Friday, April 30, 2010

जाट पहेली- 1 (पातालपानी)

पिछली पोस्ट: तीन धर्मों की त्रिवेणी- रिवालसर झील

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सभी को यह जानकर अति हर्ष होगा कि जाट पहेली को पुनर्जीवित किया जा रहा है। इससे पहले मुसाफिर जाट की पहेली की आठ किश्तें छप चुकी है, लेकिन समय अभाव की वजह से बन्द करनी पड गई थी।

इस नये संस्करण मे पुराने संस्करण के मुकाबले कुछ बदलाव किये जा रहे हैं। पुराने संस्करण में हम एक प्रश्न पूछते थे, इस बार एक चित्र दिखाया जायेगा। आपको उस चित्र के बारे में बताना है।

तो आओ, शुरू करते हैं जाट पहेली के फेज टू को:

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ऊपर दिखाये गये चित्र को देखिये और नीचे लिखे तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिये:

1. यह रेलवे स्टेशन किस लाइन पर स्थित है? – (50,49,48,… अंक)

2. किस राज्य के किस जिले में स्थित है? - (10+10 अंक)

3. इसके बारे में कोई और जानकारी देने पर। –(30 अंक)

जिन्हे उपरोक्त प्रश्नों में से कोई भी उत्तर नहीं पता है तो मायूस ना हों, आपको भी टिप्पणी करते ही 5 अंकों का पुरस्कार दिया जायेगा।

यह पहेली केवल मनोरंजन और थोडे बहुत ज्ञानवर्धन के लिये है। इसके विजेता बनने पर आपको मेरी तरफ से शाबासी दी जायेगी और आपके ब्लॉग का लिंक अगले शुक्रवार को हमारे यहां आपके फोटू सहित छापा जायेगा।
इसके जवाब देने की अन्तिम तिथि 2 मई 2010 के सुबह के आठ बजे तक है। उपरोक्त तिथि के बाद प्राप्त होने वाले जवाबों पर गौर नहीं किया जायेगा और उन्हें कोई अंक नहीं दिया जायेगा।


उत्तर के लिये यहां क्लिक करें
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Wednesday, April 28, 2010

तीन धर्मों की त्रिवेणी – रिवालसर झील

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हिमाचल प्रदेश के मण्डी जिले में मण्डी से लगभग 25 किलोमीटर दूर एक झील है – रिवालसर झील। यह चारों ओर पहाडों से घिरी एक छोटी सी खूबसूरत झील है। इसकी हिन्दुओं, सिक्खों और बौद्धों के लिये बडी ही महिमा है। महिमा बाद में सुनायेंगे, पहले वहां पहुंचने का इन्तजाम कर लें। भारत की राजधानी है नई दिल्ली। यहां से लगभग 250 किलोमीटर दूर एक खूबसूरत शहर है – हरियाणा-पंजाब की राजधानी भी है यह – चण्डीगढ। इसे हिमाचल का प्रवेश द्वार भी कह सकते हैं। यहां से शिमला, कांगडा और मनाली की बसें तो जाते ही मिल जाती हैं। मनाली वाले रास्ते पर स्थित है प्रसिद्ध नगर मण्डी। मण्डी से कुछ पहले नेर चौक पडता है। मण्डी और नेर चौक दोनों जगहों से ही रिवालसर की बसें बडी आसानी से मिल जाती हैं। इसका एक नाम पद्मसम्भव भी है।

कहते हैं कि बौद्धों के महान तान्त्रिक और गुरू पद्मसम्भव यहां से तिब्बत गये थे। यहां के एक गोम्पा में उनकी मूर्ति है। इस मन्दिर का बाहरी हिस्सा तिब्बती शैली में बना है। एक और किस्सा यह है कि गुरू पद्मसम्भव साधना के लिये यहां आये थे। तत्कालीन मण्डी नरेश की पुत्री उनकी शिष्या बनी और बाद में पत्नी भी। राजा ने इसे अपमान समझा और पद्मसम्भव को जला देने का हुक्म दे दिया। लेकिन आग की लपटें जलरूप में बदल कर झील बन गयी। इसी झील का नाम हुआ पद्मसम्भव।

रिवालसर का एक सम्बन्ध लोमश ऋषि से भी जुडा है। उन्हे एक तपस्या स्थल की खोज थी, जो उन्हे यहां मिला। झील के किनारे ही उनका मन्दिर है। साथ में एक शिवालय और कृष्ण मन्दिर भी है। सिक्ख धर्म से भी इसका महत्व जुडा हुआ है। सिक्खों के दसवें गुरू गोविन्द सिंह हिमाचल प्रवास के दौरान 1758 में यहां आये थे। उन्होनें मुगल सम्राट औरंगजेब से टक्कर लेने के लिये और जीतने के लिये गुरू पद्मसम्भव से आशिर्वाद लिया था। मैं इस यात्रा में उस ऐतिहासिक गुरुद्वारे में नहीं जा सका।

मैने चण्डीगढ से रात को बारह बजे मण्डी डिपो की बस पकडी। उसने केवल साढे चार घण्टे में ही मुझे मण्डी में फेंक दिया। पूरा मण्डी सोया पडा था। सुबह-सुबह की ठण्ड थी, इसलिये चादर ओढनी पडी। सामने ही एक चायवाले की दुकान खुली थी, लगातार दो कप चाय पी। वहीं बैठे बैठे सात बजा दिये। अब इरादा था पराशर झील जाने का। वहां जाने के लिये थोडा बहुत पैदल भी चलना पडता है। पता चला कि कटौला जाने वाली पहली बस ग्यारह बजे मिलेगी। कटौला पराशर का बेस कैम्प है। तभी एक सरदारजी ‘रिवालसर, रिवालसर’ चिल्लाते हुए अपनी बस को ले जाने लगे। अपन भी चढ लिये उसी में।

रिवालसर में शान्ति पसरी हुई थी। तिब्बती लोग कुछ तो अपनी दुकानें खोल रहे थे, कुछ झील की परिक्रमा कर रहे थे। बाकी की कहानी चित्रों की जुबानी:


जय लोमश



लोमश मन्दिर के सामने ही शिवालय

रिवालसर झील

गुरू पद्मसम्भव



गोम्पा का प्रवेश द्वार

गोम्पा में बंधा एक घण्टा (कौन बजाता होगा इसे)

श्रद्धालु इन कटोरियों में पानी भर रहे हैं। मैने इस बाबा से पूछा भी था कि यह मामला क्या है। लेकिन इन्हे मेरी भाषा समझ ही नहीं आयी।

उनमें घी के विशालकाय कटोरे हैं। लगातार ‘दिये’ जलते रहते हैं।

मणी, इन्हे पुण्य पाने के लिये घुमाया जाता है। इनमें मन्त्र भरे हुए हैं, एक चक्कर घुमाने पर सभी मन्त्रों का एक बार जाप करने के बराबर पुण्य मिलना माना जाता है।


यहां इस गोम्पा का पूरा इतिहास लिखा है। लेकिन इस बोर्ड के सामने एक कार खडी थी, इसलिये सामने से इसका फोटू नहीं ले पाया।

अगर आपको मालूम है तो कृपया बतायें कि ये क्या हैं।

झील की परिक्रमा करता हुआ

साफ स्वच्छ पाने में शानदार प्रतिबिम्ब

कुत्ते को बिस्कुट खिलाता एक बौद्ध भिक्षु

रिवालसर का प्राकृतिक सौन्दर्य
घुमक्कडी जिन्दाबाद
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Monday, April 26, 2010

चण्डीगढ का गुलाब उद्यान

छोटा सा चण्डीगढ और इतिहास भी कुछ खास नहीं; लेकिन देखने लायक-घूमने लायक इतना कुछ कि मन थकता नहीं है। यहां अपने कुछ घण्टों के प्रवास में हम रॉक गार्डन में घूम आये, सुखना झील देख ली, अब चलते हैं गुलाब उद्यान (ROSE GARDEN) की तरफ। इसका पूरा नाम है ज़ाकिर गुलाब उद्यान। यह पूर्व राष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन के नाम पर 1967 में बनाया गया था। यह एशिया का सबसे बडा गुलाब उद्यान है। यह तीस एकड से भी ज्यादा इलाके में फैला हुआ है। इसमें 1600 से भी ज्यादा गुलाब की किस्में हैं। इनमें से कुछ किस्में तो बहुत ही दुर्लभ हैं। यह चण्डीगढ के सेक्टर 16 में स्थित है।

एक बार फिर से अपनी बात सुनाता हूं। कल नाइट शिफ्ट की थी, फिर सीधा चण्डीगढ पहुंच गया, फिर रॉक गार्डन, उसके बाद बिना समय गंवाये सुखना झील। यहां तक मैं इतना थक चुका था कि मन कर रहा था कहीं पडकर सो जाऊं। पडकर सोने के लिये रेलवे स्टेशन व बस अड्डा सही जगह है। मुझे चूंकि आज रात को कहीं निकल जाना था, इसलिये मैने बस अड्डे को चुना। सुखना के पास ही एक चौराहे पर रिक्शावाले से पूछा कि भाई, यह सडक ‘सतारा’ ही जा रही है क्या? बोला कि हां, लेकिन पांच किलोमीटर है। आ जा, मेरी रिक्शा में बैठ जा, पहुंचा दूंगा। चण्डीगढ में पंजाबी प्रभुत्व होने की वजह से सेक्टर सत्रह वाले बस अड्डे को सतारा कहते हैं। सतारा मतलब सत्रह।

उसने पांच किलोमीटर बताया था लेकिन मुझे लगा कि यह मुझे डरा रहा है, दो-एक किलोमीटर ही होगा। पैदल निकल पडा। आधे घण्टे तक चलता रहा। कम से कम तीन किलोमीटर तो चल ही लिया हूंगा, ‘सतारा’ दा नामोनिशान नहीं। बडा सयाना बनता है, अब सारा सयानापन निकलने लगा। तभी एक कारवाला मेरी बगल में रुका और उसने पूछा-“भाई, सतारा किन्ना दूर है?” मैने हाथ से इशारा किया –“आगे से राइट।” पता तो मुझे भी नहीं था लेकिन कुछ तो सही था ही।

तभी एक बोर्ड लगा दिखा –ज़ाकिर गुलाब उद्यान। यह तो बहुत प्रसिद्ध है। चलो, चलते हैं। रविवार की शाम थी (14 मार्च 2010)। खूब चहल-पहल थी। कुछ देर के लिये मैं भी थकान भूल गया। बस अड्डा भी बगल में है। अच्छा लगा यहां जाकर। ना कोई फीस, ना लाइन, ना भीड, ना गन्दगी। एकदम खुला और गुलाब की मस्त खुशबू से महकित। घूमता रहा और फोटू खींचता रहा। फव्वारे के पास पहुंचकर एक बेंच पर बैठ गया। देखा कि सामने गुलाब की क्यारी के उस तरफ दो बन्दे घास पर लेटे हैं। मुझे भी लेटने की तलब लग गयी। इस बेन्च पर ही लेट जाऊं? ना, अच्छा सा नहीं लगेगा। पीछे गर्दन घुमाई। एक बढिया ‘लोकेशन’ मिल गयी। दो तरफ तो गुलाब की क्यारियां थीं, एक तरफ पेडों का झुण्ड था। मैं वहीं जा पडा। मुझे कौन-सा सोना था, थोडी देर आराम करके ‘सतारा’ पहुंचना था।

आंख खुली दो घण्टे बाद। पहले तो खुद पर हंसी आयी, फिर एक तसल्ली ये भी थी कि कम से कम आंख खुल तो गयी। नहीं तो जो हालत उस दिन मेरी थी, और सोने का जो आदर्श माहौल था, ठण्डी हवा चल रही थी, गुलाब की महक थी, कोई टोकने-टाकने वाला नहीं था; उससे तो दस-बारह घण्टे से पहले आंख खुलनी ही नहीं चाहिये थी। नींद भी इतनी भयंकर आयी थी कि जगने के बाद पांच मिनट तक तो यही सोचता रहा कि मामला क्या है। तू पडा कहां है? धीरे-धीरे याद आया कि ओहो! तू तो चण्डीगढ में है। तब तक अन्धेरा हो चुका था, चहल-पहल भी कम हो गयी थी।

उठा और बाहर निकलकर सडक पार करके ‘सतारा’ आईएसबीटी पहुंचा। मेरे पास अभी भी कल का पूरा दिन पडा था। अब यहां से एक बस पकडनी थी। पता चला कि वहां जाने वाली बस ‘तिरताली’ आईएसबीटी से मिलेगी। तिरताली मतलब सेक्टर तितालिस। मैने फिर कहां की बस पकडी, आप सोच भी नहीं सकते। हां, कल रात को मेरा कालका मेल से वापसी का रिजर्वेशन भी था। इसलिये दिल्ली की बस पकडने का सवाल खत्म। कहां की बस पकडी, यह प्रश्न आपके लिये एक चुनौती है। चाहे सामने भारत का नक्शा रख लो, चाहे हिमाचल-पंजाब-हरियाणा का; नहीं बता पाओगे। खुला चैलेन्ज दे रहा हूं।

चलो, एक हिण्ट भी दे देता हूं। मैने ना तो हरियाणा की किसी जगह की बस पकडी, ना पंजाब की। हिमाचल जाने वाली बस पकडी। दूसरा हिंट – शिमला, सोलन, रेणुका, पांवटा साहिब, ऊना, कांगडा, ज्वालामुखी, डलहौजी, कुल्लू-मनाली, किन्नौर; इनमे से किसी भी जगह नहीं गया।

ROSE GARDEN, CHANDIGARH
ROSE GARDEN, CHANDIGARH
ROSE GARDEN, CHANDIGARH
ROSE GARDEN, CHANDIGARH
ROSE GARDEN, CHANDIGARH
ROSE GARDEN, CHANDIGARH
ROSE GARDEN, CHANDIGARH
ROSE GARDEN, CHANDIGARH
ROSE GARDEN, CHANDIGARH
ROSE GARDEN, CHANDIGARH
ROSE GARDEN, CHANDIGARH
ROSE GARDEN, CHANDIGARH
ROSE GARDEN, CHANDIGARH
ROSE GARDEN, CHANDIGARH
ROSE GARDEN, CHANDIGARH
घुमक्कडी जिन्दाबाद

चण्डीगढ यात्रा श्रंखला
1. रॉक गार्डन, चण्डीगढ
2. चण्डीगढ की शान- सुखना झील
3. चण्डीगढ का गुलाब उद्यान
4. तीन धर्मों की त्रिवेणी- रिवालसर झील