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Thursday, January 28, 2010

भारत में नैरो गेज

भारत में ज्यादातर रेल लाइन ब्रॉड गेज में है। जो नहीं हैं, उन्हे भी ब्रॉड गेज में बदला जा रहा है। जो नई लाइनें बन रही हैं, वे भी ब्रॉड गेज में ही हैं। धीरे-धीरे मीटर गेज की सभी लाइनों को ब्रॉड में बदल दिया जायेगा। जैसे कि अभी पिछले साल रेवाडी-रींगस-फुलेरा लाइन को पूरा कर दिया है। इस पर चेतक एक्सप्रेस दोबारा दौडने लगी है। रेवाडी-सादुलपुर-बीकानेर लाइन पर भी गेज परिवर्तन का काम पूरा हो चुका है।

Thursday, January 7, 2010

चलूँ, बुलावा आया है

पुरानी दिल्ली के स्टेशन से रात को नौ बजे एक ट्रेन चलती है- जम्मू के लिए (4033 जम्मू मेल)। शुरूआती दिमाग तो रोहित ने ही लगाया था। दिवाली पर ही कह दिया था कि दिसम्बर में वैष्णों देवी चलेंगे। तभी मैंने एकदम रिजर्वेशन करा लिया कि कहीं रोहित बाद में मना ना कर दे। हमने इस लपेटे में रामबाबू को भी ले लिया। साल ख़त्म होते-होते रोहित कहने लगा कि यार, जितनी उम्मीद थी उतनी छुट्टियाँ नहीं मिली। रोहित की मनाही सुन-सुनकर रामबाबू भी नाटने की तैयारी करने लगा।
खैर, लाख डंडे करने पर दोनों इस शर्त पर राजी हो गए कि वैष्णों देवी के दर्शन करते ही तुरंत वापस आ जायेंगे। नहीं तो हमारा चार दिन बाद 30 दिसम्बर को वापसी का टिकट था। 26 दिसम्बर को हमें दिल्ली से जाना था। अच्छा, मैं इन दोनों का ज़रा सा चरित्र-चित्रण कर दूं। हम तीनों ने साथ साथ ही पढ़ाई पूरी की है। आजकल रोहित तो है ग्रेटर नोएडा में होण्डा सीएल कम्पनी में और रामबाबू है गुडगाँव में मारूति कम्पनी में। तीसरे की तो बताने की जरुरत ही नहीं है। उसे तो ऐसी बीमारी लग गयी है कि हाल-फिलहाल लाइलाज ही है। बेटा, जब वा आवेगी ना, लम्बी चोटी वाली, या बेमारी तो तभी ठीक होवेगी। ससुरे को घूमने की खाज है।

Monday, January 4, 2010

जम्मू-ऊधमपुर रेल लाइन

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें
2009 के आखिर में वैष्णों देवी के दर्शन करने जम्मू गया तो वापसी में कटरा से सीधा ऊधमपुर पहुँच गया। वहां से दोपहर बाद जम्मू जाने के लिए एक पैसेंजर ट्रेन पकड़ी। इस मार्ग पर सफ़र करके दिमाग में आया कि वैष्णों देवी का यात्रा वृत्तान्त तो होता रहेगा, पहले भारतीय इंजीनियरी का अदभुत करिश्मा दिखा दिया जाए।
जितनी जानकारी मुझे अभी तक है उसके अनुसार बात दरअसल ये है कि आजादी से पहले पाकिस्तान नामक देश भारत देश का ही हिस्सा था। उन दिनों पूरे भारत में रेल लाइनों का विस्तार होता जा रहा था। दिल्ली से अम्बाला, अमृतसर होते हुए लाहौर, रावलपिण्डी तक ट्रेनें जाती थीं। पठानकोट को भी अमृतसर से जोड़ दिया गया था। जम्मू तक भी ट्रेनें जाती थीं। उन दिनों जम्मू-सियालकोट के बीच रेल सेवा थी। रावलपिण्डी से श्रीनगर तक भी रेल लाइन बिछाने की योजना बन रही थी।