Monday, November 2, 2009

करोल के जंगलों में

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आपने पढ़ा कि किस तरह मैं सोलन जा पहुंचा। सोलन हिमाचल प्रदेश में स्थित है और कालका-शिमला के बिलकुल बीच में है। मुझे यहाँ से आगे करोल टिब्बा जाना था। इसके पास ही कोई प्रसिद्ध गुफा है। सोलन से दो-तीन किलोमीटर आगे चम्बाघाट है। चम्बाघाट से करोल जाने के लिए पैदल चलना पड़ता है।
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यहाँ से करोल जाने का जो रास्ता मुझे बताया गया, उसकी दिशा एक ऐसी पहाडी की ओर है जो ज्यादा ऊँची नहीं दिख रही थी। मेरा अंदाजा था कि वो गुफा व गुफा के पास बना एक मंदिर इस पहाडी के उस पार होना चाहिए। जल्दी ही चम्बाघाट क़स्बा भी पीछे छूट गया। अब मेरा साथ दे रहे थे केवल जंगल, पर्वत व कंक्रीट की बनी पगडण्डी। जितना ऊपर चढ़ता जा रहा था, चम्बाघाट व सोलन शहर भी उतने ही विहंगम लग रहे थे। कभी-कभी रास्ते में कोई मिल भी जाता था, उससे रास्ता कन्फर्म कर लेता था।
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तभी कुछ आगे ऊपर शोर सुनाई दिया - इंसानी शोर। शोर सुनकर ही लगभग मालूम पड़ जाता है कि यह शोर क्यों हो रहा है। मुझे लगा कि आठ-दस लड़के हैं और शायद वे भी करोल ही जा रहे हैं। वह एक हँसी-मजाक व तफरीह का शोर था। जल्दी ही मैं उनके पास जा पहुंचा। देखा कि काफी बड़ा ग्रुप है। इसमें कुछ लड़कियां व कुछ लड़के थे। खूब हा-हा, हू-हू करते हुए चल रहे थे। मेरी ये आदत है या कहिये कमी है कि मैं बाहर किसी से घुलमिल नहीं पाता हूँ। इसलिए उनसे बिना कुछ कहे सुने ही मैं आगे निकल गया। सभी के पास कमर पर लटके बैग थे तो जाहिर था कि वे भी करोल ही जा रहे होंगे।
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आगे एक महिला मिली। वे नीचे चम्बाघाट से ऊपर अपने गाँव जा रही थी। उन्होंने बताया कि गुफा अभी भी बहुत दूर है। कम से कम दो घंटे और लगेंगे। सीधे इसी पगडण्डी से चलते जाना, पहुँच जाओगे।
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आगे बिलकुल सीधी खड़ी चट्टान थी। यहाँ कंक्रीट की पगडण्डी नहीं थी। केवल कटर से चट्टान को काटकर रास्ता बना रखा था। यहीं पर एक चट्टान ऐसी काटी गयी थी कि दो दिशाओं में दो पगडंडियाँ जाती दिखाई दीं। मेरा दिमाग खराब हो गया कि किस रास्ते से जाऊं। अब मैंने एक ट्रिक सोची। यहीं बैठकर उस ग्रुप की प्रतीक्षा करने लगा। जब वे लोग पास आते दिखे, फटाफट चढ़कर एक पगडण्डी पर चलने लगा। और थोडी दूर जाकर फिर बैठ गया।
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मुझे देखना ये था कि वे लोग किस रास्ते से जायेंगे। अगर मेरी तरफ आये तो मेरी बल्ले-बल्ले हो जायेगी। और अगर दूसरी तरफ से चले गए तो मैं भी उनके पीछे-पीछे हो लूँगा। यानी कि दोनों हाथों में लड्डू। भटकूँगा नहीं। अच्छा, जब वे उस 'तिराहे' पर पहुंचे, तो उनका भी दिमाग खराब हो गया होगा। संयोग से उनमे से एक ने मुझे देख लिया। बस, फिर क्या था। सभी मेरी तरफ ही आने लगे।
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यहाँ से आगे भी पगडण्डी बहुत ही खराब हालत में थी। रास्ते में कोई मिल भी नहीं रहा था, इसलिए मुझे उस ग्रुप के साथ ही मिलना पड़ा। वे कुल सोलह जने थे - आठ लड़के व आठ लड़कियां। सोलन से लॉ स्टुडेंट थे यानी कानूनी छात्र। मेरा परिचय जानकार सभी आश्चर्यचकित रह गए कि तुम केवल करोल के लिए दिल्ली से यहाँ आये हो!
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अच्छा हाँ, हमने उस तिराहे से वो जो दूसरी पगडण्डी भ्रमवश छोड़ दी थी, वही असली रास्ता था। वही गुफा के पास से होता हुआ टिब्बे तक जाता था। इधर हम, थोडा आगे चलकर यह पगडण्डी ख़त्म होनी ही थी और ख़त्म हो भी गयी। अब हमारे आगे था चीड - देवदार का घना जंगल, घुटनों से ऊपर तक उगी घास। अब हम गुफा तक तो पहुँच ही नहीं सकते थे, टिब्बे पर पहुँच सकते थे। टिब्बा कहते हैं किसी पहाड़ की चोटी पर छोटा सा समतल भाग। चोटी पर पहुँचने के लिए हमें लगातार ऊपर चढ़ते रहना था। बिना किसी रास्ते के झाडियों में चलते हुए हम भी चढ़ते ही जा रहे थे। ज्यादातर झाडियाँ कंटीली थी। दल के सदस्य बारी-बारी से डंडे से कंटीली झाडियों को हटाते और तब बाकी वहां से निकलते।
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घंटा डेढ़ घंटा बीत गया। सभी में निराशा छाने लगी। एक ने कहा कि वापस चलो। लेकिन वापस भी नहीं जा सकते थे। आगे बढ़ रहे हैं तो आखिरकार चोटी पर पहुंचेंगे भी। अगर अभी वापस हो जायेंगे तो नीचे घाटी में खो जायेंगे। रास्ता भी नहीं मिलेगा।
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डेढ़ घंटे बाद। एक पगडण्डी मिली। यहीं वो पगडण्डी थी, जिसे हमने उस 'तिराहे' पर छोड़ दिया था। यह सीधी चोटी पर यानी टिब्बे पर जाती है। करोल के टिब्बे पर।

(जंगल के बीच में)
(कंक्रीट की पगडण्डी और पीछे सोलन शहर)
(ये टेढ़े मेढे रास्ते)
(यही तो हिमालय का आनंद है)
(मैंने कैमरे को एक झाड़ पर सेट कर दिया और टाइमर लगा दिया।)
(कंक्रीट की पगडण्डी ख़त्म। अब शुरू होती है खेतों के बीच से कच्ची पगडण्डी। इन खेतों में मक्का बो रखी है।)
(यहाँ टमाटर व शिमला मिर्च भी खूब बोई जाती है। अपने खेत से टमाटर इकट्ठे करता एक बालक। मैंने भी इससे बात करते-करते तीन-चार टमाटर खा डाले।)
(रास्ते में कई बुग्याल मिले। बुग्याल कहते हैं पहाड़ पर घास के मैदान को।वैसे बुग्याल एक गढ़वाली शब्द है।)
(यह एक ताल है जिसमे थोड़ा पानी था। है ना खूबसूरत नजारा!)
(इसके बारे में भी कुछ लिखने की जरुरत है?)
(रास्ता ढूंढो और आगे बढो।)
(चोटी से किन्नौर के बर्फीले पहाड़ भी दिख रहे थे। दूर एक हलकी सी लकीर दिख रही है।)


करोल टिब्बा यात्रा श्रंखला
1. चलो सोलन की ओर
2. करोल के जंगलों में
3. करोल टिब्बा और पांडव गुफा

9 comments:

  1. भारत जैसा कुछ कहीं और कहा...और फिर वह भी हिमाचल...इसे देवभूमि यूं ही नहीं कहते, स्वर्ग यहीं है.

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  2. @"यहीं पर एक चट्टान ऐसी काटी गयी थी कि दो दिशाओं में दो पगडंडियाँ जाती दिखाई दीं।"
    If u come across this situation again , look for wrappers of Gutkha,Pan masala , Fruity etc. The more popular the way ,more plastic it will have . U can try it in any tourist-forest of India and will never loose the way .

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  3. जंगल के रास्ते का विवरण पढकर शरीर में झुरझुरी सी हो रही है.

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  4. इतने बियाबान इलाके में एक दम अकेले और निहत्थे ? खैर, मज़े करो भाई लेकिन
    कोई कट्टा, तमंचा या चक्कू न सही कम से कम ताऊ रामपुरिया सरीखा लट्ठ तो ले जाते
    ये न समझो की मैं मज़ाक कर रहा हूँ ,असल में ये इलाका जंगली सूअर और लेपर्ड
    से भरा पड़ा है !

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  5. बहुत रोचक यात्रा संस्मरण लिख रहे हैं आप।सुन्दर चित्रो को देख हमारा मन भी करता है कि कभी हम भी ऐसी यात्रा पर जाएं....धन्यवाद।

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  6. अम्मा यार क्यूँ जलाते हो। वैसे आज की पोस्ट से दो शब्दों के अर्थ तो पता चले। एक टिब्बा दूसरा बुग्याल। फोटो भी अच्छी है।

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  7. आपके खींचे चित्र और फिर उनका वर्णन मुझे बार बार आपके ब्लॉग पर खींच लाता है...इंसान हो तो आप जैसा...घुमक्कड़...
    नीरज

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  8. किस्सा और चित्र दोनो ही रोचक हैं

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  9. मुनीश जी,
    आपके दूसरे कमेन्ट से तो शरीर में झुरझुरी सी हो गयी है. वैसे मुझे लगता है कि मैं लेपर्ड से तो सुलट लूँगा लेकिन जंगली सूअर खतरनाक होता है. आगे से ध्यान रखूंगा.

    @परमजीत जी,
    तो रोका किसने है. निकल पडो.

    @सुशील जी,
    यहाँ हिमाचल में बुग्याल शब्द सही नहीं लगता. यह गढ़वाल में बोला जाता है. हिमाचली में पता नहीं क्या बोला जाता है.

    @नीरज गोस्वामी जी,
    आपका बहुत बहुत धन्यवाद.

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