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Thursday, October 29, 2009

करोल के जंगलों में

एक महीने से भी ज्यादा समय हो गया था कहीं गए हुए। पिछले महीने देवप्रयाग गया था। तभी एक दोस्त ललित को पता चला कि मैं घुमक्कडी करता हूँ। बोला कि यार अब जहाँ भी जाएगा, बता देना, मैं भी चलूँगा तेरे साथ। अब मैंने अपना दिमाग लगाया। सोचा कि मेरी तरह इसे भी तीन-चार दिन की छुट्टी आराम से मिल जायेगी। चल बेटे, केदारनाथ चलते हैं। बैठे-बिठाए थोडी देर में ही तय हो गया कि कब यहाँ से चलना है, कब वहां से चलना है। लेकिन 19 अक्टूबर को केदारनाथ के कपाट बंद हो गए। कपाट बंद होते ही अगले के तो तोते उड़ गए। बोला कि नहीं यार, इस रविवार को मेरी फलानी परीक्षा है। वैसे भी अब क्या फायदा वहां जाने का? वहां तो भगवान् जी के भी दर्शन नहीं होंगे। अगली बार चलूँगा, जहाँ भी तू कहेगा, पक्का।
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ललित ने तो इस बार मेरे साथ जाने से मना कर दिया लेकिन उधर मेरी हालत खराब होनी शुरू हो गयी। पेट में घुमक्कडी के खदके लगने शुरू हो गए, गैस के गोले बनने लगे। इसका मतलब था कि कहीं ना कहीं जाना ही पड़ेगा। तभी आशीष खंडेलवाल से लाइन मिल गयी। उन्होंने फिलहाल जयपुर आने से मना कर दिया। ऑफिस वर्क की अति होने की वजह से। नैनीताल वाली विनीता यशस्वी से संपर्क किया। उन्होंने ना तो ना की, ना ही हाँ की। कहा कि बाद में बताती हूँ। अभी तक तो बताया नहीं।

Monday, October 26, 2009

जब पहली बार ट्रेन से सफर किया

मैंने पहली बार ट्रेन से सफ़र किया था आज से लगभग साढे चार साल पहले यानी अप्रैल 2005 में। भारतीय नौसेना की परीक्षा देने कानपुर जाना था। मैंने तब तक ट्रेन देखी तो थी लेकिन बैठा नहीं था। यहाँ तक कि मेरठ सिटी रेलवे स्टेशन भी नहीं देखा था। मेरठ छावनी तो देख रखा था - दो प्लेटफोर्म वाला।
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इन परिस्थितियों में पिताजी मुझे अकेले नहीं भेज सकते थे। बोले कि मैं चलूँगा तेरे साथ। इतने लम्बे सफ़र के लिए रिजर्वेशन भी नहीं कराया। तब तो मुझे भी नहीं पता था कि रिजर्वेशन नाम की भी कोई चीज होती है। मेरठ सिटी पहुंचे। मैं अति हर्ष उल्लाषित हो रहा था कि आज ट्रेन में बैठूंगा। पिताजी की आज्ञा से मैं ही कानपुर के दो टिकट लाया।

Thursday, October 8, 2009

चन्द्रबदनी - एक दुर्गम शक्तिपीठ

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नवरात्र ख़त्म हो गए हैं। इन दिनों जम्मू स्थित वैष्णों देवी हो या हिमाचल वाली ज्वाला देवी आदि, सभी के दरबार में भयानक भीड़ रहती है। लेकिन आज हम आपको एक ऐसी 'शक्ति' के दर्शन कराएँगे जो सुगम होने के साथ-साथ दुर्गम भी है। सुगम तो इसलिए कि मंदिर तक जाने के लिए करीब-करीब एक किलोमीटर चलना पड़ता है और दुर्गम इसलिए कि इतना सुगम होने के बावजूद भी लोग-बाग़ वहां नहीं जाते। यह उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले में है। और समुद्र तल से लगभग 2500 मीटर की ऊंचाई पर। जाडों में यहाँ बरफ भी पड़ती है।
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पिछली पोस्ट में जब मैं देवप्रयाग गया था, तो पता चला कि चन्द्रबदनी देवी यहाँ से ज्यादा दूर नहीं है। अगर आप अभी तक देवप्रयाग नहीं गए हैं तो सलाह मानिए और फटाफट पहुँचिये। सुबह-सुबह संगम में स्नान करके सीधे तहसील के पास पहुँच जाओ और यहीं खड़े होकर हिण्डोलाखाल जाने वाली बस या जीप की प्रतीक्षा करो। अगर अपना वाहन लेकर आये हो तो सीधे हिण्डोलाखाल निकल जाओ और मेरी प्रतीक्षा करो। मैं अभी बस से आ रहा हूँ। देवप्रयाग से हिण्डोलाखाल तक महड, कांडीखाल जैसे करीब दर्जनभर गाँव पड़ते हैं। इन गांवों को हम लोग गढ़वाली गाँव कहते हैं। समुद्र तल से ऊंचाई भी लगातार बढती जाती है।