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Monday, December 31, 2012

2012 की घुमक्कडी का लेखा जोखा

2012 चला गया। इस साल घुमक्कडी में एकाध नहीं बल्कि तीन महान उपलब्धियां हासिल हुईं। आगे बताया जायेगा तीनों महान उपलब्धियों के साथ साथ पिछले बारह महीनों में की गई हर छोटी बडी यात्रा के बारे में।
1. मावली- मारवाड मीटर गेज ट्रेन यात्रा- मावली से मारवाड तक चलने वाली 152 किलोमीटर की दूरी तय करने वाली इस ट्रेन में 7 फरवरी को यात्रा की गई। इससे एक दिन पहले रेवाडी से रींगस होते हुए फुलेरा तक की यात्रा भी इसी ट्रिप का हिस्सा है।


Friday, December 28, 2012

टहला बांध और अजबगढ

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जब नीलकंठ महादेव से वापस जयपुर जाने के लिये चल पडे तो टहला से कुछ पहले अपने बायें एक बडी झील दिखाई पडी। इसमें काफी पक्षी आनन्द मना रहे थे। सर्दियां आने पर उत्तर भारत में पक्षियों की संख्या बढ जाती है। ये बढे हुए पक्षी सुदूर उत्तरी ध्रुव के पास यानी साइबेरिया आदि ठण्डे स्थानों से आते हैं। विधान ने बिना देर किये मोटरसाइकिल सडक से नीचे उतारकर झील के पास लगा दी।
इसका नाम या तो मंगलसर बांध है या फिर मानसरोवर बांध। हमें देखते ही बहुत से पक्षी इस किनारे से उडकर दूर चले गये। मैं और विधान अपने अपने तरीके से इनकी फोटो खींचने की कोशिश करने लगे।
मैं ना तो पक्षी विशेषज्ञ हूं, ना ही बडा फोटोग्राफर। फिर भी इतना जानता हूं कि पक्षियों की तस्वीरें लेने के लिये समय और धैर्य की जरुरत होती है। चूंकि कोई भी पक्षी हमारे आसपास नहीं था, सभी दूर थे, इसलिये मनचाही तस्वीर लेने की बडी परेशानी थी।
मैं चाहता था कि एक ऐसी तस्वीर मिले जिसमें पक्षी पानी में तैरने के बाद उडने की शुरूआत करता है। उसके पंख उडने के लिये फैले हों और पैर पानी में हों। हालांकि इस तरह की एक तस्वीर लेने में कामयाबी तो मिली लेकिन मुझे यह तस्वीर ज्यादा पसन्द नहीं आई।
फिर भी कुछ बेहतरीन फोटो आये हैं, जिसमें लाइन बनाकर तैरते पक्षी हैं। 60 गुना बडा करने वाला कैमरा बहुत काम आया। आज पता चला कि बर्ड फोटोग्राफी करने के लिये जूम कितनी काम की चीज है। जूम के साथ स्टेबलाइजर भी काम की चीज है। इतना बडा जूम करने के बाद हाथ में कैमरा लेते हैं तो हमें ऑब्जेक्ट दिखाई भी नहीं देता- इधर उधर हो जाता है।
टहला से चलने के बाद हम उस तिराहे पर पहुंचे जहां से सीधा रास्ता अजबगढ जाता है और बायें वाला भानगढ। हम सीधे चल पडे। कुछ दूर चलते ही एक छोटा सा बांध मिला। इसमें दो तीन जने नहा रहे थे। हमें भी देखते ही तलब लग गई। कपडे उतारकर पानी में घुसे तो लगा जैसे कि हरिद्वार में हर की पैडी पर नहा रहे हों। बेहद ठण्डा पानी।
यहां से अजबगढ ज्यादा दूर नहीं है। अजबगढ की कहानी भी कुछ कुछ भानगढ से मिलती जुलती है। किला भी है और कुछ पुराने खण्डहर भी। अजबगढ में घुसने से पहले एक बडा बांध भी है। यहां भी काफी पक्षी थी लेकिन वे हमारी पहुंच से बाहर थे।

Wednesday, December 26, 2012

नीलकंठ महादेव मन्दिर- राजस्थान का खजुराहो

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26 नवम्बर 2012 की शाम के सवा चार बजे थे, जब हमने भानगढ से प्रस्थान किया। लक्ष्य था नीलकण्ठ महादेव। साढे पांच बजे हम नीलकण्ठ महादेव पर थे।
पता नहीं किस वर्ष में राजा अजयपाल ने नीलकण्ठ महादेव की स्थापना की। यह जगह मामूली सी दुर्गम है। जब भानगढ से अलवर की तरफ चलते हैं तो रास्ते में एक कस्बा आता है- टहला। टहला से एक सडक राजगढ भी जाती है।
टहला में प्रवेश करने से एक किलोमीटर पहले एक पतली सी सडक नीलकण्ठ महादेव के लिये मुडती है। यहां से मन्दिर करीब दस किलोमीटर दूर है। धीरे धीरे सडक पहाडों से टक्कर लेने लगती है। हालांकि इस कार्य में सडक की बुरी अवस्था हो गई है लेकिन यह अपने मकसद में कामयाब भी हो गई है। कारें इस सडक पर नहीं चल सकतीं, जीपें और मोटरसाइकिलें कूद-कूदकर निकल जाती हैं।
आठ दिन की इस यात्रा में यह जगह मुझे सर्वाधिक पसन्द आई। साढे पांच बजे जब हम यहां पहुंचे तो एक छोटे से गांव से निकलते हुए मन्दिर तक पहुंचे। टहला से चलने के बाद पहाड पर चढकर एक छोटे से दर्रे से निकलकर एक घाटी में प्रवेश करते हैं। यह घाटी चारों तरफ से पहाडों से घिरी है, साथ ही घने जंगलों से भी।
अन्धेरा होने लगा था। एक पुलिस वाले ने मुझे फोटो खींचते देखकर पर्ची कटवाने की सलाह दी, जिसे मैंने तुरन्त मान लिया। पच्चीस रुपये की पर्ची कटी।
कल विधान की शादी की सालगिरह है। चलते समय गृह मन्त्रालय का सख्त आदेश था कि सालगिरह धूम-धाम से मनानी है। उधर भानगढ से यहां तक के घण्टे भर के सफर में मैंने विधान के मन में घुस-घुसकर यह निष्कर्ष लगाया कि महाराज गृह मन्त्रालय की बात टाल सकते हैं। इसी का नतीजा हुआ कि मैं नीलकण्ठ पहुंचते ही जिद कर बैठा कि आज यहीं रुकेंगे।
एक स्थानीय लडके से पता चला कि पूरे गांव में रुकने का वैसे तो कोई आधिकारिक ठिकाना नहीं है लेकिन किसी भी घर में जाकर ‘भिक्षां देहि’ जैसी भावना प्रदर्शित करेंगे तो कोई मना नहीं करेगा। यह सुनते ही मैंने तुरन्त उसी लडके के सामने ‘झोली’ फैला दी जिसे उसने अविलम्ब सहर्ष स्वीकार कर लिया। विधान ने काफी कुरेदा ताकि लडका अगर मना ना भी करे तो मना करने की मनोस्थिति में आ जाये लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।

Monday, December 24, 2012

भानगढ- एक शापित स्थान

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आज की शुरूआत एक छोटी सी कहानी से करते हैं। यह एक तान्त्रिक और एक राजकुमारी की कहानी है। तान्त्रिक राजकुमारी पर मोहित था लेकिन वह उसे कोई भाव नहीं देती थी। चूंकि राजकुमारी भी तन्त्र विद्या में पारंगत थी, इसलिये उसे दुष्ट तान्त्रिक की नीयत का पता था। एक बार तान्त्रिक ने राजकुमारी की दासी के हाथों अभिमन्त्रित तेल भिजवाया। तेल की खासियत यह हो गई कि वह जिसके भी सिर पर लगेगा, वो तुरन्त तान्त्रिक के पास चला जायेगा। राजकुमारी पहचान गई कि इसमें तान्त्रिक की करामात है। उसने उस तेल को एक शिला पर फेंक दिया और जवाब में वह शिला तान्त्रिक के पास जाने लगी। बेचारे तान्त्रिक की जान पर बन गई। शिला क्रिकेट की गेंद तो थी नहीं कि तान्त्रिक रास्ते से हट जायेगा और वो सीधी निकल जायेगी। अभिमन्त्रित थी, तो तान्त्रिक कितना भी इधर उधर भागेगा, शिला भी उतना ही इधर उधर पीछा करेगी। जब तान्त्रिक के सारे उपाय निष्क्रिय हो गये, तो उसने श्राप दे दिया। श्राप के परिणामस्वरूप शिला फिर से बावली हो गई और अब वो नगर को ध्वस्त करने लगी। उसी ध्वस्त नगर का नाम है भानगढ।
प्रवेश द्वार पर लगे शिलालेख के अनुसार भानगढ को आमेर के राजा भगवन्त दास ने सोलहवीं सदी के आखिर में बसाया। आज यहां सबकुछ उजाड है मात्र तीन चार मन्दिरों को छोडकर। राजमहल तो पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है।
इसके बारे में भयंकर तरीके से प्रचलित है कि यह स्थान शापित और भुतहा है। बडी भयानक और डरावनी कहानियां भी सुनी-सुनाई जाती हैं। यह भी कहा जाता है कि यहां रात को जो भी कोई रुका है, सुबह जिन्दा नहीं मिला। रात में भूत-बाजार लगने की भी बातें सुनाई देती हैं।
मुझे इन सब बातों पर यकीन है। चूंकि मैं बिना शर्त भगवान को मानता हूं, तो मेरी मजबूरी बन जाती है कि शैतान को भी मानूं।
जयपुर में विधान चन्द्र के यहां साइकिल खडी की और हम दोनों मोटरसाइकिल पर निकल पडे भानगढ की ओर। दोपहर ग्यारह बजे जयपुर से चले क्योंकि इससे पहले मन में कोई योजना नहीं थी इधर आने की। अगले दिन विधान की शादी की सालगिरह थी, इसलिये आज ही वापस भी लौटना था। हालांकि उन्होंने ऐसा किया नहीं।
दौसा-अलवर रोड पर एक गांव है- गोला का बास। यहीं से भानगढ का रास्ता जाता है जो दो किलोमीटर से ज्यादा नहीं मालूम पडता।

Friday, December 21, 2012

साम्भर झील और शाकुम्भरी माता

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24 नवम्बर 2012 को रात होने तक मैं साइकिल चलाकर पुष्कर से साम्भर झील पहुंच गया। अगले दिन जब पूछताछ की तो पता चला कि यहां से 23 किलोमीटर दूर एक लोकप्रिय मन्दिर है- शाकुम्भरी माता मन्दिर। इधर अपना भी फाइनल हो गया कि शाकुम्भरी तक चलते हैं।
साम्भर झील खारे पानी की एक बहुत बडी झील है। राजस्थान के अर्धमरुस्थलीय इलाके में फैली यह झील जयपुर, अजमेर और नागौर जिलों में स्थित है। वैसे तो साम्भर लेक नाम से जोधपुर लाइन पर रेलवे स्टेशन भी है लेकिन नजदीकी बडा स्टेशन छह किलोमीटर दूर फुलेरा है।
भौगोलिक रूप से इस झील को पानी की सप्लाई चारों तरफ से आती हुई कई नदियां करती हैं लेकिन शुष्क इलाके में उनसे नियमित सप्लाई सम्भव नहीं है। मानसून के दौरान ही इन नदियों में पानी रहता है, बाकी समय सूखी रहती हैं। इसलिये इसमें भू-गर्भ से पानी निकालकर भरा जाता है। पानी में नमक की मात्रा बहुत ज्यादा है, इसलिये यह झील नमक की ‘खेती’ के लिये जानी जाती है।
झील में नमक ढोने के लिये रेल लाइनें बिछी हुई हैं। साम्भर लेक स्टेशन के पास नमक शोधन कारखाना है जहां नमक की सफाई से लेकर पैकिंग तक होती है। इस कारखाने तक कच्चा नमक लाने के लिये झील के अन्दर बिछी रेल लाइनें बडी कारगर हैं। यहां दो गेज की लाइनें हैं- मीटर और नैरो। कारखाने के अपने छोटे छोटे इंजन हैं और नमक ढोने हेतु लकडी के छोटे छोटे डिब्बे भी हैं। लकडी के डिब्बे ही नमक के लिये सर्वोत्तम होते हैं क्योंकि लोहे का क्षरण बडी जल्दी होता है।
एक तरह से देखा जाये तो साम्भर एक ऐसी झील है जिसमें तीनों गेज की रेल पटरियां हैं- ब्रॉड, मीटर और नैरो। ब्रॉड गेज से भारतीय रेल गुजरती है जो झील के बीच से निकलती है। बाकी दोनों लाइनें नमक ढोने के लिये हैं।
झील के दक्षिणी किनारे से होते हुए 18 किलोमीटर दूर एक गांव है- कोरसीना, जहां से शाकुम्भरी मन्दिर पांच किलोमीटर दूर रह जाता है। वैसे कोरसीना से एक रास्ता रूपनगढ भी जाता है। मैं कल रूपनगढ से ही आया था लेकिन इस रास्ते को पकडने की बजाय नरैना वाला रास्ता पकड लिया। अगर कल रूपनगढ से साम्भर लेक जाने के लिये मैं यह कोरसीना वाला रास्ता पकड लेता तो आज दोबारा इस रास्ते पर नहीं आता।

Wednesday, December 19, 2012

पुष्कर- ऊंट नृत्य और सावित्री मन्दिर

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23 नवम्बर 2012.
पुष्कर में सालाना कार्तिक मेला शुरू हुए तीन दिन हो चुके थे। रोजाना सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित हो रहे थे। आज के कार्यक्रम के अनुसार मुख्य आकर्षण ऊंटों और घोडों का नृत्य था।
साइकिल यही आश्रम में खडी करके मैं पैदल मेला मैदान की तरफ चल पडा। मैदान में सामने नट अपना प्रदर्शन कर रहे थे। ये कल भी यही थे।
और जैसे ही लाउडस्पीकर पर घोषणा हुई कि ऊष्ट्र-अश्व नृत्य प्रतियोगिता शुरू होने वाली है, तो नटों के यहां अचानक रौनक खत्म हो गई। सब लोग नृत्य स्थान पर चले गये।
नृत्य स्थान के चारों तरफ इतनी भीड इकट्ठी हो गई कि पैर रखने की जगह भी नहीं बची। हालांकि मैंने मोर्चा जल्दी ही मार लिया था, इसलिये आगे पहुंच गया। बाहर तीन तरफ बहुत से पर्यटक ऊंटों पर बैठकर प्रतियोगिता देखने लगे।
पहले ऊंट नृत्य हुआ जिसमें तीन ऊंटों ने भाग लिया। उसके बाद घोडे नाचे। घोडे जल्दी प्रशिक्षित हो जाते हैं इसलिये उनका नृत्य ज्यादा प्रभावशाली लगा। बाजे के साथ कदमताल करते घोडे संसाधनहीन लोगों द्वारा बेहतरीन प्रशिक्षण का नतीजा थे।
ब्रह्मा के नाम पर बनी दुकान (ब्रह्मा मन्दिर) में जाने से पहले वही क्रियाकर्म करने पडते हैं, जो भारत की अन्य ‘दुकानों’ के बाहर होते हैं- जूते उतारना और मोबाइल, कैमरा, बैग बाहर रखना। जूते उतारना तो ठीक है लेकिन बाकी सामान भी बाहर रखना मेरी समझ से बाहर की बात है। यह हालत तब थी जबकि वहां राजस्थान पुलिस के जवान ही सारा मोर्चा सम्भाले हुए थे।
समझ नहीं आता कि मोबाइल, कैमरा, बैग बाहर क्यों रखवाये जाते हैं। मैं भले ही पूजा पाठ नहीं करता हूं लेकिन इतना जरूर जानता है कि पूजा-पाठ का इन चीजों से कोई सम्बन्ध नहीं है। दूसरा कारण सुरक्षा हो सकता है। इन चीजों के माध्यम से आपत्तिजनक चीजे, विस्फोटक अन्दर लाये जा सकते हैं। अगर विस्फोटकों से बचने के लिये इन चीजों को मन्दिर में ले जाना प्रतिबन्धित है तो मैं चाहता हूं कि मेट्रो स्टेशनों तथा रेलवे स्टेशनों पर भी इनपर प्रतिबन्ध लगाया जाये। अगर प्रशासन को मन्दिर के अन्दर बैग ले जाने पर डर लगता है तो स्टेशनों के अन्दर बैग ले जाने पर क्यों नहीं लगता? नई दिल्ली स्टेशन के बाहर हमेशा आधा किलोमीटर लम्बी कई लाइनें लगी रहती हैं क्योंकि स्कैनर मशीनों से सामान की चैकिंग की जाती है। क्या मन्दिरों में इस तरह की चैकिंग नहीं हो सकती?

Saturday, December 15, 2012

पुष्कर

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एक बार मैं और विधान गढवाल के कल्पेश्वर क्षेत्र में भ्रमण कर रहे थे, तो एक विदेशी मिला। नाम था उसका केल्विन- अमेरिका में बढई है और कुछ समय बढईगिरी करके जमा हुए पैसों से दुनिया देखने निकल जाता है। उसने बताया कि वो कई महीनों से भारत में घूम रहा है। विधान ठहरा राजस्थानी... लगे हाथों पूछ बैठा कि राजस्थान में कौन सी जगह सर्वोत्तम लगी। केल्विन ने बताया कि एक किला है। उसने खूब दिमाग दौडाया लेकिन नाम नहीं बता सका।
हमने अपनी तरफ से भी नाम गिनाये- आमेर, कुम्भलगढ, चित्तौडगढ, मेहरानगढ, जैसलमेर आदि लेकिन वो सबको नकारता रहा। आखिरकार अचानक बोला- बण्डी- उस किले का नाम है बण्डी। हम हैरान हो गये कि केल्विन की नजर में सर्वोत्तम बण्डी नामक किला है लेकिन यह है कहां। हमने भी पहली बार बण्डी नाम सुना। लेकिन जल्द ही पता चल गया कि वो बूंदी के किले की बात कर रहा है। बण्डी यानी बूंदी।
तभी से मुझे एक बात जंच गई कि बूंदी का किला एक बार जरूर देखना चाहिये। आज जयपुर में था तो बूंदी जाने के विचार मन में आने लगे। सुबह जब होटल से बाहर निकला तो बूंदी के लिये ही निकला। रात टोंक में रुकना तय हुआ।
चलते चलते होटल के रिसेप्शन में अखबार पर नजर पडी- पुष्कर में मेले का शुभारम्भ।
बस अड्डे के पास ही मैंने कमरा लिया था। जब यहां से साइकिल से टोंक रोड के लिये निकला तो कुछ दूर रेलवे लाइन के साथ साथ चलना हुआ। अब दिमाग से बूंदी उतरने लगा था और पुष्कर चढने लगा।
...
रात किशनगढ में रुका।
...
22 नवम्बर 2012 की दोपहर बाद मैं पुष्कर में था। ब्रह्मा नगरी पुष्कर। भारत में ब्रह्मा के कुछ ही गिने चुने मन्दिर हैं, उनमें पुष्कर भी है।
एक बार ऐसा हुआ कि ब्रह्माजी परेशानी में पड गये। उन्हें यज्ञ करना था और कोई भी जगह पसन्द नहीं आई। या फिर बहुत सी जगहें पसन्द आ गई होंगी। मतलब वे समझ नहीं पा रहे थे कि यज्ञ कहां किया जाये। कोई और होता तो वो शिवजी से पूछ आता। राक्षस भी शिवजी से ही शक्ति अर्जित करते थे लेकिन ब्रह्मा ठहरे ‘बडे देवता’। वे भला शिवजी से कैसे पूछ सकते थे? बडों के साथ यही परेशानी होती है कि वे खुद से ज्यादा बुद्धिमान किसी को नहीं समझते। नहीं तो किसी से भी अपनी परेशानी बताते, हल जरूर निकलता। टॉस नहीं करना पडता।

Thursday, December 13, 2012

और ट्रेन छूट गई

नवम्बर में एक ऐसा अदभुत योग बन रहा था कि मुझे अपने खाते से मात्र दो छुट्टियां खर्च करके उनके बदले में आठ छुट्टियां मिल रही थीं। यह योग बीस से सत्ताईस नवम्बर के बीच था। उधर चार दिसम्बर से बीस दिसम्बर तक सरकारी खर्चे से राजधानी एक्सप्रेस से कर्नाटक की यात्रा भी प्रस्तावित थी। राजधानी से जाने और आने के टिकट बुक हो चुके थे।
मन तो नहीं था नवम्बर में कहीं जाने का लेकिन जब दो के बदले आठ छुट्टियां मिल रही हों तो ऐसा करना पडा। एक साइकिल यात्रा का विचार होने लगा। पिछली नीलकण्ठ वाली साइकिल यात्रा से उत्साहित होकर सोच लिया कि ये आठों दिन साइकिल को ही समर्पित कर देने हैं। इसका दूसरा फायदा है कि सप्ताह भर बाद होने वाली कर्नाटक यात्रा की दिशा तय हो जायेगी- साइकिल ले जानी है या नहीं।
खूब सोच विचार करके भुज जाना पक्का हो गया। कहां ट्रेन से साइकिल लेकर उतरना है, कब कब कहां कहां जाना है, सब सोच लिया गया। एक दिन में 100 किलोमीटर साइकिल चलाने का लक्ष्य रखा गया।
लेकिन भुज जाने में अजमेर आडे आ गया। उन दिनों एक तो पुष्कर में मेला था और दूसरे अजमेर में भी मुसलमानों का कुछ बडा मौका था। तो अजमेर तक तो सीटें मिल रही थीं लेकिन उसके बाद सैंकडों वेटिंग। हां, भुज से वापस आने के लिये आला हजरत ट्रेन में पक्की बर्थ मिल गई।
भुज कैसे जायें? यह प्रश्न एक बडी उलझाऊ पहेली बन गया। सीधे अजमेर वाले रूट से जब हर तरह का जोड-तोड करके देख लिया तो इधर उधर के रूटों पर ताकझांक शुरू हुई। रतलाम-वडोदरा वाला रूट अजमेर का भी गुरू निकला।
जोधपुर से रात ग्यारह बजे के आसपास गांधीधाम के लिये एक ट्रेन चलती है। यह मंगलवार को तो चलती है लेकिन बुधवार को नहीं चलती। उधर दिल्ली से मंगल की सुबह चलकर शाम तक जोधपुर पहुंचना भी दुष्कर हो गया, कोई ट्रेन नहीं।
आखिरकार भुज का मामला रद्द करके कहीं और की सोच हावी होने लगी। उदयपुर की सीट मिल रही थी। भुज से वापसी का आरक्षण हो ही चुका था, सोचा कि उदयपुर से भुज तक जायेंगे साइकिल से। तभी दिखा कि जैसलमेर की सीटें भी हैं। सोचा कि चलो जैसलमेर से भुज चलते हैं। कभी सोचा कि उदयपुर से जैसलमेर तक साइकिल चलाते हैं। आठ दिनों में 800 किलोमीटर साइकिल चलाने का लक्ष्य था- अनुभवहीन सोच।

Friday, November 16, 2012

जयपुर- चूरू मीटर गेज ट्रेन यात्रा

शेखावाटी में आज के समय में एक ही रूट पर मीटर गेज चलती है- जयपुर से चूरू के बीच। एक समय ऐसा हुआ करता था कि शेखावाटी के लोगों को पता भी नहीं था कि भारत में कहीं बडी ट्रेन भी चलती है। उनकी सबसे नजदीकी ब्रॉड गेज दिल्ली में हुआ करती थी।
पिछले दिनों शेखावाटी में अचानक दो लाइनें बन्द हो गईं। पहली रतनगढ- सरदारशहर और दूसरी लोहारू- सीकर। इनमें से दूसरी वाली पर मैंने यात्रा कर रखी थी, सरदारशहर वाली पर नहीं की थी। इनके बन्द होते ही मुझे डर लगने लगा कि कहीं जयपुर-चूरू भी बन्द ना हो जाये। यह लाइन बन्द हो, इससे पहले ही इस पर यात्रा कर लेनी चाहिये। इसी सिलसिले में आज मैं जयपुर में हूं।
यात्रा शुरू होती है नींदर बेनाड स्टेशन से। असल में कल रात मैं दस बजे जयपुर पहुंचा। अपने एक मित्र विधान उपाध्याय जयपुर के ही रहने वाले हैं और नींदर बेनाड के पास उनका घर है। रात उनके यहां चला गया। सुबह छह बजे तक आंख खुल जाये, यही बहुत बडा काम है। इसलिये तय हुआ सवा छह बजे तक नींदर बेनाड स्टेशन पहुंच जाना है। पन्द्रह किलोमीटर पीछे जयपुर जाकर वहां से यात्रा शुरू करनी चाहिये थी, लेकिन इतना भी काफी है।
बीच में ढहर का बालाजी स्टेशन पडता है। वो छूट गया यानी ढहर का बालाजी ढेर।
विधान ने बताया कि नींदर बेनाड का मतलब है निः+धड और बे+नाड। नाड कहते हैं गर्दन को। अब कहानी बिना धड और बिना गर्दन वाली है तो आगे कुछ भी जोडा जा सकता है।
अगर मैं भारत के इस अर्धमरुस्थलीय भाग में यात्रा न करता तो ट्रेन के सबसे पीछे वाले डिब्बे में बैठता। लेकिन अब धूल से बचने के लिये अगले डिब्बों में बैठना पडेगा। मैं अक्सर बीच वाले डिब्बों में बैठना पसन्द नहीं करता क्योंकि बीच वाले डिब्बों में यात्रियों का घनत्व सबसे ज्यादा होता है।
नींदर बेनाड के बाद भट्टों की गली, चौमूं सामौद, लोहरवाडा, गोविन्दगढ मलिकपुर, छोटा गुढा स्टेशन हैं और इनके बाद आता है रींगस जंक्शन। रींगस में बडी लाइन को पार करती हुई यह छोटी लाइन आगे चल पडती है। बडी लाइन रेवाडी को फुलेरा से जोडती है। सुबह विधान के यहां से एक कप चाय पीकर चला था, रींगस में कचौडियां खाई गईं।

Wednesday, November 14, 2012

दिल्ली- जयपुर डबल डेकर ट्रेन यात्रा

एक दिन अचानक नजर में आया कि लोहारू- सीकर मीटर गेज लाइन बन्द हो गई है। उसे बडी लाइन में बदला जायेगा और कुछ महीनों बाद वो भारत के मुख्य रेल नेटवर्क से जुड जायेगी। हालांकि हर बन्द होती छोटी लाइन के बारे में जानकर दुख तो होता है लेकिन ऐसा तो होना ही है। कब तक और क्यों दुखी हों? मेरे एक मित्र हैं- अभिषेक कश्यप जिनके बारे में मैंने सबसे पहले जाना कि वे ‘रेल-फैन’ हैं। यानी रेलों के जबरदस्त फैन। लेकिन उनका शौक केवल छोटी लाइनों तक ही है, बडी लाइनों के फैन हैं या नहीं लेकिन गेज परिवर्तन के जबरदस्त विरोधी। जी भरकर कोसते हैं वे रेलवे के गेज परिवर्तकों को।
खैर, हमारा स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि हम किसी भी तरह के परिवर्तन को स्वीकार करने में झिझकते हैं, जबकि हमें इसे स्वीकार करना चाहिये। बल्कि जिन्दगी में खुद भी परिवर्तित होते रहना चाहिये।
तो जी, राजस्थान में कुछ समय पहले तक मीटर गेज ही हुआ करती थी, अब सब खत्म होती जा रही हैं। गिनी चुनी मीटर गेज ही बची हुई हैं, इनमें से भी ज्यादातर पर मैंने यात्रा कर रखी है। लोहारू- सीकर लाइन के बन्द होते ही मुझे चिन्ता सताने लगी जयपुर- चुरू लाइन की। मैंने लोहारू- सीकर लाइन पर तो यात्रा कर रखी है लेकिन जयपुर- सीकर- चुरू अभी भी मुझसे अछूती है। कोशिशें होने लगीं बन्द होने से पहले शेखावाटी की इस आखिरी बची छोटी लाइन पर यात्रा करने की।
पिछले हफ्ते यानी 31 अक्टूबर को योजना फाइनल हो गई। हां, सुबह छह बजे ट्रेन जयपुर से चलकर दोपहर तक चुरू पहुंच जाती है। उसके बाद चुरू से एक पैसेंजर ट्रेन बीकानेर के लिये चलती है। मैंने इस बीकानेर वाली बडी लाइन पर भी यात्रा नहीं की है, इसलिये लगे हाथों इसे भी भुनाने का निर्णय कर लिया। शाम तक बीकानेर जाऊंगा। आधी रात के आसपास वहां से दिल्ली के लिये ट्रेन है, उससे वापसी का आरक्षण करा लिया।
तो जब 30 अक्टूबर को दिल्ली से चलने लगा तो करण का सन्देश आया कि साइकिल से कहीं चलना है। बिना सोचे समझे ऋषिकेश फाइनल हो गया। मीटर गेज यात्रा फिर से कैंसिल हो गई।
अगले हफ्ते फिर, यानी 6 नवम्बर को। नाइट ड्यूटी के कारण छह को पूरे दिन खाली, सात की साप्ताहिक छुट्टी- हमेशा की तरह दो दिन हाथ में। फिर से मीटर गेज की सम्भावना लेकिन कोई रिजर्वेशन नहीं। दिन भर में किसी भी ट्रेन में बैठकर शाम तक आराम से जयपुर जाया जा सकता है, रिजर्वेशन की कोई जरुरत भी नहीं लेकिन बीकानेर से दिल्ली वापस आने के लिये रात भर का रिजर्वेशन जरूरी है। उसी पिछले सप्ताह वाली ट्रेन से करा लिया।

Monday, November 12, 2012

नीलकंठ से हरिद्वार साइकिल यात्रा

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नीलकंठ से अब बारी थी वापस आने की। दोपहर बाद ढाई बजे के आसपास नीलकंठ से वापस चल दिये। बड़ी जबरदस्त तलब लगी है वापस चलने की क्योंकि अब सारे रास्ते नीचे ही उतरना है। ऋषिकेश से यहाँ आने में जो बुरी हालत हुई, अब हालत उसके बिल्कुल विपरीत होने वाली है। पैड़ल की जगह ब्रेक पर ध्यान लगाना पड़ेगा।
नीलकंठ से निकलते ही ढलान शुरू हो गयी। पाँच किलोमीटर तक बड़ी जबरदस्त ढलान है। दो सौ मीटर नीचे पहुँच जाते हैं हम इस दूरी में। एक बात बड़ी अच्छी है कि सड़क बिल्कुल मस्त है, कहीं कोई गड्ढा तक नहीं है। साइकिल की अधिकतम स्पीड़ 36.5 किलोमीटर प्रति घंटा रिकार्ड़ की गयी।
पाँच किलोमीटर बाद जब तिराहे से ऋषिकेश की तरफ़ मुड़ जाते हैं तो सड़क कुछ ऊबड़-खाबड़ हो जाती है। साइकिल के अगले पहिये को ऐसे में जबरदस्त झटके झेलने पड़ते हैं। इनसे बचने के लिये इसमें शॉकर लगे हैं।

Thursday, November 8, 2012

ऋषिकेश से नीलकंठ साइकिल यात्रा

हम ऋषिकेश में हैं और आज हमें सौ किलोमीटर दूर दुगड्डा जाना है साइकिल से। इसके लिये हमने यमकेश्वर वाला रास्ता चुना है - पहाड़ वाला। दिन भर में सौ किलोमीटर साइकिल चलाना वैसे तो ज्यादा मुश्किल नहीं है, लेकिन पूरा रास्ता पहाड़ी होने के कारण यह काम चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
कुछ दिनों पहले मैंने अपने एक दोस्त करण चौधरी का ज़िक्र किया था, जो एम.बी.बी.एस. डॉक्टर भी है। हमारी जान-पहचान साइकिल के कारण ही हुई। करण ने तब नई साइकिल ली थी गियर वाली। उसने इंडियामाइक वेबसाइट पर पूछा कि दिल्ली से पचास किलोमीटर की रेंज में कौन-सी ऐसी जगह है, जहाँ आसानी से साइकिल से जाया जा सकता है। संयोग से वो प्रश्न मेरे सामने भी आ गया। मैंने बता दिया कि सुल्तानपुर नेशनल पार्क चले जाओ। बस, हो गयी जान-पहचान।

Monday, November 5, 2012

रूपकुण्ड का नक्शा और जानकारी

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रूपकुण्ड का यात्रा वृत्तान्त तो खत्म हो गया है। आज कुछ और सामान्य जानकारी दी जायेगी, जो बाद में जाने वालों के काम आयेगी।
रूपकुण्ड के यात्रा मार्ग में एक बेहद खूबसूरत बुग्याल आता है- बेदिनी बुग्याल। इसका पडोसी आली बुग्याल है। बेदिनी के बाद रूपकुण्ड जाने का एक ही रास्ता है जबकि बेदिनी जाने के दो रास्ते हैं- लोहाजंग से कुलिंग, वान होते हुए और लोहाजंग से कुलिंग, दीदना, आली बुग्याल होते हुए। लोहाजंग से कुलिंग होकर वान तक मोटर योग्य सडक बनी है लेकिन इस पर कोई बस नहीं चलती। बसें लोहाजंग तक ही आती हैं। लोहाजंग से वान जाने के लिये दिन भर में गिनी चुनी जीपें चलती हैं, यात्रियों की अपनी गाडियां भी चलती हैं, नहीं तो पैदल भी जाया जा सकता है- दूरी दस किलोमीटर है।
अब प्रस्तुत हैं इस यात्रा मार्ग के छोटे-छोटे टुकडों की जानकारी:
1. वान से बेदिनी बुग्याल: बेहतरीन पगडण्डी बनी है, हो सकता है कि एक बार किसी से पूछना पडे कि बेदिनी का रास्ता किधर से जाता है। एक बार रास्ता पकड लेंगे तो दोबारा नहीं पूछना पडेगा। वान से शुरूआत में मध्यम स्तर की चढाई है। लगभग तीन किलोमीटर के बाद रास्ता नीचे उतरने लगता है और नीलगंगा के पुल तक उतरता जाता है। वान की ऊंचाई 2460 मीटर है, तीन किलोमीटर के बाद ऊंचाई 2717 मीटर तक पहुंच जाती है, इसके बाद नीलगंगा का पुल 2558 मीटर पर है। नीलगंगा के बाद तीव्र चढाई शुरू होती है। पांच किलोमीटर बाद बेदिनी बुग्याल की सीमा में घुस जाते हैं, बुग्याल शुरू हो जाता है। यहां से कैम्प साइट करीब डेढ किलोमीटर दूर है। बेदिनी बुग्याल की ऊंचाई 3473 मीटर है।
2. लोहाजंग से दीदना: यह लोहाजंग से बेदिनी जाने वाला दूसरा रास्ता है। पहला रास्ता वान से होकर है, जिसका वर्णन ऊपर किया जा चुका है। लोहाजंग से वान रोड पर चार किलोमीटर बाद कुलिंग गांव आता है। कुलिंग से नीलगंगा के दूसरी तरफ दीदना दिखाई पडता है। दीदना जाने के लिये पहले नीचे उतरना पडता है, फिर नीलगंगा पार करके ऊपर चढना होता है। इस रास्ते में जहां कुलिंग से नीलगंगा तक जबरदस्त तेज उतराई है, वहीं नीलगंगा पार करके दीदना तक चढाई भी जबरदस्त है। कुलिंग से दीदना की दूरी करीब चार किलोमीटर है, जिसमें पुल बीच में पडता है। लोहाजंग की ऊंचाई 2350 मीटर, कुलिंग 2310 मीटर, नीलगंगा का पुल 1950 मीटर और दीदना 2433 मीटर पर है।

Saturday, November 3, 2012

रूपकुण्ड यात्रा- आली से लोहाजंग

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आली बुग्याल के बिल्कुल आखिरी सिरे पर है वो छोटा सा पानी का कुण्ड, मुझे बताया गया गया था कि वहां से नीचे उतरने का रास्ता मिलेगा। मैं कुण्ड के पास पहुंचा तो नीचे उतरने का रास्ता दिख गया। लेकिन मैं मुश्किल में पड गया कि रास्ता यही है या अभी कुछ और सीधे चलते जाना है। यहां से दाहिने की तरफ भी रास्ता होने का भ्रम था और सीधे भी।
मुझे पता था कि आगे दीदना गांव तक भयानक जंगल मिलने वाला है। बेदिनी में ही मैंने इसकी पुष्टि कर ली थी। जंगल में अकेले चलते हुए मुझे डर लगता है।
कुछ देर के लिये मैं कुण्ड के पास ही बैठ गया। एक आदमी आता दिखाई पडा। वो महिपत दानू (फोन- 09411528682, 09837439533) था, जो दीदना का रहने वाला है और लोहाजंग में उसकी दुकान भी है। उसने बताया कि दाहिने वाला रास्ता शॉर्टकट है, जो बहुत ढलान वाला है जबकि सीधा जाने वाला रास्ता खच्चरों वाला है। मैंने पूछा कि तुम किस रास्ते से जाओगे, तो बोला कि खच्चरों वाले रास्ते से क्योंकि मुझे इधर आये हुए बहुत दिन हो गये हैं, सुना है कि खच्चरों वाला रास्ता पक्का बन रहा है। देखूंगा कि कितना पक्का बन गया है। और हम शॉर्टकट रास्ते को छोडकर सीधे चल पडे।
जल्दी ही जंगल शुरू हो गया। लेकिन एक तो महिपत के साथ होने से और दूसरे आवाजाही होने से उतना डर नहीं लगा। पूरे रास्ते भर रूपकुण्ड जाने वाले कई ग्रुप मिले।
कुछ देर बाद तोलपानी पहुंच गये। तोलपानी दीदना से पहले दो तीन झौंपडियों वाली जगह है, जहां टैंट लगाने और झौंपडियों में रुकने की सुविधा है। चारों ओर जंगल से घिरी खूबसूरत जगह है तोलपानी- समुद्र तल से 2872 मीटर की ऊंचाई पर।
तोलपानी से कुछ नीचे उतरकर दीदना गांव के ऊपर एक खुली समतल जमीन है जिसे दीदना कैम्पिंग ग्राउण्ड कहा जाता है। दीदना में रात्रि विश्राम करने वाले ज्यादातर ग्रुप यही अपने तम्बू लगाते हैं।
दीदना- समुद्र तल से 2400 मीटर की ऊंचाई पर एक गांव। इसके सामने नीलगंगा के दूसरी तरफ कुलिंग है जहां मुझे जाना है। महिपत चूंकि दीदना का ही रहने वाला था इसलिये अपने घर ले गया। उसने घर को होम स्टे बना रखा है, जहां रूपकुण्ड या बेदिनी जाने वाले लोग रुक सकते हैं और खाना आदि भी खा सकते हैं। जाते ही मुझे चाय मिली जिसके पैसे लेने से उसने इंकार कर दिया। उसने यहीं रुक जाने को भी कहा लेकिन कल सुबह सवेरे लोहाजंग से बस पकडनी जरूरी बताकर मैं चल पडा। चलने से पहले महिपत ने नीचे नीलगंगा तक उतरने और फिर कुलिंग तक चढने का रास्ता समझा दिया।

Tuesday, October 30, 2012

रूपकुण्ड से आली बुग्याल

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3 अक्टूबर 2012 की सुबह आराम से सोकर उठा। कल रूपकुण्ड देखकर आया था तो थकान हो गई थी और नींद भी अच्छी आई। हालांकि स्लीपिंग बैग में उतनी अच्छी नींद नहीं आती, फिर भी आठ बजे तक सोता रहा। 
आईएएस अफसरों में से ज्यादातर को मेरे बारे में पता था कि बेचारा दिल्ली से आया है और अच्छी नौकरी वाला है, फिर भी आखिरी समय तक किसी से ना तो दोस्ती हुई, ना ही जान-पहचान। इसके लिये काफी हद तक मैं भी जिम्मेदार हूं, क्योंकि मैं बाहर निकलकर लोगों से घुल-मिल नहीं पाता हूं। उस पर भी अगर किसी की कोई बात बुरी लग जाये तो फिर कहना ही क्या!
जब हम सब रूपकुण्ड पर थे तो गाइड देवेन्द्र ने ऐलान किया कि नीचे भगुवाबासा में खाना खायेंगे। इस ऐलान में कुछ हिस्सा मेरे लिये भी था क्योंकि एक तो देवेन्द्र पहले से ही मेरे लिये खाना लाया था और मेरा बैग देवेन्द्र के पास था जिसमें सबका खाना रखा था। हवा का घनत्व कम होने के कारण मेरा दिमाग काम भी कम ही कर रहा था लेकिन तुरन्त ही उसने एक काम यह किया कि अपने बैग से बिस्कुट का एक पैकेट निकाल लिया।
आईएएस अफसरों से मुझे एक तरह की चिढ सी हो गई थी। पहले दिन भले ही उनके साथ ही ‘सरकारी’ खाना खाया हो, लेकिन उसके बाद मैंने उनका खाना ना छूने की प्रतिज्ञा कर ली। सुबह पांच बजे ढाबे पर दो प्लेट मैगी खाकर चला। रास्ते में कालू विनायक पर बिस्कुट का एक पैकेट और कुछ नमकीन खत्म की, पानी पी लिया।
मैं रूपकुण्ड से बाकी सब के पन्द्रह मिनट बाद चला था, इसलिये नीचे उतरते हुए वे जल्दी ही मुझसे काफी आगे निकल गये। भगुवाबासा में सरकारी फाइबर हट हैं, जिनकी देखरेख स्थानीय निवासी करते हैं। वे चाय आदि उपलब्ध करा देते हैं। अफसरों की पूरी टीम वहीं पर चाय के साथ पूरी-सब्जी खाने लगी। मैं वहां से उनसे ऐसा आंख बचाकर निकला कि किसी को मेरे निकल जाने की खबर नहीं हुई। देवेन्द्र को पता था कि मैं कुछ पीछे पीछे आ रहा हूं, तो उसने मेरे लिये भी चाय बनवाकर रखवा दी और कुछ देर बाद पूरी टीम को लेकर चल पडा। पेरी पूरी सब्जी भी वही रख दी थी उसने।
मैं कालू विनायक पर आंख मीचकर लेटा था जब वे सब लोग वहां पहुंचे। देवेन्द्र ने पूछा कि सब लोग खाना खा रहे थे तो तुम क्यों नहीं आये। यह भी बताया कि मेरी चाय वहां रखी है और पैसे देवेन्द्र ने दिये थे। मैंने जवाब पहले से ही सोच रखा था कि इनमें से कोई भी आदमी मेरे पहचान में नहीं आया, मैंने सोचा कि यह कोई और ग्रुप है, इसलिये मैं निकल आया। साथ ही यह भी बता दिया कि मैंने बिस्कुट खा लिये हैं, कोई परेशानी की बात नहीं है।

Saturday, October 27, 2012

रूपकुण्ड- एक रहस्यमयी कुण्ड

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भगुवाबासा समुद्र तल से लगभग 4250 मीटर की ऊंचाई पर है जबकि इससे चार किलोमीटर आगे रूपकुण्ड 4800 मीटर पर। अगर चढाई का यही अनुपात 2000 मीटर की रेंज में होता तो समीकरण कुछ आसान होते।
अफसरों का पूरा दल मुझसे करीब डेढ किलोमीटर आगे था। सभी लोग दिख भी रहे थे लेकिन चींटियों जैसे। आखिरी एक किलोमीटर की चढाई भी दिख रही थी, जिसे देख-देखकर मैं परेशान हुआ जा रहा था। कम ऑक्सीजन के कारण मन भी नहीं था चलने का।
हालत अफसरों की भी ज्यादा अच्छी नहीं थी। जब वो आखिरी चढाई शुरू होने को आई, तब मैं उनके पास पहुंच गया। उनमें भी जो ज्यादा तन्दुरुस्त थे, वे ऊपर चढे हुए दिख रहे थे और नीचे वालों को चिल्ला-चिल्लाकर रास्ता बता रहे थे। जो मेरे जैसे थे, कमजोर मरियल से, वे सबसे पीछे थे। यहां चट्टान भी खत्म हो गई थी। था तो केवल चट्टानों का चूरा, जो हमारे सिर के लगभग ऊपर की चट्टानों से टूट-टूटकर गिरता रहता था।
जब मैं उनके सबसे पीछे वाले दल से आगे निकलने लगा तो उन्होंने मुझसे कहा कि यार, तुम तो थके ही नहीं हो, इधर हमारी ऐसी तैसी हुई पडी है। मैंने कहा कि नहीं, ऐसा नहीं है। मुझे तुम बे-थके लग रहे हो और ऐसी तैसे मेरी हुई पडी है।
नीचे गाइड देवेन्द्र ने बताया था कि अप्रैल- मई में यहां एक बंगाली ट्रैकर की मौत हो गई थी। यहां बर्फ ही बर्फ थी उस समय और वो फिसल गया था। यही आखिरी हिस्सा इस यात्रा का सबसे खतरनाक हिस्सा है। हालांकि आज यहां दूर दूर तक बर्फ का नामोनिशान नहीं है लेकिन जब यहां बर्फ होती है, तो कैसे पार करते हैं लोग-बाग इसे। चढ तो मैं जाऊंगा इस पर लेकिन जब नीचे उतरूंगा, तब बुरी फजीहत होगी क्योंकि मेरे पास आज कोई लठ भी नहीं है। चट्टानों का चूरा है, जो पैर रखते ही फिसल जाता है।
और आखिरकार मैं उस समतल जगह पर पहुंच जाता हूं जहां एक छोटा सा मन्दिर भी बना है। पूरी रूपकुण्ड यात्रा में एक चढाई चढने के बाद जहां भी समतल जगह आती है, वहीं मन्दिर है, तो यहां भी है। इसके दूसरी तरफ एक अपेक्षाकृत छोटी चढाई और दिख रही है, जिसके उस तरफ शायद रूपकुण्ड है। यही बराबर में ही एक बडा सा गड्ढा भी है जिसमें चट्टानों के टुकडे बिखरे पडे हैं। यहीं मन्दिर के चबूतरे पर सभी लोग बैठे हैं, गाइड देवेन्द्र भी है। थोडा आगे ताजी बर्फ है जहां इन्हीं में से कुछ लोग मस्ती कर रहे हैं, फोटो खींच रहे हैं। ये लोग शायद नीचे से आने वाले अपने आखिरी ‘जत्थे’ का इंतजार कर रहे हैं।

Wednesday, October 24, 2012

रूपकुण्ड यात्रा- बेदिनी बुग्याल से भगुवाबासा

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2 अक्टूबर 2012, जब पूरा देश गांधी जयन्ती मनाने की सोचकर सोया हुआ था, सुबह पांच बजे, मैं उठा और रूपकुण्ड के लिये चल पडा। यहां किसी के ध्यान में नहीं था कि आज गांधी जयन्ती है।
पांच बजे अच्छा खासा अन्धेरा होता है लेकिन चांद निकला था, शायद आज पूर्णिमा थी, तभी तो समूचा चांद दिख रहा था। तेज हवा चल रही थी, ठण्ड चरम पर थी। जब तक धूप नहीं निकलेगी, तब तक ठण्ड भी लगेगी, यह सोचकर मैंने पूरे गर्म कपडे पहन लिये। बैग में बिस्कुट नमकीन के पैकेट, रेनकोट, पानी की बोतल, दो चार खाली पन्नियां रख ली, बाकी सामान टैण्ट में छोड दिया। कौन ले जायेगा यहां से इस बाकी सामान को? और ले जाता हो तो ले जा, वापसी के लिये कुछ वजन कम हो जायेगा।
देखा कि आईएएस वाले अभी भी यहीं हैं। हालांकि इन्होंने रात घोषणा की थी कि चार बजे निकल पडेंगे, लेकिन इतने बडे ग्रुप में एक घण्टा लेट हो जाना कोई बडी बात नहीं है। अगर मैं भी चार बजे निकलने की प्रतिज्ञा करता तो कौन जानता है कि छह बजे निकलना होता। ठण्ड और नींद इतनी जबरदस्त आती है कि सुबह उठने का मन नहीं होता।

Monday, October 22, 2012

बेदिनी बुग्याल

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बेदिनी बुग्याल रूपकुण्ड के रास्ते में आता है। इसकी समुद्र तल से ऊंचाई करीब 3400 मीटर है। बुग्याल एक गढवाली शब्द है जिसका अर्थ होता है ऊंचे पहाडों पर घास के मैदान। ये मैदान ढलानदार होते हैं। गढवाल में कुछ अन्य बुग्याल हैं- औली, चोपता, दयारा, पंवालीकांठा। इनमें औली और चोपता तक सडक बनी है, इसलिये ज्यादा लोकप्रिय भी हैं। औली बुग्याल में जब जाडों में बर्फ पडती है तो वहां शीतकालीन खेल भी आयोजित होते हैं।
बेदिनी बुग्याल कैम्प साइट से कुछ दूर बेदिनी कुण्ड है जहां एक कुण्ड है और नन्दा देवी का छोटा सा मन्दिर है। मैं आज नीचे वान से यहां आया तो बेहद थक गया था। ना चाहते हुए भी एक चक्कर बेदिनी कुण्ड का लगाकर वापस कैम्प साइट तक आया तो काफी आराम महसूस हुआ। करीब दो घण्टे बाद फिर बेदिनी कुण्ड गया तो शरीर पूरी तरह वातावरण के अनुसार ढल चुका था। यानी कल ही रूपकुण्ड जाना है, शरीर ने इसकी अनुमति दे दी थी।

Friday, October 19, 2012

रूपकुण्ड यात्रा- वान से बेदिनी बुग्याल

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जब मैं वान में था तो इन्दरसिंह के होटल के सामने सडक पर जो कि खाली पडी जमीन ज्यादा लगती है, दो लोग खच्चर के लिये मोलभाव कर रहे थे। अगले दिन पता चला कि वे मसूरी से आये हैं और आईएएस प्रशिक्षु हैं। यानी उनकी यह सरकारी यात्रा है। वे कुल मिलाकर बाइस जने थे, उनके साथ दो सहायक भी मसूरी से आये थे और एक सीआइएसएफ का जवान भी था।
खैर, जब वे दो लोग खच्चर के लिये मोलभाव कर रहे थे तो मुझे नहीं मालूम था कि वे इतने बडे आदमी हैं। मैंने समझा कि वे दो ही जने हैं और अपने राशन पानी और तम्बू आदि के लिये खच्चर करना चाहते हैं। हालांकि इसमें कोई विशेष बात कुछ नहीं हुई लेकिन उनकी बहस और मोलभाव करना काफी मजेदार था। अब मैं सोच रहा हूं कि जब वे सरकारी खर्चे पर थे तो उन्हें मोलभाव करने की जरुरत क्या थी।
अगले दिन यानी एक अक्टूबर की सुबह आराम से आठ बजे सोकर उठा। आज मुझे मात्र दस किलोमीटर पैदल चलकर बेदिनी बुग्याल तक ही जाना था। इन्दरसिंह से पता कर लिया कि वहां रुकने का क्या इन्तजाम मिलेगा, तो उसने कहा कि आप वहां पहुंचो तो सही, सारा इन्तजाम है। उसके कहने का मतलब था कि एक अकेले इंसान के लिये कहीं भी जगह हो जाती है। अगर संख्या ज्यादा है तो दिक्कत होती है। फिर मेरे पास स्लीपिंग बैग भी था, मुझे बस छत चाहिये थी। चूंकि यह रूपकुण्ड यात्रा के लिये आदर्श मौसम होता है, तो वहां स्थानीय लोगों के साथ साथ दूसरे यात्रियों के तम्बू भी मिलेंगे। मेरा भरोसा दूसरे यात्रियों के मुकाबले स्थानीय लोगों पर ज्यादा था, जो कि आखिरकार सही निकला।

Wednesday, October 17, 2012

रूपकुण्ड यात्रा- दिल्ली से वान

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29 सितम्बर 2012 की सुबह मैं आनन्द विहार बस अड्डे के पास उस तिराहे पर खडा था जहां से मोहननगर जाने वाली सडक का जन्म होता है और वहीं दिल्ली और यूपी की सीमा भी हैं। दुविधा में था कि हरिद्वार के रास्ते जाऊं या हल्द्वानी के रास्ते या रामनगर के रास्ते। दुविधा जल्दी ही खत्म हो गई जब देहरादून वाली बस आकर रुकी। मैं इसी में चढ गया और रुडकी का टिकट ले लिया। रुडकी से दोबारा बस बदली और दोपहर से पहले पहले मैं हरिद्वार पहुंच चुका था।
हरिद्वार में नाश्ता करके हमेशा की तरह गोपेश्वर जाने वाली प्राइवेट बस पकडी और श्रीनगर का टिकट लिया। मैं जब भी इधर आता हूं तो श्रीनगर का ही टिकट लेता हूं क्योंकि बस यहां काफी देर तक रुकी रहती है। समय बचाने के लिये इससे आगे खडी बस में जा बैठता हूं। हालांकि आज ऐसा करने की नौबत नहीं आई और यही बस जल्दी चल पडी। अब दोबारा टिकट लिया कर्णप्रयाग का, वो भी तब जब कंडक्टर ने सवारियां गिनकर ऐलान किया कि एक सवारी अभी भी बेटिकट है।

Monday, October 15, 2012

रूपकुण्ड यात्रा की शुरूआत

रूपकुण्ड उत्तराखण्ड में 4800 मीटर की ऊंचाई पर एक छोटी सी झील है। वैसे तो हिमालय की ऊंचाईयों पर इस तरह की झीलों की भरमार है लेकिन रूपकुण्ड एक मामले में अद्वितीय है। इसमें मानव कंकाल बिखरे पडे हैं। वैज्ञानिकों ने इनकी जांच की तो पाया कि ये कई सौ साल पुराने हैं। इतने सारे मानव कंकाल मिलने का एक ही कारण हो सकता है कि कोई बडा दल वहां था और उनके ऊपर जानलेवा विपत्ति आ पडी। वहां इतनी ऊंचाई पर इतने लोग क्या कर रहे थे, क्यों थे; यह भी एक सवाल है। इसके भी दो जवाब बनते हैं- एक तो यह कि जिस तरह आज हर बारह साल में यहां नन्दा देवी राजजात यात्रा होती है, उसी तरह तब भी होती होगी और यात्रा में भाग लेने वाले श्रद्धालु थे वे। दूसरा जवाब है कि वे व्यापारी थे जो शायद तिब्बत जा रहे थे।
लेकिन व्यापारियों वाली बात हजम नहीं होती क्योंकि इधर से तिब्बत जाने का मतलब है कि वे नीति पास के रास्ते जायेंगे। वान या लोहाजंग या देवाल के लोग अगर नीति पास जायेंगे तो अलकनन्दा घाटी के सुगम रास्ते का इस्तेमाल करेंगे, रूपकुण्ड और उससे आगे के दर्रे का इस्तेमाल करना गले नहीं उतरता। इसलिये तीर्थयात्रा वाली कहानी ज्यादा वास्तविक लगती है।

Saturday, October 13, 2012

46 रेलवे स्टेशन हैं दिल्ली में

एक बार मैं गोरखपुर से लखनऊ जा रहा था। ट्रेन थी वैशाली एक्सप्रेस, जनरल डिब्बा। जाहिर है कि ज्यादातर यात्री बिहारी ही थे। उतनी भीड नहीं थी, जितनी अक्सर होती है। मैं ऊपर वाली बर्थ पर बैठ गया। नीचे कुछ यात्री बैठे थे जो दिल्ली जा रहे थे। ये लोग मजदूर थे और दिल्ली एयरपोर्ट के आसपास काम करते थे। इनके साथ कुछ ऐसे भी थे, जो दिल्ली जाकर मजदूर कम्पनी में नये नये भर्ती होने वाले थे।
तभी एक ने पूछा कि दिल्ली में कितने रेलवे स्टेशन हैं। दूसरे ने कहा कि एक। तीसरा बोला कि नहीं, तीन हैं, नई दिल्ली, पुरानी दिल्ली और निजामुद्दीन। तभी चौथे की आवाज आई कि सराय रोहिल्ला भी तो है। यह बात करीब चार साढे चार साल पुरानी है, उस समय आनन्द विहार की पहचान नहीं थी। आनन्द विहार टर्मिनल तो बाद में बना। उनकी गिनती किसी तरह पांच तक पहुंच गई। इस गिनती को मैं आगे बढा सकता था लेकिन आदतन चुप रहा।

Tuesday, October 9, 2012

विन्ध्याचल और खजूरी बांध

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चुनार से निकलकर हमारा काफिला मीरजापुर की तरफ चल पडा। मीरजापुर से कुछ किलोमीटर पहले एक छोटा सा चौरास्ता है, जहां से हम बायें मुड गये और सुनसान पडी सडक पर चलते चलते खजूरी बांध के समीप पहुंच गये। वैसे तो बांध वो जगह होती है, जहां पानी को बांधा जाता है। यानी जहां पानी के बहाव में रोक लगाई जाती है। वो जगह इस सुनसान सडक से काफी दूर थी, तो यहां ज्यादा समय नष्ट न करते हुए आगे बढ चले। कुछ देर बाद हम बांध पर पहुंचेंगे।
मीरजापुर-राबर्ट्सगंज रोड पर पहुंचे। इस पर करीब दो तीन किलोमीटर के बाद बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का दक्षिणी परिसर बना है। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय वैसे तो वाराणसी में है लेकिन इसकी एक शाखा यहां भी है।
चूंकि हम चन्द्रेश की कृपा से बाइकों पर थे तो किसी तरह के आवागमन की कोई परेशानी नहीं थी। अब वापस मीरजापुर की तरफ हो लिये और सीधे पहुंचे खजूरी बांध के मुहाने पर। यहां से एक नहर भी निकाली गई है। बांध होते ही नहरों के लिये हैं। हां, कभी कभी टरबाइन लगाकर बिजली भी बना ली जाती है।
इस बांध में दरारें पडी हुई हैं। इन दरारों से बहुत सारा पानी निकल जाता है। चन्द्रेश को डर है कि अगर इन दरारों की वजह से बांध टूट गया तो मीरजापुर में भारी तबाही मचेगी। लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता। क्योंकि यह इलाका बरसात को छोडकर सूखा ही रहता है। बाकी समय में इसमें पानी भरने का कोई तरीका नहीं है। बरसात में इसमें अधिकतम पानी रहता है। दूसरे, बांध की दीवार तकरीबन बीस-पच्चीस मीटर ऊंची है और लम्बाई भी पचास मीटर के करीब है। चूंकि पानी ज्यादा नहीं है इसलिये बांध टूटने की दशा में कभी भी पूरी दीवार नहीं टूट सकती। दीवार में जो छेद हैं, वे धीरे धीरे बडे होते चले जायेंगे। धीरे धीरे ज्यादा पानी निकलता चला जायेगा और धीरे धीरे इसकी जल-धारण क्षमता भी कम होती चली जायेगी। इसीलिये मुझे तबाही जैसे लक्षण नहीं लगते। यह एक दम तोडता हुआ बांध है।
यहां काफी समय व्यतीत किया गया। घर से लाया गया खाना भी निपटाया गया और अतुल को नहर में नहलाया भी गया।

Sunday, October 7, 2012

चुनार का किला व जरगो बांध

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अगले दिन वाराणसी से निकलकर हम तीनों चन्द्रेश (वेबसाइट) के गांव की तरफ चल पडे। आज चूंकि एक ही बाइक थी इसलिये तीनों उसी पर सवार हो गये। दूसरी बाइक हमें गांव से मिलेगी। वाराणसी से करीब पच्चीस किलोमीटर दूर मिर्जापुर जिले में उनका गांव है। कल पूरे दिन हम बाइकों पर घूमे थे, आज फिर से बाइक ही झेलनी पडेगी। हालांकि मैं पहले ही बाइक पर लम्बे समय तक बैठे रहने के पक्ष में नहीं था, लेकिन फिर सोचा कि आज बाइकों की वजह से हमें देश के उन हिस्सों को देखने का सौभाग्य मिलेगा, जो कथित रूप से पर्यटक स्थलों की श्रेणी में नहीं आते। बिल्कुल नई जगह।
आज हमें इलाहाबाद-बनारस जैसे अति प्रसिद्ध जगहों के बीच की जमीन पर विचरण करना था, लेकिन गंगा के दक्षिण में। सबसे पहले शुरूआत होती है रामनगर किले से। यह किला वाराणसी के गंगापार स्थित रामनगर कस्बे में स्थित है। यह कभी काशी नरेश की राजधानी हुआ करता था। आजकल इसमें सैन्य गतिविधियां चल रही हैं, इसलिये हम इसके अन्दर नहीं गये। वैसे बताते हैं कि इसमें चोखेर बाली फिल्म की शूटिंग भी हुई थी और इसमें एक संग्रहालय भी है।

Wednesday, October 3, 2012

काशी विश्वनाथ और बनारस के घाट

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बनारस के घाटों के सिलसिले में हम सबसे पहले पहुंचे मणिकर्णिका घाट। इससे पहले जब सारनाथ से आ रहे थे तो एक फाटक से गुजरना पडा। फाटक बन्द था और कृषक एक्सप्रेस यहां से निकली थी। कृषक एक्सप्रेस लखनऊ से मण्डुवाडीह जाती है और गोरखपुर का चक्कर लगाकर आती है। इस तरह यह ट्रेन लखनऊ-वाराणसी की तीन सौ किलोमीटर की दूरी को तय करने के बजाय साढे पांच सौ किलोमीटर का चक्कर लगाकर आती है।
इस मामले में कौन सी ट्रेन सबकी गुरू है? यानी एक जगह से दूसरी जगह के लिये सीधी रेल लाइन होने के बावजूद भी बडे आडे तिरछे रूट से जाती है, खासकर दूर का चक्कर लगाकर। वो ट्रेन है विन्ध्याचल एक्सप्रेस (11271/11272) जो भोपाल और इटारसी के बीच चलती है। वैसे तो भोपाल से इटारसी 100 किलोमीटर भी नहीं है, दो घण्टे भी नहीं लगते दूसरी ट्रेनों में जबकि विन्ध्याचल एक्सप्रेस 738 किलोमीटर की दूरी तय करके भोपाल से इटारसी जाती है और साढे अठारह घण्टे लगाती है। यह भोपाल से चलकर पहले बीना जाती है, फिर सागर, कटनी, जबलपुर और पिपरिया रूट से इटारसी पहुंचती है। कौन इस ट्रेन में धुर से धुर तक की यात्रा करता होगा?
इसी के पास एक पुल भी मिला जहां नीचे से गोरखपुर वाली लाइन और ऊपर से मुगलसराय वाली लाइन गुजरती है। मुगलसराय वाली लाइन विद्युतीकृत है। इससे सिद्ध होता है कि पहले वाराणसी- भटनी लाइन यानी वाराणसी- छपरा लाइन मीटर गेज थी। और हां, वाराणसी से इलाहाबाद वाली लाइन के भी मीटर गेज होने के लक्षण मिल रहे हैं। मुझे लग रहा है कि इलाहाबाद सिटी स्टेशन पहले मीटर गेज होता था।

Sunday, September 30, 2012

सारनाथ

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सात बजे काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस वाराणसी पहुंची। यह दो घण्टे से भी ज्यादा लेट थी। इसके लेट होने का फायदा यह निकला कि हमें जहां पांच बजे ही उठना पडता, अब सात बजे सोकर उठे, ज्यादा नींद ले ली।
स्टेशन के बाहर ही चन्द्रेश भाई इंतजार कर रहे थे। चन्द्रेश वाराणसी से करीब पच्चीस किलोमीटर दूर अपने गांव में रहते हैं। इसके बावजूद भी वे बाइक लेकर सुबह छह बजे से पहले कैंट स्टेशन आ गये। वाराणसी जंक्शन को कैंट भी कहते हैं।
अब हम दोनों चन्द्रेश के अधीन थे। उन्होंने सबसे पहले एक कमरा दिलाया, सामान रखा, नहाये धोये और सारनाथ के लिये निकल पडे। सबसे अच्छी बात थी कि उन्होंने दो बाइकों का इंतजाम कर लिया था। बाइक से सारनाथ गये।
सारनाथ एक बौद्ध तीर्थ स्थल है। बोधगया में जब महात्मा बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हो गया तो उन्होंने पहला उपदेश सारनाथ में दिया था। चूंकि वाराणसी पहले से ही भयंकर हिन्दू तीर्थ रहा है तो जरूर काशी वालों की तथा बुद्ध की भिडन्त हुई होगी। हो सकता है कि बुद्ध काशी ही जा रहे हों और उन्हें नास्तिक घोषित करके काशी के बाहर ही रोक लिया गया हो। देखा जाये तो सारनाथ काशी से बाहर ही है। जिसे ज्ञान प्राप्त हो जाता है, वो पत्थर की मूर्तियों में भगवान को नहीं ढूंढता, इसलिये काशी वालों ने उन्हें नास्तिक बताया होगा।

Friday, September 28, 2012

बडा इमामबाडा और भूल भुलैया, लखनऊ

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बाराबंकी से जब मैं और अतुल चले तो दिमाग में बडा इमामबाडा था। लखनऊ सिटी स्टेशन पर ट्रेन से उतरे। मोबाइल में नक्शा खोलकर देखा, दूरी करीब डेढ किलोमीटर दिखाई। रास्ता भी इसी ने बता दिया। स्टेशन के सामने हल्का नाश्ता करके मोबाइल के बताये रास्ते पर चल पडे।
तभी संजय भास्कर का फोन आया कि वो लखनऊ पहुंच चुका है। वो हिसार से गोरखधाम एक्सप्रेस के जनरल डिब्बे में बैठकर आया था। इसका कारण उसने बताया कि स्लीपर में सीट नहीं थी। जबकि एक दिन पहले तत्काल कोटे में रिजर्वेशन हो जाता है। बाद में शाम तक वो जब हमारे ही साथ रहा तो हमने पाया कि वो अव्वल दर्जे का कंजूस भी है। अभी तक हम खुद को ही अव्वल दर्जे का कंजूस मानते थे, वो हमारा भी गुरू निकला।
मैंने उससे कहा कि हम बडा इमामबाडा देखने जा रहे हैं, आ जा। बोला कि आता हूं। थोडी देर में फोन आया कि टम्पू वाला डेढ सौ रुपये मांग रहा है। पूछने लगा कि कोई सस्ता साधन बता। डेढ सौ रुपये सुनकर मेरे भी होश उड गये। मैं उसे ट्रेन के बारे में बता सकता था लेकिन मुझे ट्रेन का टाइम मालूम नहीं था। मैंने कहा कि तू और पूछताछ कर, कोई ना कोई बस जरूर मिल जायेगी। पूछता पूछता आ जा, भले ही रास्ते में एक दो जगह बसें बदलनी ही क्यों ना पडे।

Wednesday, September 26, 2012

वर्ष का सर्वश्रेष्ठ घुमक्कड- नीरज जाट

एक दिन सन्दीप भाई घूमते घूमते हमारे यहां आ गये। उनका जब भी कभी लोहे के पुल से जाना होता है, वे अक्सर आ ही जाते हैं। बोले कि इस बार तू परिकल्पना द्वारा आयोजित वर्ष के सर्वश्रेष्ठ घुमक्कड के लिये टॉप तीन में पहुंच गया है। पूरी उम्मीद है कि तू ही सर्वश्रेष्ठ बनेगा।
चलो इसे थोडा विस्तार से बता देता हूं। परिकल्पना एक समूह है जो हिन्दी ब्लॉगिंग को बढावा देने के लिये पुरस्कार वितरण करता है। ज्यादा नहीं मालूम मुझे इसके बारे में लेकिन इसका साथ तस्लीम (TSALIIM- Team for Scientific Awareness on Local Issues in Indian Masses) समूह भी देता है। परिकल्पना समूह के मालिक रविन्द्र प्रभात हैं जबकि तस्लीम के डॉ जाकिर अली रजनीश। बस, अगर कोई और जिज्ञासा है इनके बारे में तो मैं नहीं बता पाऊंगा।
पिछले साल इन्होंने दिल्ली में हिन्दी भवन में पुरस्कार वितरण किया था। काफी सारी श्रेणियों में नामांकन होता है। काफी लोगों को उनके लेखन क्षेत्र के अनुसार पुरस्कृत किया जाता है। पिछले साल ही इन्होंने पुरस्कारों की शुरूआत की थी। मैं और सन्दीप दोनों उसमें भाग लेने पहुंचे थे, हालांकि हमें कुछ नहीं मिला।

Monday, September 24, 2012

भारत परिक्रमा- आखिरी दिन

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21 अगस्त 2012
ट्रेन नई दिल्ली पहुंची। इसी के साथ अपनी भारत परिक्रमा पूरी हो गई।
अब वक्त था विश्लेषण करने का। इस यात्रा में मैंने क्या खोया और क्या हासिल किया, इस बारे में सोचने का।
एक घुमक्कड के पास कुछ भी खोने को नहीं होता। इसलिये जाहिर है कि अपनी तरफ से कुछ भी खोया नहीं गया है, पाया ही है, हासिल ही किया है।
कुछ दोस्तों ने इस यात्रा पर जाने से पहले काफी आलोचना की थी। बेकार का काम बताया था इसे। हालांकि इसमें उतना हासिल नहीं हुआ जितना कि मेरी बाकी यात्राओं में हासिल होता रहा है। पहले एक स्थान पर जाता था और ढेर सारी सामग्री मिलती थे, इसमें ढेर सारे स्थानों पर गया और कम सामग्री मिली है।
मैं पहले से ही पर्यटक और घुमक्कड में फर्क करता आया हूं, आज भी उस मुद्दे को उठाऊंगा। पर्यटक कभी भी घुमक्कड को नहीं समझ पायेगा। ज्यादातर लोग पर्यटक होते हैं, उन्हें घुमक्कड और घुमक्कडी उतने पसन्द नहीं होते, जितना कि पर्यटन। मैं न्यू जलपाईगुडी से होकर निकला, पर्यटकों ने सलाह दी कि दार्जीलिंग और सिक्किम पास ही हैं। डिब्रुगढ गया तो सलाह मिली कि काजीरंगा भी जाना था। इसके अलावा जहां जहां से गुजरा, पर्यटकों ने सलाह देने में कोई कसर नहीं छोडी।

Monday, September 10, 2012

भारत परिक्रमा- तेरहवां दिन- पंजाब व जम्मू-कश्मीर

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20 अगस्त 2012
ट्रेन यानी जन्मभूमि एक्सप्रेस भटिण्डा से निकल चुकी थी, जब मेरी आंख खुली। साढे सात से ज्यादा का समय था और ट्रेन बिल्कुल सही समय पर चल रही थी।
पंजाब से मेरा आना-जाना कई बार हो चुका है और मैं अच्छी तरह जानता हूं कि पंजाब से एक सिरे पर जो भी फसल दिखाई देगी, धुर दूसरे सिरे पर भी वही फसल दिखेगी। पानी की कोई कमी नहीं है इस राज्य में। नहरों का जाल बिछा हुआ है। भारत के किसी दूसरे राज्य के लिये खेती के मामले में पंजाब से टक्कर लेना आसान नहीं है। लेकिन पंजाब के अलावा भारत में एक इलाका और भी है जो उसे टक्कर दे सकता है। वो इलाका है- दोआब। पंजाब के कम्प्टीशन के लिये दोआब। दोआब यानी (राम)गंगा-यमुना के बीच का इलाका यानी मुख्यतया पश्चिमी उत्तर प्रदेश। मैं दोआब का ही रहने वाला हूं और हिन्दुस्तान के कई हिस्सों में घूमने के बाद दोआब से तुलना करके देखता हूं। या फिर अपनी जन्मभूमि होने के कारण दोआब मुझे सर्वश्रेष्ठ लगता है?

Sunday, September 9, 2012

भारत परिक्रमा- बारहवां दिन- गुजरात और राजस्थान

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19 अगस्त 2012
ठीक समय पर ट्रेन चल पडी। यह थी जन्मभूमि एक्सप्रेस (19107) जो अहमदाबाद से ऊधमपुर जाती है। यह गाडी तकरीबन सालभर पहले ही चलना शुरू हुई है। यह एक ऐसी ट्रेन है जो तटीय राज्य से चलकर राजस्थान के धुर मरुस्थलीय इलाके से होती हुई हिमालय की ऊंचाईयों तक जाती है। इसके रास्ते में पंजाब का विशाल उपजाऊ मैदान भी पडता है। वैसे तो अहमदाबाद-जम्मू एक्सप्रेस (19223) भी लगभग इसी रास्ते से चलती है लेकिन वो अर्द्ध मरुस्थलीय रास्ते से निकलकर मात्र जम्मू तक ही जाती है। पहली वाली जोधपुर से जैसलमेर वाली लाइन पर चलकर फलोदी से दिशा परिवर्तन करके लालगढ (बीकानेर) और फिर भटिण्डा के रास्ते जाती है जबकि दूसरी वाली जोधपुर से मेडता रोड, नागौर और बीकानेर के रास्ते भटिण्डा जाती है। दोनों में मुख्य अन्तर बस यही है।
अहमदाबाद से मेहसाना यानी करीब सत्तर किलोमीटर तक डबल गेज की लाइनें हैं यानी मीटर गेज और ब्रॉड गेज की लाइनें साथ साथ बराबर बराबर में। अहमदाबाद से फलोदी होते हुए भटिण्डा एक हजार किलोमीटर से भी ज्यादा है और कुछ साल पहले यह सब मीटर गेज हुआ करता था। अब गुजरात में अहमदाबाद से मेहसाना और उसके आसपास की कुछ लाइनें मीटर गेज की बची हैं। मेहसाना और अहमदाबाद के बीच में मीटर गेज की पांच छह ट्रेनें चलती हैं। मेहसाना से तरंगा हिल के लिये मीटर गेज की डीएमयू भी चलती हैं। मेरी बडी इच्छा है कि मीटर गेज की डीएमयू में यात्रा करूं। बडी लाइन की डीएमयू में कई बार घूम चुका हूं।

Saturday, September 8, 2012

भारत परिक्रमा- ग्यारहवां दिन- गुजरात

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18 अगस्त 2012
सुबह दो बजे सही समय पर ट्रेन राजकोट पहुंच गई। अहमदाबाद से जो बर्थ मेरी थी, राजकोट के बाद यही बर्थ किसी और की हो जायेगी। उसे राजकोट से ही इस ट्रेन में चढना है। कायदा यह बनता है कि राजकोट में ट्रेन रुकते ही उसे मुझे जगा कर डिब्बे से बाहर नहीं तो कम से कम बर्थ से नीचे तो उतार ही देना था। लेकिन मेरी बर्थ का उत्तराधिकारी नहीं आया और मैं सोता रह गया। अच्छा था कि अलार्म लगा लिया था, आंख खुल गई नहीं तो सोमनाथ महाराज ने बुलाने में कसर नहीं छोडी थी। यह सोमनाथ एक्सप्रेस थी जो वेरावल जाती है। वेरावल से चन्द किलोमीटर आगे ही सोमनाथ है। सुबह सात बजे ओखा पैसेंजर की बजाय सोमनाथ के दरबार में बैठा मिलता या नींद से झूलता मिलता।
सोमनाथ बाबा किसी को आमन्त्रित करने में बडा उस्ताद है। अपनी इसी आदत के चक्कर में हजार साल पहले गलत लोगों को आमन्त्रित कर बैठा और सत्रह बार लुटा। वाह जी वाह सोमनाथ!

Friday, September 7, 2012

भारत परिक्रमा- दसवां दिन- बोरीवली नेशनल पार्क

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17 अगस्त 2012
आज का दिन बहुत खराब रहा। बल्कि खराबी रात से ही आनी शुरू हो गई। पता नहीं क्या हुआ कि दाहिने हाथ के कन्धे में बडा तेज दर्द होने लगा। मंगलौर से चला था तो कम था लेकिन मडगांव से निकला तो बढ गया। लेटने की ज्यादातर अवस्थाओं में यह असहनीय हो जाता। मात्र एक अवस्था में दर्द नहीं होता था- बिल्कुल सीधे लेटकर दाहिना हाथ पेट पर रखकर सोने पर।
लेकिन मेरे लिये पेट पर हाथ रखकर सोने से अच्छा है कि ना ही सोऊं। क्योंकि पेट पर हाथ रखकर सोने से मुझे बडे भयंकर डरावने सपने आते हैं। मुझे याद है, होश संभालने से अब तक, जब भी मुझे डरावने सपने आते हैं, इसका मतलब पेट पर हाथ ही होता है। मैं भूलकर भी इस अवस्था में नहीं सोता हूं, लेकिन कभी कभी नींद में ऐसा हो जाता है। पसीने से लथपथ हो जाता हूं और आंख खुल जाती है। आज भी ऐसा ही हो रहा था। नींद आती और गडबड शुरू, पसीना और नींद गायब। पेट से हाथ हटाते ही असहनीय दर्द। फिर से वही हाथ रखना पडता। और यह चक्र मुम्बई आने तक चलता रहा। इस दौरान कई बार कभी मुझपर तो कभी घर-परिवार पर भयंकर आपदा टूटती दिखाई पडीं। हालांकि मैं इन बातों पर विश्वास नहीं करता लेकिन कुछ तो मामला है कि पेट या छाती पर हाथ रखकर सोने से डरावने सपने आते हैं।

Thursday, September 6, 2012

भारत परिक्रमा- नौवां दिन- केरल व कर्नाटक

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16 अगस्त 2012
चार बजे अपने आप आंख खुल गई। यह शोरानूर जंक्शन था। यहां से चार लाइनें निकलती हैं- कोयम्बटूर के लिये, त्रिवेन्द्रम के लिये, मंगलौर के लिये और चौथी नीलाम्बर रोड के लिये। अपनी ट्रेन मंगलौर की तरफ चल पडी। अपन दोबारा पसर गये।
अब आंख खुली बडागारा पहुंचकर। यह कोई लम्बी-चौडी ठाठ वाली ट्रेन नहीं है, नाम तो एक्सप्रेस का है लेकिन हर दस पन्द्रह मिनट में, बीस पच्चीस किलोमीटर पर रुकती जरूर है। ट्रेन सही समय पर चलनी चाहिये, चाहे हर जगह रुकती हुई चले।
अगला स्टेशन माहे है। मैं अपने साथ अपनी यात्रा में काम आने वाली हर ट्रेनों के ठहरावों की लिस्ट लेकर निकला हूं जिससे पता चल जाता है कि अब गाडी कहां रुकेगी। इसलिये पता चल गया कि अब माहे में रुकेगी।
माहे पुदुचेरी में है। हां जी, सही कह रहा हूं कि माहे पुदुचेरी में है, पांडिचेरी में है। सोचिये मत कि पुदुचेरी तो चेन्नई के पास है, पूर्वी समुद्र से मिला हुआ है, यहां पश्चिमी समुद्र के किनारे पुदुचेरी कहां से आ गया। इस बारे में कुछ भी सोचना मना है। जो कह दिया सो कह दिया। बोल दिया कि माहे पुदुचेरी में है तो है। असल में पुदुचेरी में चार जिले हैं- पुदुचेरी, कराईकल, माहे और यानम। शुरू वाले दोनों जिलों की सीमा तमिलनाडु से मिलती है, माहे की केरल से और यानम की आन्ध्र प्रदेश से। पुदुचेरी पर फ्रांस का शासन रहा है, अंग्रेजों से भारत आजाद हो गया लेकिन पुदुचेरी आजाद नहीं हुआ। बाद में जब फ्रांसीसी भी चले गये तो उनकी चार अलग-अलग स्थानों पर बसी बस्तियों को उनके नजदीकी राज्य में नहीं मिलाया गया बल्कि फ्रांसीसी शासन की याद जिन्दा रखने के लिये सभी को पांडिचेरी नाम दे दिया गया जो बाद में पुदुचेरी हो गया और अब ये केन्द्र शासित प्रदेश हैं।

Wednesday, September 5, 2012

भारत परिक्रमा- आठवां दिन- कन्याकुमारी

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15 अगस्त 2012
आज स्वतन्त्रता दिवस है। असोम से मेरे जो साथी तीन दिनों से साथ आ रहे थे, वे कल देर रात तक धीरे धीरे छोडकर चले गये। उनकी जगह और लोग आ गये, जिनकी यात्रा मात्र एक रात की ही होगी। कुछ सेलम से आये, कुछ ईरोड से, कुछ कोयम्बटूर से।
मेरी आंख खुली सुबह साढे छह बजे के आसपास। ट्रेन त्रिवेन्द्रम पहुंचने वाली थी। बाहर बारिश हो रही थी। सभी खिडकियां बन्द थीं। पंखे भी बन्द थे। नीचे वाली सवारियों को ठण्ड लगने लगी थी, इसलिये उन्होंने पंखे बन्द कर दिये थे।
केरल पश्चिमी घाट की पहाडियों के बीच बसा हुआ है। पश्चिमी घाट की पहाडियां मानसून में खूब बारिश के लिये मशहूर हैं। मेरी अभी तक की तटीय यात्रा पूर्वी घाट के साथ साथ हुई है। कहीं भी बारिश नहीं मिली। बल्कि कल तो आन्ध्र प्रदेश में इतनी गर्मी थी कि गर्म हवा लग रही थी। अब यात्रा पश्चिमी तट के साथ साथ होगी। कन्याकुमारी से मुम्बई और उससे भी आगे वडोदरा तक खूब बारिश का सामना करना पडेगा, ऐसा मेरा अन्दाजा है।

Tuesday, September 4, 2012

भारत परिक्रमा- सातवां दिन- आन्ध्र प्रदेश व तमिलनाडु

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14 अगस्त 2012
कल बुखार हो जाने के कारण कमजोरी आ गई थी, लेकिन अब बुखार ठीक था। विजयवाडा स्टेशन पर मैं नीचे उतरा। बराबर वाले प्लेटफार्म पर दक्षिण लिंक एक्सप्रेस खडी थी, जो विशाखापटनम से निजामुद्दीन जाती है। काजीपेट जाकर यह हैदराबाद- निजामुद्दीन दक्षिण एक्सप्रेस से जा मिलती है यानी विशाखापटनम से काजीपेट तक यह लिंक के तौर पर चलती है।
गाडी चल पडी तो थोडी देर खिडकी वाली सीट पर बैठ गया। धूप निकली थी व लू जैसा एहसास भी हो रहा था। फिर भी कमजोरी के कारण नीचे मन नहीं लगा, वापस अपनी ऊपर वाली बर्थ पर चला गया। पडा रहा लेकिन नींद भी नहीं आई।
पूर्वोत्तर वालों ने व दक्षिण वाले फौजी ने ताश खेलने शुरू कर दिये। उनकी बातचीत हिन्दी में हो रही थी लेकिन मेरे पल्ले ना तो पूर्वोत्तरी हिन्दी पडी, ना दक्षिणी हिन्दी। इन लोगों का भी अधिकतम कोयम्बटूर तक का साथ है।

Monday, September 3, 2012

भारत परिक्रमा- छठा दिन- पश्चिमी बंगाल व ओडिशा

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13 अगस्त 2012
आंख खुली अण्डाल पहुंचकर। वैसे तो ट्रेन का यहां ठहराव नहीं है लेकिन दुर्गापुर जाने के लिये ट्रेन यहां सिग्नल का इंतजार कर रही थी। आसनसोल से जब हावडा की तरफ चलेंगे तो पहले अण्डाल आयेगा, फिर दुर्गापुर। ट्रेन रामपुर हाट के रास्ते आई है। मुझे समझ नहीं आ रहा कि रामपुर हाट से गाडी सीधे आसनसोल जा सकती थी, फिर क्यों पचास किलोमीटर का फालतू चक्कर लगाकर दुर्गापुर में भी ठहराव दिया गया? रामपुर हाट से गाडी पहले अण्डाल आती है, फिर हावडा की तरफ चलकर दुर्गापुर जाती है, दुर्गापुर में इसका डीजल इंजन हटाकर इलेक्ट्रिक इंजन लगाया जाता है, फिर गाडी विपरीत दिशा में चलती है, अण्डाल होते हुए आसनसोल पहुंचती है। अगर मात्र इंजन बदलने के लिये गाडी को दुर्गापुर ले जाया जाता है तो यह काम तो आसनसोल में भी हो सकता है। नहीं तो रामपुर हाट में भी हो सकता है।
दुर्गापुर में अपने एक मित्र को मिलना था लेकिन वे नहीं आये।

Friday, August 31, 2012

भारत परिक्रमा- पांचवां दिन- असोम और नागालैण्ड

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आंख खुली दीमापुर जाकर। ट्रेन से नीचे उतरा। नागालैण्ड में घुसने का एहसास हो गया। असोम में और नागालैण्ड के इस इलाके में जमीनी तौर पर कोई फर्क नहीं है। हां, नागालैण्ड में दूर पहाडों की लम्बी श्रंखला दिख रही थी। स्टेशन का नाम डिमापुर लिखा हुआ था।
पहले जब पूर्वोत्तर में असोम को छोडकर बाकी राज्यों में इनर लाइन परमिट की जरुरत होती थी तो लोगों को इस लाइन पर यात्रा करने में बडी परेशानी होती थी। कारण था दीमापुर। गुवाहाटी से तिनसुकिया जा रहे हैं, डिब्रुगढ जा रहे हैं यानी असोम से असोम में जा रहे हैं, तो इस दीमापुर की वजह से परमिट बनवाना पडता था या फिर जुरमाना।
गुवाहाटी से डिब्रुगढ जाने वाले ज्यादातर लोग रेल का इस्तेमाल नहीं करते, बस से जाते हैं, जल्दी पहुंच जाते हैं। कारण है कि रेल पहले लामडिंग व दीमापुर होते हुए तिनसुकिया जायेगी, फिर डिब्रुगढ। जबकि अगर बस से जा रहे हैं तो रास्ते में ना तो लामडिंग आयेगा, ना दीमापुर बल्कि डिब्रुगढ पहले आयेगा, उसके बाद तिनसुकिया।
हालांकि डिब्रुगढ से एक लाइन सीधे सिमालुगुडी तक बना दी गई है, जिससे तिनसुकिया तक चक्कर लगाकर नहीं जाना पडता लेकिन अभी भी ज्यादातर ट्रेनें तिनसुकिया वाले लम्बे रूट से ही जाती हैं। इसका कारण शायद फौजी हैं, जो अपने घर जाने के लिये बडी संख्या में तिनसुकिया आते हैं।

Wednesday, August 29, 2012

भारत परिक्रमा- लीडो- भारत का सबसे पूर्वी स्टेशन

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आज का दिन मेरे घुमक्कडी इतिहास के मील का पत्थर है। असोम के बारे में जो भी भ्रान्तियां थीं, सब खत्म हो गईं। यह एक दिन इतना सिखा गया कि बता नहीं सकता। जी खुश है आज। आज असोम ने दिल जीत लिया। ऐसा तो अपने भी नहीं करते। धीरे धीरे बताता हूं कि आज क्या-क्या हुआ।
11 अगस्त की सुबह आंख खुली सिमालुगुडी जंक्शन पर। ट्रेन एक घण्टे लेट चल रही थी। हो जा जितना लेट होना है। तू जितनी भी लेट होगी, मैं उतना ही खुश होऊंगा। पौने छह घण्टे का मार्जिन है लीडो में और वहां करने धरने को कुछ नहीं। स्टेशन पर बैठकर मक्खियां ही गिननी पडेंगी। गिननी इसलिये क्योंकि मक्खियां मारनी बसकी बात नहीं है। चार घण्टे लेट हो जा; चल छोड, पांच घण्टे लेट हो जा मेरी तरफ से, मैं परेशान होने वालों में नहीं हूं।
लाकुवा, भोजो और सापेखाती के बाद मैं फिर सो गया। जब गाडी तिनसुकिया पहुंची, तब पता तो चल गया था लेकिन मैं उठा नहीं। मार्घेरिटा के बाद जाकर उठा, जब कुछ ही देर में लीडो पहुंचने वाले थे।

Monday, August 27, 2012

भारत परिक्रमा- तीसरा दिन- पश्चिमी बंगाल और असोम

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आज का दिन बेहद शानदार रहा। कल की सारी थकान मिट गई। आंख खुली छह बजे के आसपास। पता नहीं कि गाडी कहां है। मोबाइल ने जैसे ही नेटवर्क पकडा तो सबसे पहले गूगल मैप खोलकर देखा कि ट्रेन कहां है। ट्रेन कटिहार से आगे निकल चुकी थी लेकिन यह क्या????
इसे सीधे बारसोई की तरफ निकलना था जबकि यह जा रही है मालदा वाले रूट पर। तो क्या लम्बा चक्कर काटकर बारसोई जायेगी? हां जी, यह लम्बा चक्कर काटकर बारसोई गई। असल में यहां एक त्रिकोण बनता है। कटिहार, बारसोई और स्टेशन ‘क’ (नाम ध्यान नहीं- कटिहार मालदा रूट पर है)। कटिहार- न्यू जलपाईगुडी के बीच में बारसोई है। मेरे हिसाब से ट्रेन को सीधे बारसोई जाना था लेकिन यह पहले ‘क’ जायेगी, फिर वहां से मुडकर बारसोई यानी लम्बा चक्कर काटकर।
एक बार फिर से सो गया। अबकी आंख खुली रंगापानी पहुंचकर- न्यू जलपाईगुडी से बिल्कुल पहले। ट्रेन रुकी हुई थी। करीब आधे घण्टे तक ट्रेन यहां खडी रही। इसके बाद न्यू जलपाईगुडी पहुंची। यह एनजेपी के नाम से ज्यादा जाना जाता है।

Saturday, August 25, 2012

भारत परिक्रमा- दूसरा दिन - दिल्ली से प्रस्थान

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देखा जाये तो आज यात्रा का पहला दिन है लेकिन चूंकि ट्रेन रात पौने ग्यारह बजे की थी, इसलिये कल का दिन पहला दिन माना गया। अगर ट्रेन सही समय पर चलती तो कल यानी 8 अगस्त को पन्द्रह मिनट की यात्रा होती। 
चार बजे अलार्म बजा, मेरी आंख खुली। दस मिनट बाद ही आवाज गूंजी कि पूर्वोत्तर सम्पर्क क्रान्ति प्लेटफार्म नम्बर बारह पर खडी है। अब इतना तो पक्का हो गया कि ट्रेन तैयार है, अब इससे ज्यादा लेट नहीं होगी। मैं वेटिंग रूम से अपना बोरिया बिस्तर समेटकर ट्रेन में जा घुसा। ठीक साढे चार बजे गाडी चल दी और अपनी भारत परिक्रमा की विधिवत शुरूआत हो गई- पौने पांच घण्टे लेट।
साढे नौ बजे आंख खुली। गाडी अच्छलदा से निकल चुकी थी। घण्टे भर में कानपुर पहुंच जायेगी। और पहुंच भी गई। नई दिल्ली से चलने के छह घण्टे बाद मैं कानपुर में था।
मैं कानपुर तक कई बार आ चुका हूं, दो बार इलाहाबाद तक और एक बार मुगलसराय और गया होते हुए हावडा तक। इस रूट पर खासकर इलाहाबाद तक कोई खास प्राकृतिक दृश्य ना होने के कारण यात्रा करने में उतना मजा भी नहीं आता। फिर मुझे जो मजा नये रूट पर आता है, उतना पुराने रूट पर नहीं आता। इसलिये ज्यादातर समय अपनी ऊपर वाली बर्थ पर पडे पडे ही बिताया।

Thursday, August 16, 2012

भारत परिक्रमा- पहला दिन

8 अगस्त 2012 की सुबह मैं नाइट ड्यूटी से निपटकर घर पहुंचा। आज रात पौने बारह बजे जैसे ही नई दिल्ली से पूर्वोत्तर सम्पर्क क्रान्ति रवाना होगी, तभी अपनी भारत परिक्रमा शुरू हो जायेगी। बडा उत्साह था इस मेगा यात्रा को शुरू करने का। कभी इतनी लम्बी ना तो रेल यात्रा की और ना ही कोई और यात्रा। 12000 किलोमीटर से भी ज्यादा की यात्रा होगी यह।
कोई जल्दी तो थी नहीं मुझे ट्रेन पकडने की। घर जाकर सो गया। दोपहर को उठा तो रातभर के जागरण की थकान मिट गई थी। बाहर देखा तो बारिश पड रही थी। दिल्ली में पिछले कई दिन से मौसम अच्छा है। भले ही अभी तक बारिश ने वो मानसून वाला रूप ना दिखाया हो, लेकिन बादल बडे मेहरबान हैं। हल्की फुल्की फुहार भी समय-बेसमय हो जाती है। इस समय भी फुहार हो रही थी।
अमित का फरमान आया कि तू इतने दिनों के लिये जा रहा है, मुझे भूखा मरना पडेगा। असल में जब अमित नहीं होता तो मैं भूखा मरता हूं और जब मैं नहीं होता तो अमित भूखा मरता है। दोनों साथ होते हैं तो साथ ही खाना बनाते हैं। अगर दोनों में से एक नहीं होगा तो खाना नहीं बनेगा। फिर या तो भूखे ही गुजारा करते हैं या दूध ब्रेड से पेट भरते हैं।

Thursday, August 9, 2012

दिल्ली से जैसलमेर और मुनाबाव

एक रेल यात्रा याद आ रही है। इसका मैंने आज तक कभी भी जिक्र नहीं किया है। यह चार दिनों की यात्रा थी और इसमें चारों दिन पैसेंजर ट्रेनों में ही रहना था। सबसे बडी बात है कि इसके फोटो भी हैं मेरे पास।
दिल्ली से चलकर आधी रात को मैं रेवाडी पहुंच गया। तारीख थी 19 अक्टूबर 2010. रेवाडी से सुबह सादुलपुर वाली पैसेंजर पकडी। रास्ते में महेन्द्रगढ और लोहारू बडे स्टेशन पडे। लोहारू जंक्शन भी है जहां से मीटर गेज की लाइन सीकर और आगे जयपुर चली जाती है। मेरा इधर आना पहली बार हुआ था।
तब तक सादुलपुर से चुरू की तरफ रेल यातायात शुरू नहीं हुआ था- गेज परिवर्तन का काम चल रहा था लेकिन हिसार और हनुमानगढ वाली लाइनें चालू थी। हिसार वाली लाइन को बडा बनाया जा चुका था जबकि हनुमानगढ वाली लाइन मीटर गेज ही थी, आज भी है।
सादुलपुर से सूरतपुरा तक हिसार और हनुमानगढ वाली लाइनें साथ साथ चलती हैं- मीटर गेज और ब्रॉड गेज। मैंने मीटर गेज की गाडी पकडी हनुमानगढ जाने के लिये। यहां से पहाडसर, नरवासी, हांसियावास, सिधमुख, अनूपशहर, कलाना, तहसील भादरा, गोगामेडी, श्री रामगढ, दीपलाना, नोहर, भुकरका, खनानियां, सुरेरा, ऐलनाबाद, तलवाडा झील, टीबी, जोडकियां, हिरनवाली आदि स्टेशन पडे। खैर, हनुमानगढ पहुंचे। यहां से एक बडी लाइन भटिण्डा जाती है और दूसरी बडी लाइन बीकानेर। जबकि श्रीगंगानगर के लिये एक छोटी लाइन भी है। जिस ट्रेन से मैं आया था, उसे श्रीगंगानगर होते हुए सूरतगढ जाना था। वैसे तो हनुमानगढ से सूरतगढ सीधे बडी लाइन से पचासेक किलोमीटर ही है लेकिन छोटी लाइन से इसकी दूरी दो सौ किलोमीटर के आसपास है। श्रीगंगानगर और उससे भी आगे पाकिस्तान सीमा के पास बसे कई गांवों और कस्बों से होती हुई जाती है यह छोटी लाइन। हालांकि आज श्रीगंगानगर से आगे यह लाइन बन्द है गेज परिवर्तन के लिये।

Tuesday, August 7, 2012

रेल यात्राओं की कुछ यादें-1

भारत परिक्रमा यात्रा शुरू होने वाली है। बडा उत्साह है मुझे इस यात्रा पर जाने का। मुझे पता है कि लगातार ट्रेनों में बैठे रहने से दो तीन दिन बाद ही बोरियत शुरू हो जायेगी। लेकिन अलग-अलग जगहों पर जाना, वहां के नजारे देखना, विभिन्न भाषाओं वाले लोगों से मिलना, अलग-अलग खान-पान को चखना; यह सब मुझे इस बारह दिन की यात्रा में मिलेगा।
जब मैं लोगों को बताता हूं कि भारत परिक्रमा कर रहा हूं, तो वे भी बडे खुश हो जाते हैं लेकिन अगली बात सुनते ही उनकी खुशी दूर हो जाती है। अगली बात ये है कि मुझे इस यात्रा में ट्रेनों से नीचे नहीं उतरना है। नीचे उतरना भी है तो स्टेशन से बाहर नहीं निकलना है। एक ट्रेन से उतरते ही अगली ट्रेन की प्रतीक्षा शुरू कर देनी है। यह प्रतीक्षा जहां गुवाहाटी में बारह घण्टों की रहेगी, वहीं त्रिवेन्द्रम में आठ घण्टों की, मुम्बई में छह घण्टों की और अहमदाबाद में भी करीब छह घण्टों की ही रहेगी। बाकी जगहों पर और भी कम समय मिलेगा।

Sunday, August 5, 2012

नेपाल से भारत वापसी

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13 जुलाई की शाम थी और मैं बेगनासताल से पोखरा के लिये वापस चल दिया। 7 बजकर 40 मिनट पर सुनौली की बस थी, जिसका टिकट मैंने साढे चार सौ रुपये देकर पहले ही बुक करा लिया था। मैं 7 बजकर 35 मिनट पर बस स्टैण्ड पर पहुंचा, तो पता चला कि बस दस मिनट पहले ही चली गई है यानी 7 बजकर 25 मिनट पर ही। मैं बस स्टैण्ड के अधिकारियों पर खदक पडा कि टिकट पर बस का टाइम सात चालीस लिखा है तो वो पन्द्रह मिनट पहले क्यों चली गई। बोले कि तुम्हारी घडी सही नहीं है, बस अपने निर्धारित समय पर ही गई है। असल में नेपाल का समय भारतीय समय से पन्द्रह मिनट आगे है। मैं नेपाल में प्रविष्ट तो हो गया था लेकिन घडी को नेपाली समय से नहीं मिलाया, भारतीय ही रहने दिया।
जब अकल ठिकाने लग गई तो पूछा कि अगली बस कितने बजे है तो पता चला कि सुबह पांच बजे। अब सुनौली के लिये कोई बस नहीं है। यानी मेरा कल लुम्बिनी देखना रद्द हो जायेगा। और लुम्बिनी की बात छोडिये, साढे चार सौ रुपये गये पानी में। अधिकारियों ने पैसे लौटाने से मना कर दिया। ऊपर से अब पोखरा में तीन सौ का कमरा भी लेना पडेगा। कल फिर से साढे चार सौ का टिकट लेकर सुनौली जाना पडेगा। यानी एक ही झटके में साढे सात सौ रुपये का नुकसान!

Friday, August 3, 2012

पोखरा- शान्ति स्तूप और बेगनासताल

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ज्यादा दूर नहीं चलना पडा और एक कच्ची सडक ऊपर की तरफ जाती दिख गई। आधे घण्टे से ज्यादा और एक घण्टे से कम लगा मुझे पैदल शान्ति स्तूप तक जाने में। इसे इंग्लिश में पीस पैगोडा (Peace Pagoda) कहते हैं। यहां से पोखरा शहर का एक बडा हिस्सा और फेवा ताल भी दिखता है। समुद्र तल से ऊंचाई लगभग 1100 मीटर है।
जापानियों की एक संस्था ने इसका निर्माण किया। इसके निर्माण के समय बुद्ध विरोधियों ने एक जापानी की हत्या भी कर दी थी, उसकी यादगार भी पैगोडा के पास ही बनी हुई है। झक सफेद रंग का स्तूप बडा शानदार लगता है। स्तूप की चार दिशाओं में बुद्ध की विभिन्न मुद्राओं की मूर्तियां भी हैं। आज जब चारों तरफ बादल थे, यह और भी निखर आया था। बादलों की वजह से अन्नपूर्णा श्रंखला की चोटियां भी नहीं दिख रही थीं।
यहां से जब मैं नीचे उतर रहा था, तो मेरे साथ दो भारतीय नेपाली गाइड के साथ साथ नीचे ही जा रहे थे। लहजे से वे मुझे मेरठ के आसपास के लगे। मैंने उनसे पूछा कि आप कहां के रहने वाले हो। उन्होंने हिन्दी भाषी को देखकर तुरन्त समझ लिया कि बन्दा भारतीय है। बोले कि यूपी के। यूपी में कहां से? बताने की बजाय उल्टा मुझसे ही पूछ लिया कि तुम कहां के हो। मैंने कह दिया कि तुम्हारा पडोसी हूं। मतलब? मतलब मेरठ का हूं। उन्होंने बताया कि वे मुजफ्फरनगर के हैं।

Wednesday, August 1, 2012

पोखरा- फेवा ताल और डेविस फाल

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12 जुलाई 2012 की शाम पांच बजे तक मैं पोखरा पहुंच गया। मुझे पोखरा के बारे में बस इतना ही मालूम था कि यहां एक ताल है जिसका नाम फेवा ताल है। मैं पृथ्वी चौक के पास था। बारिश हो रही थी, इसलिये एक शेड में शरण ले ली। बारिश थमी तो बाहर निकला और एक टैक्सी वाले से पूछा कि फेवा ताल कितना दूर है। बोला कि छह किलोमीटर है, आओ बैठो, आठ सौ रुपये लगेंगे। मैं किसी टैक्सी वाले से इस तरह के प्रश्न नहीं पूछता हूं, लेकिन पृथ्वी चौक से काठमाण्डू रोड पर काफी दूर तक इन्हीं लोगों का साम्राज्य रहता है, तो पूछना पडा।
काठमाण्डू की तरह यहां भी लोकल बस सेवा बडी अच्छी है- पोखरा मिनी माइक्रो बस सेवा। मुझे पूरी उम्मीद थी कि यहां से फेवा ताल के लिये कोई ना बस जरूर मिल जायेगी। मैं आज ताल के किनारे ही रुकना चाहता था। हालांकि ताल से दूर रुकने की अपेक्षा ताल के किनारे रुकना हमेशा महंगा होता है। किसी राह चलते आदमी से इस बारे में पूछा तो उसने बता दिया कि कहां से फेवा ताल की बस मिलेगी। बस मिलती, इससे पहले ही एक लडका मेरे पास आया और पूछा कि कमरा चाहिये? मैंने मना कर दिया। नेपाली भाषा भले ही देवनागरी में लिखी जाती हो, लेकिन जब कोई नेपाली आदमी हिन्दी बोलता है तो कभी कभी बडा मजेदार लगता है। उसने उसी मजेदार लहजे में कहा कि सभी लोग ताल के किनारे ही रुकना पसन्द करते हैं, हमारे यहां ताल से दूर कोई नहीं रुकता। मैंने पूछा कि कमरा कितने का होगा, तो बोला कि दो सौ से शुरू हैं। बिना टीवी और बिना टॉयलेट का दो सौ रुपये, इसके बाद जैसे जैसे सुविधा बढेंगी, किराया भी बढता जायेगा। आखिरकार मैंने उसकी बात मंजूर कर ली।

Sunday, July 29, 2012

काठमाण्डू आगमन और पशुपतिनाथ दर्शन

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मैं रक्सौल स्टेशन पर था और थोडी देर में सीमा पार करके नेपाल में प्रविष्ट हो जाऊंगा। रक्सौल का नेपाली भाई बीरगंज है। यानी सीमा के इस तरफ रक्सौल और उस तरफ बीरगंज। स्टेशन से करीब एक किलोमीटर दूर सीमा है। इस बात की जानकारी मुझे गूगल मैप से मिल गई थी। मैं अपने मोबाइल के उसी नक्शे के अनुसार रक्सौल स्टेशन से सीमा की तरफ बढ चला।
स्टेशन पर कई तांगे वाले खडे थे, जो मुझे देखते ही पहचान गये कि यह नेपाल जायेगा। मैंने उन सभी को नजरअन्दाज किया और आगे बढ गया। तभी पीछे से एक तांगे वाला आया और खूब खुशामद करने लगा कि मैं तुम्हे सीमा पार करा दूंगा। पैसे पूछे तो उसने अस्सी रुपये बताये। मैंने एक किलोमीटर के लिये अस्सी रुपये देने से मना कर दिया। तब वो बोला कि सीमा से भी दो-तीन किलोमीटर आगे काठमाण्डू की बसें मिलती हैं। चूंकि शाम के छह बज रहे थे और तांगे वाले के अनुसार सीमा बन्द होने का समय नजदीक आ रहा था, मैं पचास रुपये तय करके उसके साथ हो लिया। साथ ही यह भी तय हुआ कि जहां से काठमाण्डू की बस मिलेगी, वो मुझे वहीं ले जाकर छोडेगा। मैंने उससे पक्का बोल दिया कि काठमाण्डू वाली बस में बैठकर ही मैं तुम्हें पैसे दूंगा। अगर मुझे काठमाण्डू की बस नहीं मिली तो पैसे नहीं दूंगा। वो मान गया।

Friday, July 27, 2012

नेपाल यात्रा- गोरखपुर से रक्सौल (मीटर गेज ट्रेन यात्रा)

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11 जुलाई की सुबह छह बजे का अलार्म सुनकर मेरी आंख खुल गई। मैं ट्रेन में था, ट्रेन गोरखपुर स्टेशन पर खडी थी। मुझे पूरी उम्मीद थी कि यह ट्रेन एक घण्टा लेट तो हो ही जायेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ठीक चार साल पहले मैं गोरखपुर आया था, मेरी ट्रेन कई घण्टे लेट हो गई थी तो मन में एक विचारधारा पैदा हो गई थी कि इधर ट्रेनें लेट होती हैं। इस बार पहले ही झटके में यह विचारधारा टूट गई।
यहां से सात बजे एक पैसेंजर ट्रेन (55202) चलती है- नरकटियागंज के लिये। वैसे तो यहां से सीधे रक्सौल के लिये सत्यागृह एक्सप्रेस (15274) भी मिलती है जोकि कुछ देर बाद यहां आयेगी भी लेकिन मुझे आज की यात्रा पैसेंजर ट्रेनों से ही करनी थी- अपना शौक जो ठहरा। इस रूट पर मैं कप्तानगंज तक पहले भी जा चुका हूं। आज कप्तानगंज से आगे जाने का मौका मिलेगा।

Wednesday, July 25, 2012

नेपाल यात्रा- दिल्ली से गोरखपुर

इस यात्रा का कोई इरादा नहीं था। अचानक इतनी जल्दी सबकुछ हुआ कि मैं समझ ही पाया कि हो क्या रहा है। पिछले महीने ही गौमुख तपोवन गया था, आठ दिन की छुट्टी ली थी, अगले महीने अगस्त में भारत परिक्रमा पर निकलना है, बारह दिन की छुट्टी चाहिये। एक शिफ्ट ड्यूटी करने वाले को छुट्टी उतनी आसानी से नहीं मिलती, जितनी कि सामान्य ड्यूटी करने वाले को मिल जाती है। इसलिये कोई मतलब नहीं बनता फिर से अचानक कई दिन की छुट्टी ले लेने का। लेकिन बडा प्रबल है पशुपतिनाथ, बुला ही लिया।
अपने एक दोस्त हैं भार्गव साहब। बडे शौकीन हैं हिमालय की ऊंचाईयों को छूने के। कभी भी फोन आ जाता है, कहते हैं कि फलां जगह चलना है। एक दिन बोले कि नीलकण्ठ चलेंगे। मैं हैरत में पड गया कि आज इस हिमालय की ऊंचाईयों वाले जीव को नीलकण्ठ की कैसे सूझ गई। यह तो ऋषिकेश के पास है, हजार मीटर के आसपास ऊंचाई है। फिर उन्होंने मेरी इस लघु-सी दिखने वाली शंका का समाधान करते हुए कहा कि भाई, एक नीलकण्ठ लाहौल में भी है। लाहौल यानी कुल्लू के पार का देश, मनाली के पार का देश, रोहतांग के पार का देश और आखिर में हिमालय के पार का देश। वाह मेरे भाई, कहां पंजा मारा है तुमने! जरूर चलेंगे।

Monday, July 23, 2012

गौमुख तपोवन का नक्शा और जानकारी

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आज गौमुख तपोवन यात्रा की आखिरी किश्त है। इसकी शुरूआत एक मजेदार वाकये से करते हैं।
पिछले दिनों मेरे पास एक फोन आया। किसी महिला की आवाज थी। उन्होंने इतनी आत्मीयता से बात की कि मैं सोच में पड गया कि ये कौन हो सकती हैं। अगर अनजान होतीं तो पहले अपना परिचय देती, फिर बात शुरू करतीं। आखिरकार मैंने झिझकते हुए पूछ ही लिया कि आप कौन हो। उन्होंने बताया कि तुम गंगोत्री गये थे। तो उत्तरकाशी में गौमुख का परमिट बनवाते समय तुम्हें एक मोटी मिली थी, मैं वही मोटी हूं।
मैं हैरान रह गया। आपको भी याद होगा कि उत्तरकाशी से गंगोत्री वाली पोस्ट को मैंने इसी किस्से से शुरू किया था कि शामली की दो मोटी-मोटी महिलाएं भी गौमुख का परमिट बनवाने के लिये वहीं थीं। वे अकेले जाना चाह रही थी जबकि मुझ समेत सभी उन्हें एक पॉर्टर ले जाने की सलाह दे रहे थे। पता नहीं उन्होंने पॉर्टर का परमिट बनवाया या नहीं लेकिन मैं उन्हें अगले दिन भोजबासा तक ढूंढता हुआ गया था। लेकिन वे नहीं मिली। उस दिन बात आई-गई हो गई। ना उन्हें मेरे बारे में मालूम था, ना कोई फोन नम्बर, ना कोई पता। और उस दिन अचानक उनका फोन आया तो हैरानी की बात ही थी।

Thursday, July 19, 2012

ट्रेन से भारत परिक्रमा

भारत परिक्रमा हो चुकी है। पहला भाग पढने के लिये यहां क्लिक करें
इस बार बडा ही धाकड प्रोग्राम बनाया है। अक्सर मेरी सोच ज्यादा लम्बी नहीं चलती, बस एक महीने आगे की ही सोच सकता हूं। जून का महीना जब चल रहा था, तो मेरी सोच मात्र जुलाई तक ही सीमित थी, अगस्त के बारे में कि कहां जाना है, मैं सोच भी नहीं सकता था। लेकिन अब जमाना बदल गया है। हमने भी लम्बा-लम्बा सोचना शुरू कर दिया है। उसी का नतीजा है यह धाकड प्रोग्राम।
जून में जब मैं गौमुख गया था तो लगातार कई कई दिन चलते रहने से, दुनिया से कटे रहने से, थके रहने से, कुछ भी ना करने से दिमाग या तो बाहरी दुनिया के बारे से सोचने की मना कर देता है, या फिर कुछ स्पेशल सोचता है। हमारे दिमाग ने स्पेशल सोचा। मतलब यह है कि ट्रेन यात्रा का यह प्रोग्राम गंगाजी की देन है। वहीं ट्रेकिंग करते करते अपने दिमाग में आया कि एक लम्बी ट्रेन यात्रा की जाये। वहीं समय भी तय हो गया कि अगस्त में चलेंगे। क्योंकि अगस्त तक प्रायः मानसून पूरे भारत पर कब्जा जमा लेता है और धरती का रंग रूप बदल जाता है। साथ ही मौसम की चुभन भी कम हो जाती है।

Monday, July 16, 2012

तपोवन से गौमुख और वापसी

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11 जून 2012 की सुबह पांच बजे अचानक मेरी आंख खुली। यह कुछ चमत्कार ही था कि इतनी ठण्ड में इतनी सुबह मेरी आंख खुली हो और मैं उठ भी गया। टैण्ट से बाहर निकला, धूप नहीं निकली थी। ज्यों ही धीरे धीरे धूप निकलनी शुरू हुई तो सबसे पहले दूर पूर्व में गंगोत्री शिखरों पर दिखाई पडी। उसके बाद हमारे सामने शिवलिंग चोटी पर सूर्य किरणें पडनी शुरू हुईं। नजारा वाकई चमत्कृत कर देने वाला था। उस नजारे के सभी फोटो आप पिछली पोस्टों में देख चुके हैं।
मौनी बाबा भी जग चुके थे। कल यहां कुछ विदेशी भी रुके थे। मुझे पक्का याद नहीं कि ये कल वाले विदेशी ही थे या आज नये आ गये थे। यह आठ बजे की बात है। हमने बाबा के यहां चाय पी, नाश्ते में उबले चने फ्राई हुए बने थे। खाये नहीं, बल्कि पैक करवा लिये।

Thursday, July 12, 2012

कीर्ति ग्लेशियर

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पिछली बार मैंने बताया था कि हम मात्र एक रात के लिये ही तपोवन गये थे लेकिन वहां जाकर हम उसके मोहपाश में इतने बंध गये कि हम वहां दो रात रुके। यानी एक पूरा दिन और। फिर अपने चौधरी साहब की हालत भी काफी खराब थी, उन्हें आराम की जरुरत थी इसलिये भी एक दिन रुकना सही फैसला रहा।
10 जून 2012 की सुबह बाबाजी के यहां चाय पीकर मैंने नन्दनवन जाने का फैसला किया। बाकी सभी लोग मेरे इस फैसले के खिलाफ थे, क्योंकि नन्दनवन जाने के लिये पहले तपोवन से नीचे उतरना पडेगा, फिर खतरनाक गौमुख ग्लेशियर पार करना पडेगा और उसके बाद नन्दनवन की चढाई चढनी पडेगी। तपोवन से नन्दनवन दिखता है। ग्लेशियर के एक तरफ तपोवन है और दूसरी तरफ नन्दनवन। यह भी पता चला कि नन्दनवन में कोई आदमजात नहीं रहती और कभी कभार कोई ट्रैकिंग वाला ग्रुप आ जाता है।
मुझे यहां से निकलना जरूर था, पता नहीं कहां के लिये। दो-चार घण्टे तो मैं यहां बैठ सकता था लेकिन पूरे दिन बैठना मेरे लिये बडी मुश्किल बात थी। मैंने सबको भरोसा दिया कि नन्दनवन नहीं जाऊंगा और नन्दू को साथ लेकर चल पडा। साथ में केवल कैमरा और पानी की बोतल थी। मन में लक्ष्य नन्दनवन ही था।

Monday, July 9, 2012

तपोवन, शिवलिंग पर्वत और बाबाजी

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9 जून 2012 की दोपहर बाद ढाई बजे हम तीनों तपोवन पहुंच गये। इसकी समुद्र तल से ऊंचाई 4350 मीटर है। हमारे बिल्कुल सामने है शिवलिंग पर्वत शिखर जिसकी ऊंचाई 6000 मीटर से ज्यादा है। इसके अलावा तपोवन में जो एक और शानदार चीज है वो है अमरगंगा, जो इसकी सुन्दरता में चार चांद लगाती है।
तपोवन जाने से पहले मैंने इसके बारे में केवल इतना ही सुना था कि यह गौमुख से छह किलोमीटर आगे है। यही बात मुझे रोमांचित करती थी। अपने हिमालय अनुभवों के आधार पर मुझे पता था कि वहां इतनी ऊंचाई पर कोई वन नहीं होगा, बल्कि कोई छोटा मोटा मैदान होगा जिसे अक्सर उच्च हिमालयी क्षेत्रों में वन या बाग कह देते हैं। श्रीखण्ड महादेव के पास भी एक ऐसी ही जगह है पार्वती बाग जहां एक बडे से समतल सुरक्षित मैदान के अलावा कुछ नहीं है। और 4000 मीटर की ऊंचाई पर छोटी मोटी घास ही उग सकती है, कोई बडा पेड नहीं।

Thursday, July 5, 2012

गौमुख से तपोवन- एक खतरनाक सफर

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तपोवन के लिये चलने से पहले बता दूं कुछ बातें जो मैंने तपोवन से वापस आकर सुनीं। सबसे पहली बात तो मेरे साथ जाने वाले पत्रकार चौधरी साहब ने ही कही कि तपोवन तक जाना द्रौपदी के डांडे से भी कठिन है। अब यह द्रौपदी का डांडा क्या बला है? असल में चौधरी साहब ने उत्तरकाशी स्थित नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (निम) से पर्वतारोहण का बेसिक कोर्स कर रखा है। यह कोर्स एक महीने का होता है और इसमें पर्वतारोहण की हर बारीकी सिखाई जाती है। ट्रेकिंग और पर्वतारोहण में फर्क होता है। सबसे बडा अन्तर तो यही है कि ट्रेकिंग में अपने ऊपर थोडा सा सामान लादकर दो-चार दिन पैदल चला जाता है। ज्यादा हुआ तो एकाध दर्रा पार कर लिया। लेकिन पर्वतारोहण इससे आगे की चीज है। उसमें ज्यादा सामान अपने ऊपर लादा जाता है और कोई चोटी फतह की जाती है। यानी जहां ट्रेकिंग खत्म हो जाती है, वहां से आगे पर्वतारोहण शुरू हो जाता है। भारत में पर्वतारोहण केवल उच्च हिमालय में ही किया जा सकता है जबकि ट्रेकिंग कहीं भी की जा सकती है। हिमालय के बाद पश्चिमी घाट की पहाडियां ट्रेकिंग के लिये जानी जाती हैं, जबकि वहां पर्वतारोहण नहीं हो सकता। कुछ भी हो, ट्रेकिंग का बाप होता है पर्वतारोहण।

Monday, July 2, 2012

भोजबासा से तपोवन की ओर

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9 जून 2012 की सुबह थी। मैं सोकर उठा तो देखा कि टैंट में अकेला ही पडा था। बाकी सब कभी के उठ चुके थे। बाहर झांका तो मौसम साफ था और धूप भी निकली थी। बिल्कुल सामने गौमुख की दिशा में गंगोत्री श्रंखला के तीनों पर्वत शिखर साफ दिखाई पड रहे थे। चौधरी साहब और नन्दू कभी के जग गये थे और चौधरी साहब अब फोटो ले रहे थे।
सात बजे मेरी आंख खुली और आठ बजे हमने गौमुख की तरफ चलना शुरू कर दिया। चलने से पहले गढवाल मण्डल वालों के यहां महा-महंगी मैगी और चाय ली। इसके अलावा आलू के तीन परांठे पैक करवा लिये और पारले-जी के पांच पैकेट भी ले लिये। गढवाल मण्डल विकास निगम वाले यहां खाने पीने की चीजों को बेहद ऊंचे दामों पर बेचते हैं। आलू का एक परांठा पचास रुपये और पारले जी का एक पैकेट जो नीचे पांच रुपये का आता है, उसे बीस रुपये का बेच रहे थे। कारण वही जो इस दुर्गम इलाके में हमेशा होता है। अच्छा हां, आज हमारा लक्ष्य गौमुख तक ना जाकर आगे तपोवन तक जाने का था। हमारा परमिट मात्र गौमुख तक के लिये था और आज उसका आखिरी दिन था। कायदे से हमें आज गौमुख देखकर गंगोत्री लौट जाना था।

Friday, June 29, 2012

गौमुख यात्रा- गंगोत्री से भोजबासा

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8 जून 2012 की सुबह नौ बजे हमने गौमुख के लिये प्रस्थान कर दिया। मेरे साथ एक पत्रकार चौधरी साहब और कुली नन्दू भी था। हमारे पास स्लीपिंग बैग, टैण्ट और खाने का भरपूर सामान था। गंगोत्री समुद्र तल से लगभग 3000 मीटर की ऊंचाई पर है। इतनी ऊंचाई पर ट्रेकिंग करना मायने रखता है। साधारण सेहत वाला इंसान इतनी ऊंचाई पर सही सलामत पैदल नहीं चल सकता। इसके लिये सेहत साधारण से ऊपर चाहिये। हम दोनों साधारण से ऊपर तो थे, लेकिन ज्यादा ऊपर नहीं।
गंगोत्री से अच्छी तरह निकल भी नहीं पाये थे कि एक ‘टोल टैक्स’ चुकाना पडा। सौ रुपये की पर्ची कटी। बताया गया कि कुलियों के, पॉर्टरों के, गाइडों के भले के लिये यह टैक्स लिया जाता है। हालांकि इसमें से एक धेला भी इन लोगों के ना तो पास जाता है, ना ही इनके लिये खर्च किया जाता है। इसका सबूत था नन्दू, जिसके कारण हमें यह टैक्स देना पडा और नन्दू को इससे कोई फायदा नहीं होता। कोई उसे पूछता तक नहीं। यहां अपने पत्रकार साहब खदक पडे। कहने लगे कि दिल्ली जाकर आरटीआई लगाऊंगा और पता करूंगा कि कितना पैसा इन लोगों पर खर्च किया गया और कितना कमाया गया। पता नहीं उन्होंने दिल्ली आकर आरटीआई लगाई या नहीं। शायद नहीं लगाई।

Monday, June 25, 2012

उत्तरकाशी से गंगोत्री

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7 जून 2012 को जब हम उत्तरकाशी फॉरेस्ट कार्यालय से गौमुख जाने का परमिट बनवा रहे थे, तो वहीं पर दो मोटी-मोटी महिलाएं भी थीं। वे भी परमिट बनवाने आयी थीं। गौरतलब है कि अगर हम अपने साथ गाइड या पॉर्टर भी ले जाते हैं, तो उनका भी परमिट बनवाना पडता है। लोकल आदमियों ने उनसे पूछा कि क्या आप अपने साथ कोई गाइड-पॉर्टर नहीं ले जायेंगीं। उन्होंने मना कर दिया। लोगों ने उन्हें पोर्टर ले जाने की सलाह दी- उनके मोटापे को देखते हुए। उनका दोनों का वजन अगर सौ-सौ किलो नहीं भी था तो नब्बे नब्बे किलो से कम भी नहीं था।
महिलाओं ने एक बार तो लोकल आदमियों की तरफ पर्यटकों वाले अंदाज से देखा। अक्सर हम कहीं भी जाते हैं, तो लोकल आदमियों की निष्पक्ष सलाह को शक की निगाह से देखते हैं। हमें यह लगता है कि सामने वाला हमें ठगने की कोशिश कर रहा है या हमें बेवकूफ बना रहा है। उसी हिकारत भरे अन्दाज से उन्होंने उन आदमियों को देखा। कहने लगीं कि हम वैष्णों देवी गयी थीं, तो पैदल ही गई थीं। वहां हमें कोई दिक्कत नहीं हुई तो यहां कैसे हो जायेगी। वे ठहरे बेचारे किस्म के इंसान। घर की मुर्गी दाल बराबर हर जगह ही होती है। उनके लिये गौमुख चाहे जैसा भी हो, लेकिन वैष्णों देवी दूर की जगह होने के कारण अति सम्मानित है। इसलिये कहने लगे कि हां, आप फिर तो जरूर पैदल ही चली जायेंगी।

Wednesday, June 20, 2012

उत्तरकाशी और नेहरू पर्वतारोहण संस्थान

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6 जून 2012 की शाम तक हम उत्तरकाशी पहुंच गये थे। लगातार बारह घण्टे हो गये थे हमें बाइक पर बैठे बैठे। आधा घण्टा नरेन्द्रनगर और आधा घण्टा ही चम्बा में रुके थे। थोडी देर चिन्यालीसौड भी रुके थे। इन बारह घण्टों में पिछवाडे का ऐसा बुरा हाल हुआ जैसे किसी ने मुर्गा बनाकर पिटाई कर दी हो। बाइक से उतरते ही हमारे मुंह से निकला- आज की अखण्ड तपस्या पूरी हुई।
मैंने बताया था कि मेरे साथ चौधरी साहब थे, जो दिल्ली के एक प्रसिद्ध अखबार में पत्रकार थे। अब पत्रकारों का बडा जबरदस्त नेटवर्क होता है। कहीं भी चले जाओ, मोबाइल नेटवर्क मिले या ना मिले, पत्रकारों का पूरा फुल नेटवर्क मिलता है।
उत्तरकाशी में नेहरू पर्वतारोहण संस्थान है जहां पर्वतारोहण की कक्षाएं चलती हैं, पर्वतारोहण सिखाया जाता है, वो भी बिल्कुल सस्ते दामों पर। हमारे पत्रकार साहब का एक नेटवर्क उस संस्थान में भी है। उसका शॉर्ट नाम निम (NIM- Nehru Institute of Mountaineering) है। उत्तरकाशी में कहीं भी किसी से पूछ लो कि निम कहां है, आपको सही जानकारी मिल जायेगी। तो जी, हम भी निम में जा पहुंचे। जिससे मिलना था, मिले। उन्होंने ही निम के पास हमारे लिये एक होटल में कमरा बुक करा दिया था। बाद में पता चला कि वो कमरा 600 रुपये का था।

Saturday, June 16, 2012

गंगोत्री-गोमुख-तपोवन यात्रा- दिल्ली से उत्तरकाशी

अक्सर ऐसा होता है कि जब भी मैं कहीं जाने की योजना बनाता हूं तो पेट में मरोडे उठने लगते हैं। जी खुश हो जाता है कि इतने दिन और बचे हैं, मैं फलां तारीख को इतने बजे वहां पर रहूंगा। और उन मरोडों की वजह से पेट खराब हो जाता है, दस्त भी लग जाते हैं। उसी खराबी की वजह से मेरी कई यात्राएं कैंसिल हुई हैं। मई में ग्वालियर वाली नैरो गेज ट्रेन की सवारी करनी थी, पेट खराब और यात्रा कैंसिल। उसका सारा रिजर्वेशन करा लिया था, पक्की योजना बन गई थी, लेकिन ऐन टाइम पर पेट में मरोडे उठे। सोचा गया कि भयंकर गर्मी की वजह से ऐसा हो रहा है, तुरन्त रिजर्वेशन कैंसिल और यात्रा भी कैंसिल।
अपने एक और घुमक्कड दोस्त हैं- सन्दीप पंवार। उन्हें बीस मई के आसपास सारपास की ट्रेकिंग पर जाना था यूथ हॉस्टल की तरफ से। उनकी देखा-देखी मैंने भी अपने खुद के आधार पर सारपास पार करने की योजना बनाई। और कब बीस मई आई और कब चली गई, पता ही नहीं चला। ये भी ध्यान नहीं रहा कि सन्दीप भाई ने वो यात्रा की या नहीं। ... एक मिनट, पूछ लेता हूं उनसे....