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Friday, August 31, 2012

भारत परिक्रमा- पांचवां दिन- असोम और नागालैण्ड

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आंख खुली दीमापुर जाकर। ट्रेन से नीचे उतरा। नागालैण्ड में घुसने का एहसास हो गया। असोम में और नागालैण्ड के इस इलाके में जमीनी तौर पर कोई फर्क नहीं है। हां, नागालैण्ड में दूर पहाडों की लम्बी श्रंखला दिख रही थी। स्टेशन का नाम डिमापुर लिखा हुआ था।
पहले जब पूर्वोत्तर में असोम को छोडकर बाकी राज्यों में इनर लाइन परमिट की जरुरत होती थी तो लोगों को इस लाइन पर यात्रा करने में बडी परेशानी होती थी। कारण था दीमापुर। गुवाहाटी से तिनसुकिया जा रहे हैं, डिब्रुगढ जा रहे हैं यानी असोम से असोम में जा रहे हैं, तो इस दीमापुर की वजह से परमिट बनवाना पडता था या फिर जुरमाना।
गुवाहाटी से डिब्रुगढ जाने वाले ज्यादातर लोग रेल का इस्तेमाल नहीं करते, बस से जाते हैं, जल्दी पहुंच जाते हैं। कारण है कि रेल पहले लामडिंग व दीमापुर होते हुए तिनसुकिया जायेगी, फिर डिब्रुगढ। जबकि अगर बस से जा रहे हैं तो रास्ते में ना तो लामडिंग आयेगा, ना दीमापुर बल्कि डिब्रुगढ पहले आयेगा, उसके बाद तिनसुकिया।
हालांकि डिब्रुगढ से एक लाइन सीधे सिमालुगुडी तक बना दी गई है, जिससे तिनसुकिया तक चक्कर लगाकर नहीं जाना पडता लेकिन अभी भी ज्यादातर ट्रेनें तिनसुकिया वाले लम्बे रूट से ही जाती हैं। इसका कारण शायद फौजी हैं, जो अपने घर जाने के लिये बडी संख्या में तिनसुकिया आते हैं।

Wednesday, August 29, 2012

भारत परिक्रमा- लीडो- भारत का सबसे पूर्वी स्टेशन

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आज का दिन मेरे घुमक्कडी इतिहास के मील का पत्थर है। असोम के बारे में जो भी भ्रान्तियां थीं, सब खत्म हो गईं। यह एक दिन इतना सिखा गया कि बता नहीं सकता। जी खुश है आज। आज असोम ने दिल जीत लिया। ऐसा तो अपने भी नहीं करते। धीरे धीरे बताता हूं कि आज क्या-क्या हुआ।
11 अगस्त की सुबह आंख खुली सिमालुगुडी जंक्शन पर। ट्रेन एक घण्टे लेट चल रही थी। हो जा जितना लेट होना है। तू जितनी भी लेट होगी, मैं उतना ही खुश होऊंगा। पौने छह घण्टे का मार्जिन है लीडो में और वहां करने धरने को कुछ नहीं। स्टेशन पर बैठकर मक्खियां ही गिननी पडेंगी। गिननी इसलिये क्योंकि मक्खियां मारनी बसकी बात नहीं है। चार घण्टे लेट हो जा; चल छोड, पांच घण्टे लेट हो जा मेरी तरफ से, मैं परेशान होने वालों में नहीं हूं।
लाकुवा, भोजो और सापेखाती के बाद मैं फिर सो गया। जब गाडी तिनसुकिया पहुंची, तब पता तो चल गया था लेकिन मैं उठा नहीं। मार्घेरिटा के बाद जाकर उठा, जब कुछ ही देर में लीडो पहुंचने वाले थे।

Monday, August 27, 2012

भारत परिक्रमा- तीसरा दिन- पश्चिमी बंगाल और असोम

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आज का दिन बेहद शानदार रहा। कल की सारी थकान मिट गई। आंख खुली छह बजे के आसपास। पता नहीं कि गाडी कहां है। मोबाइल ने जैसे ही नेटवर्क पकडा तो सबसे पहले गूगल मैप खोलकर देखा कि ट्रेन कहां है। ट्रेन कटिहार से आगे निकल चुकी थी लेकिन यह क्या????
इसे सीधे बारसोई की तरफ निकलना था जबकि यह जा रही है मालदा वाले रूट पर। तो क्या लम्बा चक्कर काटकर बारसोई जायेगी? हां जी, यह लम्बा चक्कर काटकर बारसोई गई। असल में यहां एक त्रिकोण बनता है। कटिहार, बारसोई और स्टेशन ‘क’ (नाम ध्यान नहीं- कटिहार मालदा रूट पर है)। कटिहार- न्यू जलपाईगुडी के बीच में बारसोई है। मेरे हिसाब से ट्रेन को सीधे बारसोई जाना था लेकिन यह पहले ‘क’ जायेगी, फिर वहां से मुडकर बारसोई यानी लम्बा चक्कर काटकर।
एक बार फिर से सो गया। अबकी आंख खुली रंगापानी पहुंचकर- न्यू जलपाईगुडी से बिल्कुल पहले। ट्रेन रुकी हुई थी। करीब आधे घण्टे तक ट्रेन यहां खडी रही। इसके बाद न्यू जलपाईगुडी पहुंची। यह एनजेपी के नाम से ज्यादा जाना जाता है।

Saturday, August 25, 2012

भारत परिक्रमा- दूसरा दिन - दिल्ली से प्रस्थान

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देखा जाये तो आज यात्रा का पहला दिन है लेकिन चूंकि ट्रेन रात पौने ग्यारह बजे की थी, इसलिये कल का दिन पहला दिन माना गया। अगर ट्रेन सही समय पर चलती तो कल यानी 8 अगस्त को पन्द्रह मिनट की यात्रा होती। 
चार बजे अलार्म बजा, मेरी आंख खुली। दस मिनट बाद ही आवाज गूंजी कि पूर्वोत्तर सम्पर्क क्रान्ति प्लेटफार्म नम्बर बारह पर खडी है। अब इतना तो पक्का हो गया कि ट्रेन तैयार है, अब इससे ज्यादा लेट नहीं होगी। मैं वेटिंग रूम से अपना बोरिया बिस्तर समेटकर ट्रेन में जा घुसा। ठीक साढे चार बजे गाडी चल दी और अपनी भारत परिक्रमा की विधिवत शुरूआत हो गई- पौने पांच घण्टे लेट।
साढे नौ बजे आंख खुली। गाडी अच्छलदा से निकल चुकी थी। घण्टे भर में कानपुर पहुंच जायेगी। और पहुंच भी गई। नई दिल्ली से चलने के छह घण्टे बाद मैं कानपुर में था।
मैं कानपुर तक कई बार आ चुका हूं, दो बार इलाहाबाद तक और एक बार मुगलसराय और गया होते हुए हावडा तक। इस रूट पर खासकर इलाहाबाद तक कोई खास प्राकृतिक दृश्य ना होने के कारण यात्रा करने में उतना मजा भी नहीं आता। फिर मुझे जो मजा नये रूट पर आता है, उतना पुराने रूट पर नहीं आता। इसलिये ज्यादातर समय अपनी ऊपर वाली बर्थ पर पडे पडे ही बिताया।

Thursday, August 16, 2012

भारत परिक्रमा- पहला दिन

8 अगस्त 2012 की सुबह मैं नाइट ड्यूटी से निपटकर घर पहुंचा। आज रात पौने बारह बजे जैसे ही नई दिल्ली से पूर्वोत्तर सम्पर्क क्रान्ति रवाना होगी, तभी अपनी भारत परिक्रमा शुरू हो जायेगी। बडा उत्साह था इस मेगा यात्रा को शुरू करने का। कभी इतनी लम्बी ना तो रेल यात्रा की और ना ही कोई और यात्रा। 12000 किलोमीटर से भी ज्यादा की यात्रा होगी यह।
कोई जल्दी तो थी नहीं मुझे ट्रेन पकडने की। घर जाकर सो गया। दोपहर को उठा तो रातभर के जागरण की थकान मिट गई थी। बाहर देखा तो बारिश पड रही थी। दिल्ली में पिछले कई दिन से मौसम अच्छा है। भले ही अभी तक बारिश ने वो मानसून वाला रूप ना दिखाया हो, लेकिन बादल बडे मेहरबान हैं। हल्की फुल्की फुहार भी समय-बेसमय हो जाती है। इस समय भी फुहार हो रही थी।
अमित का फरमान आया कि तू इतने दिनों के लिये जा रहा है, मुझे भूखा मरना पडेगा। असल में जब अमित नहीं होता तो मैं भूखा मरता हूं और जब मैं नहीं होता तो अमित भूखा मरता है। दोनों साथ होते हैं तो साथ ही खाना बनाते हैं। अगर दोनों में से एक नहीं होगा तो खाना नहीं बनेगा। फिर या तो भूखे ही गुजारा करते हैं या दूध ब्रेड से पेट भरते हैं।

Thursday, August 9, 2012

दिल्ली से जैसलमेर और मुनाबाव

एक रेल यात्रा याद आ रही है। इसका मैंने आज तक कभी भी जिक्र नहीं किया है। यह चार दिनों की यात्रा थी और इसमें चारों दिन पैसेंजर ट्रेनों में ही रहना था। सबसे बडी बात है कि इसके फोटो भी हैं मेरे पास।
दिल्ली से चलकर आधी रात को मैं रेवाडी पहुंच गया। तारीख थी 19 अक्टूबर 2010. रेवाडी से सुबह सादुलपुर वाली पैसेंजर पकडी। रास्ते में महेन्द्रगढ और लोहारू बडे स्टेशन पडे। लोहारू जंक्शन भी है जहां से मीटर गेज की लाइन सीकर और आगे जयपुर चली जाती है। मेरा इधर आना पहली बार हुआ था।
तब तक सादुलपुर से चुरू की तरफ रेल यातायात शुरू नहीं हुआ था- गेज परिवर्तन का काम चल रहा था लेकिन हिसार और हनुमानगढ वाली लाइनें चालू थी। हिसार वाली लाइन को बडा बनाया जा चुका था जबकि हनुमानगढ वाली लाइन मीटर गेज ही थी, आज भी है।
सादुलपुर से सूरतपुरा तक हिसार और हनुमानगढ वाली लाइनें साथ साथ चलती हैं- मीटर गेज और ब्रॉड गेज। मैंने मीटर गेज की गाडी पकडी हनुमानगढ जाने के लिये। यहां से पहाडसर, नरवासी, हांसियावास, सिधमुख, अनूपशहर, कलाना, तहसील भादरा, गोगामेडी, श्री रामगढ, दीपलाना, नोहर, भुकरका, खनानियां, सुरेरा, ऐलनाबाद, तलवाडा झील, टीबी, जोडकियां, हिरनवाली आदि स्टेशन पडे। खैर, हनुमानगढ पहुंचे। यहां से एक बडी लाइन भटिण्डा जाती है और दूसरी बडी लाइन बीकानेर। जबकि श्रीगंगानगर के लिये एक छोटी लाइन भी है। जिस ट्रेन से मैं आया था, उसे श्रीगंगानगर होते हुए सूरतगढ जाना था। वैसे तो हनुमानगढ से सूरतगढ सीधे बडी लाइन से पचासेक किलोमीटर ही है लेकिन छोटी लाइन से इसकी दूरी दो सौ किलोमीटर के आसपास है। श्रीगंगानगर और उससे भी आगे पाकिस्तान सीमा के पास बसे कई गांवों और कस्बों से होती हुई जाती है यह छोटी लाइन। हालांकि आज श्रीगंगानगर से आगे यह लाइन बन्द है गेज परिवर्तन के लिये।

Tuesday, August 7, 2012

रेल यात्राओं की कुछ यादें-1

भारत परिक्रमा यात्रा शुरू होने वाली है। बडा उत्साह है मुझे इस यात्रा पर जाने का। मुझे पता है कि लगातार ट्रेनों में बैठे रहने से दो तीन दिन बाद ही बोरियत शुरू हो जायेगी। लेकिन अलग-अलग जगहों पर जाना, वहां के नजारे देखना, विभिन्न भाषाओं वाले लोगों से मिलना, अलग-अलग खान-पान को चखना; यह सब मुझे इस बारह दिन की यात्रा में मिलेगा।
जब मैं लोगों को बताता हूं कि भारत परिक्रमा कर रहा हूं, तो वे भी बडे खुश हो जाते हैं लेकिन अगली बात सुनते ही उनकी खुशी दूर हो जाती है। अगली बात ये है कि मुझे इस यात्रा में ट्रेनों से नीचे नहीं उतरना है। नीचे उतरना भी है तो स्टेशन से बाहर नहीं निकलना है। एक ट्रेन से उतरते ही अगली ट्रेन की प्रतीक्षा शुरू कर देनी है। यह प्रतीक्षा जहां गुवाहाटी में बारह घण्टों की रहेगी, वहीं त्रिवेन्द्रम में आठ घण्टों की, मुम्बई में छह घण्टों की और अहमदाबाद में भी करीब छह घण्टों की ही रहेगी। बाकी जगहों पर और भी कम समय मिलेगा।

Sunday, August 5, 2012

नेपाल से भारत वापसी

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13 जुलाई की शाम थी और मैं बेगनासताल से पोखरा के लिये वापस चल दिया। 7 बजकर 40 मिनट पर सुनौली की बस थी, जिसका टिकट मैंने साढे चार सौ रुपये देकर पहले ही बुक करा लिया था। मैं 7 बजकर 35 मिनट पर बस स्टैण्ड पर पहुंचा, तो पता चला कि बस दस मिनट पहले ही चली गई है यानी 7 बजकर 25 मिनट पर ही। मैं बस स्टैण्ड के अधिकारियों पर खदक पडा कि टिकट पर बस का टाइम सात चालीस लिखा है तो वो पन्द्रह मिनट पहले क्यों चली गई। बोले कि तुम्हारी घडी सही नहीं है, बस अपने निर्धारित समय पर ही गई है। असल में नेपाल का समय भारतीय समय से पन्द्रह मिनट आगे है। मैं नेपाल में प्रविष्ट तो हो गया था लेकिन घडी को नेपाली समय से नहीं मिलाया, भारतीय ही रहने दिया।
जब अकल ठिकाने लग गई तो पूछा कि अगली बस कितने बजे है तो पता चला कि सुबह पांच बजे। अब सुनौली के लिये कोई बस नहीं है। यानी मेरा कल लुम्बिनी देखना रद्द हो जायेगा। और लुम्बिनी की बात छोडिये, साढे चार सौ रुपये गये पानी में। अधिकारियों ने पैसे लौटाने से मना कर दिया। ऊपर से अब पोखरा में तीन सौ का कमरा भी लेना पडेगा। कल फिर से साढे चार सौ का टिकट लेकर सुनौली जाना पडेगा। यानी एक ही झटके में साढे सात सौ रुपये का नुकसान!

Friday, August 3, 2012

पोखरा- शान्ति स्तूप और बेगनासताल

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ज्यादा दूर नहीं चलना पडा और एक कच्ची सडक ऊपर की तरफ जाती दिख गई। आधे घण्टे से ज्यादा और एक घण्टे से कम लगा मुझे पैदल शान्ति स्तूप तक जाने में। इसे इंग्लिश में पीस पैगोडा (Peace Pagoda) कहते हैं। यहां से पोखरा शहर का एक बडा हिस्सा और फेवा ताल भी दिखता है। समुद्र तल से ऊंचाई लगभग 1100 मीटर है।
जापानियों की एक संस्था ने इसका निर्माण किया। इसके निर्माण के समय बुद्ध विरोधियों ने एक जापानी की हत्या भी कर दी थी, उसकी यादगार भी पैगोडा के पास ही बनी हुई है। झक सफेद रंग का स्तूप बडा शानदार लगता है। स्तूप की चार दिशाओं में बुद्ध की विभिन्न मुद्राओं की मूर्तियां भी हैं। आज जब चारों तरफ बादल थे, यह और भी निखर आया था। बादलों की वजह से अन्नपूर्णा श्रंखला की चोटियां भी नहीं दिख रही थीं।
यहां से जब मैं नीचे उतर रहा था, तो मेरे साथ दो भारतीय नेपाली गाइड के साथ साथ नीचे ही जा रहे थे। लहजे से वे मुझे मेरठ के आसपास के लगे। मैंने उनसे पूछा कि आप कहां के रहने वाले हो। उन्होंने हिन्दी भाषी को देखकर तुरन्त समझ लिया कि बन्दा भारतीय है। बोले कि यूपी के। यूपी में कहां से? बताने की बजाय उल्टा मुझसे ही पूछ लिया कि तुम कहां के हो। मैंने कह दिया कि तुम्हारा पडोसी हूं। मतलब? मतलब मेरठ का हूं। उन्होंने बताया कि वे मुजफ्फरनगर के हैं।

Wednesday, August 1, 2012

पोखरा- फेवा ताल और डेविस फाल

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12 जुलाई 2012 की शाम पांच बजे तक मैं पोखरा पहुंच गया। मुझे पोखरा के बारे में बस इतना ही मालूम था कि यहां एक ताल है जिसका नाम फेवा ताल है। मैं पृथ्वी चौक के पास था। बारिश हो रही थी, इसलिये एक शेड में शरण ले ली। बारिश थमी तो बाहर निकला और एक टैक्सी वाले से पूछा कि फेवा ताल कितना दूर है। बोला कि छह किलोमीटर है, आओ बैठो, आठ सौ रुपये लगेंगे। मैं किसी टैक्सी वाले से इस तरह के प्रश्न नहीं पूछता हूं, लेकिन पृथ्वी चौक से काठमाण्डू रोड पर काफी दूर तक इन्हीं लोगों का साम्राज्य रहता है, तो पूछना पडा।
काठमाण्डू की तरह यहां भी लोकल बस सेवा बडी अच्छी है- पोखरा मिनी माइक्रो बस सेवा। मुझे पूरी उम्मीद थी कि यहां से फेवा ताल के लिये कोई ना बस जरूर मिल जायेगी। मैं आज ताल के किनारे ही रुकना चाहता था। हालांकि ताल से दूर रुकने की अपेक्षा ताल के किनारे रुकना हमेशा महंगा होता है। किसी राह चलते आदमी से इस बारे में पूछा तो उसने बता दिया कि कहां से फेवा ताल की बस मिलेगी। बस मिलती, इससे पहले ही एक लडका मेरे पास आया और पूछा कि कमरा चाहिये? मैंने मना कर दिया। नेपाली भाषा भले ही देवनागरी में लिखी जाती हो, लेकिन जब कोई नेपाली आदमी हिन्दी बोलता है तो कभी कभी बडा मजेदार लगता है। उसने उसी मजेदार लहजे में कहा कि सभी लोग ताल के किनारे ही रुकना पसन्द करते हैं, हमारे यहां ताल से दूर कोई नहीं रुकता। मैंने पूछा कि कमरा कितने का होगा, तो बोला कि दो सौ से शुरू हैं। बिना टीवी और बिना टॉयलेट का दो सौ रुपये, इसके बाद जैसे जैसे सुविधा बढेंगी, किराया भी बढता जायेगा। आखिरकार मैंने उसकी बात मंजूर कर ली।