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Saturday, January 31, 2009

दूर दूर तक प्रसिद्द है मेरठ का गुड

जब मैं गुडगाँव में रहता था तो मुझसे दिल्ली के एक दोस्त ने पूछा कि यार, ये जो गुड होता है ये कौन से पेड़ पर लगता है? मैंने कहा कि इस पेड़ का नाम है गन्ना। तो बोला कि गन्ने पर किस तरह से लगता है? डालियों पर लटकता है या गुठली के रूप में होता है या फिर तने में या जड़ में होता है। मैंने कहा कि यह गन्ने की डालियों पर प्लास्टिक की बड़ी बड़ी पन्नियों में इस तरह पैक होता है जैसे कि बड़ी सी टॉफी। लोगबाग इसे पन्नियों में से बाहर निकाल लेते हैं और पन्नियों को दुबारा टांग देते हैं। उसके मुहं से एक ही शब्द निकला- आश्चर्यजनक।

Sunday, January 25, 2009

ऐसे मनाते थे हम 26 जनवरी

छब्बीस जनवरी मतलब वो दिन जब हम स्कूल तो जाते थे, लेकिन बिना बस्ते के और बिना तख्ती के। हमें पता होता था कि आज स्कूल में मिठाई मिलेगी। मिठाई क्या, सभी बच्चों को गिनती के पाँच पाँच बतासे मिलते थे। अब उनमे से एक दो तो हम ऐसे ही खा जाते थे, दो तीन बतासे बचाकर माँ को भी देने पड़ते थे।
हम दोनों भाईयों में होड़ लगी होती थी कि कौन ज्यादा बतासे बचाए। इसके लिए हम दूसरे स्कूलों को भी नही छोड़ते थे। हमारे इस प्राईमरी स्कूल के बगल में ही है इंदिरा स्कूल। मतलब इंदिरा गाँधी जूनियर हाई स्कूल। जो रुतबा कानपुर में ग्रीन पार्क का है, कोलकाता में ईडेन गार्डन का है, मुंबई में वानखेडे स्टेडियम का है, और दिल्ली में फिरोज़ शाह कोटला का है; वही बल्कि उससे भी ज्यादा रुतबा हमारे गाँव में इंदिरा स्कूल के एक बीघे के मैदान का है। सुबह नौ दस बजे से दोपहर बाद दो तीन बजे तक तो स्कूल चलता था। स्कूल बंद हुआ नही, गाँव के अन्य बच्चों से लेकर शादीशुदाओं तक का जमघट लग जाता था।

Thursday, January 8, 2009

चलो, हैदराबाद चलते हैं - एक रोमांचक रेलयात्रा

मई 2008 के पहले सप्ताह में एक लैटर आया। रेलवे सिकंदराबाद की तरफ़ से। कह रहे थे की भाई नीरज, हम 22 जुलाई को जूनियर इंजीनियर की परीक्षा का आयोजन कर रहे हैं, तू भी आ जाएगा तो और चार चाँद लग जायेंगे। मैं ठहरा ठलुवा इंसान। तुंरत ही तैयारी शुरू कर दी। इधर मैंने तो 19 जुलाई का दक्षिण एक्सप्रेस (गाड़ी नंबर 2722) का रिजर्वेशन कराया, उधर बापू ने हैदराबाद में मेरे रहने का इंतजाम भी कर दिया। हमारे पड़ोसी फौजी राजेन्द्र सिंह की तैनाती वही पर थी। वापसी का रिजर्वेशन कराया मैंने आन्ध्र प्रदेश संपर्क क्रांति एक्सप्रेस (गाड़ी नंबर 2707) से 23 जुलाई का। यानी कि मुझे हैदराबाद पहुँचते ही ख़ुद को राजेन्द्र भाई के हवाले कर देना था। आगे का सिरदर्द उन्ही का था।

Tuesday, January 6, 2009

25000 किलोमीटर की रेल यात्रा

अब तक मैंने 25000 किलोमीटर की रेल यात्रा पूरी कर ली है। पहली बार जब मैं रेल में अप्रैल 2005 में बैठा था, उस समय मैंने ये बात तो सोची भी नहीं थी। प्रमाण के तौर पर शुरूआती पाँच छः यात्राओं को छोड़कर और कुछ बेटिकट यात्राओं को छोड़कर मेरे पास सभी टिकट सुरक्षित रखे हैं। आओ शुरू करते हैं कुछ सांख्यिकीय तथ्यों से:
अभी तक कुल मिलाकर छोटी बड़ी 210 यात्राएं की हैं। जिनमे से 109 बार पैसेंजर ट्रेनों से 7562 किलोमीटर, मेल/एक्सप्रेस ट्रेनों से 80 यात्राओं में 10428 किलोमीटर, और सुपर फास्ट ट्रेनों से 21 यात्राओं में 7031 किलोमीटर का सफर। सबसे लम्बी यात्रा रही 1660 किलोमीटर की दो बार, जब दक्षिण एक्सप्रेस से निजामुद्दीन से सिकंदराबाद गया था और आन्ध्र प्रदेश संपर्क क्रांति एक्सप्रेस से वापस आया था। सबसे छोटी यात्रा रही 4 किलोमीटर की जब मेरठ सिटी से मेरठ छावनी गया था।

Monday, January 5, 2009

चले थे सहस्त्रधारा, पहुँच गए लच्छीवाला


इस रविवार को हमारा घूमने का कार्यक्रम बना-सहस्त्रधारा जाने का। सहस्त्रधारा देहरादून से आगे पहाडों में घने जंगलों के बीच स्थित है। सुबह कपड़े वपड़े धोकर और नहाकर मैं और सचिन निकल पड़े। हरिद्वार पहुंचकर देहरादून का टिकट लिया। उस दिन सभी ट्रेनें कम से कम चार घंटे लेट थी। तो हमें सुबह सात बजे आने वाली लाहौरी एक्सप्रेस (गाड़ी नंबर 4632 ) ग्यारह बजे मिल गई। बारह बजे तक तो यह हरिद्वार में ही खड़ी रही।

जब मुझ पर लगा रेल में जुरमाना

अपनी बेरोजगारी के दिनों में एक बार कुरुक्षेत्र जाना हुआ। सन 2007 के दिसम्बर महीने की छः तारीख को। मेरे साथ रोहित भी था। वापसी में कुरुक्षेत्र से गाजियाबाद जाना था। हमें कुरुक्षेत्र रेलवे स्टेशन से ट्रेन मिली अमृतसर-दादर एक्सप्रेस (गाड़ी नंबर- 1058) । नई दिल्ली से दूसरी ट्रेन बदलनी थी।
अब एक तो जाडे के दिन, दूसरा शाम का समय। हमें जनरल डिब्बे में घुसने की तो दूर, लटकने तक की भी जगह नहीं मिली। मजबूरी में ना चाहते हुए भी शयनयान डिब्बे में जा घुसे। जब तक सूरज नहीं छिपा, तब तक हम खिड़की पर ही बैठे रहे। पानीपत के बाद दिन छिपने पर ठण्ड बढ़ने के कारण हमने खिड़की बंद कर ली। हमारे साथ और भी हमारे जैसे ही कई यात्री बैठे हुए थे।