Friday, September 28, 2012

बडा इमामबाडा और भूल भुलैया, लखनऊ

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बाराबंकी से जब मैं और अतुल चले तो दिमाग में बडा इमामबाडा था। लखनऊ सिटी स्टेशन पर ट्रेन से उतरे। मोबाइल में नक्शा खोलकर देखा, दूरी करीब डेढ किलोमीटर दिखाई। रास्ता भी इसी ने बता दिया। स्टेशन के सामने हल्का नाश्ता करके मोबाइल के बताये रास्ते पर चल पडे।
तभी संजय भास्कर का फोन आया कि वो लखनऊ पहुंच चुका है। वो हिसार से गोरखधाम एक्सप्रेस के जनरल डिब्बे में बैठकर आया था। इसका कारण उसने बताया कि स्लीपर में सीट नहीं थी। जबकि एक दिन पहले तत्काल कोटे में रिजर्वेशन हो जाता है। बाद में शाम तक वो जब हमारे ही साथ रहा तो हमने पाया कि वो अव्वल दर्जे का कंजूस भी है। अभी तक हम खुद को ही अव्वल दर्जे का कंजूस मानते थे, वो हमारा भी गुरू निकला।
मैंने उससे कहा कि हम बडा इमामबाडा देखने जा रहे हैं, आ जा। बोला कि आता हूं। थोडी देर में फोन आया कि टम्पू वाला डेढ सौ रुपये मांग रहा है। पूछने लगा कि कोई सस्ता साधन बता। डेढ सौ रुपये सुनकर मेरे भी होश उड गये। मैं उसे ट्रेन के बारे में बता सकता था लेकिन मुझे ट्रेन का टाइम मालूम नहीं था। मैंने कहा कि तू और पूछताछ कर, कोई ना कोई बस जरूर मिल जायेगी। पूछता पूछता आ जा, भले ही रास्ते में एक दो जगह बसें बदलनी ही क्यों ना पडे।
थोडी देर में पता चला कि उसे सीधे बडे इमामबाडे तक के लिये टम्पू मिल गया है, वो भी मात्र सात रुपये में। सुनकर एक बार तो यकीन नहीं हुआ कि डेढ सौ से सात रुपये और वो भी टम्पू में ही। उसे कोई बंधे बंधाये रूट पर चलने वाला टम्पू मिल गया था।
हमारे मोबाइल ने हमें पहुंचाया बडे इमामबाडे के पिछवाडे पर, जहां अन्दर प्रवेश करने के लिये एक छोटा सा घूमने वाला गेट लगा था। हम अन्दर चले गये। ठीक ठाक चहल-पहल थी। यहां आकर पता चला कि अन्दर आने के लिये मेन गेट से टिकट लेना पडता है, तो हम बडे खुश हो गये कि वाह रे मोबाइल, कंजूसों का मान रखने के लिये तूने भी पिछवाडे वाला रास्ता बताया। लेकिन यह खुशी ज्यादा देर तक नहीं टिक सकी, हमें तीस रुपये का टिकट लेना पडा। असल में यहां बावली है, भूल भुलैया है जहां प्रवेश के लिये वही तीस रुपये का टिकट दिखाना होता है।
कुछ देर बाद संजय भी मेन गेट से आ गया। हमने उसे डेढ सौ से सात रुपये तक पहुंचने की बधाई दी और कोल्ड ड्रिंक की फरमाइश कर दी। उसने कहा कि आओ चलो, पीते हैं। अन्दर परिसर में ही एकमात्र कोल्ड ड्रिंक की दुकान से हमने तीन बोतलें लीं जो 60 रुपये की पडीं। हमारा ‘गुरू’ फटाफट पीकर एक तरफ चला गया और पैसे देने को हम दोनों ही बचे रह गये। तभी हमें पता चला कि अगला उस्ताद आदमी है।
खैर, कोई भी शहर मुझे पसन्द नहीं है तो लखनऊ भी मेरी ना-पसन्द से अछूता कैसे रह सकता है। इमामबाडे के कुछ फोटो नीचे लगा रखे हैं, देख लेना। इतिहास भूगोल कुछ नहीं बताऊंगा।
बावली में गये। पहले बावली सिस्टम होता था पानी के लिये जिसके बारे में मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है। देखने से लगता है कि यह एक कुआं होता है जिससे पानी निकालने के लिये सीढियां बनी होती हैं। चारों तरफ छोटी छोटी गैलरियां और कमरे भी हैं, शायद कुछ ठण्डक का विचार रहता होगा। बस, बावली का भूगोल बन्द।
इसके बाद भूल भुलैया में गये। गाइड ले जाने की जोरदार सलाह मिली। लेकिन यकीन था कि निकल जायेंगे। कुछ सीढियां ऊपर चढकर भूल-भुलैया की छत पर पहुंचे। यहां से माहौल का जायजा लिया। तीन या चार बाहर निकलने के छेद मिले। तय हुआ कि अगर खो जायेंगे तो ऊपर जाने वाली हर सीढी पर चढना है, ताकि कुछ देर में ऊपर छत पर पहुंच सकें।
इमामबाडा- मुझे नहीं पता कि इसका मतलब क्या होता है, पहले इसका इस्तेमाल कौन करता था, क्यों करता था लेकिन इसकी दीवारें ऊंची होने के साथ साथ मोटी भी बहुत हैं। इन्हीं दीवारों में पतले पतले गलियारे बने हुए हैं, जिनमें जगह जगह इमामबाडे में झांकने के लिये झरोखे भी बने हैं। इन्हीं झरोखों से इन गलियारों में प्रकाश भी रहता है। कुल मिलाकर मुख्य गलियारा एक ही है जो आयताकार बना हुआ है, इमामबाडे की चारों तरफ की दीवारों के अन्दर।
चूंकि मुख्य गलियारा इमामबाडे की छत के पास बना है तो इसमें से कुछ उप-गलियारे भी निकले हुए हैं। आपके दाहिने या बायें एक उप-गलियारा जाता दिखेगा जो कुछ आगे जाकर मुख्य पलियारे में ही मिल जायेगा, क्योंकि मुख्य गलियारा आयताकार है। इसके अलावा बहुत सारे गन्दे से झरोखे भी हैं जहां से इमामबाडे के अन्दर ताकझांक की जा सकती है। एक छोटी सी सुरंग भी है जो बन्द है और उसके बारे में गाइड बता रहा था कि यह आगरा या पता नहीं कहां जाकर खुलती है।
बस यही भूल-भुलैया का गणित है। हमने इस गणित को समझ लिया और जब मन करता, तब निकल सकते थे और निकले भी। अगर इसके अलावा भी कुछ है भूल-भुलैया में जो मैंने ऊपर नहीं लिखा तो वो हमसे छूट गया होगा। मुझे नहीं लगता कि कुछ छूटा भी होगा।
बाहर निकल गये। सडक पर पहुंचे। सामने एक बडा सा दरवाजा है जिसके बीच से सडक जा रही है। इसे रूमी दरवाजा करते हैं। अगर रूमी नहीं कहते तो बता देना, मैंने इस लेख को लिखने में कोई बाहरी मदद नहीं ली है। गलती हो सकती है।
उसके बाद छोटा इमामबाडा है। अब तक दोपहर हो चुकी थी, अच्छी धूप निकल गई थी, हम पसीने से तरबतर थे। सुबह से पैदल ही चल रहे थे, तो छोटा इमामबाडा सुन्दर होने के बावजूद उतना आकर्षक नहीं लगा। वापस दोबारा बडे के सामने से होते हुए एक तिराहे पर पहुंचे, जहां से कैसरबाग के टम्पू मिलते हैं। कैसरबाग में ही मुझे पुरस्कार लेना था।
पुरस्कार समारोह के दौरान ही संजय के कैमरे की सेलें खत्म हो गईं। संजय डिस्चार्ज बैटरी की तरह धीरे धीरे हमारे पास आया और बिना कुछ बोले मुंह लटकाकर बैठ गया। मेरे पास एक अतिरिक्त कैमरा था जिसकी सेलें मैंने उसे दे दीं। वो फिर चार्ज हो गया और भागने दौडने में मस्त हो गया।
हमें अब वाराणसी जाना था। संजय ने पहले तो कहा कि वो भी चलेगा लेकिन हमारी सीटें आरक्षित थीं और हमने साझा करने से मना कर दिया तो उसने दिल्ली जाने का मन बना लिया। इसलिये कैसरबाग में ही हमने एक दूसरे को अलविदा कह दिया। मेरी रिचार्जेबल सेलें उसके पास ही रह गईं। चारबाग पहुंचने पर मुझे यह ध्यान आया।
हमें काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस से वाराणसी जाना था जिसका लखनऊ का समय है पौने दस बजे और वाराणसी पहुंचने का समय है सुबह पौने पांच बजे। खैर, संजय को फोन मिलाया तो पता चला कि वो अभी कुछ ब्लॉगर दोस्तों के साथ कैसरबाग में ही है और आठ बजे के करीब उसके चारबाग पहुंचने की उम्मीद है। मैंने अन्दाजा लगाया कि वो नौ बजे तक आयेगा और हमारी ट्रेन चलेगी यहां से पौने दस बजे। सेल मिलने की उम्मीदें तो हैं।
फिर हिसाब लगाया कि संजय पर हमारे कितने रुपये बकाया हैं- सत्ताईस रुपये निकले, कोल्ड ड्रिंक, इमामबाडे से कैसरबाग तक टम्पू और कैसरबाग में मौसमी का जूस। मैं और अतुल अब सोचने लगे कि संजय से ये सत्ताईस रुपये और सेलें कैसे ली जायें।
साढे आठ बजे फिर मैंने फोन किया तो पता चला कि एक घण्टा और लग सकता है। मैंने सेलों की बात कही तो बताया कि चिन्ता मत कर, घर जाकर कोरियर कर दूंगा। तभी एक अमृततुल्य आकाशवाणी गूंजी कि काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस एक घण्टे की देरी से आयेगी। मैंने नेट पर चेक किया तो पता चला कि ट्रेन बालामऊ से दो घण्टे लेट चली थी। यानी यहां भी दो घण्टे लेट हो जाने की उम्मीद है, यह उम्मीद सच निकली।
दस बजे संजय हमें स्टेशन पर मिला। सबसे पहले सेलें लीं। अब ध्यान आये सत्ताईस रुपये। सीधे सीधे मांगने में हिचक महसूस हो रही थी, इसलिये घुमा-फिराकर मांगे- चल, यार कुछ खा-पीकर आते हैं। बोला कि मैं तो फुल हूं। कुछ नहीं खा सकता। हमने कहा कि हम फुल नहीं हैं, तू चल, हमें खाते हुए देख लेना। तेरे लिये दिल्ली जाने के लिये गोमती एक्सप्रेस सर्वोत्तम है और वो सुबह पांच बजे मिलेगी।
आखिरकार हम पहुंचे एक आइसक्रीम वाले के पास। ताऊ, कितने कितने की आइसक्रीम हैं? बोला कि पन्द्रह की हैं, बीस की हैं, पच्चीस की हैं...। ठीक है, ला पच्चीस वाली तीन दे दे। यहां भी संजय ने सबसे पहले आइसक्रीम निपटा दी। उसके निपतते ही मैंने कहा कि संजय भाई, पैसे दे दे। वो मना करे तो कैसे करे। उसे पैसे देने पडे। हम फिर से कंजूसश्री बन गये।
मैं और अतुल होली-दीवाली मनाते हुए संजय को छोडकर बनारस भाग गये जबकि संजय भाई को सुबह दिवाला मनाना पडा। रात प्रतीक्षालय में सोते हुए उनका मोबाइल किसी ने जेब से निकाल लिया।

इमामबाडे का मुख्य प्रवेश द्वार

बडा इमामबाडा

इमामबाडे में 

स्लीपिंग ब्यूटी

बडा इमामबाडा


अतुल और संजय


बावली


बावली

बावली में बावला





भूल भुलैया का मुख्य गलियारा


भूल भुलैया की छत से

भूल भुलैया की छत से



भूल भुलैया का गलियारा


भूल भुलैया के झरोखों से दिखता इमामबाडा

मैं इससे सहमत नहीं हूं। इसमें लिखा है कि गन्दगी फैलाना जानवरों का काम है, जबकि जानवरों को तो यह भी नहीं पता होता कि गन्दगी होती क्या है। गन्दगी इंसानों का ही कॉन्सेप्ट है, इंसानों द्वारा ही फैलाई जाती है। 




छोटा इमामबाडा

छोटा इमामबाडा
अगले भाग में जारी...

लखनऊ- बनारस यात्रा
1.वर्ष का सर्वश्रेष्ठ घुमक्कड- नीरज जाट
2.बडा इमामबाडा और भूल-भुलैया, लखनऊ
3.सारनाथ
4.बनारस के घाट
5.जरगो बांध व चुनार का किला
6.खजूरी बांध और विन्ध्याचल

10 comments:

  1. नीरज भाई आपका सोनी का कैमरा कमाल कर रहा हैं, बहुत ही खूबसूरत और लाज़वाब फोटो हैं. मेरे भाई फोटो में कैप्शन डालना कैसे भूल गए हो. धन्यवाद, वन्देमातरम...

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  2. संजय भाई के 23 रुपये आपकी तरफ बकाया हैं, कैसे वापिस देने का विचार है आपका? डीडी या चैक कब भेजेंगे।
    संजय जी की ट्रेन सुबह थी तो रात में ही स्टेशन पर क्यों पहुंच गये? स्टेशन पर सोना केवल घुमक्कडों के लिये ही ठीक रहता है।
    2 कुत्तों की फोटो दी है, लेकिन इनके बारे में कुछ नहीं लिखा गया।

    प्रणाम

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  3. बिना खंभों के इतना बड़ा हॉल एक आश्चर्य है, भूल भुलैया उसी छत के लिये बना है।

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  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (29-09-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  5. आप की फोटो कला और तीस हजारी केमरा कमाल दिखा रहा है, वर्णनं अति सुंदर है,
    धन्यवाद

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  6. बहुत सुंदर चित्रमय प्रस्तुति नीरज !

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  7. बेहतरीन कैमरा बेहतरीन वर्णन बेहतरीन प्रस्तुति.....!

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  8. हमने भी देखा इसे, धीरेंद्र भदौरिया संग
    बडा खूब बाड़ा लगा, भूल - भुलैया तंग
    भूल- भुलैया तंग , दीवारें बनी तिलस्मी
    दूर तलत आवाज , सुनाई देती धीमी
    लखनऊ के इतिहास-पृष्ठ की स्वर्णिम रेखा
    धीरेंद्र भदौरिया संग, इसे हमने भी देखा ||

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  9. बहुत सुन्दर छायांकन .बेहद सुन्दर वृत्तांत .कहतें हैं फटोग्रेफी

    मैं इससे सहमत नहीं हूं। इसमें लिखा है कि गन्दगी फैलाना जानवरों का काम है, जबकि जानवरों को तो यह भी नहीं पता होता कि गन्दगी होती क्या है। गन्दगी इंसानों का ही कॉन्सेप्ट है, इंसानों द्वारा ही फैलाई जाती है।
    चार चाँद लगा देती है .और पशु पक्षी तो सफाई कर्मी हैं हमारे पर्यावरण के ये न हों तो हम सब कुछ को सड़ा दें .

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  10. बहुत सुन्दर छायांकन .बेहद सुन्दर वृत्तांत .कहतें हैं फटोग्रेफी चार चाँद लगा देती है

    मैं इससे सहमत नहीं हूं। इसमें लिखा है कि गन्दगी फैलाना जानवरों का काम है, जबकि जानवरों को तो यह भी नहीं पता होता कि गन्दगी होती क्या है। गन्दगी इंसानों का ही कॉन्सेप्ट है, इंसानों द्वारा ही फैलाई जाती है।
    मैं भी आपसे सहमत हूँ . पशु पक्षी तो सफाई कर्मी हैं हमारे पर्यावरण के ये न हों तो हम सब कुछ को सड़ा दें .

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