Sunday, April 29, 2012

औली से जोशीमठ

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आखिरकार हम दोनों औली से वापस चल पडे। आज की यह पोस्ट कुछ ज्यादा नहीं है, बल्कि पिछली पोस्ट में बहुत ज्यादा फोटो थे, फिर भी कुछ फोटो बच गये थे तो उस कसर को आज निकाला गया है।
गोरसों बुग्याल में हमारी जान पहचान मुम्बई के एक परिवार से हुई। करीब तीन चार घण्टे तक हम साथ साथ रहे। उन्होंने हरिद्वार से ही एक कार बुक कर ली थी और गढवाल में घूम रहे थे। हमें इतनी जानकारी हो जाने के बाद कुछ ज्यादा मतलब उनसे नहीं रह गया था। अब हमें उनकी कार दिख रही थी। हम चाहते थे कि पैदल जाने के बजाय उनकी कार से ही जोशीमठ जायें। उसके लिये जरूरी था उनसे जान-पहचान बढाना ताकि अगर चलते समय वे शिष्टाचारवश भी कहें तो हम तुरन्त उनका पालन करे। हमने तय कर लिया था कि अगर उन्होंने यह ऑफर दिया तो हम इस मौके को किसी भी हालत में हाथ से नहीं जाने देंगे। गलती से भी शिष्टाचर नहीं दिखायेंगे, मना नहीं करेंगे। हम आज ही जोशीमठ से पैदल औली आये थे, गोरसों बुग्याल तक गये थे और थके हुए थे।
पार्किंग में कुछ लोग क्रिकेट खेल रहे थे, मुम्बई वाला भी उनमें शामिल हो गया। हम क्रिकेट खेलने के मूड में नहीं थे, इसलिये खेले नहीं। हमें आधा घण्टा हो गया कि उनका खेल बन्द हो और वे वहां से रवाना हों और हमसे भी साथ चलने को पूछें। हमने पिछले कुछ घण्टों से उनके दिमाग में यह बात अच्छी तरह घुसा दी थी कि हम पैदल ही जोशीमठ से आये हैं और अब फिर जोशीमठ ही जायेंगे।
जब क्रिकेट बन्द नहीं हुआ, हम दोनों उनकी प्रतीक्षा करके पक गये तो पके फल की तरह टूट कर गिर पडे। तय हुआ कि सडक पर ही पैदल चलते हैं, वे जब पीछे से आयेंगे तो शायद साथ चलने का ऑफर दे दें। आखिर वे भी घूमने वाले और हम भी घूमने वाले, पिछले चार घण्टों का साथ तो था ही। मैंने उन्हें कल चोपता जाने की सलाह भी दी थी, इस नाते उस सलाह के बदले कुछ दक्षिणा भी बनती है, इसलिये हम नाउम्मीद नहीं थे।
कम से कम तीन चार किलोमीटर तक सडक के साथ साथ जलेबी की तरह घूमते रहे, वे नहीं आये। हमें भी दो सौ पर्सेण्ट पक्का पता था कि वे आज जोशीमठ जायेंगे और फलाने होटल में रुकेंगे। कभी किसी की गाडी आ जाती, तो कभी किसी की लेकिन वे नहीं आये। आखिरकार उनकी गाडी दूर से आती दिखाई दी, तो हम तुरन्त उनके शिष्टाचार पर हां करने के लिये तैयार हो गये। लेकिन यह क्या????गाडी आई और सर्राटे से निकल गई। चारों के चारों पीछे घूमकर हमें देखते जा रहे थे।
अब तो कुछ उम्मीद नहीं बची। और अब हम क्यों सडक पर चलें? सडक ने हमें धोखा दे दिया और हमने भी इसे तुरन्त ही छोड दिया। पगडण्डी पकडी और नीचे उतरते गये। सवा छह बजे तक हम जोशीमठ में थे। खाया, पीया और सो गये। कल यहां लाइट थी, आज नहीं थी। आज बारिश हुई थी ना, इसलिये कहीं इसी वजह से लाइट चली गई होगी।
कल कल्पेश्वर चलेंगे।
जाटराम औली में उडनखटौले में

सावधान, आगे तीव्र मोड है।

औली से पर्वतों का नजारा

शानदार दृश्य

ऐसे नजारों की कमी नहीं है।

पानी की टंकी और पानी के स्रोत

कहां कहां टंगकर रहते हैं लोग? ऊपर टंगे एक गांव तक जाती सडक।

एक और बढिया नजारा

विधान चन्द्र उपाध्याय

जाटराम

दिन में चांद और वो भी हिमालय के ऊपर! यह नजारा था तो दोनों के सामने लेकिन दिखा केवल विधान को ही।

औली- जोशीमठ रोड के किनारे लिखा गया एक ‘श्लोक’

विधान के चेहरे पर थकान के कोई भाव नहीं हैं।

विधान और जाटराम में फरक साफ दिखाई दे रहा है।

और आखिर में इसी सडक के दो फोटो दिखाऊंगा। एक तो देख लिया दूसरा नीचे है।

कौन कहता है कि सडकों में जान नहीं होती, सडकें निर्जीव होती हैं? यह रही बलखाती, लहराती, घूमती, नाचती, कूदती, फांदती सजीव जीती जागती सडक।


जोशीमठ यात्रा वृत्तान्त
1. जोशीमठ यात्रा- देवप्रयाग और रुद्रप्रयाग
2. जोशीमठ यात्रा- कर्णप्रयाग और नंदप्रयाग
3. जोशीमठ से औली पैदल यात्रा
4. औली और गोरसों बुग्याल
5. औली से जोशीमठ
6. कल्पेश्वर यानी पांचवां केदार
7. जोशीमठ यात्रा- चमोली से वापस दिल्ली

Thursday, April 26, 2012

औली और गोरसों बुग्याल

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4 अप्रैल 2012 की दोपहर थी, मैं और विधान औली में थे। वो औली जो भारत में शीतकालीन खेलों के लिये प्रसिद्ध है। भारत में क्या, पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। यह सर्दियों में मनाली और गुलमर्ग से टक्कर लेता है। इसे कुछ लोग भारत का स्विट्जरलैण्ड भी कह देते हैं। हो सकता है कि जो लोग स्विट्जरलैण्ड गये हों, उन्हें औली सर्दियों में बिल्कुल वैसा ही दिखता हो। लेकिन आज जो औली हम देख रहे थे, वो स्विट्जरलैण्ड के आसपास तो क्या, दूर दूर भी नहीं दिख रहा था। बरफ कहीं नहीं थी और धूल उड रही थी।
इस सीजन में जमकर बर्फबारी हुई। दिसम्बर के शुरू से ही बर्फ पडनी शुरू हो गई थी और पूरे जाडों भर पडती रही। इस बार खूब शोर मचा कि इतनी बरफ कभी नहीं देखी। हमें भी पूरी उम्मीद थी कि औली में खूब बर्फ मिलेगी। बल्कि हम तो सोच रहे थे कि अगर स्कीइंग हमारे बजट के अनुकूल हुई तो उस पर भी हाथ आजमायेंगे। सब धरा का धरा रह गया। लेकिन कहीं बर्फ नहीं दिखी। सब उजाड।
अच्छा ढलान है औली में। स्कीइंग के लिये आदर्श। कई सारी स्की लिफ्ट भी हैं। यानी जब खिलाडी बर्फ पर फिसलता हुआ नीचे आ जाता है तो उसे ऊपर पहुंचाने के लिये ये लिफ्ट काम आती हैं। स्की लिफ्ट क्या कहें उन्हें, छोटे उडन खटोले ही कहना चाहिये। अंग्रेजी वालों के लिये रोप वे। जोशीमठ से औली वाली जो मुख्य रोपवे है, वो तो बन्द पडी थी लेकिन यहां औली में नीचे से ऊपर पहुंचाने के लिये एक रोपवे चालू थी। आने जाने का दो सौ रुपये का टिकट था। बर्फ थी नहीं, ढलान भी इतना नहीं था कि हम थक जाते लेकिन मजे के लिये दोनों ने चार सौ रुपये खर्च कर दिये। जोशीमठ-औली वाली रोपवे का जो आखिरी टावर है, उससे थोडा सा पहले ही हमें उतार दिया गया। भीड थी नहीं। उस आखिरी टावर के उस तरफ की पहाडियों पर अच्छी खासी बर्फ दिख रही थी। वहां पेड भी नहीं थे, बस बर्फ थी। उस बर्फ और हमारे बीच में जंगल भी दिख रहा था। मुझे समझते देर नहीं लगी कि वो गोरसों बुग्याल (Gorson Bugyal) है।
गोरसों बुग्याल औली से करीब तीन किलोमीटर दूर है। यह क्वारी पास (Kuari Pass) के रास्ते में पडता है। क्वारी पास वहां से करीब बीस किलोमीटर दूर है। सीधी सी बात है कि जब गोरसों पर इतनी बरफ है तो क्वारी पर कितनी होगी। हमने जब दिल्ली से निकलने की योजना बनाई थी तो हमारी लिस्ट में क्वारी पास भी था, तीन दिन लगने थे। लेकिन ऐन टाइम पर विपिन गौड के मना कर देने पर हमारा क्वारी पास जाना रद्द हो गया।
हमें नीचे जोशीमठ में ही पता चल गया था कि औली से आगे जाने के लिये परमिट की जरुरत पडती है, खासकर क्वारी पास जाने वालों के लिये। यहां एक ने बताया कि गोरसों के लिये भी परमिट की जरुरत है। साथ ही यह भी पता चला कि आगे संरक्षित वन क्षेत्र है, इसलिये परमिट तभी मिल सकेगा जब साथ में गाइड हो। हमें समझते देर नहीं लगी कि यह जो आदमी हमसे बता रहा है, वो गाइड ही है और यहां ‘ग्राहक’ पकडने में लगा है। संरक्षित क्षेत्र है, तो उसमें प्रवेश करने के लिये परमिट और कुछ फीस तो समझ में आती है लेकिन गाइड की जरुरत समझ से बाहर थी। विधान ने उससे थोडी बहुत बहस भी की, लेकिन उस बहस का कोई फायदा नहीं था।
अब हम दोनों ने अपना-अपना दिमाग लगाना शुरू किया। सामने कुछ ऊपर लगभग तीन किलोमीटर दूर गोरसों बुग्याल बर्फ से ढका दिखाई दे रहा था। औली महाप्रसिद्ध जगह है, तो गोरसों तक बढिया रास्ता मिल जायेगा, यह भी पूरी उम्मीद थी, इसलिये रास्ता भटकने का भी डर नहीं था। और तीन किलोमीटर में रास्ता भी क्या भटकना! जो चीज सामने दिख रही है, वहां तक जाने में क्या रास्ता भटकना? गाइड की कोई जरुरत ही नहीं थी। हम इसी मुद्दे पर परेशान थे और कोई हल ढूंढ रहे थे।
हमसे कुछ ऊपर कुछ खच्चर जा रहे थे। सीधी सी बात है कि वे पर्यटक ही थे और गोरसों ही जा रहे होंगे। एक बात और समझ में आई कि असली रास्ता वहां ऊपर से ही है। हम कुछ नीचे खुले मैदान में चल रहे थे। थोडा आगे ऊपर एक छोटा सा कमरा भी था। हमसे सोचा कि वो ही चेकपोस्ट है। हमने उस कमरे से बचकर निकलने का निर्णय लिया। विधान को भी समझा दिया कि अगर कोई आवाज लगाये तो पीछे मुडकर नहीं देखना है। बाद में जो होगा, देखा जायेगा। यही घुमक्कडी धर्म भी है। हमारे गुरूदेव राहुल सांकृत्यायन ने तिब्बत यात्रा छुपते छुपाते की थी, वे इस बात को सही ठहराते हैं तो हम भी उनके चेले हैं तो हम कैसे उन्हें गलत बता दें?
बाद में पता चला कि वो कमरा कोई चेकपोस्ट नहीं था, बल्कि चाय पानी की दुकान थी। उस दुकान के पीछे एक कमरा और था, वो बन्द था। शायद वो ही चेकपोस्ट हो। या फिर गाइड ही कुछ कमाने के चक्कर में परमिट के बारे में बोल रहा हो। हम खूब पीछे देखते गये, वापसी में उस चाय पानी की दुकान से चाय भी पी लेकिन ऐसा कुछ नहीं मिला।
औली से गोरसों बुग्याल जाने के लिये घने जंगल से होकर निकलना पडता है। जंगल शुरू होते ही बर्फ भी मिलनी शुरू हो गई। हमसे पहले बहुत लोग यहां से जा चुके थे, इसलिये बर्फ पर अच्छा खासा रास्ता बना था, भटकने की कोई नौबत ही नहीं आई। और भटककर जाते भी कहां? ऊपर ही चढते जाना था। कोई ज्यादा मुश्किल चढाई भी नहीं थी। हमारे आगे मुम्बई का एक परिवार भी चल रहा था, जो बाद में उस चाय पानी की दुकान तक लगभग हमारे साथ साथ ही रहा।
गोरसों बुग्याल लगभग 3400 मीटर की ऊंचाई पर है। यह जानकारी मुझे जीपीएस ने दी। विधान तो कह भी रहा था कि हम इस जगह को 4000 मीटर ऊंची बतायेंगे, कोई भी जांच-पडताल नहीं करेगा और हमारे खाते में एक और उपलब्धि जुड जायेगी। जांच-पडताल करेगा भी तो कह देंगे कि गलती हो गई।..... इससे करीब बीस किलोमीटर आगे क्वारी पास 3800 मीटर के करीब है, यानी कोई ज्यादा मुश्किल नहीं है क्वारी पास पार करना। बस औली तक गाडी से या उडनतश्तरी से आ जाओ, फिर पैदल चलो। और पैदल भी मुश्किल नहीं। कुछ लोग तो इसे सर्दियों में पार करते हैं। कल भी एक ग्रुप गया था। हम भी चले जाते, कोई ज्यादा मुश्किल नहीं आती लेकिन विपिन के मना कर देने पर हमने मानसिक रूप से तय कर लिया था कि नहीं जायेंगे। रास्ते के लिये दो-तीन दिन का राशन और टैण्ट-स्लीपिंग बैग साथ ले जाने पडते हैं।
यहां हम करीब दो घण्टे तक रहे। विधान बडा गजब का इंसान है। आगे चलता ही रहा। बुग्याल होते भी इसी तरह के हैं कि आगे चलते जाने को मन करता है। मुझे बर्फ से डर लगता है, इसलिये मैं नहीं जाना चाहता था बर्फ में और आगे। लेकिन विधान को देखकर मुझे भी जाना पडा। मैं उसके पास जाकर और आगे जाने की मना करना चाहता तब तक वो और आगे निकल गया होता। आखिरकार एक जगह वो रुका और मेरी पकड में आया। मैंने हाथ जोड दिये कि भाई, बस। अब और आगे नहीं। बोला कि नहीं, वो सामने चोटी दिख रही है ना। वहां तक जायेंगे बस। अगर नहीं जायेंगे तो उस चोटी का उलाहना रह जायेगा कि दो असली घुमक्कड आये थे, चोटी पर नहीं चढे। मैंने कहा कि भाई, उससे आगे ऐसी और भी चोटियां दिखेंगी, किस-किस पर चढता रहेगा?
मौसम खराब होने लगा था। हल्की बर्फबारी भी हुई। बादल भी गडगडा रहे थे लेकिन वे दूर थे। जब अचानक सिर के ऊपर गडगडाहट सुनाई पडी तो विधान का संविधान बोला कि वापस चलो। मैं पिछले साल जब करेरी झील गया था तो इसी तरह बादलों की गडगडाहट में फंस गया था, तब से मुझे गडगडाहट से भी डर लगता है। कुछ ऐसा ही डर विधान का भी है। वापस मुड गये। लेकिन अब बर्फ पर नीचे उतरना है। मुझे बर्फ पर चढने के मुकाबले नीचे उतरना मुश्किल लगता है। सामने हमें करीब एक किलोमीटर दूर जंगल में घुसने का रास्ता भी दिखाई दे रहा था। खुला ढलानदार मैदान है यह। हम थोडा चक्कर काटकर आये थे, अब सीधे उतर रहे थे। इसलिये हमारे आते समय के निशान किसी काम नहीं आये। यहां पट्ठे ने और भी दिलेरी दिखाई। जिस स्पीड से जमीन पर चलता है, उसी स्पीड से बर्फ पर उतरने लगा। अगला एक भी जगह ना फिसला, ना धंसा। उधर मेरी हवा खराब। विधान के पैर के निशान पर पैर रखता तो ऊपर वाले को याद करता कि ले गया। ले फिसला, ले धंसा, ले गिरा, ले....।
अभी हमें पूरा जंगल भी बर्फ से ही होकर पार करना पडेगा, यानी अगले दो ढाई किलोमीटर बर्फ पर ही चलना होगा। हालांकि यहां वो ग्लेशियरों वाली खतरनाक बर्फ नहीं थी, ना ही फिसलकर कहीं गहरी खाईयों में जा पडने का डर था लेकिन फिर भी बर्फ तो बर्फ होती है। हमें दो डण्डे पडे मिले। चेक करने पर मजबूत निकले। साथ ले लिये। बडे काम आये। आखिरकार राम-राम भजते इस बर्फ से बाहर निकले। रास्ते में एक जगह जानवर भी दिखा। काफी दूर था करीब सौ मीटर दूर। मैंने इसे कुत्ते का दर्जा दिया। जबकि विधान ने भेडिया बताया। बाद में मैंने भी उसका दर्जा थोडा बढाकर गीदड तक पहुंचा दिया।
वापस औली पहुंचे। उसी चाय पानी वाली दुकान पर गये। पच्चीस रुपये की एक कप चाय थी। विधान ने कहा कि एक कप चाय बनाओ, और उसे दो कपों में दे दो। लेकिन उन्होंने दो कप बनाई यानी पचास रुपये की। अब लडने की बारी हमारी थी। इसका फायदा ये हुआ कि वो चाय हमें बीस-बीस रुपये की पडी। और स्वाद? घण्टा स्वाद!
उडनतश्तरी बन्द थी। कोई यात्री ही नहीं था, तो वे क्यों उसे खाली घुमाते रहेंगे? उडनतश्तरी वाला सो रहा था। हम दो और चार मुम्बई वाले। कुल छह जने थे नीचे जाने के लिये। उसे जगाया गया। उसने नीचे अपने ‘जोडीदार’ से बात की और मशीन चालू हो गई। हम फिर से उडनतश्तरी पर सवार हो गए। नीचे पार्किंग में कुछ लोग क्रिकेट खेल रहे थे। यहां क्रिकेट खेलने पर कडा नियम ये है कि छक्का नहीं मार सकते। छक्का मारते ही बल्लेबाज आउट हो जाता है। आउट होना तो देखा जाये, बल्लेबाज पर दूसरी मार भी होती है। वो ये कि उसे गेंद कहीं नीचे से ढूंढकर लानी पडती है। और चूंकि औली ढलानदार मैदान जैसा है, तो गेंद पूरी तरह पाताल लोक में नहीं जाती, बीच में ही कहीं अटक जाती है।

जोशीमठ- औली रोड

औली में पार्किंग

उडनतश्तरी की कुर्सियां

और उडनतश्तरियां उड चलीं।

औली से नीती घाटी का नजारा

औली में उडनतश्तरी

औली की खूबसूरती

सीधे हम जा रहे हैं, दाहिने से भी एक रोपवे आ रहा है, वो जोशीमठ से आ रहा है जो आजकल बन्द था।

औली में रहने का खर्चीला इंतजाम

और अब चलते हैं गोरसों के लिये। यह है विधान।

जाट महाराज बर्फ से डरते हैं, इसलिये संभल कर चल रहे हैं।

बर्फीला जंगल। इस जंगल को पार करके गोरसों बुग्याल है।

जंगल में पडियार देवता का मन्दिर

सामने है गोरसों बुग्याल

आओ, थोडा ठण्ड झेलें।

मैं जब बनियान में बैठा था, तब विधान इस ड्रेस में था।

गोरसों बुग्याल

बुग्याल में ताल और बर्फ।

वो जाटराम है। विधान फोटो खींच रहा है।

बुग्याल में अच्छी खासी बर्फ थी।

विधान कह रहा था कि और आगे चलते हैं और वो गया भी। जाट बेचारा बडे धर्मसंकट में पड गया। जाऊं तो बरफ में चलना पडेगा, बर्फ से डर लगता है। ना जाऊं तो विधान चला जा रहा है, वो मजाक उडायेगा। आखिरकार जाना ही पडा।

विधान की योजना थी कि उस उच्चतम बिन्दु तक चलते हैं लेकिन भला हो बादलों का कि गडगना शुरू कर दिया। विधान इन गडगने से थोडा बहुत डरता है।

यह है विधान।

यह किसी जानवर का कंकाल बचा हुआ है। यानी यहां मांसाहारी जानवर भी हैं। हमें एक जानवर दिखा भी था, मैंने उसकी पहचान पहले कुत्ते फिर गीदड के रूप में की जबकि विधान ने कहा कि भेडिया है।

यह है आवश्यक सूचना कि औली से आगे जाने के लिये परमिट लेना जरूरी है। हमें यह सूचना गोरसों से वापस आकर दिखाई दी।

जाटराम औली में।

औली से दूर पहाडों का नजारा।

औली के ढलान।

औली की सुन्दरता

पार्किंग में क्रिकेट खेला जा रहा है। यहां छक्का मारने पर बल्लेबाज को छह रन नहीं मिलते, बल्कि आउट माना जाता है।

विधान और जाटराम का एकमात्र सम्मिलित फोटो

अगली गाथा में औली से जोशीमठ चलेंगे।



जोशीमठ यात्रा वृत्तान्त
1. जोशीमठ यात्रा- देवप्रयाग और रुद्रप्रयाग
2. जोशीमठ यात्रा- कर्णप्रयाग और नंदप्रयाग
3. जोशीमठ से औली पैदल यात्रा
4. औली और गोरसों बुग्याल
5. औली से जोशीमठ
6. कल्पेश्वर यानी पांचवां केदार
7. जोशीमठ यात्रा- चमोली से वापस दिल्ली

Sunday, April 22, 2012

जोशीमठ से औली पैदल यात्रा

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4 अप्रैल 2012 की सुबह थी। आठ बजे मेरी आंख खुली। देखा कि विधान नहा भी लिया है। आराम से हम इसलिये सोकर उठे क्योंकि हमें आज मात्र औली तक ही जाना था और वापस आना था। कल पता चल गया था कि जोशीमठ से औली जाने वाली उडनतश्तरी मैंटेनेंस के लिये बन्द कर रखी है। सडक मार्ग भी है जो 13 किलोमीटर लम्बा है। इसके अलावा तीसरा रास्ता भी है जिसे पैदल रास्ता कहते हैं। यह करीब 8 किलोमीटर का पडता है।
मैं दो साल पहले यमुनोत्री गया था, पिछले साल केदारनाथ यात्रा की। इन दोनों यात्राओं की खास बात यह रही कि दोनों जगह मैं ऑफ सीजन में गया था। कपाट खुलते हैं तो इन मन्दिरों में पूजा-पाठ शुरू हो जाती है। और इसके साथ ही शुरू हो जाता है यात्रा सीजन। ऑफ सीजन में जाना खासा मनोरंजक होता है मुझ जैसों के लिये। केदारनाथ जाने के लिये एक बार तो लगा कि नहीं जा पायेंगे, पुलिस वालों ने रोक लिये थे। कहते थे कि परमिट लाओ, तभी जाने देंगे। लेकिन नसीब नसीब की बात होती है, बिना परमिट के ही जा पहुंचे भगवान केदार के सूने पडे दरबार में।
लेकिन नसीब हमेशा साथ नहीं देते। यहां से यानी जोशीमठ से बद्रीनाथ करीब 50 किलोमीटर दूर है। बद्रीनाथ जाने के लिये परमिट की जरुरत पडती, जो कि यहीं से बन जाता लेकिन फिर दिक्कत आती कि कैसे जायें। केदारनाथ तो इसलिये चले गये क्योंकि वहां ऑफ सीजन में भी गौरीकुण्ड तक बसें जीपें चलती हैं। गौरीकुण्ड से पैदल यात्रा शुरू होती है लेकिन यहां जोशीमठ से आगे बसें जीपें नहीं चलतीं। इसलिये हमें एसडीएम से परमिट लेकर कोई गाडी करनी पडती जो हमारी जेब से हजारों का बिल बनवा कर ही चैन लेती। इसलिये बद्रीनाथ का प्रोग्राम खत्म करना पडा। हम ही जानते हैं कि उस समय हमारे दिल पर क्या बीती थी। दो धाम मैंने ऑफ सीजन में कर रखे थे, तीसरा आज हो जाता तो गंगोत्री को तो कभी भी नाप देते। चारों धाम ऑफ सीजन में हो जाते जाटराम के।
खैर, यहां हमने कमरा एक रात भर के लिये लिया था। इसे अगली रात के लिये भी बढवा दिया गया और फालतू भारी सामान यही रख दिया गया। चल पडे औली की तरफ। हां, चलने से पहले आलू के दो-दो परांठे और चाय भी उदरस्थ कर दिये गये। साथ में बिस्कुट-नमकीन के पैकेट लिये गये। औली में ये चीजें महंगी मिलती हैं।
किसी ने बता दिया कि इस सडक पर वहां से सीधे हाथ पर मुड जाना, फिर ऐसे मुडना, फिर वैसे मुडना, फिर ऐसे, फिर वैसे, फिर सीधे चढते जाना। भूल गये। शुरू में सीधे हाथ मुडकर ऐसे-वैसे मुडना भूल गये और एक बन्द जगह में पहुंच गये। एक से पूछा तो उसने बताया कि ऐसे चले जाओ, वहां से टैक्सी कर लेना। मैंने कहा कि भाई, पैदल वाले हैं हम, पैदल वाला शॉर्ट कट बता दे। पहले तो आंख फाडी और फिर बोला कि मरोगे क्या? औली बहुत दूर है, वहां पैदल नहीं जा पाओगे। मैं सही सलाह दे रहा हूं। अच्छा, उसके अलावा कोई आसपास था भी नहीं इसलिये उसी से पूछना मजबूरी बन गई। वो भी पक्का घाघ ही निकला, बताया नहीं, बल्कि यही सलाह देता रहा कि पैदल नहीं जा सकोगे। वापस मुडे, किसी और से पूछा, तब जाकर सही रास्ते पर आये।
आदि शंकराचार्य थे ना??? वही जिन्होंने पूरे भारत के चारों कोनों में चार धामों की स्थापना की। वे यहां जोशीमठ में ही टिके थे। एक कल्पवृक्ष था, जिसके नीचे उन्होंने ध्यान लगाया था। वो कल्पवृक्ष आज भी है। आज उसके नीचे छोटे मन्दिर बने हैं, पुराने हैं, इसलिये शंकराचार्य की अवधारणा समझ में आ जाती है। नही तो मैं ही खारिज कर देता कि यहां शंकराचार्य आये थे। मजाक में कह रहा हूं कि खारिज कर देता। वे महान घुमक्कड थे और ऐसे महात्माओं की हम बडी इज्जत करते हैं।
खैर, कल्पवृक्ष के लगभग नीचे से औली वाला शॉर्टकट ऊपर चढता है। ऊपर तक गांव बसे हैं, इसलिये इंसानों के साथ साथ पालतुओं की भी आवाजाही बनी रहती है। जगह जगह सडक भी रास्ता काटती रहती है। चारों ओर के बढिया नजारे देखने को मिलते हैं। ढाई घण्टे लगे हम दोनों को औली तक जाने में। पसीना भी डटकर आया लेकिन आखिरकार महसूस नहीं हुआ कि हम थक गये हैं। ना थकने की शिकायत विधान को भी थी। है ना मजे की बात!

जोशीमठ ज्योतिर्मठ का प्रवेश द्वार

ज्योतीश्वर महादेव मन्दिर- आदि गुरू शंकराचार्य की तपस्थली। इसके पीछे कल्पवृक्ष दिखाई दे रहा है। बताते है कि यह 2500 वर्षों से यहां खडा है।

महादेव मन्दिर के नन्दीगण



औली मार्ग से नीचे जोशीमठ और उसके पार पर्वतों का विहंगम नजारा

औली रोड से ऐसा दिखता है जोशीमठ

जोशीमठ के उस तरफ पहाड पर टंगे एक गांव तक जाने के लिये बनाई गई सडक

विधान चन्द्र उपाध्याय। अभी तक अपनी घुमक्कडी में मुझे दो ही ऐसे जीव मिले हैं, जिनसे मेरी सबसे ज्यादा बनती है। एक विधान और दूसरा अतुल। विधान एक कमजोर ताकतवर इंसान है। उसकी कमजोरी यह है कि वो मेरे बराबर नहीं चल सकता लेकिन ताकत यह है कि वो मुझसे हमेशा दस मीटर पीछे रहता है। मैं धीरे धीरे चलूं, तब भी दस मीटर और सुपरफास्ट चलूं, तब भी दस मीटर। है ना अजीब!

गजब का मोटापा और गजब का जज्बा। जोशीमठ से औली अच्छी खासी ऊंचाई पर है। हम पैदल गये थे। वापस आकर विधान के शब्द थे- यार, नीचे उतरना भारी पड रहा है। ऊपर जाने में पता ही चला कि हम कब ऊपर पहुंच गये। आमतौर पर होता उल्टा है।

मेरा घर से बाहर निकलना काफी होता है लेकिन आजतक पौधों के नाम तक पता नहीं चले। इसका नाम भी नहीं पता। लेकिन खूबसूरत लग रहा है।

जोशीमठ और उस तरफ अलकनन्दा घाटी।

ओहो, जाट महाराज बैठे हैं!

यह आफ्टर बसन्त है। धरती कितनी भी सूखी हो, लेकिन फूल मुस्कराते मिलते हैं।

यही छोटी सी बोतल सूमो पहलवान विधान की प्यास बुझाती थी और यही सूखे पहलवान जाटराम की भी।

फूल फिर से आ गये। नाम नहीं मालूम। एक तितली वाला फोटो भी खींचा था हमारे विधान भाई ने। पता नहीं कहां जा छुपा है।

अरे ये तो रहा। यह विधान का प्रोडक्ट है। उन्होंने ही खींचा है इस फोटो को। जाटराम में कहां इतनी अक्ल?

थकान तो हो ही जाती है। आराम करना भी जरूरी है।

रोंगटे खडे करने की जरुरत नहीं है। फोटो खींचने के लिये एक पैर पत्थर पर रख लिया, बस। विधान तो कह भी रहा था कि हम दुनिया को बतायेंगे कि ऐसे ऐसे रास्तों से निकलकर गये थे। विधान पक्की गड्ढाहीन औली रोड पर खडा फोटो खींच रहा है।

ये पांच छह झबरे झबरे कुत्ते थे। जंगल में इन लोकल जातियों से डर भी लगता है लेकिन हिमालय है ही ऐसा कि आदमियों की तरह यहां के जानवर भी बढिया होते हैं।

यह भी एक झूठा फोटो है। मात्र फोटो खिंचवाने के लिये। यह एक बरसाती नाला है।

विधान। गजब का इंसान। हम औली पहुंचने वाले हैं और सूमो पहलवान जैसा दिखने वाला अभी भी बिना थके चला जा रहा है।

ये फूल फिर आ गये?

यह है जोशीमठ- औली रोड।

जाटराम औली पहुंचने वाले हैं।
इस बार तो औली के द्वार तक आ गये। अगली बार आपको पक्का औली दिखाऊंगा। वादा है, वादा।

जोशीमठ यात्रा वृत्तान्त
1. जोशीमठ यात्रा- देवप्रयाग और रुद्रप्रयाग
2. जोशीमठ यात्रा- कर्णप्रयाग और नंदप्रयाग
3. जोशीमठ से औली पैदल यात्रा
4. औली और गोरसों बुग्याल
5. औली से जोशीमठ
6. कल्पेश्वर यानी पांचवां केदार
7. जोशीमठ यात्रा- चमोली से वापस दिल्ली