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16 जुलाई, 2009 । दोपहर ग्यारह बजे हम दोनों भाई कांवड़ उठाकर चल पड़े। हमारे साथ गाँव के जितने भी 'भोले' थे, सभी दो घंटे पहले जा चुके थे। हम पिछले चार सालों से काली पल्टन मंदिर मेरठ में जल चढाते थे, लेकिन इस बार इरादा था पुरा महादेव बागपत में चढाने का। आमतौर से भोले या तो नंगे पैर होते हैं या फिर चप्पल पहनते हैं लेकिन मैंने जूते पहने हुए थे। जूते पहनने से पैरों को सुकून मिलता है।
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आज हमने टारगेट बनाया रुड़की (30 किलोमीटर) पार करके मंगलौर (40 किलोमीटर) में रात्रि विश्राम करने का। लेकिन रात बारह बजे तक भी मंगलौर पहुंचना कोई आसान काम नहीं था।
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ग्यारह बजे हरिद्वार से चलकर साढे बारह बजे तक हम ज्वालापुर पहुँच गए। यहाँ आधे घंटे तक आराम किया। जिस समय एक बजे यहाँ से चले, तो जबरदस्त धूप व गर्मी थी। इरादा तो था दो बजे तक बहादराबाद पहुँचने का, लेकिन सूर्यदेव की वजह से ऐसा नहीं हो सका। बहादराबाद से तीन किलोमीटर पहले ही एक टेंट में जगह देखकर हमने अपनी पन्नी खोल ली। पन्नी ही हमारी बोरिया-बिस्तर थी। कमर सीधी करने के लिए लेटे तो नींद ही आ गयी। अब तक 8-9 किलोमीटर चल चुके थे।
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उठाने वाला कोई था नहीं, फिर भी साढे चार बजे आँख खुल गयी। शाम को इस समय भी अच्छी-खासी गर्मी थी। नहा-धोकर पांच बजे फिर से चलना शुरू कर दिया। घंटे भर में ही बहादराबाद पहुँच गए। यहाँ हमें कुछ हिजडे दिखे। कांवड़ लाते हिजडे। आज पहली बार हिजडों को भगवान का नाम लेते देखा था। इसके बाद तो दिन ढलता गया। अँधेरा बढ़ता गया और गर्मी भी कम होती गयी। यही वो समय होता है जब सबसे ज्यादा भोले सड़क पर होते हैं। हम भी अँधेरी रात होने के बावजूद अपनी पूरी स्पीड से चले जा रहे थे। हमारा नियम था कि एक घंटा तो जमकर चलो, उसके बाद आधा घंटा आराम करो। इस दौरान शरीर गरम रहे, चाय भी पी लेते थे।
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खैर, रात को बारह बजे तक मंगलौर तो नहीं पहुँच सके, रुड़की जरूर पहुँच गए। रुड़की एक बड़ा शहर है, हरिद्वार से तीस किलोमीटर दूर। हर भोले का पहला लक्ष्य होता है रुड़की। बड़ा शहर है तो सुविधाएं भी ज्यादा। स्ट्रीट लाइटों से चमकती चौडी-चौडी सड़कें। जब हम पहुंचे तो रुड़की सो रहा था। सड़क पर, गलियों में, बंद दुकानों-मकानों के सामने भोले ही सोये हुए थे। उन्हें देखकर नींद तो हमें भी आनी ही थी। लेकिन कहीं सही सी जगह नहीं मिली। आखिरकार जगह मिल गयी। एक दुकान के सामने थोडी सी जगह खाली थी। भला हो दुकानदार का, उसने वहां पर एक दरी बिछा रखी थी। दो-तीन भोले भी थे। दो हम पहुँच गए।
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कहते हैं कि भोलों को जो कुछ होना होता है, रुड़की तक हो जाता है। मेरे बाएं पैर में दो छाले पड़ चुके थे। आशु ने सुबह साढे पांच बजे ही उठा दिया। क्योंकि सुबह की ठंडक में जितना चल लें, उतना ही फायदा रहता है। उधर, कल जो 30 किलोमीटर चले थे, उसका नतीजा अब दिख रहा था- पैरों में अकडन। यह अकडन इतनी ज्यादा होती है कि जैसे ही चलना शुरू करते हैं, एक-एक कदम बड़ी मुश्किल से रखा जाता है। धीरे-धीरे चलते-चलते पैर में गर्माहट बढ़ने लगती है और तेजी भी बढ़ने लगती है।
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हम सवा छः बजे यहाँ से चले। सात बजे रेलवे का पुल पार करके नाश्ता किया और फिर बढ़ चले। इसके बाद रुके मंगलौर नहर के पुल पर। काफी तेज चलते हुए हम यहाँ पहुंचे थे। गाँव के उन भोलों को फोन मिलाया जो हमसे पहले निकल चुके थे, तो पता चला कि उन्होंने थोडी देर पहले ही रुड़की पार की है। यानी वे हमसे 6-7 किलोमीटर पीछे थे। असल में उनमे कुछ ऐसे भोले भी थे, जो पहली बार कांवड़ ला रहे थे। इसलिए वे धीरे-धीरे चल रहे थे। एक बात और, भीड़ इतनी ज्यादा होती है कि हमने कब उन्हें पीछे छोड़ दिया, पता ही नहीं चला।
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मंगलौर से ही मुरादनगर तक कांवड़ यात्रा मार्ग भी है गंगा नहर के किनारे-किनारे। लेकिन यह हमारे किसी काम का नहीं। यहाँ से चलकर साढे ग्यारह बजे मंडावली के पास पहुँच गए। यहाँ तक थकान व आलस व धूप-गर्मी हावी होने लगे थे, तो यहीं पर सो गए। पांच बजे उठे, नहा-धोकर फिर चल पड़े। शाम को साढे सात बजे तक गुरुकुल नारसन पार करके उत्तराखंड छोड़कर उत्तर प्रदेश में प्रवेश कर गए। बॉर्डर से दो किलोमीटर चलकर पुरकाजी आता है। हालाँकि यह एक मुस्लिम प्रधान क़स्बा है, लेकिन यात्रा का पहला भंडारा यहीं पर मिला। हम कहाँ छोड़ने वाले थे। आलू की सब्जी, पूरी व चावल।
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खा-पीकर फिर चल पड़े। अँधेरा तो हो ही गया था। रात का टाइम और यहाँ से हमने चलने में जबरदस्त तेजी दिखाई। अगर हमारे पास मीटर होता तो वो हमारी स्पीड कम से कम साढे छः किलोमीटर प्रति घंटा बताता। भोले औसतन पांच की स्पीड से चलते हैं। यहाँ हम हवा के घोडे पर सवार थे। कोई भी हमसे आगे नहीं निकल रहा था, सबको पीछे छोड़ते हुए, दे दनादन दे दनादन। फलौदा व बरला गाँव कब निकल गए, पता ही नहीं चला। बरला गाँव से एक किलोमीटर आगे है बरला इंटर कालिज। यहाँ भोलों के खाने-पीने व ठहरने का बढ़िया इंतजाम होता है। कॉलेज के बरामदों में पंखे लगे होते हैं व दरी भी बिछी होती है। 17 जुलाई की रात को ग्यारह बजे हम यहाँ पहुंचे। बड़ी ही आसानी से सोने की जगह मिल गयी और हम सो गए।
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हम जो आज इतना तेज चले थे, इसका मुझे इतना नुकसान हुआ कि पूरे रास्ते परेशान रहा। दाहिना पैर जो दोपहर तक ठीक था, उसमे भी तीन मोटे-मोटे छाले पड़ गए थे। बाएं पैर में तो खैर दो ही छाले थे। एक बात और, आज हम करीब 40 किलोमीटर चले थे यानी हरिद्वार से 70 किलोमीटर।

(रुड़की में सोकर उठते भोले)

(जीवन चलने का नाम)

(इस बार महिलाएं भी बहुत थीं)

(मंगलौर में नहर के किनारे)

(नहर की पटरी से जाते भोले)

(इन बड़ी कांवड़ और डीजे से रास्ता आसान हो जाता है)

(ये है हमारा अब तक का सफरनामा। लाल लाइन तो सड़क है, नीली नहर और काली रेलवे लाइन)
कांवड यात्रा श्रंखला
1. कांवड यात्रा- 1
2. कांवड यात्रा- 2
3. कांवड यात्रा का सबसे बुरा दिन
4. कांवड यात्रा का आखिरी दिन
5. बरसात में नीलकण्ठ के नजारे



















एक जगह हम कन्फ्यूजिया गए। ये वाली रोड जायेगी या वो वाली? बताने वाला कोई था ही नहीं। हम अंदाजे से आगे बढ़ते रहे। टिपिन टॉप तो पहुंचे नहीं, विश्व प्रसिद्द चर्च में पहुँच गए। इसे क्वींस लाइन भी कहा जाता है। 
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कोहरे के कारण पेडों से गिरती टप-टप बूंदों से सीढियां गीली हो गयी थीं। छोटा सा साफ़-सुथरा मंदिर। यहाँ चारों तरफ बांज का जंगल है। यहाँ भी हमारे अलावा कोई नहीं था। बस केवल जंगल का सन्नाटा और बूंदों की टप-टप। हम यहाँ डेढ़-दो घंटे तक बैठे रहे।
इन वादियों में आकर तो ऐसा लगता है कि क्या है दिल्ली-विल्ली? चलो, छोडो दिल्ली को और यहीं बस जाओ। 











