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Monday, August 31, 2009

इन्दौर में ब्लॉगर ताऊ से मुलाकात

14 अगस्त, जन्माष्टमी। जैसे ही ताऊ को पता चला कि मैं इंदौर में हूँ, तुरन्त ही निर्देश मिलने शुरू हो गए कि फलानी बस पकड़ और फलाने चौराहे पर उतर जा। खैर, फलाने चौराहे पर ताऊ ने किसी को भेज दिया और थोडी ही देर में मैं ताऊ के घर पर उनके सामने। देखते ही बोले -"अरे यार! तू तो बिलकुल वैसा का वैसा ही है, जैसा अपनी पोस्ट में दिखता है।" घाट तो मैं भी नहीं हूँ -"अजी ताऊ, मैं तो बिलकुल वैसा ही हूँ। लेकिन आपने क्यों रूप बदल लिया है? कौन सा मेकअप कर लिया है कि आज तो चिम्पैंजी की जगह आदमी नजर आ रहे हो?" "अरे ओये, चुप। यहाँ पर मुझे ताऊ मत बोलना।" (शायद मेड-इन-जर्मन का डर था)। खैर हमने फिर उन्हें पूरे दिन ताऊ नहीं बोला।
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फिर दोपहर को साढे बारह-एक बजे 'ब्रेकफास्ट' किया। यहीं ताई से हमारा सामना हुआ। पहले तो मैं सोच रहा था कि ताई वाकई 'ताई' जैसी होगी। लेकिन मेरा अंदाजा गलत निकला। इसके बाद पडोसी के घर की तरफ इशारा करके बोले कि वो देख, वो साला बीनू फिरंगी पड़ा हुआ है। अब तो खा-खाकर पड़ा रहता है। हमारा सैम नीचे बंधा हुआ है। और वो देख, वहां घास में थोडी सी मिटटी है ना, वहीं हमारी दोनों भैंसें चम्पाकली व अनारकली बंधी रहती थीं। जब से यमराज के भैंसे के साथ चक्कर चला है, तब से खूंटे समेत गायब हैं।

Thursday, August 27, 2009

महाकाल की नगरी है उज्जैन

13 अगस्त 2009, अगले दिन जन्माष्टमी थी। मैं उस दिन भोपाल के पास भीमबैठका में था। ताऊ का फोन आया। बोले कि भाई, हम नासिक जा रहे हैं, कल शाम को यहाँ से निकलेंगे। तू दोपहर तक इंदौर आ जा, मिल लेंगे। जब मैंने उन्हें बताया कि मैं भोपाल में हूँ, बोले तो एक काम कर, आज रात को उज्जैन पहुँच जा। सुबह चार बजे महाकाल मंदिर में भस्म आरती होती है। उसे जरुर देखना। इसके अलावा वहां तेरे लायक कुछ भी नहीं है। फिर सीधे इंदौर आ जाना।
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ताऊ की बात हमने तुरन्त मानी। रात ग्यारह वाली पैसेंजर पकड़ी, टीटी की 'कृपा' से सोते हुए गए। ढाई बजे ही उज्जैन पहुँच गए। साढे तीन बजे तक नहा-धोकर चार बजे महाकाल मंदिर पहुँच गए। पहुँचते ही प्रसाद वालों ने पचास रूपये का प्रसाद जबरदस्ती 'गले' में बाँध दिया। जन्माष्टमी होने की वजह से काफी लम्बी लाइन लगी थी। अन्दर गर्भगृह में भस्म आरती की तैयारी चल रही थी। बाहर जगह-जगह टीवी स्क्रीन पर आरती का लाइव प्रसारण चल रहा था।

Monday, August 24, 2009

भीमबैठका- मानव का आरंभिक विकास स्थल

आज एक ऐसी जगह पर चलते हैं जो बिलकुल गुमनाम सी है और अनजान सी भी लेकिन यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल है- एक दो साल से नहीं बल्कि बारह सालों से। इस जगह का नाम है- भीमबैठका (BHIMBETKA), भीमबेटका, भीमबैठिका। कहते हैं कि वनवास के समय भीम यहाँ पर बैठते थे इसलिए यह नाम पड़ गया। ये तो सिर्फ किंवदंती है क्योंकि भीम ने अपने बैठने का कोई निशान नहीं छोडा।
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निशान छोडे हैं हमारे उन आदिमानव पूर्वजों ने जो लाखों साल पहले यहाँ स्थित गुफाओं में गुजर-बसर करते थे। जानवरों का शिकार करके अपना पेट भरते थे। उन्ही दिनों उन्होंने चित्रकारी भी शुरू कर दी। यहाँ स्थित सैंकडों गुफाओं में अनगिनत चित्र बना रखे हैं। इन चित्रों में शिकार, नाच-गाना, घोडे व हाथी की सवारी, लड़ते हुए जानवर, श्रृंगार, मुखौटे और घरेलु जीवन का बड़ा ही शानदार चित्रण किया गया है।

Thursday, August 20, 2009

बरसात में नीलकंठ के नज़ारे

कुछ दिन पहले मैंने प्रतिज्ञा की थी कि जल्दी ही नीलकंठ महादेव के नज़ारे दिखाए जायेंगे। हमारे यहाँ देर तो है पर अंधेर नहीं है। इसलिए थोडी देर में आप देखोगे नीलकंठ की हिमालयी वादियों को। मैं वहां करीब महीने भर पहले 15 जुलाई को गया था। उस दिन दोपहर से पहले बारिश हुई थी इसलिए नजारों में चाँद भी लगे थे और तारे भी।
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चलो, आज फिर चलते हैं वहीं पर। सबसे पहले किसी भी तरह ऋषिकेश पहुंचेंगे। अरे यार, वही हरिद्वार वाला ऋषिकेश। हवाई जहाज से, ट्रेन से, बस से, कार से, टम्पू से; जैसा भी साधन मिले, बस पहुँच जाइए। इसके बाद राम झूला पार करके स्वर्गाश्रम। पहुँच गए? ठीक है। यहाँ से नीलकंठ की दूरी कम से कम चौदह किलोमीटर है- वो भी पैदल। दम-ख़म हो तो पैदल चले जाओ। पूरा रास्ता पक्का है लेकिन महाघनघोर जंगल भी है। दस किलोमीटर तक तो निरंतर खड़ी चढाई है। सावन को छोड़कर पूरे साल सुनसान पड़ा रहता है। बन्दर व काले मुहं-लम्बी पूंछ वाले लंगूर जगह-जगह आपका स्वागत करेंगे। ये ही यहाँ की पुलिस है। बैग व जेबों की तलाशी लेकर ही आगे जाने देते हैं।

Monday, August 3, 2009

ऐसा ही होता है ना भाई-बहन का प्यार!!!

परसों रक्षाबंधन है। भाई-बहन के प्यार का बंधन। आज की इस आधुनिक दुनिया में जहाँ बाकी पूरे साल दुनिया भर के "फ्रेंडशिप डे" मनाये जाते हैं, रक्षाबंधन की अलग ही रौनक होती है। इसी रौनक में हम भी रक्षाबंधन मना लेते हैं।
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हमारे कोई बहन तो है नहीं, इसलिए मुझे नहीं पता कि बहन का प्यार कैसा होता है। तवेरी-चचेरी बहनों के भी अलग ही नखरे होते हैं। रक्षाबंधन वाले दिन हमारी कलाईयों में बुवाएं ही राखी बांध देती हैं। पिताजी हर चार भाई हैं। बाकी तीनों बड़े हैं। सभी के अपने-अपने घर-परिवार हैं। दो बुवा हैं। जब वे आती हैं तो बड़े ताऊ के यहाँ ही रुकती हैं। इसके बाद बाकियों के घर पड़ते हैं। इस क्रम में हमारा घर सबसे आखिर में है।
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तो बुवाओं को हमारे यहाँ आते-आते दोपहर हो जाती है। इसलिए दोपहर तक तो हम बेफिक्र रहते हैं, इसके बाद नहा-धोकर चकाचक हो जाते हैं। एक बजे के आसपास बुवाजी आती हैं। पिताजी को राखी बांधकर हमें भी बांधती हैं। वे घर से बनाकर स्टील के डिब्बे में रखकर कलाकंद व मिठाई लाती हैं। हम भी अपनी हैसियत से उन्हें कुछ नेग देते हैं।