Buy My Book

Saturday, May 7, 2011

केदारनाथ में बर्फ और वापस गौरीकुण्ड

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें
20 अप्रैल 2011 की सुबह गुप्तकाशी से चलकर दोपहर ढाई तीन बजे तक हम केदारनाथ पहुंच गये थे। हमें क्या पता था कि वहां इतनी बर्फ मिलेगी कि मन्दिर तक पहुंचने के भी लाले पड जायेंगे। हमारा कार्यक्रम वासुकी ताल जाने का भी था- या तो आज ही जाते या फिर कल सुबह। दसियों फीट बर्फ में वासुकी ताल जाना हमारे लिये बिल्कुल असम्भव बात थी। उधर सिद्धान्त का इरादा आज ही वासुकी ताल भी देखकर वापस गौरीकुण्ड पहुंच जाने का था। मैं उसके इस इरादे के खिलाफ था क्योंकि ऐसा करने से सबसे पहली बात कि हम भयंकर रूप से थक जाते, दूसरी बात हमारे पास एक दिन और बढ जाता। उस एक दिन में हम कहां जाते- यह भी सोचना पडता।

खैर, मन्दिर के सामने खडे होकर जब हम फोटो खींच रहे थे, तभी बर्फबारी शुरू हो गई। आज जिंदगी में पहली बार बर्फबारी देखी थी। हवा में तैरती हुई रुई सी नन्हीं-नन्हीं बर्फ। मन्दिर प्रांगण में कुछ लोग बर्फ हटाने का काम कर रहे थे। मैंने उनसे पूछा कि यहां रुकने का कुछ हो जायेगा। बोले कि नहीं, क्योंकि रजाई सीमित हैं। मैंने सिद्धान्त से कहा कि ये लोग तो मना कर रहे हैं, लेकिन हम केदारनाथ में आराम से रुक सकते हैं। बोला कि कैसे। आ चल। वापस चलते हैं, बताऊंगा। रास्ते में एक ऐसा होटल था जिसकी ढलावदार छत भारी बर्फ की वजह से टूट गई थी। छत ने जब सामने की लकडी की दीवार पर दबाव डाला तो वह भी गिर गई। कुल मिलाकर कोई भी उस होटल में आराम से अन्दर जा सकता था। भीतर दुनिया भर की रजाईयां तह लगी रखी भी थीं। देख, हम यहां रुक सकते हैं। खाने को हमारे पास चने हैं ही। चाहे जितनी रजाईयां बिछानी हों, बिछाओ; जितनी ओढनी हों, ओढो। बोला कि यहां लाइट नहीं है। सिद्धान्त को किसी नई जगह पर अंधेरे से डर लगता है। गुप्तकाशी में भी उसने पूरी रात कमरे की लाइट जलाए रखी थी। फिर कहने लगा कि यहां रुकना सुरक्षित नहीं है। मैंने पूछा कि कैसे। बोला कि भालू-भूलू आ सकते हैं। मैंने कहा कि नहीं, इस समय केदारनाथ के आसपास भी भालू नहीं हैं। वे बर्फ से नीचे जंगलों में हैं। रात को उनका यहां दस फीट बर्फ पर आना असम्भव है। खैर, सिद्धान्त नहीं माना।

वासुकी ताल का बन्द रास्ता देखकर सिद्धान्त पहले तो उदास हुआ था। बोला कि असली चीज तो रह ही जायेगी। मैंने कहा कि भाई, यहां इतनी बर्फ है, यह क्या कम है। पता नहीं अपनी जिंदगी में हम कभी केदारनाथ में इतनी बर्फ देख पायेंगे या नहीं। फिर सिद्धान्त खुश भी हो गया- आठ दूनी सोलह किलोमीटर चलने में जो समय लगता, वो बच गया। अब हम आराम से नीचे गौरीकुण्ड जा सकते हैं। केदारनाथ से वासुकी ताल आठ किलोमीटर है। उसके नीचे वापस जाने के उतावलेपन का एक कारण था- घर पर फोन करना। वो घरवालों से देहरादून जाने की बात कहके आया था ना कि केदारनाथ जाने की। उसे रोजाना शाम को अपनी सलामती की खबर देनी होती थी। अभी चूंकि यात्रा सीजन शुरू नहीं हुआ है, इसलिये केदारनाथ में नेटवर्क नहीं है। गौरीकुण्ड में एकाध कम्पनी का नेटवर्क है। मतलब साफ है कि उसे आज शाम हर हाल में गौरीकुण्ड में ही बितानी पडेगी। यह बात उसने मुझे पहले नहीं बताई थी।

मेरी इच्छा ऊपर ही रात गुजारने की थी। सिद्धान्त के वापस जाने के फैसले से मैं कुछ देर तक तो किंकर्तव्यविमूढ सा बना रहा लेकिन जल्दी ही मैंने भी अपना फैसला सुना दिया- मैं यही रुकूंगा। उस टूटे होटल में न सही, दो किलोमीटर नीचे गरुड चट्टी में साधुओं के आश्रम में। इसकी असल वजह यह थी कि मैं घूमने के साथ-साथ फोटो खींचने भी जाता हूं। इस इलाके में दोपहर बाद मौसम अक्सर खराब हो जाता है। सुबह को मौसम बिल्कुल ठीक रहता है। सुबह बर्फ से लदे पहाडों के मस्त फोटो आयेंगे। मैंने उससे कहा कि तू फटाफट चला जा। अगर गुप्तकाशी की बस मिल जाये तो गुप्तकाशी चले जाना और उसी कल वाले होटल में रुक जाना। मैं दोपहर तक आ जाऊंगा। अगर गुप्तकाशी की बस ना मिली तो गौरीकुण्ड में ही रुक जाना। मैं दोपहर तक नीचे पहुंच जाऊंगा। उसी होटल में मिलेंगे जिसमें सुबह मैगी खाई थी। सिद्धान्त मैराथन धावक है, चलने-फिरने-दौडने में कभी थकान महसूस नहीं करता। वही केदारनाथ से ही दौड लगानी शुरू कर दी।

मैं अकेला हो गया था। तीन साढे तीन का टाइम था। मुझे दो किलोमीटर ही तो जाना था। आराम से फोटो खींचता रहा और चलता रहा। रास्ते में एक नेपाली मजदूर मिला, वो बर्फ काटकर रास्ता बना रहा था। उसके तीन साथी वापस जा चुके थे। मुझे भी जाते देख वो साथ हो लिया। उसने बताया कि हम कई दिन से बर्फ काटकर रास्ता बना रहे हैं, अभी कई दिन और लगेंगे। आखिर में रहने-खाने के कट-कुटाकर करीब तीन सौ रुपये हाथ में आयेंगे। उसने दिल्ली में नौकरी लगवाने की भी गुजारिश की। मैंने कहा कि भाई, जितने भी हाथ में आ रहे हैं, उसी से तसल्ली कर लो। यहां जब रास्ता बन जायेगा तो तुरन्त ही दूसरा काम मिल जायेगा। दिल्ली में आमदनी से ज्यादा अकेला कमरे का किराया ही होता है।

गरुड चट्टी पहुंचे। भयंकर भूख लग रही थी। जाते समय सिद्धान्त कुछ चने और किशमिश-बादाम दे गया था। और सुबह जरा सी मैगी के अलावा कुछ खास खाया भी नहीं था। फिर लगातार 14 किलोमीटर की चढाई। कुल मिलाकर हालत जितनी खराब हो सकती थी, बस जरा सी कम खराब थी। रास्ते में धरी एक बेंच पर बैठ गया। पानी पीया, कुछ चने खाये और बैठा रहा। आधे घण्टे तक ऐसे ही बैठा रहा। बडा सुकून मिला। सुबह से लगातार चलने पर था वो भी सिद्धान्त के साथ। अब कहीं जाकर अपनी सरकार आई है। अपना स्टाइल यही है कि मजे से मजे लेते-लेते चलो।

चने खाकर कुछ पेट पूजा सी हुई। बैठने से शरीर को भी आराम मिला- कुछ थकान भी कम हुई। नतीजा यह हुआ कि आज यहां आश्रम में रुकना कैंसिल। सिद्धान्त वाली राह पकडी और सीधा साढे छह बजे गौरीकुण्ड पहुंचकर ही दम लिया। इस बारह किलोमीटर को दो घण्टे में नाप दिया। चने जेब में डाल रखे थे, खाता खाता चलता रहा। गौरीकुण्ड के बस अड्डे पर पहुंचकर पता चला कि गुप्तकाशी की आखिरी जीप अभी अभी निकली है। यानी आज गौरीकुण्ड में ही रुकना पडेगा। दूसरी बात, यह भी साफ हो गया कि सिद्धान्त गुप्तकाशी पहुंच गया होगा। अभी भी हमारे पास तीन दिन थे। बस अड्डे पर ही तय कर लिया कि सुबह जोशीमठ के लिये निकल चलेंगे। सुबह पांच बजे वाली बस से निकलना तय हुआ। छह साढे छह बजे तक गुप्तकाशी पहुंच कर आधे घण्टे में सिद्धान्त को तैयार करके वहां से सात बजे गोपेश्वर जाने वाली बस पकडनी है।

मैंने गौरीकुण्ड में 150 रुपये में एक कमरा ले लिया। कमरा बिल्कुल शाही था। मंदाकिनी के किनारे। खाना खाने उसी एकमात्र होटल में चला गया। आईपीएल का मैच चल रहा था। भीड थी। होटल वाले ने कहा कि मैच खत्म होने के बाद खाना दूंगा। खैर, आठ बजे तक मैच खत्म हो गया। तभी किसी ने कंधे पर हाथ रखा और आवाज आई- नीरज? तुम यहां? वो सिद्धान्त था। गौरीकुण्ड आने पर जब उसकी घरवालों से बात हो गई तो वो गुप्तकाशी जाना भूल गया। सोचा कि कल जब मैं यहां से गुजरूंगा तो साथ हो लेंगे। उसने कमरा ले लिया था और एक घण्टे की नींद भी खींच चुका था। मैं तुरन्त अपने कमरे वाले के यहां गया तो पता चला कि वो अपने घर जा चुका है। रात थी, अंधेरा था। और हां, एक मजेदार बात तो रह ही गई। सिद्धान्त ने जो कमरा लिया था, वो मेरे कमरे के बिल्कुल बराबर वाला था- एक ही होटल में।

यहां पर हालांकि 150 रुपये ज्यादा लग गये लेकिन फायदा यह हुआ कि हम समय रहते मिल गये। नहीं तो मैं सुबह पांच वाली बस पकडकर गुप्तकाशी चला जाता और सिद्धान्त आराम से उठकर मेरी प्रतीक्षा करता। कल का पूरा दिन खराब होता। सिद्धान्त ने बताया कि वह पूरी तेजी से वापस आ रहा था तो एक जगह पर गिर पडा और घुटना चोटिल हो गया। मैंने उससे कल के बारे में पूछा तो बोला कि भाड में जाये कल का दिन, आज तसल्ली से सोना है। मैं तुरन्त सहमत हो गया।



केदारनाथ में दस फीट तक बर्फ थी।






ये हैं केदारनाथ के आसपास के होटल। कपाट बन्द होने के कारण पूरे जाडों भर यहां कोई आदमजात नहीं होती। जमकर बर्फ पडती है, तो कोई हटाता भी नहीं है।




अब हमने वापसी की राह पकड ली। यहां पंद्रह बीस मिनट के लिये धूप निकली थी और चेहरे की चमडी जल गई थी।




यहां से सिद्धान्त को विदा कर दिया। सिद्धान्त जाता दिख रहा है।












यह है गरुड चट्टी में साधुओं का आश्रम।






घोडे और कण्डी के रेट। ये रेट पिछले साल के हैं, हो सकता है कि इस साल कुछ बदलाव हो जायें।




गौरीकुण्ड के पास से बहती मंदाकिनी

अगला भाग: त्रियुगी नारायण मन्दिर- शिव पार्वती का विवाह मण्डप


केदारनाथ तुंगनाथ यात्रा
1. केदारनाथ यात्रा
2. केदारनाथ यात्रा- गुप्तकाशी से रामबाडा
3. केदारनाथ में दस फीट बर्फ
4. केदारनाथ में बर्फ और वापस गौरीकुण्ड
5. त्रियुगी नारायण मन्दिर- शिव पार्वती का विवाह मण्डप
6. तुंगनाथ यात्रा
7. चन्द्रशिला और तुंगनाथ में बर्फबारी
8. तुंगनाथ से वापसी भी कम मजेदार नहीं
9. केदारनाथ-तुंगनाथ का कुल खर्चा- 1600 रुपये

23 comments:

  1. bahut shaandaar sansmaran... is post ko khatam nahi hone dena chahti thi. laga badi jaldi khatam ho gayi..

    ReplyDelete
  2. तो गुप्तकाशी से फ़िर आगे पैदल जाना पड़ता है क्या ?

    और २ घंटे में १२ किलोमीटर वह भी पहाड़ी इलाके में आपकी फ़िटनेस भी काफ़ी अच्छी है फ़िर तो... :) आप बताते रहिये और हमें जब भी समय मिलेगा हम भी घुमक्कड़ी करने निकल पड़ेंगे आपके बताये रास्ते पर ...

    ReplyDelete
  3. मैंने गुप्तकाशी में 150 रुपये में एक कमरा ले लिया.
    yeh shayad Gaurikund hai.. baakiaapki marji, aap jahaan tuko....
    Hum to bas aapke ghummkaadi ke diwane hain......

    ReplyDelete
  4. भाई, केदारनाथ तो हम भी गए हैं वह भी पाँच बार। किन्तु हर बार जून माह में ही जाना हुआ इसलिए बर्फ तो दूर में दिखाई पड़ा, नजदीक नहीं। आपके पोस्ट के चित्रों में बर्फ देखकर इच्छा हो रही है कि एक बार मई माह में पुनः केदारनाथ जाया जाय।

    ReplyDelete
  5. बर्फ देख कर ही ठंड लग रही है।

    ReplyDelete
  6. बहुत सुंदर यात्रा, मजा आ गया, चित्र एक से बढ कर एक, नीरज भाई एक बात आप को मालूम हे कि यह बर्फ़ भी कई प्रकार की होती हे? जो आप देख कर आये हे,अगर पता हो तो जरुर बतलाये, इस का पता इस बर्फ़ को हाथ मे लेने से ही चलता हे, अगर किसी को भी पता हो तो जरुर बतलाये...

    ReplyDelete
  7. ५-६ साल पहले हम भी मई के महीने में ही गए थे पर बर्फ न के बराबर थी|

    ReplyDelete
  8. विवेक रस्तोगी जी,
    गुप्तकाशी से लगभग 35-40 किलोमीटर आगे गौरीकुण्ड है। गौरीकुण्ड तक पक्की सडक बनी है। बसें और जीपें भी चलती हैं।
    गौरीकुण्ड से आगे 14 किलोमीटर केदारनाथ है जोकि पैदल है।
    और 2 घण्टे में 12 किलोमीटर पहाड से नीचे उतरना कोई मुश्किल नहीं है। यह आराम से हो जाता है।

    प्रकाश यादव जी,
    आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं। यह गौरीकुण्ड ही है जो गलती से गुप्तकाशी लिखा गया था। इसे ठीक कर दिया गया है। धन्यवाद।

    अवधिया जी,
    इसी महीने चले जाओ। इस साल बहुत ज्यादा बर्फ गिरी है। आपको कई फीट बर्फ तो अभी भी मिल जायेगी। शायद वासुकी ताल का रास्ता भी ना खुला हो।

    भाटिया जी,
    मुझे बर्फ के बारे में कोई परख नहीं है। हां, मैंने अपनी सुविधा के हिसाब से इसकी दो कैटेगरी बना रखी हैं। ताजी भुरभुरी बर्फ और पुरानी ठोस बर्फ। ताजी बर्फ तो यही केदारनाथ में थी और ठोस बर्फ मुझे अमरनाथ में मिली थी।

    ReplyDelete
  9. चित्र देख कर बस ऐसा प्रतीत हो रहा है सचमुच हम भी वहीं कहीं बीच में है...बहुत बढ़िया यात्रा वर्णन..बहुत बहुत बधाई जो हम सब को घर बैठे दर्शन करा दिए आप..

    ReplyDelete
  10. बहुत सुंदर यात्रा, मजा आ गया

    ReplyDelete
  11. वाह नीरज ,इतनी बर्फ देख कर मुझे इस बोंबे में भी ठंड लग रही है --इन सुनसान रास्तो में केसे घूमते रहे --ऐसा लग रहा है जेसे पुराने फ्रिज में बर्फ जम जाती थी

    ReplyDelete
  12. गयो तो नहीं चलिए इसी से आनंद लेते हैं।
    बहुत बढ़िया।

    ReplyDelete
  13. Veerey Ghumte Raho..!
    August, September & October Mai Yadi Goumukh(Sundervan & Tapovan) Chalna Ho To Batlana..

    Luv u n Miss u
    Cheers
    Siddhant Chaudhary

    ReplyDelete
  14. वाह! क्या नज़ारा है.

    नीरज जी नमस्कार..

    ReplyDelete
  15. beautiful pics
    snow let it snow

    ReplyDelete
  16. यह सब देखकर ही ठंडी पड़ने लगी...भागो.


    _____________________________
    पाखी की दुनिया : आकाशवाणी पर भी गूंजेगी पाखी की मासूम बातें

    ReplyDelete
  17. Neeraj ji Mujhe Apse jalan hoti hai ki aap ko kya kam dham nahi hai jo keval ghummakkadi hi karate rahate hai.bahar hal mai bhi do bar kedarnath gay hu, par itani barf aap jaise himmatvalo ko hi nasib hoti hai.

    ReplyDelete
  18. अरसे बाद ब्‍लॉग पढ़ना शुरू किया हे आज ही कइ्र संस्‍मरण निपटाए.... इस संस्मरण ने सर से पांव तक ईर्ष्‍या से झुलसा दिया है... मौज काटे जाओ जाट भाई।

    ReplyDelete
  19. भाई आप के केदारनाथ के यात्रा व्रतान्त ने अन्दर तक
    रोमान्चित कर दिया कभी हमें भी अपने साथ घुमक्कडी करने का मौका दें लेख मे कन्ही भी एसा नही लगा की आप घूम रहे हो मुझे अनुभव हुआ कि सिद्धान्त की जगह मै आपके साथ हूं आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।

    ReplyDelete
  20. es baar muje bhi kedar dham jane ka mauka mila ....aur dekh kar bahut acha lag....lakin aapki yatra ko dekh kar lag rahe hai ...kedar dham may 1st week mai hi jana acha hai agar aap ko sundar nazare aur shaati chahiye...
    Th

    ReplyDelete
  21. mai v aap ki hi tarike ka ghum ne ka kafi soukin hu, but jada time hi nahi mil pata, but any way jitna v milega.. aap ki gume huye in sari place ko jaroor gumuga..

    ReplyDelete