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Saturday, July 2, 2011

श्रीखण्ड महादेव- जब मिलेंगे दो जाट

अपने इस विशाल देश में एक सुन्दर सा, मनोरम सा राज्य है- हिमाचल प्रदेश। शिमला इसकी राजधानी है। जी हां, वही शिमला जिसके पीछे पैसे वाले पर्यटक भागे फिरते हैं। घुमक्कडों की यहां खैर नहीं। शिमला से भी अगर धुर उत्तर की ओर देखें तो दूर कहीं बर्फीली चोटियां दिखती हैं। कहते हैं कि वो किन्नौर है। किन्नौर यानी किन्नर देश। राहुल सांकृत्यायन ने ‘मेरी किन्नर यात्रा’ के माध्यम से इस पौराणिक देश को अमर बना दिया है।
चलिये, शिमला से आगे निकलते हैं। अगर कोई पर्यटक शिमला से आगे निकल गया तो समझो कि उसमें थोडे बहुत घुमक्कडी के गुण हैं। हिन्दुस्तान-तिब्बत मार्ग पर चलते जायें तो बहुत आगे नारकण्डा आता है। नारकण्डा से आगे भी दुनिया है। सैंज है- जहां हमें सतलुज का साथ मिलता है। यहां पर कुल्लू से आने वाली सडक भी मिल जाती है। यह सडक जलोडी पास को लांघकर आती है। सुना है कभी जलोडी पास का नाम? मैंने सुना है।

सैंज से आगे निकलते हैं। रामपुर पहुंचते हैं- रामपुर बुशहर। प्राचीन राजधानी। यहां से सराहन ज्यादा दूर नहीं है। सराहन के बाद किन्नौर का इलाका शुरू हो जाता है। यहां तक शिमला ही था- शिमला जिला। हमें रामपुर से आगे नहीं जाना है। रामपुर से इस सडक को छोड देना है और निरमण्ड पहुंचना है- उससे भी आगे जांव पहुंचना है। हमें श्रीखण्ड महादेव जाना है। जांव से श्रीखण्ड की पैदल यात्रा शुरू होती है।
इस यात्रा में साथी रहेंगे- संदीप पंवार। संदीप से मेरी पहली बातचीत फोन के माध्यम से हुई थी- रामराम जी से। संदीप ने मुझसे रामराम की थी। मेरे पास अक्सर फोन आते रहते हैं- एक दिन संदीप का भी आ गया। पडोसी ही निकले। उनके घर पर पहुंच गया। वे गूगल में ‘जाट’ ढूंढते-ढूंढते ‘नीरज जाट’ के यहां पहुंचे थे। बताते हैं कि तभी से फैन हो गये। हमने भी अपना धर्म निभाया। उनका ब्लॉग बना दिया। दिक्कत आई नाम रखने की। ‘नीरज जाट जी’ की तरह ‘संदीप जाट जी’ पसन्द नहीं आया। शर्त थी कि नाम के साथ जाट शब्द जरूर लिखना है। ‘जाट महाराज’, ‘सिरफिरा जाट’ ‘पागल जाट’- कई शब्द दिमाग में आये लेकिन आखिर में एक शब्द जचा- जाट देवता। आज जाट देवता अपनी बुलंदियों को छूने लगा है।
एक दिन दौडे-दौडे मेरे ऑफिस में आये। सांस फूल रही थी- बोले कि एक बात कहनी है। फिर रुक गये- पहले पानी पीऊंगा, प्यास लग रही है। मैंने बताया कि बाहर पानी की एक मशीन रखी है, जाओ और पी लो। गये और चिल्लाते-चिल्लाते हाथ मसलते वापस आ गये। क्या हुआ? अबे, यार मरवा दिया। इस मशीन में तो खदकता हुआ पानी है। इस गर्मी में मुझे ठण्डा पानी पीना है। मैंने कहा कि भाई, आपने गलत जगह हाथ डाल दिया था। मशीन में दो टोंटी हैं। एक सही सलामत है- उसमें खदकता हुआ पानी है और जो टोंटी टूटी हुई है- उसमें है हिमालय जैसा ठण्डा पानी। इस घटना से जन्म हुआ- निर्दयी नीरज से सावधान रहना
पानी पी-पाकर बोले कि श्रीखण्ड महादेव चलते हैं। इधर मैं कभी नकारात्मक नहीं सोचता हूं। तुरन्त हां। जुलाई के मध्य में चलना तय हो गया। साथ ही यह भी तय हुआ कि दिल्ली से जांव तक सारी यात्रा मोटरसाइकिल से होगी। इधर मैं मोटरसाइकिल के मामले में कतई अनाडी हूं। आज तक इस मशीन का हैण्डल तक पकडकर नहीं देखा कि कैसा होता है। कभी पीछे बैठने का मौका भी मिलता है तो बैठता बाद में हूं पहले पाइप पकड लेता हूं- सबसे पीछे वाला। बैठने के बाद जब अच्छी तरह कॉन्फिडेण्ट हो जाता हूं तो ड्राइवर से धीरे से कहता हूं कि चल।
साथ ही संदीप ने यह प्रस्ताव भी रखा कि जाना तो सीधे होगा लेकिन वापसी तिरछी होगी। तिरछी मतलब सीधे रास्ते से नहीं बल्कि रामपुर- रोहडू- आराकोट- त्यूनी- चकराता- कालसी- देहरादून होते हुए। इस रास्ते में आराकोट में हम हिमाचल से उत्तराखण्ड में प्रवेश करेंगे। अपनी तरफ से इस पर भी मुहर लग गई।
इधर मैं भी सोच रहा हूं कि एक चीज और घुसेड दूं। वैसे इस बारे में अभी तक संदीप से बात नहीं हुई है। लेकिन पूरी उम्मीद है कि संदीप मान जायेगा। वो ये कि सैंज से कुल्लू वाली सडक पकडकर पचासेक किलोमीटर चढकर जलोडी पास तक पहुंचना। पास से कुछ ही दूरी पर एक झील भी है- सेरोलसर झील। नजदीक ही एक किला भी है। पास से सेरोलसर तक पैदल रास्ता है। इससे हमें ऊंचाई पर मोटरसाइकिल से उतरकर पैदल चलने का भी मौका मिलेगा। यह पैदल यात्रा हमारे उस समय बहुत काम आयेगी जब हम श्रीखण्ड महादेव की यात्रा करेंगे।
अगर कोई और भी हमारे साथ जाना चाहता है तो जी स्वागत है। बस हमारी कुछ शर्तें हैं-
1. मोटरसाइकिल का इंतजाम खुद करना पडेगा। मेरी या संदीप की तरफ से कोई इंतजाम नहीं है और ना ही हम किसी तीसरे को अपने साथ बैठायेंगे।
2. जांव तक सडक मार्ग बना है तो जाहिर सी बात है कि बसें भी चलती होंगी। रामपुर से निरमण्ड होते हुए बागीपुल और जांव तक काफी बसें हैं। शिमला से रामपुर तक भी बहुत बसें चलती हैं।
3. श्रीखण्ड महादेव की समुद्र तल से ऊंचाई 5200 मीटर से भी अधिक है। मतलब कि अमरनाथ के रास्ते में पडने वाले महागुनस दर्रे (4200 मीटर) से बहुत ज्यादा। मैं भी अभी तक इतनी ऊंचाई पर नहीं चढा हूं। चलने से पहले इस बारे में भी सोच लेना। इसी पैदल चढाई के बारे में सोचकर दो यात्री- अमरनाथ वाला मनदीप और ललित शर्मा मोटरसाइकिल से जाने की हिम्मत रखते हुए भी मना कर चुके हैं।
4. कोई कुछ भी खाता-पीता हो, मुझे कोई दिक्कत नहीं है। हां, संदीप चाय समेत हर नशे से दूर रहता है इसलिये उसकी राय भी ले लेनी चाहिये।
5. और कोई शर्त तो अभी याद नहीं आ रही है। हां, बढिया वाला रेनकोट जरूर रखना होगा चाहे कुछ और कपडे हों या ना हों।
6. और आखिर में सबसे बडी शर्त- यात्रा का पैदल रास्ता हम जैसे साधारण यात्रियों के लिये चार दिन का है। आना-जाना चार दिन। तो शर्त ये है कि पैदल रास्ते के बीच में कहीं भी कभी भी किसी भी हालत में चलने से मना नहीं करना है। चार दिन की जगह पांच दिन लग जायेंगे- कोई बात नहीं। मेरा मकसद किसी को डराना नहीं है- हकीकत से रूबरू कराना है। नया प्राणी सोचता है कि चलना ही तो है, चल लेंगे लेकिन वहां जाकर हकीकत अलग होती है जिसके बारे में पहले से सोचा नहीं जाता।
एक बात संदीप से भी। मैं खाने के मामले में बिल्कुल कमीना हूं। जब मन करेगा कोल्ड ड्रिंक पीऊंगा, जब मन करेगा चाय पीऊंगा, जब मन करेगा पकौडे खाऊंगा। कृपया मुझे खाने से रोकने की असफल कोशिश मत करना। इनके अलावा कुछ उल्टा-सीधा मैं खाता नहीं हूं। बस आपकी यही सहायता बहुत है।
और हां, आपकी काशी वाली पोस्ट पढकर पता चला है कि आप सुबह छह बजे तक टट्टी-पेशाब से सुलटकर नहा-धोकर चलने के लिये तैयार हो जाते हैं। इस मामले में मैं आपका घोर विरोधी हूं। हो सकता है कि आपकी सुबह पांच बजे ही उठ जाने की आदत हो, लेकिन मैं कभी तो चार बजे भी उठ जाता हूं और ज्यादातर दस बजे तक भी नहीं उठता। तो बस यही कहना है कि मुझे उठाने की असफल कोशिश करने में अपना दिमाग मत लगाना। कम से कम आठ बजे तक तो सोने ही देना। मेरी यह शर्त आपको माननी ही पडेगी।
श्रीखण्ड यात्रा पूरी हो चुकी है। इसे पढने के लिये यहां क्लिक करें

17 comments:

  1. वक्त व हालात के अनुसार अपनी शर्ते होती है,
    जो जायज कहलाती है, जबरदस्ती की नहीं।

    ऐसे भी इलाके है जहाँ के लिये पैदल यात्रा करने के लिये सुबह चार बजे भी निकलना होता है।

    नीम्बू पानी, व पकौडे तो मैं भी खा लूंगा, अगर मिले तो?

    एक बंदा और तैयार है जो रामपुर जाकर मिलेगा, नाम है विपिन गौर

    कुछ भी घुसेड दो घूमने के बारे में, सब लपेट लिया जायेगा,

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  2. महत्वपूर्ण जानकारी ||
    बहुत अच्छा लगा ||

    बधाई |

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  3. आप दोनों घूमकर आओ हम तो आपका यात्रा विवरण पढ़कर ही काम चला लेंगे :)

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  4. आओ यार आप दोनों घूम कर, फिर दोनों के ब्लॉग में नयी जानकारियां मिलेंगी...
    वैसे शर्तें कमाल की हैं :)

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  5. भाई नीरज, बहुत बढ़िया जानकारी...
    शर्तें तो कमाल की हैं... एक ghummakaad के लिए..
    वैसे कपड़ों, रेनकोट के साथ जूतों के बारें में भी बता दिया करो, क्योंकि पैदल ही चलना है सब जगह तो जुटे अछे होने चाहिए...
    हलकी कुँलिटी(रेबूक के) के जूतों का मैं भुक्तभोगी हूँ.

    बाकी यात्रा की ढेर सारी शुभकामनाएं ....

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  6. पैदल चलने वाली शर्त हटा दो तो हम भी साथ चलें :)

    प्रणाम

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  7. घुमक्कड़ी के आनन्द के आगे ये शर्तें कुछ नहीं हैं।

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  8. नीरज भाई आप श्री खंड महादेव जी घूमकर आओ फिर उपर वाले ने चाहा तो आपके साथ किसी अगली यात्रा में जरुर कोशिश करेंगे की हम आपके साथ जाने का सोभाग्य प्राप्त कर सकें आपको और संदीप भाई को मेरी शुभकामनाएं

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  9. कोई शर्त होती नहीं प्यार में.. मगर प्यार शर्तों पर तुने किया..


    मुझे ये शर्ते मंजूर नहीं और मैं तुम्हारे साथ नहीं चल रहा.. :)

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  10. मैं भी चलता मज़ा आता,लेकिन क्या करें भाई मजबूर हूँ . ऐसा लग रहा है तुम (दोनो जाट देव) उड़ते आजाद पंछी और मैं पिंजरे का.........

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  11. नीरज, साफगोई की प्रशंसा करनी ही पड़ेगी।
    ललितजी ने बताया था इस यात्रा के बारे मे।
    श्रीखंड़जी का ख्याल रखना :-)

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  12. तुम दोनों मुझे छोड़ कर जा रहे हो! मुझे जलन हो रही है.इतनी सुन्दर जगह (श्रीखंड महादेव) मैं भी चलता, अगर मेरी परीक्षाएं न होती तो ! मेरी शुभ कामनाएं 'दोनों जाटों' के साथ है!

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  13. एक भी फोटो नहीं !

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  14. एक नयी यात्रा पर चलने को हम तैयार बैठे हैं हम...लिखते चलो और फोटू दिखाते चलो...

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  15. गजब जाट शर्ते हैं यार, मोटर सायकिल के माणस सिर पै धर के ल्यावैगा।:)

    मैं बना रहा हूँ लम्बा टूर बाईक से ही। फ़ेर तु बिना मोटर सायकिल के ही आ जाना और मोटर सायकिल पे दिन-रात सोना।

    इसी का नाम है चलती का नाम गाड़ी चलते रहो, चलते रहो

    मिलते हैं शार्ट ब्रेक के बाद

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  16. are bhai jaat tu rahwe kit sa ?
    me to tera kendar janana chaun soon.

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  17. एक दिन दौडे-दौडे मेरे ऑफिस में आये। सांस फूल रही थी- बोले कि एक बात कहनी है। फिर रुक गये- पहले पानी पीऊंगा, प्यास लग रही है। मैंने बताया कि बाहर पानी की एक मशीन रखी है, जाओ और पी लो। गये और चिल्लाते-चिल्लाते हाथ मसलते वापस आ गये। क्या हुआ? अबे, यार मरवा दिया। इस मशीन में तो खदकता हुआ पानी है। इस गर्मी में मुझे ठण्डा पानी पीना है। मैंने कहा कि भाई, आपने गलत जगह हाथ डाल दिया था। मशीन में दो टोंटी हैं। एक सही सलामत है- उसमें खदकता हुआ पानी है और जो टोंटी टूटी हुई है- उसमें है हिमालय जैसा ठण्डा पानी। इस घटना से जन्म हुआ- निर्दयी नीरज से सावधान रहना।
    अब तो सभी सावधान हो चुके होंगे जो बचे हे उन्हें भी इस टिप्पणी को बार बार पढना चाहिए अच्छा आलेख हे

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