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Sunday, April 29, 2012

औली से जोशीमठ

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आखिरकार हम दोनों औली से वापस चल पडे। आज की यह पोस्ट कुछ ज्यादा नहीं है, बल्कि पिछली पोस्ट में बहुत ज्यादा फोटो थे, फिर भी कुछ फोटो बच गये थे तो उस कसर को आज निकाला गया है।
गोरसों बुग्याल में हमारी जान पहचान मुम्बई के एक परिवार से हुई। करीब तीन चार घण्टे तक हम साथ साथ रहे। उन्होंने हरिद्वार से ही एक कार बुक कर ली थी और गढवाल में घूम रहे थे। हमें इतनी जानकारी हो जाने के बाद कुछ ज्यादा मतलब उनसे नहीं रह गया था। अब हमें उनकी कार दिख रही थी। हम चाहते थे कि पैदल जाने के बजाय उनकी कार से ही जोशीमठ जायें। उसके लिये जरूरी था उनसे जान-पहचान बढाना ताकि अगर चलते समय वे शिष्टाचारवश भी कहें तो हम तुरन्त उनका पालन करे। हमने तय कर लिया था कि अगर उन्होंने यह ऑफर दिया तो हम इस मौके को किसी भी हालत में हाथ से नहीं जाने देंगे। गलती से भी शिष्टाचर नहीं दिखायेंगे, मना नहीं करेंगे। हम आज ही जोशीमठ से पैदल औली आये थे, गोरसों बुग्याल तक गये थे और थके हुए थे।

Thursday, April 26, 2012

औली और गोरसों बुग्याल

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4 अप्रैल 2012 की दोपहर थी, मैं और विधान औली में थे। वो औली जो भारत में शीतकालीन खेलों के लिये प्रसिद्ध है। भारत में क्या, पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। यह सर्दियों में मनाली और गुलमर्ग से टक्कर लेता है। इसे कुछ लोग भारत का स्विट्जरलैण्ड भी कह देते हैं। हो सकता है कि जो लोग स्विट्जरलैण्ड गये हों, उन्हें औली सर्दियों में बिल्कुल वैसा ही दिखता हो। लेकिन आज जो औली हम देख रहे थे, वो स्विट्जरलैण्ड के आसपास तो क्या, दूर दूर भी नहीं दिख रहा था। बरफ कहीं नहीं थी और धूल उड रही थी।
इस सीजन में जमकर बर्फबारी हुई। दिसम्बर के शुरू से ही बर्फ पडनी शुरू हो गई थी और पूरे जाडों भर पडती रही। इस बार खूब शोर मचा कि इतनी बरफ कभी नहीं देखी। हमें भी पूरी उम्मीद थी कि औली में खूब बर्फ मिलेगी। बल्कि हम तो सोच रहे थे कि अगर स्कीइंग हमारे बजट के अनुकूल हुई तो उस पर भी हाथ आजमायेंगे। सब धरा का धरा रह गया। लेकिन कहीं बर्फ नहीं दिखी। सब उजाड।

Sunday, April 22, 2012

जोशीमठ से औली पैदल यात्रा

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4 अप्रैल 2012 की सुबह थी। आठ बजे मेरी आंख खुली। देखा कि विधान नहा भी लिया है। आराम से हम इसलिये सोकर उठे क्योंकि हमें आज मात्र औली तक ही जाना था और वापस आना था। कल पता चल गया था कि जोशीमठ से औली जाने वाली उडनतश्तरी मैंटेनेंस के लिये बन्द कर रखी है। सडक मार्ग भी है जो 13 किलोमीटर लम्बा है। इसके अलावा तीसरा रास्ता भी है जिसे पैदल रास्ता कहते हैं। यह करीब 8 किलोमीटर का पडता है।
मैं दो साल पहले यमुनोत्री गया था, पिछले साल केदारनाथ यात्रा की। इन दोनों यात्राओं की खास बात यह रही कि दोनों जगह मैं ऑफ सीजन में गया था। कपाट खुलते हैं तो इन मन्दिरों में पूजा-पाठ शुरू हो जाती है। और इसके साथ ही शुरू हो जाता है यात्रा सीजन। ऑफ सीजन में जाना खासा मनोरंजक होता है मुझ जैसों के लिये। केदारनाथ जाने के लिये एक बार तो लगा कि नहीं जा पायेंगे, पुलिस वालों ने रोक लिये थे। कहते थे कि परमिट लाओ, तभी जाने देंगे। लेकिन नसीब नसीब की बात होती है, बिना परमिट के ही जा पहुंचे भगवान केदार के सूने पडे दरबार में।

Thursday, April 19, 2012

जोशीमठ यात्रा- कर्णप्रयाग और नंदप्रयाग

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3 अप्रैल 2012 की सुबह मैं और विधान रुद्रप्रयाग में थे। यहां से बस पकडी और घण्टे भर में कर्णप्रयाग जा पहुंचे। आज रुद्रप्रयाग से आगे अलकनन्दा घाटी में मैं पहली बार आया था। नहीं तो मंदाकिनी घाटी में दो बार जा चुका था- एक बार मदमहेश्वर और दूसरी बार केदारनाथ और तुंगनाथ। रुद्रप्रयाग से कर्णप्रयाग जाते समय रास्ते में गौचर पडता है जहां हवाई पट्टी भी है। मेरे ध्यान कुछ कुछ ऐसा है कि कुछ दिन पहले सोनिया गांधी ने गौचर में ही ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन की नींव रखी है।
कर्णप्रयाग में अलकनन्दा में पिण्डर नदी आकर मिल जाती है। पिण्डर नदी पिण्डारी ग्लेशियर से निकलती है। मैं पिछले साल अक्टूबर में पिण्डारी ग्लेशियर गया था। तो इस प्रकार पिण्डर नदी पहली ऐसी नदी बन गई जिसका आदि और अन्त मैंने देखा है। आदि और अन्त यानी उद्गम और समागम। यह पिण्डारी ग्लेशियर से यहां कर्णप्रयाग तक आने में सौ किलोमीटर से भी ज्यादा का सफर तय करती है।

Tuesday, April 17, 2012

जोशीमठ यात्रा- देवप्रयाग और रुद्रप्रयाग

एक दिन विधान चन्द्र उपाध्याय का फोन आया कि नीरज, पांच और छह अप्रैल की छुट्टी है, कहीं चलते हैं। हालांकि मैं कुछ ही दिन पहले आगरा-सातताल-कार्बेट फाल का चक्कर लगाकर आया था, इसलिये इतनी जल्दी जाने की कोई योजना नहीं थी, लेकिन फिर भी विधान को हां कह दी। वे मार्च के आखिरी दिन थे और गर्मी काफी होने लगी थी। इतना तो तय था कि हिमालय में ही जाना है। विधान ने सन्दीप भाई को भी मना लिया था और चलने से पहले विपिन भी तैयार हो गया।
सन्दीप के बारे में बताने की कोई जरुरत ही नहीं है। विपिन मेरे और सन्दीप के साथ पिछले साल श्रीखण्ड महादेव गया था और पैदल चलने में माहिर है। हमारी यात्रा अप्रैल के शुरूआती दिनों में होनी थी, इसलिये ट्रैकिंग की कोई उम्मीद नहीं थी क्योंकि इस बार बरफ काफी मात्रा में पडी थी और अप्रैल के शुरू में उसके पिघलने की कोई उम्मीद नहीं होती। हिमालय के ऊंचे इलाकों में ट्रैकिंग की असली शुरूआत मई से मानी जाती है। आखिरकार तय हुआ कि जोशीमठ चला जाये। अगर हिसाब बन गया तो बन्द बद्रीनाथ को भी देख आयेंगे। जबकि विधान का विचार नेपाल जाने का था। नेपाल की योजना इसलिये नहीं बन पाई कि हमारे पास चार दिन थे और उसमें काठमांडू जाना नहीं हो पा रहा था। जा तो सकते थे लेकिन मजेदारी नहीं थी।

Saturday, April 14, 2012

कार्बेट म्यूजियम और कार्बेट फाल

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23 मार्च 2012 और मैं था हल्द्वानी में। आज सबसे पहले मुझे कालाढूंगी जाना था। कालाढूंगी के बारे में उस समय जाने से पहले मेरी जानकारी बस इतनी ही थी कि यह रामनगर-नैनीताल के बीच में पडता है और यहां से नैनीताल की चढाई शुरू होती है। यह मेरे लिये एक साधारण जगह थी। यहां से मुझे खुरपा ताल जाने के लिये नैनीताल वाली बस पकडनी थी। और वापस आने के बाद कालाढूंगी एक खास जगह बन गई। और आज मैं गर्व से कह सकता हूं कि मैंने कालाढूंगी देखा है। मैंने वो जंगल देखा है जहां जिम कार्बेट साहब पले-बढे और महान बने। मैंने नयागांव वाली सडक देखी है, नैनीताल वाली सडक देखी है और छोटी हल्द्वानी भी देखी है। इन जगहों का नाम जिम साहब अपनी किताब ‘जंगल लोर’ में बार बार लेते हैं।
मैं कालाढूंगी गांव में उतर गया। यह हल्द्वानी-रामनगर के बीच में है। यहां एक तिराहा है जहां से एक सडक नैनीताल भी जाती है। मुझे नैनीताल वाली बस पकडनी थी। यहां उतरकर पता चला कि मुझसे थोडी सी गलती हो गई है। वो यह कि मुझे यहां से दो किलोमीटर आगे नैनीताल मोड पर उतरना था। गलती का प्रायश्चित दो किलोमीटर पैदल चलकर किया गया। यहां से सीधी सडक रामनगर चली जाती है जबकि दाहिने वाली एक सडक नैनीताल जाती है। नैनीताल रोड के दूसरी तरफ यानी अगर हम रामनगर की तरफ मुंह करके खडे हैं तो हमारे बायीं तरफ जिम साहब का घर है। इसे अब संग्रहालय बना दिया गया है। शायद दस रुपये का टिकट लगता है यहां प्रवेश करने का।

Thursday, April 12, 2012

सातताल और नल दमयन्ती ताल

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22 मार्च 2012 और मैं था कनमन में। कनमन बरेली और हल्द्वानी के बीच में बहेडी से दस किलोमीटर पहले है। यहां अपने एक दोस्त सतेंद्र रहते हैं। सुबह आराम से उठकर पहले तो मैं बहेडी गया और फिर वहां से बस पकडकर हल्द्वानी। मैं कनमन से ही लेट चला था इसलिये हल्द्वानी पहुंचने में और भी लेट हो गया। आज मुझे नैनीताल जाना था और रात को वहीं रुककर अगले दिन फिर नैनीताल घूमना था। लेकिन कल जो मैंने आगरा-बरेली रेल यात्रा की तो उसमें ठण्डी हवा चलने के कारण अंदाजा लगा लिया कि नैनीताल में सर्दी मेरी औकात से ज्यादा होगी। असल में मैं जब दिल्ली से चला था तो आगरा के लिये चला था, मुझे इसी यात्रा में नैनीताल भी जाना है, यह बात मैं भूल गया था और गरम कपडे नहीं रखे। एक यह कारण भी था नैनीताल को रद्द करने का। इसके बदले तय हुआ कि सातताल चला जाये और शाम को वापस हल्द्वानी में ही रुका जाये।

Tuesday, April 10, 2012

आगरा- बरेली पैसेंजर ट्रेन यात्रा

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21 मार्च 2012 को मैं आगरा में रितेश जी के घर पर था। वे एक ब्लॉगर हैं और यात्रा वृत्तान्त लिखते हैं। आज मुझे आगरा से अछनेरा, मथुरा, कासगंज, बरेली होते हुए भोजीपुरा तक जाना था। भोजीपुरा से आगे हल्द्वानी रोड पर एक कस्बा है बहेडी जहां मेरे एक जानकार सतेन्द्र रहते हैं। मुझे आज बहेडी में रुकना था।
आगरा फोर्ट स्टेशन से एक डीएमयू भरतपुर के लिये सुबह पांच बजे के करीब चलती है। छह बजे तक यह अछनेरा पहुंच जाती है। यात्रा शुरू करने से पहले चलिये एक बार आगरा शहर के रेल यातायात पर एक नजर डाल लेते हैं। आगरा का मुख्य स्टेशन है आगरा छावनी। यह दिल्ली-झांसी लाइन पर दिल्ली से दो सौ किलोमीटर दूर है। मान लो हम आगरा छावनी से दिल्ली की तरफ चलते हैं। यहां से निकलते ही हम एक ऐसे पुल से गुजरते हैं जिसके नीचे भी रेल लाइन है। इस लाइन के बारे में थोडी देर में बताऊंगा।

Sunday, April 8, 2012

आगरा का किला

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ताजमहल देखने के बाद अब बारी थी किला देखने की। ताजमहल से करीब दो किलोमीटर दूर आगरा का प्रसिद्ध किला है। सीधी सडक जाती है, हालांकि मुझे एक जगह रास्ता पूछने की जरुरत पडी।
"आगरे का किला भारत के किलों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। बाबर, हुमायूं, अकबर, जहांगीर, शाहजहां और औरंगजेब सभी मुगल सम्राट यहां रहे और यहीं से सारे देश का शासन हुआ। इस किले में ही राज्य का सबसे बडा खजाना और टकसाल थी। यहां विदेशी राजदूत, यात्री और वे सभी हस्तियां आईं जिन्होंने मध्यकालीन इतिहास के निर्माण में योगदान दिया। भारत के किसी अन्य किले को यह सम्मान प्राप्त नहीं है।"
"यह किला एक प्राचीन दुर्ग है जो ठीक यमुना नदी के तट पर स्थित है। यह ईंटों का दुर्ग था और चौहान राजपूतों के अधिकार में था। इसका सबसे पहला उल्लेख 1080 में हुआ, जब गजनी की एक सेना ने इसे जीत लिया। सिकन्दर लोदी (1481-1517) दिल्ली का पहला सुल्तान था जो आगरा आया और इस किले में रहा। यहीं से उसने देश का शासन चलाया और आगरे को दूसरी राजधानी का महत्व मिल गया। 1517 में यहीं उसकी मृत्यु हुई और यह दुर्ग अगले 9 वर्ष उसके पुत्र इब्राहिम लोदी के अधिकार में रहा। 1526 में पानीपत के युद्ध में इब्राहिम हार गया और मारा गया। लोदीकाल में किले में महल, कुएं और एक मस्जिद बनवाई गई।"