Saturday, October 15, 2011

पुरी यात्रा- जगन्नाथ मन्दिर और समुद्र तट

23 अगस्त 2011 को दोपहर तक कोणार्क से मैं वापस पुरी आ गया। टम्पू वाले ने सीधा जगन्नाथ मन्दिर के सामने ही जा पटका। नीचे उतरते ही पण्डों ने घेर लिया कि आ गया शिकार। मैं खुद कभी पूजा-पाठ करता नहीं हूं, पण्डों की क्या मजाल कि यहां भी मुझसे करवा दें। पता चला कि अन्दर मन्दिर में जूते-चप्पल, मोबाइल, कैमरा नहीं ले जा सकते। चप्पल निकालकर मैंने मन्दिर के सामने ही जूताघर में रख दिये। जेब में मोबाइल और कैमरा, पीछे कमर पर बैग लादकर मैं मन्दिर में घुसने लगा।

‘सुरक्षाकर्मियों’ ने सीधे जेब पर हाथ मारा और कहा कि इसे अन्दर नहीं ले जा सकते। वापस जाओ। वापस गया और कैमरा, मोबाइल भी वही जूताघर में रख आया। अब धर्म के इन ठेकेदारों का कायदा-कानून देखिये कि किसी भी कथित सुरक्षाकर्मी ने मेरा भारी-भरकम बैग चेक तक नहीं किया, चेक करना तो दूर कन्धे से उतारने तक को नहीं कहा। मैं आश्चर्यचकित रह गया कि जिस सुरक्षा के नाम पर परम सुरक्षित मोबाइल, कैमरे को अन्दर नहीं ले जाने देते, वही घोर असुरक्षित बैग को कुछ नहीं कह रहे हैं। बस, एक इसी घटना के कारण भारत के चार महान धामों में से एक श्री जगन्नाथ पुरी की इज्जत मेरी नजर में कबाडा हो गई।

रही सही कसर पण्डों ने पूरी कर दी। बाहर से ही पण्डे मेरी आगे-पीछे लगे पडे थे कि साहब, आप इतनी दूर से आये हो, बिना पूजा-पाठ के वापस जाओगे तो पाप लगेगा। हम आपको अन्दर ले जाकर पूजा करायेंगे। लेकिन पूजा-पाठ करने के लिये हमेशा कैद में रहने वाली मूर्तियों पर श्रद्धा होनी भी जरूरी होती है, जिस की इधर कमी है। वे मूर्तियां क्या करेंगी जो शताब्दियों से कैद में हैं। अपना भगवान तो एक वही है जो इन मूर्तियों को कैद में रखने वालों को कैद करता है।

अन्दर गर्भगृह में जाने वालों की लाइन लगी थी जो सरक ही नहीं रही थी और सभी के हाथों में पर्चियां थीं। गर्भगृह के द्वार से कुछ पहले ही रोक लगा रखी थी, पर्ची वालों को साइड से अन्दर भेजा रहा था। अपन तो रोक के पास ही खडे हो गये, सामने गर्भगृह के द्वार से अन्दर कपडे पर बने दो थोबडे भी दिखे। कहने को तो यही थोबडे श्रीजगन्नाथ हैं, जिनकी पूजा करवाने के लिये अन्ध भक्तों से पता नहीं कितना चढावा डकारकर पण्डे अन्दर भेजते हैं।

यहां से निकलकर मन्दिर प्रांगण में पहुंचा। देखा कि यहां तो एक मुख्य मन्दिर के अलावा छोटे-छोटे कई मन्दिर और भी हैं- पूरा मन्दिर समूह है। और मुख्य मन्दिर? क्या भव्य लग रहा था! इसकी पत्थरों की दीवारों पर वही कोणार्क वाली आकृतियां। देखने में बिल्कुल कोणार्क के सूर्य मन्दिर का भाई लगा यह मुझे। हां, इस पर मुझे मैथुन आकृतियां नहीं दिखीं। शायद हों भी, या नहीं भी। तो क्या इस अदभुत कलाकृति के फोटो खींचने से रोकने के लिये कैमरा बाहर रखवाया जाता है। इतना तो पक्का है कि सुरक्षा के लिये मोबाइल, कैमरे बाहर नहीं रखवाये जाते। अगर सुरक्षा को लेकर प्रशासन इतना संवेदनशील होता तो मेरे बैग से एक- एक सामान निकालकर चेक किया जाता या फिर चेक करने वाली मशीन लगी होती। धिक्कार है जगन्नाथ भाई तेरे इन ‘सेवकों’ को।



जगन्नाथ मन्दिर का मुख्य प्रवेश द्वार

आषाढ में होने वाली रथयात्रा में प्रयुक्त रथों के पहिये।

रथयात्रा पथ

बाहर निकला, चप्पल-मोबाइल-कैमरा वापस लिया। बीच का रास्ता पूछने पर जवाब मिला कि सीधे चले जाओ। सीधे डेढ-दो किलोमीटर चलना पडता है और हम पहुंच जाते हैं समुद्र किनारे। हालांकि कुछ घण्टे पहले मैंने कोणार्क का समुद्र तट देखा था लेकिन यहां तो पूरा बाजार लगा है किनारे पर। लोग-बाग समुद्र में नहा भी रहे हैं। देखा-देखी मैं भी पहुंच गया। और जैसे ही एक लहर आई, पानी मेरे घुटनों तक चढ आया। हालत तब खराब होने लगे जब पानी वापस जाने लगा। पता चल गया कि पैरों तले से जमीन खिसकना कहावत ऐसे ही नहीं बनी। जरूर यह समुद्र किनारे वालों ने ही बनाई होगी। उस समय मैं गिरने से बाल-बाल बचा। और मैं गिरना बिल्कुल नहीं चाहता था क्योंकि कन्धों पर बैग था, हाथ में कैमरा और अकेला । यहां से बचा तो महाराज इतनी दूर जा खडा हुआ कि सुनामी का बाप भी आये तो भी नहीं भिगो सकता था। समुद्र का पहला अनुभव।




यहां शंख बहुत सस्ते बिकते हैं। मुझसे दिल्ली से चलते समय कहा गया था कि वहां से शंख जितने भी ला सकता है, ले आना। मैं सबसे सस्ते वाले डेढ सौ रुपये के पांच शंख ले गया यानी तीस रुपये का एक शंख। दिल्ली वापस आकर मेरी बहुत तारीफ हुई कि तू तो पंचमुखी शंख ले आया है।



दिन ढलने के साथ ही दुकान वाले बेंचें, कुस्री-मेजें बिछा देते हैं। अगर मुझ जैसा कोई महज आराम करने के लिये बैठ जाता है तो यह कहकर उठा दिया जाता है कि या तो हमारे यहां से कुछ खरीदो या फिर उठो यहां से।


कोई ‘सुदर्शन पटनायक’ लगा पडा है अपनी कलाकृति बनाने में।

काफी देर बाद भी पल्ले नहीं पडा कि यह बना क्या रहा है।

हां, अब समझ आया।

आखिरकार रेतशिल्पी साहब की मेहनत से यह नतीजा निकला। मैंने यह फोटो छुपते हुए खींचा है नहीं तो शिल्पी साहब तुरन्त हाथ फैला देते कि लाओ पांच रुपये।
अन्धेरा होने पर मैं अपने ठिकाने (होटल) पुरी रेलवे स्टेशन जा पहुंचा। मजे से खाना खाया और जगह देखकर पडकर सो गया। वैसे समुद्र तट के साथ-साथ होटलों की कोई कमी नहीं है।

19 comments:

  1. थोड़ी दया तो भगवान पर भी आये कि कैसे लोगों से घिरे हैं आजकल।

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  2. अभी तक तुमने सिर्फ़ चार धाम में ये ही मंदिर देखा है, इन मंदिरों की दुर्गति देखनी है तो चारों को देखो फ़िर बताना कि सबसे बुरा कौन सा रहा, चलो फ़िर भी बढिया रही यात्रा, कुछ सिखने को तो मिला।

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  3. अभी तक तुमने सिर्फ़ चार धाम में ये ही मंदिर देखा है, इन मंदिरों की दुर्गति देखनी है तो चारों को देखो फ़िर बताना कि सबसे बुरा कौन सा रहा, चलो फ़िर भी बढिया रही यात्रा, कुछ सिखने को तो मिला।

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  4. Anonymous said... का क्या पंगा है जब मैंने कमैन्ट किया तो ये कैसे हो गया, कुछ पता हो तो बता देना,

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  5. सारे भगवानों के यही हाल हैं, पंडे पुजारी भगवान की भक्ति में नहीं अपनी जेब भरने में लगे हैं।

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  6. इस समुंदर तट को देख कर जुहू की याद आ गई ---अच्छा हुआ जो तुम यहाँ नहीं आए ---क्योकि यह तट जुहू से बहुत ही अच्छा और साफ है ....

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  7. आपके जीवंत यात्रा-वृत्तांत पढना ,हमेशा ही बहुत अच्छा लगता है.

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  8. नीरज भाई वो कफनी ग्लासिएर भी दिखा दो भाई प्लीज

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  9. बहुत बढ़िया प्रस्तुति ||
    शुभ-कामनाएं ||

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  10. इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  11. हम लोग पण्डे के साथ अन्दर गये कहने लगा संकल्प छुड़ा लीजिये पापा तैयार हो गये कहने लगा जो कहूँगा बस फटाफट दुहराते जाना दुसरे लोग भी लाइन में है | शुरुआत धीरे धीरे कुछ कहने से किया हम सब जल ले कर दुहरा रहे थे और जल्दी जल्दी में उसने अंत में कहा की हम ५ हजार का दान करते है अरे मेरा पिता जी भी बनारस के थे हम सब तो छोटे होने के कारण जल्दी में बोल गये पर पापा ने कहा तेज से की बस १०० रुपये का संकल्प लेता हूँ \ वह क्या मुर्गा फसाते है ये लोग | पास में ही कृष्ण जी के मौसी का घर है जहा तक रथ यात्रा में रथ जाता है वहा नहीं गये |

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  12. पटनायक जी हाथ भी फैला देते हैं क्‍या, पता न था लेकिन कलाकार के लिए आपकी भाषा भी हमें जंची नहीं. अगर कलाकार अपनी कला के बदले कुछ अर्जित करना चाहे तो वह हाथ फैलाना कैसे हुआ.

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    1. पटनायक जी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के रेट शिल्पकार है और कभी किसी से कुछ नहीं मांगते। और एक भिखारी से क्या मांगेंगे? इन्होने भगवन जगन्नाथजी के लिए भी थोबड़े जैसे अनुचित शब्द का प्रयोग किया है। पता नहीं जब श्रद्धा ना हो तो लोग जाते ही क्यों है मंदिरों में? ऐसे लोगों को उस मंदिर की विशेषताओं के बारे में कभी पता नही चलेगा। पण्डे कुछ ज्यादा ही लालची है वहां के, किन्तु कुछ अच्छे पण्डे भी है वहां। ये ना भूलें की ये पण्डे ही वहां की अद्भुत परम्पराओं को जीवित रखे हुए है। लेकिन जिन्हे केवल बाह्य आवरण से मतलब हो उन्हें उस क्षेत्र के माहात्म्य और पावित्र्य से क्या लेना देना? उन्हें तो केवल नग्न मूर्तियां देखने का शौक होता है।

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  13. सही कह रहे हो, मुझे भी जगन्‍नाथ पुरी में निराशा ही हाथ लगी थी। पण्‍डे ऐसे पीछे पड़ जाते हैं जैसे चोर-उचक्‍के हों।

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  14. एक बार देख के लिख दिया था अब दुबारा घूम लिए, उन जगहों पर.

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  15. आपको सुदर्शन पटनायक को देखने का मौका मिला, यह एक सौभाग्य है. वो एक प्रतिष्ठित रेतशिल्पी हैं.

    कैमर न रखवा लें तो बाहर मूर्तियों की तसवीरें कैसे बिकें, और भी कई व्यवसाय हैं.
    लुटने के तरीकों पर अंशुमाला जी ने कुछ और प्रकाश तो डाल ही दिया है.

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  16. @ राहुल सिंह जी,
    कलाकार को अपनी कला का मूल्य मिलना चाहिये। आपकी इस बात से मैं सहमत हूं, लेकिन यहां पुरी में ये रेतशिल्पी हाथ फैलाकर ही मांगते हैं। इनका हाथ इस कला में इतना जमा हुआ है कि आधे घण्टे में एक कलाकृति बना देते हैं और एक घण्टे में दो। किसी मुझ जैसे अनजान आदमी को अगर रेत पर ऐसी कलाकृतियां बनी दिखेंगी तो फोटो खींचने को मन करता है। क्लिक करते ही ये लोग हाथ धोकर पीछे पड जाते हैं कि पैसे दो। जहां तक मेरा अनुमान है तो सुदर्शन पटनायक भी कभी यहीं पर कलाकृतियां बनाते होंगे। समय समय की बात होती है कि सुदर्शन साहब अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध होते चले गये।

    @ अभिषेक जी,
    ये जनाब सुदर्शन पटनायक नहीं हैं। यह एक साधारण रेतशिल्पी ही है, और रेत पर कलाकृतियां बनाता है और लोगों द्वारा फोटो खींचने पर तुरन्त पैसे मांगता है। मैंने यह फोटो चोरी से खींचा है लेकिन एक दूसरे कलाकार के फोटो लेते समय उसने मुझे पकड लिया और पैसे लेकर ही छोडा। ऐसे कामों से कलाकार की इज्जत बढती नहीं, बल्कि घटती है।

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  17. अच्छा. खैर वो तो रेत की कलाकृतियों के ही पैसे माँग रहा था; अब तो देख रहा हूँ कि मदारी अपने बंदरों की फोटो लेने के भी पैसे मांग रहे हैं !!!
    संपेरे अपने सांप को दिखला कर उनकी फोटो खींचने के पांच रु. मांग रहे हैं. शायद नए सोर्स हैं इन्कम के !

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  18. आजकल मंदिरों में भगवान् नहीं मिलते सिर्फ उनके दलाल मिलते हैं...जो हाल हिन्दू धार्मिक स्थलों का हुआ है उसे देख कर शायद ही कोई आँखों वाला वहां जाए...धर्मांध लोगों की बात छोड़ दें क्यूँ की उन्हीं के भरोसे तो ये कारोबार चल रहा है...आपकी पोस्ट कमाल की है और आपके विचार...वन्दनीय हैं.

    नीरज

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