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Sunday, July 10, 2011

हैदराबाद से दिल्ली- एक रोमांटिक रेलयात्रा

बात तीन साल पुरानी है। तब तक मैं गुडगांव में लगी-लगाई नौकरी छोड चुका था, हरिद्वार की तरफ मुंह उठ चुका था लेकिन कुल मिलाकर बेरोजगार ही था। उन दिनों मेरा बस एक ही सपना था- सरकारी नौकरी वो भी केवल रेलवे में। उसी सिलसिले में हैदराबाद जाना हुआ। जाने की पूरी कहानी आप यहां क्लिक करके पढ सकते हैं। अब वहां से वापस आने का बखत हो गया है। तो चलो, ऐसा करते हैं कि वापस आ जाते हैं।
23 जून 2008 की बात है। सिकंदराबाद के स्टेशन से शाम पांच बजे के आसपास आंध्र प्रदेश सम्पर्क क्रान्ति चलती है दिल्ली के लिये। मेरा इसी गाडी में रिजर्वेशन था- कन्फर्म था। बर्थ नम्बर थी- 67 जो स्लीपर के डिब्बों में सबसे ऊपर वाली होती है। यह मेरी मनपसन्द बर्थ होती है। कारण यह कि सफर चाहे दिन का हो या रात का, हमेशा सोते रहने का विकल्प खुला रहता है। नीचे वाली बर्थों पर दिन में यह ऑप्शन खत्म हो जाता है।
तो जी, जैसे ही यह गाडी प्लेटफार्म पर आयी, मैं तसल्ली से गाडी में चढा। उस समय मेरे हाथ में दो समोसे और एक आधे लीटर वाली बोतल थी कोल्ड ड्रिंक की। यह गाडी तिरुपति से आती है। सबसे पहले मैंने यह देखा कि मेरी बर्थ पर कोई है तो नहीं। अगर होता तो उसे हटाने के लिये थोडा बहुत सिर मारना पडता जोकि मुझे बहुत पसन्द है। बर्थ खाली देखकर थोडी खुशी हुई तो थोडी निराशा भी हुई- किससे सिर मारूं। हां, ऐसा करते हैं कि किसी दूसरे की बर्थ पर बैठ जाते हैं। वो जब मुझे अपनी बर्थ पर बैठे देखेगा तो हटने को कहेगा, उससे सिर मारूंगा। चुपचाप सफर करने से तो अच्छा है कि हल्की-फुल्की नोकझोक होती रहे। मैं जा चढा बर्थ नम्बर 72 पर। यह साइड में ऊपर वाली बर्थ होती है। समोसे खाने शुरू कर दिये। तभी निगाह पडी बर्थ नम्बर 70 पर। मेरी बर्थ के बिल्कुल सामने वाली- सबसे ऊपर। उस पर एक सुन्दर छोरी पडी थी। मैं तीन साल पहले 20 बरस का था और वो भी करीब 20 की ही होगी।
अपने तो मजे आ गये। पता नहीं कि वो कहां तक जायेगी- पर कहीं भी जाये, कुछ सफर तो साथ साथ होगा ही। और करना भी क्या था? बस देखना ही था। छोरियों से बात करने के मामले में मैं बिल्कुल अनाडी हूं, अनाडी नहीं खत्म ही हूं। कभी किसी छोरी से ढंग से बात नहीं की। और बात करने की जरुरत है भी नहीं- आज भी।
गाडी चली, उससे पहले ही 72 नम्बर का मालिक आ गया। एक काला सा दुबला पतला सा आदमी था- उसके साथ उसकी सात-आठ साल की बेटी थी। जैसी कि मैंने रणनीति बनाई थी, उसी के अनुसार हल्की बातचीत हुई। उसे भी दिल्ली ही जाना था। उसका नाम अब तो भूल गया हूं लेकिन चलो कालिया रख देते हैं। अभी आगे बहुत काम आयेगा। कोल्ड ड्रिंक की पूरी बोतल गटक कर दो-तीन लम्बी-लम्बी डकार लेकर मैं उसकी बर्थ से उठ गया। अभी भी काफी दिन था तो मैं खिडकी पर खडा हो गया। दक्कन के पठार की पहाडियां देखने लगा। एक स्टेशन आया- BHONGIR. इसे हिन्दी में पढने पर पढा जायेगा- भोंगीर। लेकिन इसका असली नाम है- भुवनगिरी। तो जी, ऐसे ही चलते चलते काजीपेट पहुंच गये। यहां तक अंधेरा हो गया था।
अभी भी मेरी 67 नम्बर खाली थी। कालिया को छोडकर किसी को पता भी नहीं था कि इसका मालिक कौन है। रेलवे ने इस बर्थ का मालिक मुझे पूरे 24 घण्टे के लिये बनाया था क्योंकि यह गाडी सिकंदराबाद से निजामुद्दीन तक चौबीस घण्टे लगाती है। अंधेरा हो जाने के कारण बाहर देखने में समझदारी भी नहीं थी। मैं पहुंच गया 67 नम्बर पर। सामने वाली बर्थ पर वही छोरी। मैं सोच में पड गया कि इसे कहीं देखा है। खूब दिमाग हिला-हिलाकर सोच लिया, तब आखिर में याद आया कि ओहो, इसे अभी दो घण्टे पहले ही तो देखा था जब समोसे खा रहा था। इसे तो मैं भूल ही गया था। चलो, कोई बात नहीं। अब शुरू करते हैं इसके साथ अपना बाकी 22 घण्टे का सफर।
यहां से शुरू होता है रोमांटिक सफर। उसका नाम था तो सही, ध्यान नहीं आ रहा। चलो रखते हैं... क्या रखें... वो काला था तो कालिया रख दिया... यह तो बढिया गोरी चिट्टी है... गौरैया रख दें... नहीं... फिर क्या रखें? कुछ ढंग का नाम रखते हैं... एक मिनट... सोच लूं। हां, श्रुति रखते हैं। उसका नाम भी शायद श्रुति ही था। अरे नहीं भाई, यह नाम नहीं रखना... यह नाम तो मुझे कुटवा देगा... अगर अमित को पता चल गया तो मेरी खैर नहीं... अमित शायद श्रुति से ही बात कर रहा है... श्रुति से उसका रिश्ता पक्का हो गया है... मेरा रूम पार्टनर है... मैं हमेशा श्रुति को सुरती बोलता हूं... लेकिन बन्दा कुछ नहीं कहता... उसे श्रुति और सुरती में कोई फरक नहीं दिखता।
छोडो यार, उसे छोरी ही रहने देते हैं। उसका नाम रखते हैं- छोरी। जैसे ही उसकी नजर अटकती भटकती मुझ पर पडी तो कसम से भाई... देखती ही रह गई। बार बार हमारी नजरें टकराती और टकराई रहतीं और आखिर में मुझे ही हटानी पडतीं। अजीब छोरी है यार... फुल मजे ले रही है वो भी भयंकर तरीके से। यह मेरे लिये असामान्य घटना थी। मैं तुरन्त इसकी पडताल में जुट गया। मैंने पहले सोचा था कि पहले इसे देखूंगा कि यह मुझमें कितनी दिलचस्पी लेती है। इसके बाद क्या करना है, यह नहीं सोचा था। लेकिन इसके साथ और कौन कौन हैं? तभी नीचे वाली बर्थ पर बैठे एक लडके ने उससे कुछ मांगा और उसने बैग पकडा दिया। बाद में अगले दिन पता चला कि वो उसका छोटा भाई था और उनके साथ मां भी थी।
बैग में से निकालकर मां-बेटे कुछ खाने लगे लेकिन छोरी को नहीं टोका। चाय वाला आया तो दोनों ने चाय पी लेकिन इस बार भी छोरी को टोका तक नहीं। लम्बी दूरी की गाडी है यह- इसमें रसोईयान भी है। सभी यात्री डिनर करने लगे। मां-बेटे ने भी डिनर किया लेकिन चमत्कार कि इस बार भी उन्होंने उससे पूछा तक नहीं। छोरी ऊपर ही पडी रही और मुझे ही देखती रही। मैंने भी डिनर किया लेकिन उस छोरी की ‘घोर निगरानी’ में। उसका लगातार मुझे देखते रहना और मां-बेटे का उसे ना टोकना... मैंने घोषित कर दिया कि यह छोरी मानसिक रूप से विकलांग है। इसके पीछे पडना और कुछ कहना अपने ही हाथों-पैरों पर वार करना है। छोडा उसका चक्कर और लम्बी तानकर सो गये।
अगले दिन... गाडी जब नर्मदा पार कर रही थी तो आंख खुली। करीब सात बजे का टाइम था। गाडी का एक काफी लम्बी नदी पार करना और बाहर काफी उजाला होना, मैं समझ गया कि नर्मदा पार की जा रही है। नर्मदा पार करने के बाद सतपुडा की पहाडियों के बीच से गाडी गुजरती है। मेरी उस रूट पर यह पहली यात्रा थी। आलस छोडकर तुरन्त खिडकी पर आ डटा। सतपुडा की पहाडियां देखनी थीं। मानसून उस समय चरम पर था। सतपुडा की उन पहाडियों में बहार आयी हुई थी। एकाध सुरंग भी है। औबेदुल्लागंज के आसपास जब मैं वापस 67 नम्बर पर जाने लगा तो एक लडका जो अभी तक नीचे वाली बर्थ पर बैठा था, मुझसे बोला कि मेरा रिजर्वेशन वेटिंग है। पूरी रात जागते हुए कट गई है। अब ऊपर 67 नम्बर पर सोना चाहता है। मेरे अन्दर जितनी इंसानियत अब है, तब उससे भी ज्यादा थी, तुरन्त उसका अनुरोध मान लिया। वो 67 नम्बर पर जा चढा और फैल गया।
भोपाल पहुंचे। गाडी रुकने से पहले ही मुझे पूरी सब्जी वाला दिख गया। मैं गाडी रुकते ही भागा-भागा गया और दस रुपये की आठ पूरी और सब्जी खा डाली। यह मेरा नाश्ता था। गाडी में मिलने वाला महंगा और जरा सा नाश्ता मुझे रुचता नहीं है। दस मिनट बाद गाडी चल पडी। अब इसे झांसी रुकना था यानी चार घण्टे बाद। फिर से नींद आने लगी। देखा कि वो लडका जिसकी वेटिंग थी, और मेरी बर्थ पर सोने गया था, सोना-साना छोडकर उसी छोरी के पीछे पडा था। नींद तो उसके मीलों पास भी नहीं थी। वो बस छोरी को ही देखे जा रहा था। और छोरी? केवल मुझे। मुझे याद है जब नर्मदा पार करते समय मेरी आंख खुली थी, तब छोरी जागी हुई थी और मेरे जागते ही मुझे देखना शुरू कर दिया था। अब तो ठप्पा लगा दिया कि छोरी पागल है। इसके चक्कर में नहीं पडना है।
मैंने उस लडके को जबरदस्ती 67 नम्बर से भगाया और खुद जा पसरा। छोरी जहां मुझे देखने के लिये पहले औंधी पडी थी, अब सीधी लेट गई और वही क्रिया-कर्म शुरू कर दिया- मुझे देखने का। अब मैं उसकी इस हालत पर हंसूं या ना हंसूं- कुछ सूझ नहीं रहा था। उधर उस कालिया को भी अच्छी तरह पता चल गया था कि जाट और छोरी में बढिया सैटिंग हो रही है, जाट ने छोरी पटा ली है, तभी तो वो जाट का पीछा नहीं छोड रही है। वो वेटिंग वाला लडका कालिया के पास जा बैठा। जरूर उनमें यही बात चल रही होगी कि छोरी वेटिंग वाले को कोई भाव नहीं दे रही है, उसे तो बस जाट ही पसन्द है। इधर मैं चादर तानकर सो गया।
झांसी पहुंचे। आंख खुली। पडे-पडे ही आंख बिल्कुल जरा सी खोलकर उसकी तरफ देखा। इस बार छोरी ने अपनी दिशा बदल ली थी। जिधर मेरा सिर था, उधर ही सिर करके वो भी पडी थी। उस समय उसकी आंखें बन्द थी। शायद सो रही थी। मैंने पूरी आंख खोली और अंगडाई ली तो उसने भी आंखे खोल ली। अब हम एक-दूसरे के सबसे ज्यादा नजदीक थे- करीब दो फीट क्योंकि पहले हम विपरीत दिशा में पडे थे तो दूर थे लेकिन अब एक ही दिशा में थे तो सीधी सी बात है कि ज्यादा पास आ गये। गाडी झांसी से चल पडी। इसे अब निजामुद्दीन पर ही रुकना था।
पडे-पडे दिमाग में आया कि जब एक छोरी इतने भाव दे रही है तो तू क्यों पीछे हट रहा है। याद आया कि बेटा जाट, तू किसी से कम नहीं है। जब वो भाव दे रही है तो ले ले। मैंने अब उसकी तरफ करवट ली। वो पहले से ही इधर करवट लिये पडी थी। मैं मुस्कुराया, वो भी मुस्कुराई। मैं और मुस्कुराया, वो भी और मुस्कुराई। मैंने आंख मार दी। उसने शरमाकर आंख बन्द कर ली और फिर खोल ली। कुछ देर बाद मैंने चाय ली तो उसे भी टोका- उसने मुस्कुराते हुए मना कर दिया। थोडी देर बाद किताब बेचने वाला आया- पतली पतली सी किताबें। मैंने किताब वाले को टोका तो वो 15-20 किताबें मेरे पास रखकर बाकी किताबे बेचने आगे चला गया। मैंने दो-तीन किताबें छोरी को दी तो उसने तुरन्त ले ली और पढने लगी। थोडी देर बाद किताब वाला आया और मेरे खरीदने से मना करने पर सारी किताबें उठाकर जाने लगा तो छोरी ने मुझे वे दो-तीन किताबे लौटाते हुए कहा कि उसकी ये किताबें तो रह ही गई हैं। तब मैंने किताब वाले को वापस बुलाकर किताबें वापस करी। ग्वालियर के बाद मैं खिडकी पर चला गया। बाहर बहुत शानदार नजारे थे क्योंकि मानसून चरम पर था। छोरी को भी खिडकी पर आने को कहा तो उसने मना कर दिया। कालिया यह सब देख रहा था जबकि वेटिंग वाला सो गया था।
इसी तरह मथुरा पार हो गया। कालिया मेरे पास खिडकी पर आया। बोला- ‘यार, वो छोरी तो तूने पटा ली है। बढिया माल है। कर दे काम।’
‘क्या काम?’ उसका इशारा कहां था, मैं जानता था।
‘मथुरा निकल गया है। थोडी देर में दिल्ली आ जायेगा। आखिरी मौका है। छोरी मना भी नहीं करेगी।’
‘अरे यार, वो छोरी पागल है। तू कल से देख नहीं रहा है? वो कैसे मुझे ही घूरे जा रही है।’
‘अरे यही तो मौका है। उसे नीचे बुला और बाथरूम में ले जा। बाहर मैं खडा हूं। कोई दिक्कत नहीं होने दूंगा।’
‘अबे गधे, वो पागल है। अगर पागल ना होती तो मैं क्या उसे छोडने वाला था?’
‘नहीं यार, वो पागल नहीं है। वो तुझ पर फिदा है। तू कुछ भी कहेगा, वो मना नहीं करेगी। बाकी मैं बाहर हूं। तू बेफिकर होकर उसे अन्दर ले जा।’
तू बाहर है तो क्या कर लेगा? वो पागल है, उसने शोर मचा दिया और पांच-चार आदमी इकट्ठे हो गये तो तू क्या कर लेगा? मेरी तेरे चक्कर में आकर कुटाई हो जायेगी, ऊपर से दो हाथ तू भी धर देगा मुझ पर।’
‘अरे नहीं भाई, ऐसा थोडे ही होता है। देख, उसने उस वेटिंग वाले को देखा तक नहीं। वो बेचारा हार-थक कर सो गया है। तू ऊपर जाता है तो तुझे देखती है, तू नीचे आता है तो नीचे तुझे देखती है, तू खिडकी पर खडा होता है तो भी तुझे ही देखती रहती है...’
‘इसका मतलब ये है कि वो एक नम्बर की पागल है। कोई सही-सलामत छोरी ऐसा कर ही नहीं सकती। कोई किसी पर कितनी भी फिदा हो, लेकिन ऐसा नहीं कर सकती कि आसपास की सवारियों और अपने घर के सदस्यों को नजरअंदाज करके किसी को लगातार घूरती रहे।’
‘देख भाई, असल में ऐसा नहीं है। तू उसे नहीं ले जाना चाहता तो भई, तेरी मर्जी है। मेरा तो जो फर्ज था, वो निभा दिया।’
मैंने उसे उसके फर्ज के लिये धन्यवाद दिया। घण्टे भर बाद निजामुद्दीन आया और मैं अपने रास्ते, छोरी अपने रास्ते और कालिया अपने रास्ते।
अब एक दूसरी बात। छोरी पूरे रास्ते भर मुझे क्यों देखती रही, यह कारण आज तक भी समझ में नहीं आया। लेकिन हां, ये तय है कि वो पागल नहीं थी। कल उसने शाम को कुछ नहीं खाया तो इसका मतलब यह नहीं है कि मैं उसे केवल इसी बात पर पागल बता दूं। अगले दिन उन तीनों में बढिया तालमेल रहा और सबने साथ मिल-बांटकर खाना खाया। जब झांसी में हम एक दूसरे से दो फीट दूर से आंख मार रहे थे तो उसने मुझसे पूछा भी था कि कौन सा स्टेशन है। किताब वाला मामला तो मैंने बता ही दिया है कि किताब हाथ लगते ही वो पढने लगी। नीचे एक बन्दा अखबार पढ रहा था तो उसने खुद पढने के लिये उससे अखबार मांगा भी था। क्या कोई पागल यह सब कर सकता है? मेरे ग्वालियर के पास उसे खिडकी पर बुलाने पर उसने मना कर दिया। अगर वो पागल होती तो बुलाने पर आ ही जाती। अनजान आदमी का क्या भरोसा? मैं उसके लिये उतना ही अनजान था जितनी कि वो मेरे लिये।
कालिया जैसे लोग हर जगह हर ट्रेन के हर डिब्बे में बैठे मिलते हैं जो बस एक मौके की तलाश में रहते हैं और...।
यह एक सच्ची घटना है। एक रेल प्रेमी होने के नाते मेरा यही सन्देश है कि कालिया मत बनो, जाट बनो। (मैं किसी को जाति परिवर्तन की सलाह नहीं दे रहा हूं, ना ही जातिवाद फैला रहा हूं। जाट मतलब नीरज जाट।) हर परिस्थिति को एंजोय करते चलो और खुश रहो लेकिन अपनी खुशियों के लिये कभी दूसरे की खुशियों को तबाह करने की मत सोचो। और अपनी खुशी के सामने किसी दूसरी चीज को हावी मत होने दो।
मैं अक्सर मेरठ से दिल्ली आने के लिए हरिद्वार-अहमदाबाद मेल पकडता हूं। शाम साढे सात बजे मेरठ से चलकर दो घण्टे में शाहदरा पहुंचा देती है। स्लीपर वाले डिब्बे में बैठकर आता हूं। अभी कुछ ही दिन पहले की बात है। जिस कूपे में मैं बैठा था, उससे अगले कूपे में एक सुन्दर गुजराती लडकी भी थी। नौ बजे गाजियाबाद से चले तो उन्होंने सोने के लिये सीटें खोल ली। वो मिडल बर्थ पर लेट गई। एक बार उसने मुझे देखा तो देखना शुरू कर दिया। कुछ लोगों की जन्मजात ही आदत खराब होती है। इधर मैं ठहरा हर हालात में मस्त रहने वाला। अगर कोई लडकी इस तरह देख रही है तो पीछे क्यों हटें? साहिबाबाद तक वो बेचैन सी हो गई। बात अपने घर-परिवार वालों से करती, इशारे मेरी तरफ करती। मैं बस उसे और उसके इशारों को देखता रहा। विवेक विहार निकल गया। शाहदरा यहां से तीन किलोमीटर रह जाता है। मैं उठा, बैग कंधे पर लटकाया और खिडकी की तरफ निकल गया। खिडकी पर पहले ही दो तीन जने खडे थे। मैं उनके पीछे पानी के नल के पास खडा हो गया। तभी देखा कि वही लडकी आई और टॉयलेट के दरवाजे पर खडी हो गई और मुझे देखने लगी। मैंने उसे वही ठहरने का इशारा किया। वो वही खडी रही। कोई तीसरा अगर देखता तो यही सोचता कि अन्दर कोई है, यह उसके बाहर निकलने की प्रतीक्षा कर रही है। जैसे ही शाहदरा का प्लेटफार्म शुरू हुआ, मैंने उसे अन्दर जाने का इशारा किया। वो तुरन्त अन्दर चली गई। ट्रेन रुकी, मैं नीचे उतरा और सीधा ऑफिस चला गया। उस दिन मेरी नाइट ड्यूटी थी दस बजे से।
तो भईया, यात्राएं होती रहती हैं, हर तरह के आदमी मिलते है। हमें कभी भी किसी से भी विचलित नहीं होना है। बस, अपना काम करना है और खुश रहना है। भाड में जाये दुनियादारी।

दिल्ली से हैदराबाद यात्रा श्रंखला
1. चलो, हैदराबाद चलते हैं (दिल्ली से झांसी)
2. चलो, हैदराबाद चलते हैं (झांसी से इटारसी)
3. हैदराबाद यात्रा-3 (इटारसी से सिकन्दराबाद)
4. हैदराबाद से दिल्ली- एक रोमांटिक रेलयात्रा

20 comments:

  1. 25 minute barbaad ||koi gal nahin ji
    tumne to 24 ghante ----

    बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति ||
    बहुत बधाई ||

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  2. बढ़िया प्रस्तुति

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  3. अपुन को छोरियों से नहीं कुदरत से प्यार है,

    अपने बापू का मोबाइल नम्बर दे-दे भाई लगता है
    कि छोरा जवान हो गया है।

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  4. एक छोटी सी ट्रेवल लव स्टोरी !
    कालाबाजार में देव साहब पर फिल्माया गीत तो याद होगा - "अपनी तो हर आह इक तूफान है ..."
    :-)

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  5. नीरज,
    तुम्हारी घुमक्कड़ी के हम कायल हैं, लेकिन आज की पोस्ट अपनी नजर में बेस्ट पोस्ट।
    रेल प्रेमी होने के नाते जो संदेश दिया है वो एक सच्चे और साफ़दिल इंसान का संदेश है।
    तुम्हारा लेखन बहुत दिलचस्प है। संदीप ने बापू का मोबाईल नंबर मांगा है तो सिफ़ारिश जरूर करेगा, सिफ़ारिश करेगा तो भाई तेरा ब्याह भी जरूर होवेगा(न भी करता, तब भी होता लेकिन संदीप को भी तो खुश करना है:) और ब्याह होयेगा तो तेरे पांव में जंजीर भी जरूर पड़ेगी। इस भूमिका का ये मतलब है कि घुमक्कड़ी के अलावा भी कुछ लिखना पड़ा तो बहुत अच्छा लिखोगे।
    संदीप को मोबाईल नंबर जरूर दे देना:)

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  6. ये काम भी करते हो.... एक और सुचना प्रसारित करनी पड़ेगी... "कृपया अनजान व्यक्तियों को न घूरें"

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  7. @ रविकर
    सबसे पहले तो यह बात गांठ बांध लीजिये मैं एक अलग तरह का ब्लॉगर हूं। मैं केवल दो लोगों के लिये लिखता हूं-एक तो खुद अपने लिये और दूसरे उनके लिये जिन्हें यहां से कुछ काम की बात मिलती है।
    आज की पोस्ट मैंने केवल अपने लिये लिखी है, दूसरों के लिये नहीं। ना ही इसमें किसी और के लिये कोई काम की बात है। इसी लिये मैंने पोस्ट जानबूझकर काफी लम्बी की है। अगर आप यहां अपना टाइम काटने आये थे, और 25 मिनट बरबाद करके चले गये हैं तो इसके लिये आप खुद जिम्मेदार हैं, मैं नहीं।
    या यह समझ लीजिये कि आप यहां मिठाई खाने आये थे और आज आपको नीम का काढा मिला है। आपने मिठाई समझकर काढा पी लिया है और आपका जायका बिगड गया है, टाइम बरबाद हो गया है तो इसमें आप खुद जिम्मेदार हैं। क्या आपको मिठाई और काढे की परख नहीं है? पहले परख विकसित कीजिये, उसके बाद अपना टाइम काटने जहां मन करे जाइये।

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  8. 'नीरज जाट' तो हमेशा बने रहते हो , 'कालिया' बन कर भी देखते!! आखिर एक दिन 'कालिया' तो बनना ही है! जिस दिन 'कालिया' बनो उस दिन कार्ड जरूर भेजना, कम से कम एक दिन के खाने का इंतजाम तो हो जायेगा!!!

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  9. और हाँ ये रोमांटिक यात्रा तो वैसे ही है जैसे मिठाई की दुकान पे गुलाब जामुन और रसगुल्ला देख कर ललचाते रहो !!

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  10. कालिया जैसे अतिमहत्वाकांक्षियों पर आप निश्चय ही भारी पड़ेंगे। भारतीय रेल को कालिया के कलुषित इरादों से बचाने का आभार।

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  11. नीरज जी लेख पढकर अच्छा लगा. कभी कभी अपने दिल की बात भी कहनी चाहिए .

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  12. नीरज भाई बहुत अच्छा यात्रा वृत्तांत काश के सभी आप जैसी सोच रखते

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  13. जो आपको जानता है उसे आपकी इस हरकत से निराशा नहीं हुई होगी...आप हो ही ऐसे...बिंदास...फक्कड़....मन के राजा.

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  14. बढ़िया यात्रा प्रसंग

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  15. अस्वस्थता के कारण करीब 20 दिनों से ब्लॉगजगत से दूर था
    आप तक बहुत दिनों के बाद आ सका हूँ,

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  16. ओ भाई जाट भाई तुझे क्या है? अपने बारे में कैसी कैसी बातें लिख रहा है। भाई कोई अपनी इतनी आत्मप्रशंसा नहीं करता , चल
    भई हम तो बस इतना कहेगें कि तु इज्जत बचा लाया वरना कालिया
    ने तो तुझे सही रास्ता दिखाया था। वरना तू इस जमाने को मुँह
    दिखाने के लायक नहीं रहती रे पुष्पा!!!!!!!

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  17. ओ मिस्टर कूल,गुस्सा क्यूँ हो रहा है भाई? अगर बंदे को पसंद नहीं आई तो उसे कहने दे। हमें अभी तक की सबसे अच्छी पोस्ट लगी। हमने पहले भी कहा, फ़िर कह रहे हैं। जिसे नहीं पसंद आई, वो खुद अपनी पसंद की चीज ढूंढ लेंगे, तुम मस्त रहो, वैसे ही अच्छे लगते हो।

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  18. हाय!! ये अदा...छा गये बाबू मेरे घुम्मकड़...छाये रहो!!!

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  19. नीरजजी पोस्ट पढ़ कर मजा आ गया

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