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Monday, May 21, 2012

जोशीमठ यात्रा- चमोली से वापस दिल्ली

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पांच तारीख थी और साल था यही अपना दो हजार बारह। रात हो गई थी, अन्धेरा भी हो गया था और मेरे साथ थे विधान चन्द्र उपाध्याय। हम दोनों चमोली में थे। जोशीमठ से आये थे, कल दिल्ली के लिये चल देना था। आज रात हम कर्णप्रयाग में रुकने की सोचकर आये थे लेकिन चमोली तक तो आ गये, आगे के लिये खूब जोर लगाया लेकिन असफल रहे। हमें यहां एक तीसरा और मिल गया, देहरादून जाना था उसे। वो भी आज कर्णप्रयाग में ही रुकना चाहता था। हम सब मिलकर किसी ट्रक को हाथ देते, वो नहीं रुकता। बस इसी तरह हाथ देते देते दोस्ती हो गई। आखिरकार तय हुआ कि चमोली में ही रुक लेते हैं। सामने ही एक होटल था, उसमें पांच सौ का कमरा साढे चार सौ तक आ गया। लेकिन तीन में से दो ठहरे एक नम्बर के कंजूस। तीसरे को भी कंजूस बनना पडा। पास में ही बद्रीनाथ-केदारनाथ मन्दिर समिति का एक रेस्ट हाउस था, उसमें गये तो पता चला कि आजकल यहां मरम्मत चल रही है। आने वाले सीजन की तैयारियां चल रही हैं। इसलिये कोई कमरा नहीं मिलेगा।

Wednesday, May 2, 2012

कल्पेश्वर यानी पांचवां केदार

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5 अप्रैल 2012 और हम थे जोशीमठ में। हम यहां तीन तारीख की शाम को आ गये थे। हमारा इरादा बद्रीनाथ जाने का था। कपाट नहीं खुले थे लेकिन फिर भी हम जाना चाहते थे। लोगों ने बताया कि बिना परमिट के नहीं जा पाओगे। हम परमिट भी ले लेते लेकिन फिर दिक्कत आती गाडी की। हजार दो हजार से कम में कोई नहीं ले जाता हमें बद्रीनाथ। इसलिये बद्रीनाथ जाना कैंसिल कर दिया और कल यानी चार तारीख को औली चले गये। वहां से शाम को वापस आये। आज जाना था हमें कल्पेश्वर। पहले से ही सोचकर आये थे कि अगर बद्रीनाथ नहीं जा पाये तो कल्पेश्वर जाना है।
हां, एक बात और रह गई। हम रास्ते में पडने वाले सभी प्रयाग देखते हुए आ रहे थे- देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग और नंदप्रयाग। अब बचा पांचवां यानी विष्णुप्रयाग। मुझे पता था कि अलकनन्दा में विष्णु गंगा आकर मिलती है, वहीं विष्णु प्रयाग है। विष्णुगंगा की घाटी यहां जोशीमठ से दिखाई देती है। कल जब औली गये थे तो अलकनन्दा के साथ साथ दूसरी दिशा में विष्णु घाटी भी दिखाई दे रही थी। औली से ही देखकर मैंने अन्दाजा लगाया था कि जोशीमठ से विष्णुप्रयाग तीन किलोमीटर से ज्यादा नहीं होना चाहिये।