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Monday, July 26, 2010

अनछुआ प्राकृतिक सौन्दर्य – खीरगंगा

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हिमाचल प्रदेश में कुल्लू जिले में एक स्थान है- मणिकर्ण। मणिकर्ण से 15 किलोमीटर और आगे बरशैणी तक बस सेवा है। बरशैणी से भी एक-डेढ किलोमीटर आगे पुलगा गांव है जहां तक मोटरमार्ग है। इससे आगे भी गांव तो हैं लेकिन वहां जाने के लिये केवल पैरों का ही भरोसा है। पुलगा से दस किलोमीटर आगे खीरगंगा नामक स्थान है। खीरगंगा पार्वती नदी की घाटी में है। अगर पुलगा से ही पार्वती के साथ-साथ चलते जायें तो चार किलोमीटर पर इस घाटी का आखिरी गांव नकथान आता है। नकथान के बाद इस घाटी में कोई गांव नहीं है। हां, आबादी जरूर है। वो भी भेड-बकरी चराने वाले गद्दियों और कुछ साहसी घुमक्कडों की।

Wednesday, July 21, 2010

खीरगंगा - दुर्गम और रोमांचक

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पिछली बार पढा कि मणिकर्ण से खीरगंगा 25 किलोमीटर दूर है। 15 किलोमीटर दूर पुलगा तक तो बस सेवा है, आगे शेष 10 किलोमीटर पैदल चलना पडता है। पुलगा से तीन-साढे तीन किलोमीटर आगे नकथान गांव है, जो पार्वती घाटी का आखिरी गांव है। इसके बाद इस घाटी में कोई मानव बस्ती नहीं है।
नकथान से निकलते ही मैं एक काफिले के साथ हो लिया। उनमें सात-आठ जने थे। सभी के पास खोदने-काटने के औजार थे। यहां से आगे ज्यादा चढाई नहीं है। कुछ दूर ही रुद्रनाग है। यहां टेढी-मेढी चट्टानों से होकर पानी नीचे आता है यानी झरना है। यह जगह स्थानीय लोगों के लिये बेहद श्रद्धा की जगह है। देवता भी यहां दर्शन करने को आते हैं। इसका सम्बन्ध शेषनाग से जोडा जाता है। यह जगह बडी ही मनमोहक है। काफी बडा घास का मैदान भी है। पास में ही पार्वती नदी पर शानदार झरना भी है।

Monday, July 19, 2010

खीरगंगा ट्रैक - मणिकर्ण से नकथान

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उस दिन शाम को जब मैं मणिकर्ण में था, तो मेरे पास एक दिन और था। कोई लक्ष्य नहीं था कि कल जाना कहां है। अन्धेरा हो गया, एक धर्मशाला में कमरा ले लिया। तभी मुनीश जी का फोन आया। पूछने लगे कि कहां हो। अपन ने शान से बताया कि मणिकर्ण में हैं। बोले कि कल का क्या प्लान है? इधर कुछ हो तो बतायें भी। तब सुझाव मिला कि कल सोलांग घाटी चले जाओ। मनाली से दस-बारह किलोमीटर दूर है। मस्त जगह है। मुनीश जी ने तो फोन काट दिया लेकिन इधर दिमाग में हलचल होने लगी। प्लान बनने लगा कल सोलांग जाने का। अगर मुनीश जी दो घण्टे पहले बता देते तो मैं उसी समय कुल्लू चला आता। दो घण्टे लग जाते हैं मणिकर्ण से कुल्लू जाने में। यानी अब सुबह को जल्दी उठना पडेगा। इधर मेरी वो वाली बात है- “खा के सो जाओ, मार के भाग जाओ।” एक बार सो गया तो सुबह को जल्दी उठना भी महाभारत है। इसलिये सुबह पांच बजे का अलार्म भरा और दो रिमाइण्डर भरे।

Wednesday, July 14, 2010

मणिकर्ण में ठण्डी गुफा और गर्म गुफा

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मणिकर्ण में दो गुफाएं प्रसिद्ध हैं। एक तो है ठण्डी और दूसरी गर्म गुफा। ठण्डी गुफा मणिकर्ण से लगभग पांच किलोमीटर ऊपर है।
असल में हुआ ये कि कहीं सही सी जगह ढूंढता-ढूंढता मैं ठण्डी गुफा जाने वाले रास्ते के पास एक पत्थर पर बैठ गया। बाजार से गुजरते समय एक किताब खरीद ली थी- मणिकर्ण के बारे में। पत्थर पर बैठा बैठा किताब पढने लगा। उस समय मुझे ये नहीं पता था कि यह रास्ता जाता कहां है। कोई लम्बा-चौडा रास्ता नहीं था, बस ऐसे ही पगडण्डी सी बनी है। मैने गौर किया कि इस रास्ते से लोगों का आना-जाना लगा है। एक से पूछा तो उसने बताया कि यह रास्ता ठण्डी गुफा जाता है। कितनी दूर है? बस एक-डेढ किलोमीटर है। चलो, निकल चलो। चढना शुरू किया।

Wednesday, July 7, 2010

मणिकर्ण के नजारे

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6 जून, 2010 को दोपहर बारह बजे के करीब मैं कुल्लू से 45 किलोमीटर दूर मणिकर्ण पहुंच गया। कहते हैं कि एक बार माता पार्वती के कान की बाली (मणि) यहां गिर गयी थी और पानी में खो गयी। खूब खोज-खबर की गयी लेकिन मणि नहीं मिली। आखिरकार पता चला कि वह मणि पाताल लोक में शेषनाग के पास पहुंच गयी है। जब शेषनाग को इसकी जानकारी हुई तो उसने पाताल लोक से ही जोरदार फुफकार मारी और धरती के अन्दर से गरम जल फूट पडा। गरम जल के साथ ही मणि भी निकल पडी। आज भी मणिकरण में जगह-जगह गरम जल के सोते हैं।
एक कथा यह भी है कि गुरू नानक देव जी यहां आये थे। उन्होंने यहां काफी समय व्यतीत किया। अगर नानक यहां सच में आये थे तो उनकी हिम्मत की दाद देनी होगी। उस समय जाहिर सी बात है कि सडक तो थी नहीं। पहाड भी इतने खतरनाक हैं कि उन पर चढना मुश्किल है। नीचे पार्वती नदी बहती है, जो हिमालय की तेज बहती नदियों में गिनी जाती है। पहले आना-जाना नदियों के साथ-साथ होता था। इसलिये नानक देव जी पहले मण्डी आये होंगे, फिर ब्यास के साथ-साथ और दुर्गम होते चले गये। भून्तर पहुंचे होंगे। यहां से पार्वती नदी पकड ली और मणिकर्ण पहुंच गये। वाकई महान घुमक्कड थे नानक जी। उन्ही की स्मृति में एक गुरुद्वारा भी है।

Monday, July 5, 2010

कुल्लू से मणिकर्ण

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6 जून, रविवार। सुबह सोकर उठा तो काफी धूप चढ गयी थी। मैं कुल्लू में था। कल सोते समय सोचा था कि सुबह जल्दी उठकर मलाना जाऊंगा। इरादा था नग्गर की तरफ से चन्द्रखनी दर्रा पार करके मलाना पहुंचूंगा। हालांकि दर्रा पार करने में पूरा दिन भी लग सकता है। लेकिन जो होगा, देखा जायेगा। अगर मलाना भी नहीं पहुंच सका, तो चन्द्रखनी दर्रा देखकर ही आ जाऊंगा। सुबह पांच बजे ही निकल पडूंगा। लेकिन सारे के सारे अन्दाजे और वादे धरे के धरे रह गये। आठ बजे के बाद आंख खुली। मलाना फिर कभी।

अभी भी मेरे पास दो दिन थे। एक विकल्प था मनाली जाने का और रोहतांग देखने का। फिर सोचा कि कभी दोस्तों के साथ ही मनाली जाऊंगा। मनाली आने के लिये सभी दोस्त तुरन्त तैयार हो जायेंगे। दूसरा विकल्प था मणिकर्ण जाने का। नहाये धोये, कपडे पहने, बस अड्डे पर दो-तीन परांठे खाये और निकल पडे मणिकर्ण की ओर। मणिकर्ण जाने के लिये कुल्लू से वापस भून्तर आना पडता है। भून्तर में ब्यास-पार्वती संगम पर पुल पार करके बायें मुडकर मणिकर्ण के लिये सडक जाती है।