किया। लक्ष्य था नीलकण्ठ महादेव। साढे पांच बजे हम नीलकण्ठ महादेव पर थे।
पता नहीं किस वर्ष में राजा अजयपाल ने नीलकण्ठ महादेव की स्थापना की। यह जगह मामूली सी दुर्गम है। जब भानगढ से अलवर की तरफ चलते हैं तो रास्ते में एक कस्बा आता है- टहला। टहला से एक सडक राजगढ भी जाती है।
टहला में प्रवेश करने से एक किलोमीटर पहले एक पतली सी सडक नीलकण्ठ महादेव के लिये मुडती है। यहां से मन्दिर करीब दस किलोमीटर दूर है। धीरे धीरे सडक पहाडों से टक्कर लेने लगती है। हालांकि इस कार्य में सडक की बुरी अवस्था हो गई है लेकिन यह अपने मकसद में कामयाब भी हो गई है। कारें इस सडक पर नहीं चल सकतीं, जीपें और मोटरसाइकिलें कूद-कूदकर निकल जाती हैं।
आठ दिन की इस यात्रा में यह जगह मुझे सर्वाधिक पसन्द आई। साढे पांच बजे जब हम यहां पहुंचे तो एक छोटे से गांव से निकलते हुए मन्दिर तक पहुंचे। टहला से चलने के बाद पहाड पर चढकर एक छोटे से दर्रे से निकलकर एक घाटी में प्रवेश करते हैं। यह घाटी चारों तरफ से पहाडों से घिरी है, साथ ही घने जंगलों से भी।
अन्धेरा होने लगा था। एक पुलिस वाले ने मुझे फोटो खींचते देखकर पर्ची कटवाने की सलाह दी, जिसे मैंने तुरन्त मान लिया। पच्चीस रुपये की पर्ची कटी।
कल विधान की शादी की सालगिरह है। चलते समय गृह मन्त्रालय का सख्त आदेश था कि सालगिरह धूम-धाम से मनानी है। उधर भानगढ से यहां तक के घण्टे भर के सफर में मैंने विधान के मन में घुस-घुसकर यह निष्कर्ष लगाया कि महाराज गृह मन्त्रालय की बात टाल सकते हैं। इसी का नतीजा हुआ कि मैं नीलकण्ठ पहुंचते ही जिद कर बैठा कि आज यहीं रुकेंगे।
एक स्थानीय लडके से पता चला कि पूरे गांव में रुकने का वैसे तो कोई आधिकारिक ठिकाना नहीं है लेकिन किसी भी घर में जाकर ‘भिक्षां देहि’ जैसी भावना प्रदर्शित करेंगे तो कोई मना नहीं करेगा। यह सुनते ही मैंने तुरन्त उसी लडके के सामने ‘झोली’ फैला दी जिसे उसने अविलम्ब सहर्ष स्वीकार कर लिया। विधान ने काफी कुरेदा ताकि लडका अगर मना ना भी करे तो मना करने की मनोस्थिति में आ जाये लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।

Monday, December 24, 2012

भानगढ- एक शापित स्थान

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आज की शुरूआत एक छोटी सी कहानी से करते हैं। यह एक तान्त्रिक और एक राजकुमारी की कहानी है। तान्त्रिक राजकुमारी पर मोहित था लेकिन वह उसे कोई भाव नहीं देती थी। चूंकि राजकुमारी भी तन्त्र विद्या में पारंगत थी, इसलिये उसे दुष्ट तान्त्रिक की नीयत का पता था। एक बार तान्त्रिक ने राजकुमारी की दासी के हाथों अभिमन्त्रित तेल भिजवाया। तेल की खासियत यह हो गई कि वह जिसके भी सिर पर लगेगा, वो तुरन्त तान्त्रिक के पास चला जायेगा। राजकुमारी पहचान गई कि इसमें तान्त्रिक की करामात है। उसने उस तेल को एक शिला पर फेंक दिया और जवाब में वह शिला तान्त्रिक के पास जाने लगी। बेचारे तान्त्रिक की जान पर बन गई। शिला क्रिकेट की गेंद तो थी नहीं कि तान्त्रिक रास्ते से हट जायेगा और वो सीधी निकल जायेगी। अभिमन्त्रित थी, तो तान्त्रिक कितना भी इधर उधर भागेगा, शिला भी उतना ही इधर उधर पीछा करेगी। जब तान्त्रिक के सारे उपाय निष्क्रिय हो गये, तो उसने श्राप दे दिया। श्राप के परिणामस्वरूप शिला फिर से बावली हो गई और अब वो नगर को ध्वस्त करने लगी। उसी ध्वस्त नगर का नाम है भानगढ।
प्रवेश द्वार पर लगे शिलालेख के अनुसार भानगढ को आमेर के राजा भगवन्त दास ने सोलहवीं सदी के आखिर में बसाया। आज यहां सबकुछ उजाड है मात्र तीन चार मन्दिरों को छोडकर। राजमहल तो पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है।
इसके बारे में भयंकर तरीके से प्रचलित है कि यह स्थान शापित और भुतहा है। बडी भयानक और डरावनी कहानियां भी सुनी-सुनाई जाती हैं। यह भी कहा जाता है कि यहां रात को जो भी कोई रुका है, सुबह जिन्दा नहीं मिला। रात में भूत-बाजार लगने की भी बातें सुनाई देती हैं।
मुझे इन सब बातों पर यकीन है। चूंकि मैं बिना शर्त भगवान को मानता हूं, तो मेरी मजबूरी बन जाती है कि शैतान को भी मानूं।
जयपुर में विधान चन्द्र के यहां साइकिल खडी की और हम दोनों मोटरसाइकिल पर निकल पडे भानगढ की ओर। दोपहर ग्यारह बजे जयपुर से चले क्योंकि इससे पहले मन में कोई योजना नहीं थी इधर आने की। अगले दिन विधान की शादी की सालगिरह थी, इसलिये आज ही वापस भी लौटना था। हालांकि उन्होंने ऐसा किया नहीं।
दौसा-अलवर रोड पर एक गांव है- गोला का बास। यहीं से भानगढ का रास्ता जाता है जो दो किलोमीटर से ज्यादा नहीं मालूम पडता।

Friday, December 21, 2012

साम्भर झील और शाकुम्भरी माता

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24 नवम्बर 2012 को रात होने तक मैं साइकिल चलाकर पुष्कर से साम्भर झील पहुंच गया। अगले दिन जब पूछताछ की तो पता चला कि यहां से 23 किलोमीटर दूर एक लोकप्रिय मन्दिर है- शाकुम्भरी माता मन्दिर। इधर अपना भी फाइनल हो गया कि शाकुम्भरी तक चलते हैं।
साम्भर झील खारे पानी की एक बहुत बडी झील है। राजस्थान के अर्धमरुस्थलीय इलाके में फैली यह झील जयपुर, अजमेर और नागौर जिलों में स्थित है। वैसे तो साम्भर लेक नाम से जोधपुर लाइन पर रेलवे स्टेशन भी है लेकिन नजदीकी बडा स्टेशन छह किलोमीटर दूर फुलेरा है।
भौगोलिक रूप से इस झील को पानी की सप्लाई चारों तरफ से आती हुई कई नदियां करती हैं लेकिन शुष्क इलाके में उनसे नियमित सप्लाई सम्भव नहीं है। मानसून के दौरान ही इन नदियों में पानी रहता है, बाकी समय सूखी रहती हैं। इसलिये इसमें भू-गर्भ से पानी निकालकर भरा जाता है। पानी में नमक की मात्रा बहुत ज्यादा है, इसलिये यह झील नमक की ‘खेती’ के लिये जानी जाती है।
झील में नमक ढोने के लिये रेल लाइनें बिछी हुई हैं। साम्भर लेक स्टेशन के पास नमक शोधन कारखाना है जहां नमक की सफाई से लेकर पैकिंग तक होती है। इस कारखाने तक कच्चा नमक लाने के लिये झील के अन्दर बिछी रेल लाइनें बडी कारगर हैं। यहां दो गेज की लाइनें हैं- मीटर और नैरो। कारखाने के अपने छोटे छोटे इंजन हैं और नमक ढोने हेतु लकडी के छोटे छोटे डिब्बे भी हैं। लकडी के डिब्बे ही नमक के लिये सर्वोत्तम होते हैं क्योंकि लोहे का क्षरण बडी जल्दी होता है।
एक तरह से देखा जाये तो साम्भर एक ऐसी झील है जिसमें तीनों गेज की रेल पटरियां हैं- ब्रॉड, मीटर और नैरो। ब्रॉड गेज से भारतीय रेल गुजरती है जो झील के बीच से निकलती है। बाकी दोनों लाइनें नमक ढोने के लिये हैं।
झील के दक्षिणी किनारे से होते हुए 18 किलोमीटर दूर एक गांव है- कोरसीना, जहां से शाकुम्भरी मन्दिर पांच किलोमीटर दूर रह जाता है। वैसे कोरसीना से एक रास्ता रूपनगढ भी जाता है। मैं कल रूपनगढ से ही आया था लेकिन इस रास्ते को पकडने की बजाय नरैना वाला रास्ता पकड लिया। अगर कल रूपनगढ से साम्भर लेक जाने के लिये मैं यह कोरसीना वाला रास्ता पकड लेता तो आज दोबारा इस रास्ते पर नहीं आता।

Wednesday, December 19, 2012

पुष्कर- ऊंट नृत्य और सावित्री मन्दिर

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23 नवम्बर 2012.
पुष्कर में सालाना कार्तिक मेला शुरू हुए तीन दिन हो चुके थे। रोजाना सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित हो रहे थे। आज के कार्यक्रम के अनुसार मुख्य आकर्षण ऊंटों और घोडों का नृत्य था।
साइकिल यही आश्रम में खडी करके मैं पैदल मेला मैदान की तरफ चल पडा। मैदान में सामने नट अपना प्रदर्शन कर रहे थे। ये कल भी यही थे।
और जैसे ही लाउडस्पीकर पर घोषणा हुई कि ऊष्ट्र-अश्व नृत्य प्रतियोगिता शुरू होने वाली है, तो नटों के यहां अचानक रौनक खत्म हो गई। सब लोग नृत्य स्थान पर चले गये।
नृत्य स्थान के चारों तरफ इतनी भीड इकट्ठी हो गई कि पैर रखने की जगह भी नहीं बची। हालांकि मैंने मोर्चा जल्दी ही मार लिया था, इसलिये आगे पहुंच गया। बाहर तीन तरफ बहुत से पर्यटक ऊंटों पर बैठकर प्रतियोगिता देखने लगे।
पहले ऊंट नृत्य हुआ जिसमें तीन ऊंटों ने भाग लिया। उसके बाद घोडे नाचे। घोडे जल्दी प्रशिक्षित हो जाते हैं इसलिये उनका नृत्य ज्यादा प्रभावशाली लगा। बाजे के साथ कदमताल करते घोडे संसाधनहीन लोगों द्वारा बेहतरीन प्रशिक्षण का नतीजा थे।
ब्रह्मा के नाम पर बनी दुकान (ब्रह्मा मन्दिर) में जाने से पहले वही क्रियाकर्म करने पडते हैं, जो भारत की अन्य ‘दुकानों’ के बाहर होते हैं- जूते उतारना और मोबाइल, कैमरा, बैग बाहर रखना। जूते उतारना तो ठीक है लेकिन बाकी सामान भी बाहर रखना मेरी समझ से बाहर की बात है। यह हालत तब थी जबकि वहां राजस्थान पुलिस के जवान ही सारा मोर्चा सम्भाले हुए थे।
समझ नहीं आता कि मोबाइल, कैमरा, बैग बाहर क्यों रखवाये जाते हैं। मैं भले ही पूजा पाठ नहीं करता हूं लेकिन इतना जरूर जानता है कि पूजा-पाठ का इन चीजों से कोई सम्बन्ध नहीं है। दूसरा कारण सुरक्षा हो सकता है। इन चीजों के माध्यम से आपत्तिजनक चीजे, विस्फोटक अन्दर लाये जा सकते हैं। अगर विस्फोटकों से बचने के लिये इन चीजों को मन्दिर में ले जाना प्रतिबन्धित है तो मैं चाहता हूं कि मेट्रो स्टेशनों तथा रेलवे स्टेशनों पर भी इनपर प्रतिबन्ध लगाया जाये। अगर प्रशासन को मन्दिर के अन्दर बैग ले जाने पर डर लगता है तो स्टेशनों के अन्दर बैग ले जाने पर क्यों नहीं लगता? नई दिल्ली स्टेशन के बाहर हमेशा आधा किलोमीटर लम्बी कई लाइनें लगी रहती हैं क्योंकि स्कैनर मशीनों से सामान की चैकिंग की जाती है। क्या मन्दिरों में इस तरह की चैकिंग नहीं हो सकती?

Saturday, December 15, 2012

पुष्कर

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एक बार मैं और विधान गढवाल के कल्पेश्वर क्षेत्र में भ्रमण कर रहे थे, तो एक विदेशी मिला। नाम था उसका केल्विन- अमेरिका में बढई है और कुछ समय बढईगिरी करके जमा हुए पैसों से दुनिया देखने निकल जाता है। उसने बताया कि वो कई महीनों से भारत में घूम रहा है। विधान ठहरा राजस्थानी... लगे हाथों पूछ बैठा कि राजस्थान में कौन सी जगह सर्वोत्तम लगी। केल्विन ने बताया कि एक किला है। उसने खूब दिमाग दौडाया लेकिन नाम नहीं बता सका।
हमने अपनी तरफ से भी नाम गिनाये- आमेर, कुम्भलगढ, चित्तौडगढ, मेहरानगढ, जैसलमेर आदि लेकिन वो सबको नकारता रहा। आखिरकार अचानक बोला- बण्डी- उस किले का नाम है बण्डी। हम हैरान हो गये कि केल्विन की नजर में सर्वोत्तम बण्डी नामक किला है लेकिन यह है कहां। हमने भी पहली बार बण्डी नाम सुना। लेकिन जल्द ही पता चल गया कि वो बूंदी के किले की बात कर रहा है। बण्डी यानी बूंदी।
तभी से मुझे एक बात जंच गई कि बूंदी का किला एक बार जरूर देखना चाहिये। आज जयपुर में था तो बूंदी जाने के विचार मन में आने लगे। सुबह जब होटल से बाहर निकला तो बूंदी के लिये ही निकला। रात टोंक में रुकना तय हुआ।
चलते चलते होटल के रिसेप्शन में अखबार पर नजर पडी- पुष्कर में मेले का शुभारम्भ।
बस अड्डे के पास ही मैंने कमरा लिया था। जब यहां से साइकिल से टोंक रोड के लिये निकला तो कुछ दूर रेलवे लाइन के साथ साथ चलना हुआ। अब दिमाग से बूंदी उतरने लगा था और पुष्कर चढने लगा।
...
रात किशनगढ में रुका।
...
22 नवम्बर 2012 की दोपहर बाद मैं पुष्कर में था। ब्रह्मा नगरी पुष्कर। भारत में ब्रह्मा के कुछ ही गिने चुने मन्दिर हैं, उनमें पुष्कर भी है।
एक बार ऐसा हुआ कि ब्रह्माजी परेशानी में पड गये। उन्हें यज्ञ करना था और कोई भी जगह पसन्द नहीं आई। या फिर बहुत सी जगहें पसन्द आ गई होंगी। मतलब वे समझ नहीं पा रहे थे कि यज्ञ कहां किया जाये। कोई और होता तो वो शिवजी से पूछ आता। राक्षस भी शिवजी से ही शक्ति अर्जित करते थे लेकिन ब्रह्मा ठहरे ‘बडे देवता’। वे भला शिवजी से कैसे पूछ सकते थे? बडों के साथ यही परेशानी होती है कि वे खुद से ज्यादा बुद्धिमान किसी को नहीं समझते। नहीं तो किसी से भी अपनी परेशानी बताते, हल जरूर निकलता। टॉस नहीं करना पडता।

Thursday, December 13, 2012

और ट्रेन छूट गई

नवम्बर में एक ऐसा अदभुत योग बन रहा था कि मुझे अपने खाते से मात्र दो छुट्टियां खर्च करके उनके बदले में आठ छुट्टियां मिल रही थीं। यह योग बीस से सत्ताईस नवम्बर के बीच था। उधर चार दिसम्बर से बीस दिसम्बर तक सरकारी खर्चे से राजधानी एक्सप्रेस से कर्नाटक की यात्रा भी प्रस्तावित थी। राजधानी से जाने और आने के टिकट बुक हो चुके थे।
मन तो नहीं था नवम्बर में कहीं जाने का लेकिन जब दो के बदले आठ छुट्टियां मिल रही हों तो ऐसा करना पडा। एक साइकिल यात्रा का विचार होने लगा। पिछली नीलकण्ठ वाली साइकिल यात्रा से उत्साहित होकर सोच लिया कि ये आठों दिन साइकिल को ही समर्पित कर देने हैं। इसका दूसरा फायदा है कि सप्ताह भर बाद होने वाली कर्नाटक यात्रा की दिशा तय हो जायेगी- साइकिल ले जानी है या नहीं।
खूब सोच विचार करके भुज जाना पक्का हो गया। कहां ट्रेन से साइकिल लेकर उतरना है, कब कब कहां कहां जाना है, सब सोच लिया गया। एक दिन में 100 किलोमीटर साइकिल चलाने का लक्ष्य रखा गया।
लेकिन भुज जाने में अजमेर आडे आ गया। उन दिनों एक तो पुष्कर में मेला था और दूसरे अजमेर में भी मुसलमानों का कुछ बडा मौका था। तो अजमेर तक तो सीटें मिल रही थीं लेकिन उसके बाद सैंकडों वेटिंग। हां, भुज से वापस आने के लिये आला हजरत ट्रेन में पक्की बर्थ मिल गई।
भुज कैसे जायें? यह प्रश्न एक बडी उलझाऊ पहेली बन गया। सीधे अजमेर वाले रूट से जब हर तरह का जोड-तोड करके देख लिया तो इधर उधर के रूटों पर ताकझांक शुरू हुई। रतलाम-वडोदरा वाला रूट अजमेर का भी गुरू निकला।
जोधपुर से रात ग्यारह बजे के आसपास गांधीधाम के लिये एक ट्रेन चलती है। यह मंगलवार को तो चलती है लेकिन बुधवार को नहीं चलती। उधर दिल्ली से मंगल की सुबह चलकर शाम तक जोधपुर पहुंचना भी दुष्कर हो गया, कोई ट्रेन नहीं।
आखिरकार भुज का मामला रद्द करके कहीं और की सोच हावी होने लगी। उदयपुर की सीट मिल रही थी। भुज से वापसी का आरक्षण हो ही चुका था, सोचा कि उदयपुर से भुज तक जायेंगे साइकिल से। तभी दिखा कि जैसलमेर की सीटें भी हैं। सोचा कि चलो जैसलमेर से भुज चलते हैं। कभी सोचा कि उदयपुर से जैसलमेर तक साइकिल चलाते हैं। आठ दिनों में 800 किलोमीटर साइकिल चलाने का लक्ष्य था- अनुभवहीन सोच।