Thursday, July 30, 2009

कांवड़ यात्रा - 2

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16 जुलाई, 2009 । दोपहर ग्यारह बजे हम दोनों भाई कांवड़ उठाकर चल पड़े। हमारे साथ गाँव के जितने भी 'भोले' थे, सभी दो घंटे पहले जा चुके थे। हम पिछले चार सालों से काली पल्टन मंदिर मेरठ में जल चढाते थे, लेकिन इस बार इरादा था पुरा महादेव बागपत में चढाने का। आमतौर से भोले या तो नंगे पैर होते हैं या फिर चप्पल पहनते हैं लेकिन मैंने जूते पहने हुए थे। जूते पहनने से पैरों को सुकून मिलता है।
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आज हमने टारगेट बनाया रुड़की (30 किलोमीटर) पार करके मंगलौर (40 किलोमीटर) में रात्रि विश्राम करने का। लेकिन रात बारह बजे तक भी मंगलौर पहुंचना कोई आसान काम नहीं था।
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ग्यारह बजे हरिद्वार से चलकर साढे बारह बजे तक हम ज्वालापुर पहुँच गए। यहाँ आधे घंटे तक आराम किया। जिस समय एक बजे यहाँ से चले, तो जबरदस्त धूप व गर्मी थी। इरादा तो था दो बजे तक बहादराबाद पहुँचने का, लेकिन सूर्यदेव की वजह से ऐसा नहीं हो सका। बहादराबाद से तीन किलोमीटर पहले ही एक टेंट में जगह देखकर हमने अपनी पन्नी खोल ली। पन्नी ही हमारी बोरिया-बिस्तर थी। कमर सीधी करने के लिए लेटे तो नींद ही आ गयी। अब तक 8-9 किलोमीटर चल चुके थे।
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उठाने वाला कोई था नहीं, फिर भी साढे चार बजे आँख खुल गयी। शाम को इस समय भी अच्छी-खासी गर्मी थी। नहा-धोकर पांच बजे फिर से चलना शुरू कर दिया। घंटे भर में ही बहादराबाद पहुँच गए। यहाँ हमें कुछ हिजडे दिखे। कांवड़ लाते हिजडे। आज पहली बार हिजडों को भगवान का नाम लेते देखा था। इसके बाद तो दिन ढलता गया। अँधेरा बढ़ता गया और गर्मी भी कम होती गयी। यही वो समय होता है जब सबसे ज्यादा भोले सड़क पर होते हैं। हम भी अँधेरी रात होने के बावजूद अपनी पूरी स्पीड से चले जा रहे थे। हमारा नियम था कि एक घंटा तो जमकर चलो, उसके बाद आधा घंटा आराम करो। इस दौरान शरीर गरम रहे, चाय भी पी लेते थे।
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खैर, रात को बारह बजे तक मंगलौर तो नहीं पहुँच सके, रुड़की जरूर पहुँच गए। रुड़की एक बड़ा शहर है, हरिद्वार से तीस किलोमीटर दूर। हर भोले का पहला लक्ष्य होता है रुड़की। बड़ा शहर है तो सुविधाएं भी ज्यादा। स्ट्रीट लाइटों से चमकती चौडी-चौडी सड़कें। जब हम पहुंचे तो रुड़की सो रहा था। सड़क पर, गलियों में, बंद दुकानों-मकानों के सामने भोले ही सोये हुए थे। उन्हें देखकर नींद तो हमें भी आनी ही थी। लेकिन कहीं सही सी जगह नहीं मिली। आखिरकार जगह मिल गयी। एक दुकान के सामने थोडी सी जगह खाली थी। भला हो दुकानदार का, उसने वहां पर एक दरी बिछा रखी थी। दो-तीन भोले भी थे। दो हम पहुँच गए।
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कहते हैं कि भोलों को जो कुछ होना होता है, रुड़की तक हो जाता है। मेरे बाएं पैर में दो छाले पड़ चुके थे। आशु ने सुबह साढे पांच बजे ही उठा दिया। क्योंकि सुबह की ठंडक में जितना चल लें, उतना ही फायदा रहता है। उधर, कल जो 30 किलोमीटर चले थे, उसका नतीजा अब दिख रहा था- पैरों में अकडन। यह अकडन इतनी ज्यादा होती है कि जैसे ही चलना शुरू करते हैं, एक-एक कदम बड़ी मुश्किल से रखा जाता है। धीरे-धीरे चलते-चलते पैर में गर्माहट बढ़ने लगती है और तेजी भी बढ़ने लगती है।
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हम सवा छः बजे यहाँ से चले। सात बजे रेलवे का पुल पार करके नाश्ता किया और फिर बढ़ चले। इसके बाद रुके मंगलौर नहर के पुल पर। काफी तेज चलते हुए हम यहाँ पहुंचे थे। गाँव के उन भोलों को फोन मिलाया जो हमसे पहले निकल चुके थे, तो पता चला कि उन्होंने थोडी देर पहले ही रुड़की पार की है। यानी वे हमसे 6-7 किलोमीटर पीछे थे। असल में उनमे कुछ ऐसे भोले भी थे, जो पहली बार कांवड़ ला रहे थे। इसलिए वे धीरे-धीरे चल रहे थे। एक बात और, भीड़ इतनी ज्यादा होती है कि हमने कब उन्हें पीछे छोड़ दिया, पता ही नहीं चला।
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मंगलौर से ही मुरादनगर तक कांवड़ यात्रा मार्ग भी है गंगा नहर के किनारे-किनारे। लेकिन यह हमारे किसी काम का नहीं। यहाँ से चलकर साढे ग्यारह बजे मंडावली के पास पहुँच गए। यहाँ तक थकान व आलस व धूप-गर्मी हावी होने लगे थे, तो यहीं पर सो गए। पांच बजे उठे, नहा-धोकर फिर चल पड़े। शाम को साढे सात बजे तक गुरुकुल नारसन पार करके उत्तराखंड छोड़कर उत्तर प्रदेश में प्रवेश कर गए। बॉर्डर से दो किलोमीटर चलकर पुरकाजी आता है। हालाँकि यह एक मुस्लिम प्रधान क़स्बा है, लेकिन यात्रा का पहला भंडारा यहीं पर मिला। हम कहाँ छोड़ने वाले थे। आलू की सब्जी, पूरी व चावल।
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खा-पीकर फिर चल पड़े। अँधेरा तो हो ही गया था। रात का टाइम और यहाँ से हमने चलने में जबरदस्त तेजी दिखाई। अगर हमारे पास मीटर होता तो वो हमारी स्पीड कम से कम साढे छः किलोमीटर प्रति घंटा बताता। भोले औसतन पांच की स्पीड से चलते हैं। यहाँ हम हवा के घोडे पर सवार थे। कोई भी हमसे आगे नहीं निकल रहा था, सबको पीछे छोड़ते हुए, दे दनादन दे दनादन। फलौदा व बरला गाँव कब निकल गए, पता ही नहीं चला। बरला गाँव से एक किलोमीटर आगे है बरला इंटर कालिज। यहाँ भोलों के खाने-पीने व ठहरने का बढ़िया इंतजाम होता है। कॉलेज के बरामदों में पंखे लगे होते हैं व दरी भी बिछी होती है। 17 जुलाई की रात को ग्यारह बजे हम यहाँ पहुंचे। बड़ी ही आसानी से सोने की जगह मिल गयी और हम सो गए।
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हम जो आज इतना तेज चले थे, इसका मुझे इतना नुकसान हुआ कि पूरे रास्ते परेशान रहा। दाहिना पैर जो दोपहर तक ठीक था, उसमे भी तीन मोटे-मोटे छाले पड़ गए थे। बाएं पैर में तो खैर दो ही छाले थे। एक बात और, आज हम करीब 40 किलोमीटर चले थे यानी हरिद्वार से 70 किलोमीटर।

(रुड़की में सोकर उठते भोले)
(जीवन चलने का नाम)
(इस बार महिलाएं भी बहुत थीं)
(मंगलौर में नहर के किनारे)
(नहर की पटरी से जाते भोले)
(इन बड़ी कांवड़ और डीजे से रास्ता आसान हो जाता है)
(ये है हमारा अब तक का सफरनामा। लाल लाइन तो सड़क है, नीली नहर और काली रेलवे लाइन)

कांवड यात्रा श्रंखला
1. कांवड यात्रा- 1
2. कांवड यात्रा- 2
3. कांवड यात्रा का सबसे बुरा दिन
4. कांवड यात्रा का आखिरी दिन
5. बरसात में नीलकण्ठ के नजारे

Monday, July 27, 2009

कांवड़ यात्रा-1

जैसे-जैसे सावन में शिवरात्रि आती है, वैसे-वैसे मन में कांवड़ लाने की हिलोर सी उठने लगती है। मैं पूरे साल कभी भी भगवान् का नाम नहीं लेता हूँ, ना ही कभी धूपबत्ती-अगरबत्ती जलाता हूँ, ना किसी मंदिर में जाकर मत्था टेकता हूँ, ना प्रसाद चढाता हूँ, ना दान करता हूँ। लेकिन सावन आते ही-चलो चलो हरिद्वार।
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मोहल्ले के जितने भी हमउम्र और कमउम्र लडकें हैं, सभी ने तय किया कि 14 जुलाई को हरिद्वार के लिए रवाना होंगे, 15 को वहीं पर रहेंगे और 16 को कांवड़ उठा लेंगे। 19 तारीख तक पुरा महादेव बागपत पहुंचकर जल चढा देंगे। अपनी 15-16 लड़कों की टोली 14 जुलाई को सुबह दस बजे तक मोहल्ले के मंदिर प्रांगण में इकठ्ठा हो गयी। मेरे साथ छोटा भाई आशु भी था। टोली क्या पूरा मोहल्ला ही साथ था। शिवजी से कुशल यात्रा की विनती करके, बड़ों के आशीर्वाद लेकर, बम-बम के जयकारे लगते हुए यह टोली बस स्टैंड की तरफ बढ़ चली।
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गाँव से बस पकड़कर मेरठ पहुंचे। उस दिन यू पी रोडवेज का चक्का जाम था। इसलिए बिना समय गँवाए ही लालकुर्ती चौक से एक प्राइवेट बस पर जा चढ़े। छत पर कांवड़ रखकर बांधी तो हम भी छत पर ही बैठ गए। छत पर बैठना भी जरुरी था। क्योंकि सीटें तो सारी भर चुकी थीं। फिर दूसरी बस का भरोसा नहीं था कब मिले। दूसरे राज्यों की रोडवेज बसें पीछे से ही भरकर आती हैं।
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चूंकि हरिद्वार जाने वाला परंपरागत रास्ता कांवडियों की वजह से बड़े वाहनों के लिए बंद कर दिया जाता है। इसलिए बसें बिजनौर होते हुए हरिद्वार जाती हैं। यह रास्ता हरियाली से भरपूर है। दो घंटे में ही बिजनौर बैराज पर पहुँच गए। यहाँ गंगा का पानी रोककर बैराज बनाया गया है और नहरें निकाली गयी हैं। बिजनौर से नजीबाबाद ना जाकर मंडावर रोड से निकल गए।
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यह बस मेरठ में सरधना रोड पर चलने वाली प्राइवेट बस थी, इसलिए यू पी-उत्तराखंड बॉर्डर पर चिडियापुर चेकपोस्ट पर बस को रोक लिया गया लेकिन ड्राईवर ने तुंरत ही ले-देकर बस को निकाल लिया। इसके बाद शाम पांच बजे तक हम चंडीघाट पुल पर थे।
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यहाँ से दो किलोमीटर पैदल चलकर हर की पैडी के पास बिजलीघर में पहुंचे। यहीं हमने अपनी-अपनी कांवड़ रख दी। यहाँ पहुँचते ही चारों तरफ विराजमान देवी देवता बुलाने लगते हैं। हमें उनका भी तकादा पूरा करना पड़ता है। ऑटो किया और कनखल जा पहुंचे। यहाँ शिवजी के ससुर व सती के पिता दक्ष का मंदिर है। पास से ही गंगा बहती है। यहीं वो जगह है जहाँ दक्ष प्रजापति ने यज्ञ किया था और उसमे शिवजी को आमंत्रित नहीं किया था। आगे की कथा तो तुम्हे पता ही होगी।
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गंगा नहाकर जल चढाया। इसके बाद मैं तो चला गया बहादराबाद स्थित अपने पुराने कमरे पर डोनू व सचिन के पास। आशू बाकी लड़कों के साथ मंदिर के पास ही सो गया। सुबह उठकर वे सभी चंडी देवी मंदिर चले गए। जब तक वे वापस आये तब तक मैं भी बहादराबाद से हरिद्वार पहुँच गया।
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वापस आकर आशू कहने लगा कि चल भाई, नीलकंठ चलते हैं। उस समय मौसम ख़राब था और ऋषिकेश की दिशा में भयानक काले बादल भी थे। सोचा कि ऐसी परिस्थिति में चलें या ना चलें, हाँ चल, ना चल, हाँ चल, ना चल। और आखिरकार चल ही पड़े। रात को बारह बजे वहां से वापस आये। नींद तो आ ही रही थी। हर की पैडी क्षेत्र में कहीं किसी पुल पर भी लेटने तक की जगह नहीं मिली। बड़ी मुश्किल से एक पुल पर जरा सी जगह मिल सकी। कांवडिये ही कांवडिये सोये पड़े थे।
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सुबह हुई। मेरे पास जो पुरानी कांवड़ थी, वो तो दे दी मैंने आशू को। खुद ले ली नयी कांवड़ 80 रूपये में। इसके बाद आशू अपनी कांवड़ को सजाने लगा। और मैं मंशा देवी का तकादा निपटाने चला गया। जब तक वहां से वापस आया, तब तक आशू अपनी कांवड़ को सजा चुका था। एक बात और, हमारे साथ वाले सभी लड़के कांवड़ में जल भरके जा चुके थे। हम दोनों ही रह गए थे। दोनों भाई गंगा जी में खूब नहाये और कांवडों को भी नहलाया। छोटी-छोटी कनस्तरियों में जल भरा, धूपबत्ती जलाई, कांवड़ की पूजा की और दोपहर ग्यारह बजे भरी दोपहरी में कांवड़ उठाकर चल पड़े।
(हरिद्वार के रास्ते में)
(दक्ष मन्दिर, कनखल, हरिद्वार)
(कनखल में गंगा स्नान)
(हरिद्वार में कांवडिये)
(हरिद्वार में एक कांवडिया)
(मनसा देवी से हरिद्वार का नजारा)
(रात को इसी पुल पर सोये थे हम)
(हर की पैडी पर कांवडियों का हुजूम)
(एक डुबकी और)
(ख़ुद के साथ कांवड़ को भी नहलाकर पवित्र किया)

(और चल पड़े 150 किलोमीटर की पद यात्रा पर)

कांवड यात्रा श्रंखला
1. कांवड यात्रा- 1
2. कांवड यात्रा- 2
3. कांवड यात्रा का सबसे बुरा दिन
4. कांवड यात्रा का आखिरी दिन
5. बरसात में नीलकण्ठ के नजारे

Friday, July 24, 2009

आज जन्मदिन है मेरा

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आज तो जी मेरा हैप्पी बड्डे है। फिर तो मौज मस्ती का दिन होना चाहिए। अजी कहाँ, आज का दिन भी ऐसे ही कट जायेगा जैसे बाकी दिन कटते हैं। क्योंकि हम तो रोजाना ही मौज-मस्ती में डूबे रहते हैं। मस्ती किसी हैप्पी बड्डे की मोहताज थोड़े ही है? करना ही क्या है!!! सुबह को उठकर नहा धोकर, ड्यूटी बजाने निकल जायेंगे। वहां से आकर तुम्हारे कमेण्ट पढेंगे। फिर कमरे पर आकर खिचडी-विचडी खाकर सो जायेंगे। मन गया हैप्पी बड्डे।
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वैसे आज का बड्डे कुछ अलग है। आज हम 21 साल के हो गए। यानी कि भारतीय संविधान के हिसाब से अचानक जवान हो गए हैं। अभी तक तो बच्चे थे। तो अब शादी-शूदी के बारे में भी सोचना पड़ेगा। ऊपर वाले ने अगर कोई जोडीदारनी बनाकर भेज रखी है तो देखने की बात ये है कि कहाँ से और कैसे निकलकर आती है। कर ले री कार-कूर का इंतजाम। तेरे होने वाले पतिदेव का रजिस्ट्रेशन हो गया है।
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मैं सोच रहा था कि इस बड्डे पर केक तो कटेगा नहीं, कहीं से केक का फोटो ही खींच लूं। जा पहुंचा एक कन्फ़ैक्शनर की दुकान में।
अजी भईया, केक है क्या?
हाँ है।
भाई, असल में एक बात है। मुझे केक का फोटो खींचना है। खरीदना नहीं है।
नहीं भाई, ऐसे नहीं होगा। फिर तो केक का डिब्बा फट जायेगा। उसे खरीदेगा कौन?
देख ले यार। कर ले किसी तरह।
ठीक है पर पैसे लूँगा।
कितने?
बीस रूपये।
रहने दे।
पैसे के मामले में मना करते देर नहीं लगती। फिर उससे कहा कि भाई, छोड़ केक-वेक को। तू मुझे दूर से दिखा दे। मैं डिब्बे का ही फोटो खींच लूँगा।
बोला कि उसके पांच रूपये लूँगा।
रहने दे।
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आज ही अपने सर्वश्रेष्ठ मित्र रोहित चौधरी दौरालिया का भी बड्डे है। वो मुझसे पूरे दो साल बड़ा है। 24 जुलाई वाले दिन हममे से एक बन्दा फोन करता है। बोलता है कि हैप्पी बड्डे। इसके बाद दूसरा बोलता है- हैप्पी बड्डे। बस, दोनों ने दोनों को विश कर दिया। फोन काट देते हैं।
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किसी के जीवन में 21 वें बड्डे का विशेष महत्त्व होता है। शायद तभी तो सुशील जी ने लिखा है- "उठ जाग मुसाफिर। जीवन की दोपहर हो गयी।" वास्तव में, अभी तक तो जीवन की सुबह ही थी। अब दोपहर हो गयी है। फिर धीरे-धीरे शाम हो जायेगी। और एक दिन.... रात भी होगी।
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पिछले जनम में मैंने कोई नेक काम किया होगा, तभी तो इस बार 21 साल तक सही-सलामत हूँ। आज के टाइम में सही-सलामत रहना कोई हंसी-खेल नहीं है। कदम-कदम पर दिक्कतें, परेशानियां, दुर्घटनाएं, बीमारियाँ इंसान की जिन्दगी से खेलती हैं। मेहरबानी है उस मालिक की जिसने 21 साल पहले मुझे इस धरती पर भेजा और आज तक कभी भी इस तरह की कोई परेशानी नहीं होने दी। उसी की मर्जी से बढ़िया संस्कार मिले, बढ़िया पढ़े-लिखे, बढ़िया नौकरी मिली। खूब घूमते भी हैं। हर समय ख़ुशी में टुल्ल रहते हैं। जब उसका मन करेगा, अपने इस 'खिलौने' को उठा भी लेगा।
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अगली पोस्ट: कांवड यात्रा- 1

Thursday, July 16, 2009

कांवड़ निन्दकों, इसे पढो

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एक बात मैं उन लोगों से भी कहना चाहूँगा, जो कांवड़ तो लाते नहीं और घर में बैठकर कांवडियों की जी भरकर निंदा करते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि कांवडिये निठल्लों की भीड़ है। बिलकुल ठीक कहते हैं वे लोग। आखिर कांवडिये अपना काम-धंधा छोड़कर ही तो जाते हैं। किसान धान बोकर चला जाता है, नौकरी-पेशे वाला छुट्टी लेकर चला जाता है।
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एक और विरोधाभास देखने को मिलता है। कुछ तो कहते हैं कि इस दौरान अपराध बढ़ जाते हैं क्योंकि घर के लोग तो कांवड़ लेने चले जाते हैं। घर पर रहते हैं महिलाएं और बच्चे, तो अपराधियों का काम आसान हो जाता है। वहीं कुछ कहते हैं कि अपराध घट जाते हैं क्योंकि अपराधी कांवड़ लेने चले जाते हैं।
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आजकल जितने उत्साह से कांवडिये कांवड़ ला रहे हैं, उतने ही उत्साह से कांवड़ निन्दक भी लगे पड़े हैं। एक से बढ़कर एक नुकसान गिना रहे हैं कांवड़ यात्रा के। सबसे बड़ा नुकसान बताते हैं कि आम जनता को परेशानी होती है। अरे निंदकों, तुम पहली चाल में ही धोखा खा गए। ये जो रोजाना लाखों लाख कांवडिये जा रहे हैं, आ रहे हैं, क्या तुम्हे इनके चेहरे पर परेशानी दिखती है? क्या ये आम जनता नहीं हैं? मान लो कि एक परिवार से एक व्यक्ति कांवड़ लाने गया हुआ है, तो इन दस दिनों में कम साठ लाख से ज्यादा कांवडिये, उनके परिवार, उनके पडोसी, रिश्तेदार, दोस्त सभी ख़ुशी मना रहे हैं, यानी परेशान नहीं हैं। तो बताओ, परेशान कौन है? परेशान हो तुम। तुमसे इनकी ख़ुशी देखी नहीं जा रही है।
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चलो, अब अपनी दूसरी चाल निकालो। भाई वाह!!! क्या चीज ढूंढकर लाये हो! "दिल्ली-हरिद्वार हाईवे बंद हो जाता है। जिन्दगी थम जाती है। लोग घरों में कैद हो जाते हैं।" तो निन्दकों, यहाँ भी तुम गलती कर रहे हो। हम तो सब बेवकूफ हैं, एक तुम्ही समझदार रह गए हो। किसने कहा कि हाईवे बंद हो जाता है? केवल ट्रैफिक डायवर्ट होता है, बंद नहीं होता। एक और अजीब बात सुनो। प्रशासन हरिद्वार हाईवे को बंद कर देता है, लेकिन फिर भी हरिद्वार जाने वाली बसें सबसे ज्यादा संख्या में होती हैं। सोचो, अगर हाईवे बंद ना हो, तो क्या होगा? अजी कुछ होगा ही नहीं। ना तो ट्रैफिक ही चल पायेगा, ना ही कांवडिये। रूट बदल देने से दोनों चल रहे हैं। इसलिए रूट बदलना भी गलत नहीं है।
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अब आते हैं अगली बात पर कि जिन्दगी थम जाती है। लोग घरों में कैद हो जाते हैं। अरे बेबुद्धियों, जिन्दगी थमती नहीं है, बल्कि चल पड़ती है। और लोग? वे तो घरों में रुकते ही नहीं हैं। कांवड़ यात्रा ही तो है, कोई कर्फ्यू थोड़े ही लगा होता है। रुड़की, मुजफ्फरनगर, खतौली, मेरठ जैसे शहरों में शाम को ऐसा लगता है कि जैसे पूरा शहर ही सड़क पर आ गया हो। कांवडियों से भी ज्यादा नॉन-कांवडिये होते हैं। डिवाईडरों पर भी बैठे होते हैं। बच्चे तो कांवडियों से छेड़छाड़ व मजाक भी करते हैं। पानी व शिकंजी पिलाने की होड़ लगी होती है। गर्मागर्म दूध, खीर, हलुवा, पूरी-सब्जी व फलों के तो कहने ही क्या!!! सड़कों पर स्पेशल लाइटिंग की व्यवस्था होती है। दूर-दूर के गांवों से भी लोग बुग्गी व ट्रैक्टर-ट्रोली में बैठकर आते हैं कांवडियों को देखने। अरे निन्दकों, तुम अभी किस दुनिया में जी रहे हो? निकलो, घर से बाहर तो निकलो। कांवडिये कोई गैर नहीं होते, सभी तुम्हारी ही शक्ल-सूरत वाले, नौकरी-पेशे वाले होते हैं। इनसे तुम्हे डरने की जरुरत नहीं है। ये तुम्हे खा नहीं जायेंगे। और हाँ, मारेंगे भी नहीं।
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और हाँ, तुम कहते हो कि एम्बुलेंस, पानी, दूध, फल-सब्जी जैसी जरुरी सेवाएँ भी ठप हो जाती हैं। ये सोचना भी गलत है। चूंकि सड़क पर कोई और ट्रैफिक तो होता नहीं है, इसलिए ये गाडियां फर्राटे से दौड़ती हुई चलती हैं। कोई नहीं रोकता इन्हें। कांवडिये भी हूटर व हार्न की आवाज सुनते ही तुंरत साइड दे देते हैं।
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कहते हो कि लोग फ्री में खाने के लिए कांवड़ लाते हैं। क्योंकि रास्ते में भंडारे बहुत होते हैं। भंडारे तो खैर बरला छपार के बाद (70 किलोमीटर) ही मिलते हैं। हाँ, रास्ते में कहीं-कहीं हलुवा जरुर मिल जाता है। और हाँ, भंडारे में केवल कांवडिये ही नहीं होते, कांवड़ ना लाने वाले भी बहुत होते हैं। हम भी पांच साल पहले तक टोली बनाकर मेरठ जाया करते थे- भंडारे में खाने के लिए। आज भी भंडारों में कांवडियों से ज्यादा नॉन-कांवडिये होते हैं।
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चलो ये बताओ कि अगर भंडारे ना हों, तो क्या लोग कांवड़ लाना बंद कर देंगे? अरे, कांवड़ तो हजारों सालों से लाई जा रही है। यह तो हमारी बहुरंगी संस्कृति का हिस्सा है। कांवडिये तो शिवजी का रूप होते हैं। जब हम कांवड़ लेकर गांव में आते हैं, तो बच्चे हमारे पैर छूते हैं। वे बच्चे, जो पूरे साल किसी के पैर छूना तो दूर, नमस्ते तक भी नहीं करते।
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तो आज इस मौके पर प्रतिज्ञा करो कि अब के बाद ना तो कांवडियों को बुरी नजर से देखेंगे, ना ही इन्हें दी जाने वाली सुविधाओं को कोसेंगे।
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Monday, July 13, 2009

कांवडिये कृपया ध्यान दें!

पिछली पोस्ट: लैंसडाउन यात्रा- 3
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सावन आ गया है। कांवड़ यात्रा शुरू हो चुकी है। राजस्थानी कांवडिये तो हरिद्वार से जल लेकर मेरठ पार करके दिल्ली को भी पार कर रहे हैं। दिल्ली वाले कांवडिये हरिद्वार पहुँच चुके हैं या पहुँचने ही वाले हैं। गाजियाबाद व मेरठ व आस पास वाले भी एक दो दिन में पहुँच रहे हैं। कांवडियों की बढती तादाद के मद्देनजर प्रशासन भी चौकस है। हरिद्वार से मेरठ तक तो नेशनल हाईवे बंद हो गया है। दो दिन बाद मेरठ-दिल्ली रोड भी बंद हो जायेगी।
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ऐसी परिस्थिति में व्यवस्था बनाये रखने की सारी जिम्मेदारी कांवडियों की ही हो जाती है। तो मैं यहाँ पर कुछ बातें लिख रहा हूँ, अगर किसी कांवडिये ने पढ़ ली और इन पर अमल करने की कसम खा ली तो उसे कांवड़ लाने के बराबर ही पुण्य मिलेगा।
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- तुम जब कांवड़ लाते हो, तो उस समय भगवन शंकर का प्रतिरूप होते हो, इसीलिए तुम्हे 'भोले' कहा जाता है। तो कोई भी ऐसा काम मत करो जिससे भोले की प्रतिष्ठा व मान-मर्यादा को ठेस पहुंचे।
- कभी भी कांवड़ लाते समय किसी से तेज चलने की या गंतव्य तक पहले पहुँचने की प्रतियोगिता मत करो।
- कांवड़ वैसे तो नंगे पैर ही लायी जानी चाहिए, लेकिन चप्पल व जूते पहनना भी कोई बुरी बात नहीं है।
- इस दौरान साबुन व तेल का प्रयोग बिलकुल वर्जित है।
- गंगा जी में कुछ भी मत डालो, यहाँ तक कि पुरानी टूटी हुई कांवड़ भी नहीं। पुरानी कांवडों को उन दुकानदारों को दे देना चाहिए जो नई कांवड़ बनाते हैं। इससे गंगा जी भी प्रदूषित नहीं होगी और कांवड़ की खपच्चियों का दोबारा उपयोग भी हो जाता है।
- कांवड़ ही सबसे पवित्र चीज है, इसकी पवित्रता बरकरार रखनी चाहिए। इस पर कोई भी कपडा सूखने जैसे कि निकर, तौलिया नहीं डालना चाहिए। नहाने के बाद निकर को सिर पर रख लो, तौलिये को लपेट लो, थोडी देर में अपने आप सूख जायेंगे।
- रास्ते में लोग-बाग भण्डारे करते हैं, पानी-शरबत पिलाते हैं, फल व मिठाई बांटते हैं, फ्री चिकित्सा करते हैं; कभी सोचा है कि क्यों करते हैं ये सब? पुण्य कमाने के लिए। कांवड़ लाकर कांवडियों को जो पुण्य मिलता है उसमे से ही इन्हें भी मिलता रहता है। इस तरह कांवडियों का पुण्य कम होता जाता है। अपना पुण्य कम ना हो, इसके लिए निम्न काम करें : भण्डारे में खाएं तो दान पात्र में दान जरूर करें, कहीं अगर फल व मिठाई मिलते हैं तो आगे कहीं बच्चों को दे दें, या गरीबों को दे दें।
- कभी भी नशा ना करें। भांग का प्रयोग भी ना करें।
- कभी भी आगे वाले 'भोले' से आगे निकलने के लिए साइड ना मांगें। पूरी सड़क है, खुद ही थोडा साइड में होकर आगे निकल जाएँ।
- चाहे कुछ भी हो, सड़क के किनारे शौच ना करें। कुछ बेवकूफ कांवडिये रात को सड़क के किनारे ही बैठ जाते हैं।
- चूंकि लम्बी दूरी तय करनी होती है, तो रोजाना अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही चलें। साधारणतया प्रतिदिन चालीस किलोमीटर से ज्यादा ना चलें।
- गर्मी का मौसम है तो ऐसे में डीहाइड्रेशन होने की पूरी सम्भावना रहती है। तो चाहे प्यास लगे या न लगे, थोडी थोडी देर में पानी जरुर पीते रहें।
- सोकर उठने के बाद व शौच के बाद कांवड़ उठाने से पहले नहाना जरुरी होता है।
और अंत में,
मंगलौर से खतौली होते हुए मुरादनगर तक गंगनहर के किनारे-किनारे कांवड़ यात्रा मार्ग अब बेहतरीन हो चुका है। इसलिए इस मार्ग का अधिक से अधिक उपयोग करें। मंगलौर रुड़की से 10 किलोमीटर व हरिद्वार से 40 किलोमीटर की दूरी पर है। इस मार्ग से सफ़र करने पर हाईवे के मुकाबले 20 किलोमीटर कम पड़ता है। इस पर हरियाली व छाया भी ज्यादा है। यह नहर पूरे रास्ते दाहिने रहती है यानी पश्चिम की ओर। तो पछुवा हवा यानी लू जब चलती है तो पानी के संपर्क में आकर ठंडी हो जाती है तो लू भी नहीं लगती।
बस, अभी तो मेरे दिमाग में कांवडियों के लिए इतनी ही बातें आई हैं, आपके दिमाग में कुछ आ रहा हो तो बता दें।
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Thursday, July 9, 2009

लैंसडाउन यात्रा - 3

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28 जून 2009, रविवार। दोपहर के दो बजे तय हुआ कि नहाते हैं। अभी तक हमने मुहं तक भी नहीं धोया था। अच्छा, इससे पहले एक बात और। लैंसडाउन के निवासियों को पानी की थोडी कमी रहती है। हर दो दिन बाद मिलिट्री का टैंकर आता है। पानी की सारी पूर्ति इसी टैंकर से होती है। कल टैंकर आया था, आज नहीं आएगा। फिर भी खाने पीने के लिए थोडा पानी बचा के रखा हुआ था। इतना नहीं था कि हम नहा सकें।
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हमें बताया गया कि वहां उधर कालेश्वर मंदिर के पास एक हैंडपंप है। उसी के पास शौचालय भी है। तो बाल्टी व मग्गा लेकर हम चल पड़े- नहाने। कालेश्वर मंदिर के पास पहुंचे। देखा कि हैंडपंप पर कुछ बच्चे कपडे धो रहे हैं। नरेश ने कहा कि यार, यहाँ पर नहाना पड़ेगा हमें? बड़ी शर्म सी आएगी। लेकिन नहाना तो था ही। नरेश ने बच्चों से पूछा- "क्या इस हैंडपंप में पानी आता है?"
"हाँ, लेकिन ऐसे नहीं आएगा। चलाने पर ही आएगा। क्यों, क्या करना है तुम्हे?"
"यार, नहाना है।"
"नहाओगे? इसके पानी में नहाओगे?"
"हाँ।"
"अजी, इस पानी में तो हम भी नहीं नहाते। बहुत ही गन्दा पानी आता है।"
मैंने कहा कि यार, थोडा बहुत चलाकर तो देख। देखते हैं कैसा पानी है। नरेश ने दो तीन बार हैंडल चलाया। बच्चों ने कहा कि चलाते रहो, पानी आ जायेगा। चलाते रहे तो थोडी देर बाद टप-टप। बूँद-बूँद करके बिलकुल पीला पानी आने लगा।
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ऐसे पानी में तो नहाने का सवाल ही नहीं उठता। थोडा ऊपर ही शौचालय था। बच्चों ने बताया कि शौच के लिए तो वहां पर पानी मिल ही जायेगा। ऊपर पहुंचे। वहां से भी पानी नदारद। फिर नीचे आये। आधी बाल्टी पानी भरा हैंडपंप से। उसे ऊपर ले गए। मैं तो गया नहीं था। काम निपटा कर जब नरेश नीचे आया तो बोला-" आ हा हा !!! सुबह से ही प्रेशर बना हुआ था। अब जाकर सुकून मिला है।"
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बाल्टी वापस रखकर हम छावनी की तरफ निकल गए। इरादा तो संग्रहालय देखने का था। लेकिन आज वह बंद था। चलते रहे तो एक मंदिर मिला- दुर्गा देवी मंदिर। क्या साफ़-सुथरा और कलात्मक मंदिर !!! एक बार तो हम 'गंधीलों' ने सोचा कि जाएँ या ना जाएँ। आखिरकार अन्दर चले ही गए। एक फौजी पुजारी साफ़-सफाई में मस्त था।
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यहाँ से निकलकर कालेश्वर मंदिर जा पहुंचे। अभी तक हम इसके सामने से जाने कितनी बार गुजर चुके थे।
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" कालेश्वर मंदिर लैंसडाउन का सबसे प्राचीन स्मारक है। कहते हैं कि 5000 वर्ष पहले यहाँ पर कालुन ऋषि तपस्या करते थे। उन्ही के नाम से इसका नाम कालेश्वर पड़ा। 5 मई 1887 में गढ़वाल रेजिमेंट की स्थापना हुई और 4 नवम्बर 1887 में रेजिमेंट की प्रथम बटालियन यहाँ पहुंची। उस समय यहाँ वीरान जंगल था। यहाँ पर एक गुफा में शिवलिंग था, जो कालेश्वर के नाम से जाना जाता था। यह निकटवर्ती गांवों का ग्राम देवता था। जनश्रुति के अनुसार गाँव वालों की गायें शिवलिंग के ऊपर स्वतः अपने थनों से दूध गिराती थीं। श्रृद्धा भक्ति से लोग जो मन्नत मांगते थे, वह अवश्य पूरी होती थी।
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प्रथम गढ़वाल ने 1901 में यहाँ पर एक छोटा सा मंदिर व धर्मशाला बनवाया। 1926 में मंदिर का विशद निर्माण सार्वजनिक रूप से किया गया। मंदिर की पूजा-अर्चना साधू-महात्मा करते थे। अन्य व्यस्था गढ़वाल रायफल रेजिमेंटल केंद्र करता रहा।
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1995 में मंदिर का पुनर्निर्माण गढ़वाल रायफल रेजिमेंटल केंद्र ने करवाया तथा 1999 में रेजिमेंटल केंद्र द्वारा ही मंदिर के बाहर मौजेक प्रांगण का निर्माण कराया गया। मंदिर की पूजा-अर्चना व देखभाल गढ़वाल रायफल रेजिमेंटल केंद्र द्वारा की जाती है।"
(मन्दिर के बाहर लगे शिलालेख से)
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इतना घूमते-घूमते हमें पांच-साढे पांच बज गए। बस, अब तो हमें वापस चलना ही था। वापस चलने लगे तो उन 'रिश्तेदारों' ने हिदायत दी कि अगली बार जब भी आओगे, तो अकेले मत आ जाना। बाल-बच्चों को लेकर आना। सभी से विदा ली, जीप स्टैंड पहुंचे। कोटद्वार पहुंचे। तुरंत ही नजीबाबाद की ट्रेन मिल गयी। नजीबाबाद से मेरठ डिपो की बस मिल गयी और बिजनौर, मीरांपुर, मवाना, मेरठ, मोदीनगर, मुरादनगर, मोहननगर होते हुए रात को एक बजे तक दिल्ली।
(अरे भाई, ये खाली बाल्टी लेकर कहाँ जा रहे हो? ऊपर पानी नहीं है।)
(मैंने कहा था ना कि ऊपर पानी नहीं है। चलो, अब नीचे से लाओ।)
(भाई, तू तो कतई जी छोड़ रहा है। खड़े होकर नहीं खींच सकता?)
(अरे, इतना क्यों खाया था? कि थोडी बहुत देर रुक भी नहीं सकता।)
(यह है दुर्गा देवी मन्दिर। है ना कमाल की साफ़ सफाई?)
(पुजारी जी, लेफ्ट-राईट-लेफ्ट-राईट छोड़ दी क्या? )
(अजी, हाथ मेरी तरफ़ को जोड़ रहे हो या... )
(दुर्गा देवी मन्दिर का इतिहास लिखा है इस पर।)
(ये है इसी मन्दिर का साइड व्यू।)
(इसे कहते हैं कालेश्वर मन्दिर। वो जो एक बन्दा दिख रहा है जरा उसे पहचानना।)
(कोई बताना जरा। कालेश्वर मन्दिर में घंटियाँ चढाई जाती हैं क्या?)
(ये है लैंसडाउन का नजारा।)
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नरेश जी प्रयास के नाम से "यह भी खूब रही" ब्लॉग लिखते हैं।
अगली यात्रा- कांवड यात्रा

लैंसडाउन यात्रा श्रंखला
1. लैंसडाउन यात्रा- 1
2. लैंसडाउन यात्रा- 2
3. लैंसडाउन यात्रा- 3

Monday, July 6, 2009

लैंसडाउन यात्रा -2

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मुख्य बाजार में पहुंचे। पूछ-ताछ करते रहे, टिपिन टॉप (टिप-इन-टॉप) की ओर चलते रहे। टिपिन टॉप के बारे में हमने अंदाजा लगाया कि यह लैंसडाउन की उच्चतम चोटी ही होगी। कोहरे की वजह से चोटी दिख भी नहीं रही थी। चढाई तो खैर थी ही। एक जगह हम कन्फ्यूजिया गए। ये वाली रोड जायेगी या वो वाली? बताने वाला कोई था ही नहीं। हम अंदाजे से आगे बढ़ते रहे। टिपिन टॉप तो पहुंचे नहीं, विश्व प्रसिद्द चर्च में पहुँच गए। इसे क्वींस लाइन भी कहा जाता है।
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चर्च के अन्दर तो क्या बाहर भी दूर-दूर तक कोई नहीं था। हमने भी बाहर से फोटो-वोटो खींचे। और चलते बने। रास्ते में एक वो पड़ता है- गढ़वाल मंडल वालों का रेस्ट हाउस। यहीं पर उन्होंने दो कोटेज भी बना रखी हैं। यहाँ पर कुछ टूरिस्ट थे, टूरिस्टनी भी थीं। उनके देखा-देखी हमने भी चाय का आर्डर दे दिया।
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अरे हाँ, एक ख़ास बात तो भूल ही गया। यहीं बराबर में ही टिपिन टॉप है। टिपिन टॉप के उस तरफ क्या जबरदस्त खाई!!! खाई नहीं घाटी। कोहरे के कारण पूरी घाटी नहीं दिखी। इस घाटी में नीचे जयहरीखाल गाँव दिखता है। यह लैंसडाउन-पौडी मार्ग पर गुमखाल से पहले पड़ता है। एक बार तो मन में आया कि चलो, पैदल जयहरीखाल चलते हैं। लेकिन नरेश ने मना कर दिया।
(जयहरीखाल गाँव)
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यहाँ से आधेक किलोमीटर आगे संतोषी माता का मंदिर है। कुछ दूर तक तो सड़क है, फिर 70-75 सीढियां चढ़नी होती हैं। कोहरे के कारण पेडों से गिरती टप-टप बूंदों से सीढियां गीली हो गयी थीं। छोटा सा साफ़-सुथरा मंदिर। यहाँ चारों तरफ बांज का जंगल है। यहाँ भी हमारे अलावा कोई नहीं था। बस केवल जंगल का सन्नाटा और बूंदों की टप-टप। हम यहाँ डेढ़-दो घंटे तक बैठे रहे। इन वादियों में आकर तो ऐसा लगता है कि क्या है दिल्ली-विल्ली? चलो, छोडो दिल्ली को और यहीं बस जाओ।
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दोपहर एक बजे यहाँ से वापस चल पड़े। एक बार फिर रास्ता भटक गए। इस बार जा पहुंचे भुल्ला ताल। यहाँ छोटे-से कृत्रिम ताल में बोटिंग होती है। पर्यटकों की अच्छी-खासी भीड़ भी थी।
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नरेश के एक दोस्त रहते हैं यहाँ। वहीं पर हम रुके हुए थे। यहाँ घूमफिरकर वापस आते ही दाल-चावल मिल गए। खा-पीकर कुछ देर तक तो पड़े रहे, फिर सोचा कि चलो, नहा लें। सुबह से क्या, कल से अभी तक मुहं भी नहीं धोया था। तय हुआ कि नहा-धोकर बाकी लैंसडाउन देखेंगे।
(यहाँ पर आधुनिकता भी है)
(बांज का जंगल)
(कोहरा ही कोहरा)
(पूरा भारत गर्मी से जल रहा था, लेकिन यहाँ शीतलहर चल रही है)

लैंसडाउन यात्रा श्रंखला
1. लैंसडाउन यात्रा- 1
2. लैंसडाउन यात्रा- 2
3. लैंसडाउन यात्रा- 3

Thursday, July 2, 2009

लैंसडाउन यात्रा -1

पहले परिचय- लैंसडाउन उत्तराखंड के पौडी गढ़वाल जिले में है। इसकी समुद्र तल से ऊँचाई लगभग 1500 मीटर है। यहाँ गढ़वाल रेजिमेंट का मुख्यालय भी है। सारा प्रशासन मिलिट्री के ही हाथों में है।
क्या देखें- लैंसडाउन में कुछ भी देखने के लिए पहले यहाँ जाना पड़ता है।
कैसे जाएँ- यहाँ जाने के लिए पौडी जाने की जरुरत नहीं है। कोटद्वार से ही काम चल जाता है। कोटद्वार से दूरी 42 किलोमीटर है। कोटद्वार से 20 किलोमीटर आगे दुगड्डा है।
दुगड्डा
यहाँ से थोडा आगे एक सड़क बाएं मुड़कर पौडी को चली जाती है और एक दाहिने मुड़कर लैंसडाउन जाती है। लैंसडाउन सालभर में कभी भी जाया जा सकता है। रुकने के लिए गढ़वाल मंडल विकास निगम के रेस्ट हाउस हैं तथा होटल भी हैं। यहाँ पर कभी-कभी जाडों में बरफ भी गिरती है।
और अब यात्रा वृत्तान्त
27 जून 2009, शनिवार। बहुत दिन पहले ही योजना बन गयी थी कि लैंसडाउन जायेंगे। हर बार की तरह फिर वही दिक्कत। किसे साथ लें??? आखिरकार रामबाबू ने हाँ भर ली। उसके और अपने नाम का रिजर्वेशन भी करा लिया। मसूरी एक्सप्रेस (4041) में स्लीपर का। लेकिन पांच-छः दिन पहले प्रयास वाले नरेश जी बीच में कूद पड़े। बोले कि हम भी जायेंगे। मैंने फटाफट रामबाबू को मना कर दिया।
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वैसे नरेश और मुझमे कई समानताएं हैं। जैसे कि रात को सफ़र कर लेना, ट्रेन को वरीयता देना, स्टेशन पर आलू-पूरी खाना, ज्यादा स्मार्टनेस ना दिखाना, एक दूसरे की बातों को सुनना, सही लगी तो ठीक वरना दूसरे कान से बाहर निकाल देना। लेकिन एक अंतर भी है। वे बाल-बच्चों वाले हैं जबकि मैं अभी खुद ही बाल-बच्चा हूँ।
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खैर, 28 जून रविवार को सुबह छः बजे हम कोटद्वार पहुँच गए। मेरी तो आँख कोटद्वार से जरा सा पहले ही खुली थी। जबकि नरेश आँख मीचे पड़े हुए थे। बाद में पता चला कि उन्होंने नजीबाबाद में चाय पी थी। पता भी कैसे चला? उनके कैमरे में फोटो देख रहा था तो बर्थ पर रखा कुल्हड़ भी दिख गया। अभी भी नजीबाबाद में कुल्हड़ वाली चाय मिलती है।
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स्टेशन से बाहर निकले भी नहीं थे कि 'लैंसडाउन, लैंसडाउन' चिल्लाते हुए जीप वालों ने घेर लिया। जब उन्हें पता चला कि हम भी वही जायेंगे तो हमें जीप में ठूंसकर जीप को भगा दिया। कोटद्वार से निकलते ही वही पहाडी व जलेबी की तरह गोल-गोल सड़क। दुगड्डा, फिर फतेहपुर, फिर पता नहीं क्या-क्या आया और फिर लैंसडाउन।
दुगड्डा के पास खोह नदी
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यहाँ नरेश के कोई जान-पहचान वाले रहते हैं। उन्होंने मुझे कई बार बताया कि क्या जान-पहचान है लेकिन मेरे भी दोनों कान खुले हैं, दूसरे कान से बाहर निकल गया। कालेश्वर रोड पर रहते हैं वे। दुमंजिले मकान में ऊपर वाली मंजिल पर रहते हैं।
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यहाँ सभी मकान फौज के अधीन हैं। आज भी लैंसडाउन वाले मिलिट्री को मकान किराया देते हैं। वैसे नाममात्र का ही किराया है। जिनकी 'औकात' होती है वे जमीन खरीदकर अपना मकान भी बना लेते हैं। इसके अलावा यहाँ की एक और खासियत है कि जैसा अंग्रेज इसे छोड़कर गए थे यह आजतक वैसा का वैसा ही है। यह शहर एक पहाड़ की चोटी पर बसा है। इस कारण यहाँ पानी की भारी कमी है। दो-दो दिन बाद मिलिट्री का टैंकर आता है।
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ऊपर वाली मंजिल पर जाने के लिए जैसे ही लकडी के जीने पर पैर रखा, तभी 'भाड़'। लकडी की चौखट में सिर जा टकराया। सिर को मसलता हुआ ऊपर चढ़ गया। कमरे में घुसा तो एक बार फिर 'भाड़'। छत से जा भिडा। हे भगवान्!!! मैं तो इतना लम्बा भी नहीं हूँ फिर क्यों झुकने को कह रहे हो?
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चाय बनवाई गयी। नरेश के साथ मैडम के हाथ की बनी कल शाम की सब्जी व परांठे थे। सब्जी खराब नहीं थी तो खा ली। अब टारगेट बनाया घूमने का। पहले राउंड में टिप-इन-टॉप व संतोषी माता मंदिर और दूसरे राउंड में बाकी लैंसडाउन। बैग यही पर छोड़ दिए। साथ में पानी की बोतल ली और निकल पड़े।
लैंसडाउन में कोहरा पड़ रहा था

लैंसडाउन यात्रा श्रंखला
1. लैंसडाउन यात्रा- 1
2. लैंसडाउन यात्रा- 2
3. लैंसडाउन यात्रा- 3