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Saturday, April 30, 2011

केदारनाथ यात्रा- गुप्तकाशी से रामबाडा

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हमारी केदारनाथ की असली यात्रा गुप्तकाशी से शुरू होती है। तारीख थी 20 अप्रैल 2011। गुप्तकाशी से मैं और सिद्धान्त सुबह सवेरे ही जीप पकडकर गौरीकुण्ड के लिये निकल पडे। यहां गुप्तकाशी में एक मजेदार घटना घटी। चूंकि सिद्धान्त राष्ट्रीय लेवल का मैराथन धावक है और मुम्बई मैराथन में नौवें स्थान पर रहा था। तो सीधी सी बात है कि सेहत और फिटनेस के मामले में मुझसे मीलों आगे है। जब बात हिमालय के किसी भी हिस्से में पैदल चलने की हो तो यही बात बहुत मायने रखती है। अगर उसके अलावा कोई और होता तो मैं उस पर भारी पड जाता लेकिन आज मेरा साथी मुझ पर इक्कीस साबित हो रहा था। तो मैं भी सोच रहा था कि ऐसा कौन सा काम करूं कि मुझे थोडी बहुत बढत मिल सके। तभी एक मौका मिल गया। शाम जब उसने होटल के बाथरूम के पानी में हाथ डाला तो ठण्डा पानी देखकर उसके होश उड गये। बोला कि यार पानी बेहद ठण्डा है, आज पूरे दिन से सफर पर हैं, नहाये नहीं है। सुबह नहाना पडेगा। मैं तो बराबर में खाने वाले से गर्म पानी मंगवा लूंगा। यह सुनकर मेरा जाटत्व कुछ जागा। सोचा कि बेटा यही मौका है। खुद पानी में हाथ डाला, इधर भी होश उड गये। लेकिन फिर भी कहा कि अरे नहीं यार, कुछ ठण्डा वण्डा नहीं है। मैं तो इसी में नहाऊंगा। और जब सुबह को तडके तडक उसी पानी से नहाया तो आधे घण्टे तक सिर की सारी नसें सुन्न रहीं।

Tuesday, April 26, 2011

केदारनाथ यात्रा

हमारी केदारनाथ की यात्रा शुरू होती है गुप्तकाशी से। 19 अप्रैल की सुबह दिल्ली से चलकर मैं और सिद्धान्त शाम छह बजे तक गुप्तकाशी पहुंच गये थे। कुछ दिन पहले सिद्धान्त की मेल आई थी। पूछ रहे थे कि मेरे पास उत्तराखण्ड में घूमने के लिये पूरा एक महीना है, कैसे-कैसे घूमूं? मैंने उन्हें सबकुछ समझा दिया था। लेकिन जब मैंने खुद केदारनाथ जाने की योजना बनाई तो बन्दा भी तैयार हो गया।

मैंने रात को ड्यूटी की थी इसलिये हरिद्वार और आगे रुद्रप्रयाग तक सोते हुए गया। श्रीनगर तक तो मैं कई बार सफर कर चुका हूं, इसलिये अब इस रास्ते पर जाते हुए ऋषिकेश कूदते ही भयंकर बोरियत शुरू होने लगती है। पहाडी रास्ता है, सोने की कोशिश भी करता हूं तो कभी इधर लुढक जाता हूं कभी उधर। हरिद्वार में बस अड्डे से दो किलोमीटर पहले ऋषिकुल चौराहा है। दोनों वही उतर गए। यही वो जगह है जहां से एक सडक दिल्ली के लिये जाती है और दूसरी ऊपर पहाड के लिये। हमने सडक पार भी नहीं की थी कि गोपेश्वर की बस आ गई। चढ लिये। पीछे वाली सीटें ही खाली थीं।

Monday, April 18, 2011

दिल्ली परिक्रमा रेल

कुछ महीने पहले यह घोषणा हुई थी कि दिल्ली की परिक्रमा रेलवे पर सवारी गाडियों का परिचालन बन्द किया जायेगा क्योंकि इस पर सवारियां मिलती ही नहीं हैं। सारी की सारी गाडियां लगभग खाली ही दौडती है। और वीकएण्ड पर तो बिल्कुल खाली ही होती हैं। तो तय ये हुआ था कि सप्ताह में केवल पांच दिन ही परिचालन किया जायेगा। यह व्यवस्था तीन महीने के लिये की गई थी। नतीजे निराशाजनक हुए तो रिंग रेल पर सवारी गाडी चलानी बन्द कर दी जायेंगी।

यह खबर सुनकर मेरे भी कान खडे हो गये। सोचा कि अगर एक बार यह रूट बन्द हो गया तो हमेशा के लिये बन्द हो जायेगा। हालांकि मालगाडियां चलती रहेंगी। बस तभी से मैं इस कोशिश में लग गया कि मौका मिलते ही एक चक्कर लगाकर आऊंगा। मेरा मंगलवार को साप्ताहिक अवकाश रहता है। मतलब साफ है कि मंगलवार को मैं बडी आसानी से घूम लूंगा। यह मंशा मैंने जाटदेवता संदीप पंवार से कही। बन्दा तुरन्त तैयार हो गया। मंगलवार का दिन तय हो गया।

Thursday, April 14, 2011

सतपुडा नैरो गेज- बालाघाट से जबलपुर

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अभी तक आपने पढा होगा कि मैं सतपुडा इलाके में फैले नैरो गेज के जाल को देखने सबसे पहले छिंदवाडा पहुंचा। छिंदवाडा से नैरो गेज की गाडी में बैठकर शाम तक नैनपुर चला गया। अभी मेरे पास एक दिन और था। सोचा कि बालाघाट चला जाये, कल बालाघाट से जबलपुर खण्ड भी देख लेंगे। रात तीन बजे तक बालाघाट जा पहुंचे। यहां से पौने चार बजे एक डीएमयू (78810) चलती है गोंदिया के लिये। गोंदिया भी चले गये।

अब यहां से सफर शुरू होता है वापस जबलपुर का। गाडी नम्बर 78801 सुबह सवेरे सवा पांच बजे गोंदिया से चलकर पौने आठ बजे कटंगी पहुंचती है। यह बालाघाट होते हुए ही जाती है। अच्छा हां, यह रूट यानी गोंदिया से कटंगी तक बडी लाइन है। किसी जमाने में यहां भी नैरो गेज ही थी। लेकिन आमान परिवर्तन करके इसे बडी लाइन में बदल दिया गया है। कटंगी से आगे अभी ट्रेन नहीं जाती है।

Monday, April 4, 2011

सतपुडा नैरो गेज- छिंदवाडा से नैनपुर

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अभी पिछले दिनों अपना मूड बना सतपुडा नैरो गेज वाली लाइन देखने का। इस सिलसिले में अगर कोई और होता तो वो सीधा जबलपुर जाता। लेकिन इधर ठहरे टेढी खोपडी वाले, छिंदवाडा जा पहुंचे। छिंदवाडा से नैनपुर तक कई गाडियां चलती हैं, सारी की सारी पैसेंजर। मैं साढे बारह बजे चलने वाली गाडी (58853) में जा धरा। यह गाडी शाम को सात बजे नैनपुर पहुंचा देती है।

यह इलाका भारत का सबसे व्यस्त और घना नैरो गेज वाला इलाका है। यहां रेल लाइन की शुरूआत 1905 के आसपास हुई थी। यहां सतपुडा की पहाडियों का बोलबाला है। ये पहाडियां इस मार्ग पर सफर को और भी मजेदार बना देती है। आबादी बहुत कम है। हालांकि ट्रेन में भीड बहुत होती है। गाडी की रफ्तार भी कम ही रहती है। लोगों को तेज यातायात उपलब्ध कराने के लिये इस नैरो गेज को उखाडकर ब्रॉड गेज में बदला जायेगा। जबलपुर-बालाघाट खण्ड पर आमान-परिवर्तन का काम शुरू भी हो चुका है।

Friday, April 1, 2011

यात्रा सतपुडा नैरो गेज की- दिल्ली से छिंदवाडा

भारत में कुछ चीजें ऐसी हैं जो तेजी से विलुप्त हो रही हैं। इनमें सबसे ऊपर हैं- मीटर गेज और नैरो गेज वाली गाडियां। यूनीगेज प्रोजेक्ट के तहत सभी मीटर और नैरो गेज वाली लाइनों को ब्रॉड गेज में बदला जा रहा है (सिवाय कालका-शिमला, पठानकोट-जोगिन्दर नगर, दार्जीलिंग रेलवे, ऊटी रेलवे और मथेरान रेलवे को छोडकर)। मैं पहले भी लिख चुका हूं कि मुझे किसी भी लाइन पर पैसेंजर गाडी में बैठकर हर स्टेशन पर रुकना, उनकी ऊंचाई लिखना और फोटो खींचना अच्छा लगता है। हर महीने किसी ना किसी नई लाइन पर निकल ही जाता हूं। इस साल का लक्ष्य है इन्हीं विलुप्त हो रही लाइनों पर घूमना। यानी बची हुई मीटर और नैरो गेज वाली लाइनों को कवर करना। अगर ये लाइनें एक बार बन्द हो गईं तो सदा के लिये बन्द हो जायेंगी। फिर परिवर्तन पूरा हो जाने पर इन पर बडी गाडियां दौडा करेंगी। उसके बाद हमारे पास यह तो कहने को रहेगा कि हमने ‘उस’ जमाने में छोटी गाडियों में सफर किया था।