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Saturday, July 30, 2011

श्रीखण्ड यात्रा- नारकण्डा से जांव तक

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें
17 जुलाई रविवार की सुबह थी जब मुझे नारकण्डा में उठाया गया। चाय पी, कुछ ‘जरूरी’ कामों से सेवानिवृत्त होकर नहाकर आगे के सफर के लिये तैयार हो गये। मेरे अलावा जाट देवता के नाम से लिखने वाले सन्दीप पंवार, नितिन जाट और विपिन पण्डित जी महाराज भी थे। हम दिल्ली से ही बाइक पर निकले थे और शाम होने तक शिमला से करीब 60-70 किलोमीटर आगे नारकण्डा तक पहुंच गये थे। हमारा कल का पूरा दिन बाइक पर ही बीत गया था इसलिये पूरा शरीर अकड गया था। श्रीखण्ड महादेव की यात्रा शुरू करने से पहले इस अकडन को खत्म करना जरूरी था इसीलिये जलोडी जोत (JALORI PASS) का कार्यक्रम भी रखा गया था। जलोडी का रास्ता नारकण्डा से 35 किलोमीटर आगे सैंज नामक गांव से अलग होता है। यही रास्ता जलोडी जोत को पार करके आगे कुल्लू चला जाता है। जलोडी जोत का यात्रा विवरण बाद में दिया जायेगा।

Tuesday, July 26, 2011

श्रीखण्ड महादेव यात्रा

16 जुलाई का दिन कुछ खास था। हमेशा की तरह नाइट ड्यूटी की और संदीप के साथ निकल लिया श्रीखण्ड अभियान पर। श्रीखण्ड महादेव हिमाचल प्रदेश में शिमला से करीब दो सौ किलोमीटर आगे 5200 मीटर से भी ज्यादा ऊंचाई पर है। 5200 मीटर कोई हंसी मजाक नहीं है, शिमला खुद करीब 2200 मीटर पर है। उधर शिमला से सौ किलोमीटर आगे रामपुर जोकि सतलुज किनारे बसा है 1000 मीटर पर भी नहीं है। श्रीखण्ड का रास्ता रामपुर बुशैहर से ही जाता है। रामपुर से निरमण्ड, बागीपुल और आखिर में जांव। जांव से पैदल यात्रा शुरू होती है, जांव 1900 मीटर की ऊंचाई पर बसा है। अब अंदाजा लगाया जा सकता है कि जांव से करीब 35 किलोमीटर दूर श्रीखण्ड महादेव तक कैसी चढाई रही होगी।
लोगबाग अमरनाथ जाते हैं तो सालों तक अपनी बहादुरी की मिसाल देते रहते हैं कि अमरनाथ जा चुका हूं। क्योंकि कैलाश मानसरोवर के बाद इसी यात्रा को सबसे कठिन माना जाता है। लेकिन जब मैं श्रीखण्ड गया तो पता चला कि अमरनाथ यात्रा की कठिनाईयां इसके आगे कुछ भी नहीं हैं। अमरनाथ यात्रा में सबसे कठिन चढाई पिस्सूटॉप की मानी जाती है अगर सीधे शॉट कट से चढा जाये, खच्चरों के लिये बढिया ठीक-ठाक चौडा रास्ता बना है। इस पर चलें तो ज्यादा मुश्किलें नहीं आतीं। उधर श्रीखण्ड की पूरी चढाई ही ‘पिस्सूटॉप का बाप’ कही जा सकती है- 35 किलोमीटर की चढाई। और रास्ता भी ऐसा कि खच्चर-घोडे चल ही नहीं सकते।

Friday, July 15, 2011

सात कैलाश हैं हिमालय में

सावन का महीना शुरू हो गया है। जिस तरह फरवरी मार्च में फागुन का नशा होता है उसी तरह इस मौसम में सावन का नशा होता है। मैं अपनी बात कर रहूं, किसी और की नहीं। इसका कारण हैं शिवजी। शिवजी का महीना होता है यह। कांवड यात्रा से लेकर कैलाश मानसरोवर यात्रा तक इसी महीने में होती हैं। मैं भी हरिद्वार से मेरठ तक 150 किलोमीटर की दूरी पैदल तय करके पांच बार कांवड ला चुका हूं। पूरे साल किसी भगवान का नाम नहीं लेता हूं, किसी की पूजा नहीं करता हूं लेकिन पता नहीं सावन में क्या होता है कि मन अपने आप ही कहने लगता है कि चल भोले के द्वार।

Wednesday, July 13, 2011

जोधपुर- मुनाबाव रेल लाइन

बात पिछले साल अक्टूबर की है। अपनी रेल यात्राओं के सिलसिले को आगे बढाते हुए मैं जोधपुर पहुंच गया। वैसे मुझे जोधपुर में कोई काम था भी नहीं बस जैसलमेर और मुनाबाव तक की लाइनों पर पैसेंजर ट्रेन में घूमना था। जैसलमेर की कहानी फिर कभी सुनाई जायेगी, आज मुनाबाव चलते हैं।
जहां तक मुझे जानकारी है, कुछ साल पहले तक पूरे राजस्थान में मीटर गेज लाइनों का जाल बिछा हुआ था। यहां तक कि राजस्थान के बिल्कुल बीचोंबीच से गुजरने वाली दिल्ली- जयपुर- अजमेर- अहमदाबाद लाइन भी मीटर गेज ही थी। जोधपुर भी पूरी तरह मीटर गेज स्टेशन ही था। आजादी से पहले एक मीटर गेज लाइन यहां से बाडमेर होते हुए हैदराबाद जाती थी। यह हैदराबाद आज पाकिस्तान में है। भारत में किन्हीं भी दो स्टेशनों के नाम एक जैसे नहीं रखे जाते। यही कारण है कि आज आंध्र प्रदेश में जो हैदराबाद है उसके स्टेशन का नाम हैदराबाद डेक्कन है। जबकि 'हैदराबाद' पाकिस्तान में चले गये हैदराबाद का है।

Sunday, July 10, 2011

हैदराबाद से दिल्ली- एक रोमांटिक रेलयात्रा

बात तीन साल पुरानी है। तब तक मैं गुडगांव में लगी-लगाई नौकरी छोड चुका था, हरिद्वार की तरफ मुंह उठ चुका था लेकिन कुल मिलाकर बेरोजगार ही था। उन दिनों मेरा बस एक ही सपना था- सरकारी नौकरी वो भी केवल रेलवे में। उसी सिलसिले में हैदराबाद जाना हुआ। जाने की पूरी कहानी आप यहां क्लिक करके पढ सकते हैं। अब वहां से वापस आने का बखत हो गया है। तो चलो, ऐसा करते हैं कि वापस आ जाते हैं।
23 जून 2008 की बात है। सिकंदराबाद के स्टेशन से शाम पांच बजे के आसपास आंध्र प्रदेश सम्पर्क क्रान्ति चलती है दिल्ली के लिये। मेरा इसी गाडी में रिजर्वेशन था- कन्फर्म था। बर्थ नम्बर थी- 67 जो स्लीपर के डिब्बों में सबसे ऊपर वाली होती है। यह मेरी मनपसन्द बर्थ होती है। कारण यह कि सफर चाहे दिन का हो या रात का, हमेशा सोते रहने का विकल्प खुला रहता है। नीचे वाली बर्थों पर दिन में यह ऑप्शन खत्म हो जाता है।

Wednesday, July 6, 2011

लखनऊ से बरेली मीटरगेज ट्रेन यात्रा

मुझे नई-नई रेलवे लाइनों पर घूमने का शौक है। करता ये हूं कि किसी भी लाइन पर सुबह को चलने वाली पैसेंजर गाडी पकड लेता हूं और बैठा रहता हूं, बैठा रहता हूं। 300 किलोमीटर तो आराम से कवर हो ही जाता है। कम से कम 50 नये स्टेशन भी हाथ लगते हैं। इनकी ऊंचाई लिख लेता हूं और फोटो तो खींचता ही हूं। इस साल का मकसद है कि छोटी लाइनों यानी मीटर और नैरो गेज को रौंदना। भारतीय रेलवे का मकसद है कि जितनी भी छोटी लाइनें है, सभी को बडा बनाना है, सिर्फ पांच लाइनों को छोडकर- कालका-शिमला, कांगडा रेल, दार्जीलिंग रेल, ऊटी रेल और मथेरान वाली रेल। जिस दिन मैंने यह खबर पढी, तभी से प्रतिज्ञा कर ली कि इनके बडे बनने से पहले ही इन्हें देख लेना है, इनपर घूम लेना है।
पिछले करीब दो महीनों से मैं मानसून की बाट देख रहा था। भयानक गर्मी में दिनभर ट्रेन में बैठे-बैठे लू और धूल कतई बर्दाश्त नहीं है। हमेशा की तरह दिक्कत आयी कि कौन सी लाइन रौंदनी है। दिमाग में दो लाइनें थीं- राजस्थान में जयपुर-सीकर-चुरू और सीकर-लोहारू तथा दूसरी यूपी में ऐशबाग-मैलानी-बरेली। ऐशबाग लखनऊ के बिल्कुल पास है, लखनऊ में ही है। कार्यक्रम बना कि किसी तरह शाम तक जयपुर/लखनऊ पहुंच जाना है, रात भर स्टेशन पर ही सोना है, फिर सुबह को ट्रेन पकड लेनी है। शाम तक बरेली/लोहारू आ जाना है और रात होने तक दिल्ली। लेकिन आखिरी क्षणों तक यह तय नहीं कर पाया कि जाऊं कहां।